मोहन राकेश द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक / एकांकी 'अंडे के छिलके' में बीना परिवार की बड़ी बहू है।
मोहन राकेश के एकांकी अंडे के छिलके के आधार पर बीना का चरित्र चित्रण
मोहन राकेश द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक / एकांकी 'अंडे के छिलके' में बीना परिवार की बड़ी बहू है। वह इस एकांकी की एक अत्यंत जीवंत, आधुनिक और व्यावहारिक पात्र है। एकांकी में बीना का चरित्र मध्यवर्गीय परिवार में पुरानी और नई पीढ़ी के विचारों के बीच संतुलन बनाने वाली स्त्री का प्रतीक है।
मोहन राकेश द्वारा विरचित एकांकी 'अण्डे के छिलके' में तीन पुरुष - पात्र एवं तीन नारी पात्र हैं। इनमें गोपाल की पत्नी बीना का व्यक्तित्व शेष सभी पात्रों की अपेक्षा ज्वलन्त तथा तेजस्वी है। बीना के व्यक्तित्व की प्रमुखता के अग्रलिखित कारण हैं -
उच्च शिक्षा
बीना अपनी जिठानी राधा और सास जमुना की अपेक्षा अधिक शिक्षित है। जमुनादेवी तो अशिक्षित हैं। जमुना का पुत्र और बीना का देवर श्याम जब राधा के उपन्यास 'चन्द्रकान्ता' को रामायण का गुटका बता देता है तो वे पुस्तक का नाम पढ़कर नहीं, अपितु रामायण के गुटका का आकार देखकर कहती है-" मगर गुटका रामायण तो बहुत छोटी होती है। यह तो इतनी बड़ी किताब है।" बीना की जिठानी राधा भी बीना से कहती है-"हम तुम्हारी तरह पढ़े-लिखे तो हैं नहीं।" बीना का पति गोपाल बीना से कहता है कि तुम दिन-भर बैठी 'सन्स एण्ड लवर्स' पढ़ती रहती हो इससे स्पष्ट है कि बीना अंग्रेजी पढ़ी-लिखी है।
रहस्य को भेदने में सक्षम
बीना चाय के लिए पानी लेने नल पर जाना चाहती है। नल तक जाने का रास्ता राधा के कमरे में होकर जाता है। राधा शाम से ही अपने कमरे का दरवाजा बन्द करके मोमबत्ती के प्रकाश में 'चन्द्रकान्ता' उपन्यास पढ़ रही है। बीना के द्वार खटखटाने पर राधा दरवाजा खोलती है और अँगड़ाई लेती हुई सोने से उठने का बहाना करती है। बीना समझ जाती है कि यह समय सोने का नहीं है। वह राधा के तकिये के नीचे रखा हुआ 'चन्द्रकान्ता' उपन्यास उठा लाती है। वह पहले से ही चिन्तित थी कि राधा भाभी सबके सो जाने पर मोमबत्ती जलाकर क्या करती हैं। वह राधा को किताब (चन्द्रकान्ता उपन्यास) देती हुई कहती है- "यह किताब ले लो। मगर अभी से दरवाजा बन्द करके नहीं पढ़ने दूँगी। रात को जब सब लोग सो जायें, तो मोमबत्ती जलाकर पढ़ना। मैं भी कई दिनों से सोचती थी कि रात को तुम मोमबत्ती जलाकर क्या करती रहती हो।"
वह राधा से यह भी कहती है-"इसमें (चन्द्रकान्ता उपन्यास में) ऐसा तो कुछ भी नहीं है कि इसे तकिये के नीचे छिपाकर रखा जाये और दरवाजा बन्द करके पढ़ा जाये । "
स्पष्टवादिनी
बीना से उसके देवर श्याम ने अण्डों का हलुवा बनाने का आग्रह किया तो बीना ने उसे अण्डे लाने भेज दिया। श्याम जब अण्डे लेकर आया तो बीना के कमरे में उसकी जिठानी राधा और श्याम के बड़े भाई तथा बीना के पति गोपाल बैठे थे। श्याम बड़े भाई और राधा भावज के सामने अण्डे देने में संकोच करता है, पर बीना सबके सामने अण्डों वाली बात स्पष्ट कर देती है। प्रमाण के रूप में यह संवाद प्रस्तुत है -
श्याम- यह बात तो ठीक है भाभी, मगर
बीना - मगर क्या ? !
श्याम - मगर यह कि भाभी वह जो - वह जो तुमने कहा था वह-
बीना- लाये नहीं ?
श्याम - ल लाया तो जरूर हूँ, मगर-
बीना-मगर जीजी (राधा) से डर लगता है, यही न। डरने की कोई बात नहीं,
जीजी किसी से नहीं कहेंगी- लाओ, निकालो।
श्याम- (जरा खूँखारकर) और अगर बाद में-
बीना- नहीं, बाद में कुछ नहीं होता। लाओ, निकालो।
गोपाल- क्या चीज है, जिसके लिए इतनी हील हुज्जत हो रही है ?
बीना-कुछ नहीं, आधा दर्जन अण्डे मँगवाए हैं।
पति की पोल खोलने में संकोच नहीं
बीना का पति गोपाल प्रतिदिन बिजली की अँगीठी और फ्राइंग पान के द्वारा अण्डों का आमलेट बनाकर खाता है। बड़ी भाभी राधा को वहाँ देखकर कहता है कि आदमी बाहर जाकर खा ले तो और बात है, मगर घर में, इसे सुनकर बीना पति द्वारा छिपकर अण्डों के आमलेट की बात कहती है-" घर में घर के आदमी देख लेंगे, इतनी ही बात तो है न, तो जीजी से किसी बात का परदा नहीं है। यह आज न देखतीं तो किसी और दिन देख लेतीं। जब रोज सबेरे बीना की यह बात सुनकर गोपाल घबरा जाता है और उसे आगे बोलने से रोक देता है।
जिठानी को परामर्श
बीना अपनी जिठानी राधा को इस प्रकार परामर्श देती है, जैसे किसी बच्चे को समझा रही हो। इससे स्पष्ट हो जाता है कि राधा की अपेक्षा बीना बुद्धिमती, स्पष्टभाषिणी और तेजस्विनी है। बीना के पति गोपाल प्रतिदिन सबेरे अण्डों का आमलेट बनाकर खाते हैं, इस बात को गोपाल के बड़े भाई श्याम को न बताने की बात इन शब्दों में कहती है-
“देखो भाभी ! अब तुम्हें सब मालूम हीं है, मगर भैया को (श्याम को) नहीं बताना। उनका स्वभाव तो तुम जानती ही हो। माफ कर दें तो बड़ी-बड़ी बात माफ कर दें और नाराज हो जायें तो बस छोटी-सी बात पर ।"
अण्डों के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण
बीना अपने देवर श्याम को छः अण्डे ले आने का आदेश देती है। श्याम इसे सुनकर भाभी को रोकता है कि इस घर में अण्डों का नाम भी मत लो, तो बीना अपने पति के विषय में उसे बताने लगती है-“यहाँ रोज सुबह अण्डे का नाश्ता होता है। तुम्हारे भाईसाहब ने यह बिजली का स्टोव किसलिए लाकर रखा है।" इसे सुनकर श्याम बीना को संयम बरतने को कहता है। अगर किसी ने सुन लिया तो सारे घर को गंगा स्नान करना पड़ेगा।
इसके उत्तर में बीना छिपाकर अण्डे खाने को बुरा बताती हुई कहती है- "तुम लोगों की बात मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आती, अगर खाना ही है तो उसमें छिपाने की क्या बात है, सबके सामने खाओ। माँजी नहीं खार्ती-इसलिए रसोईघर की बजाय कमरे में बना लेते हैं। और अण्डे में जीव कहाँ होता है, जैसे दूध वैसे अण्डा !"
इस प्रकार बीना जो करना है, उसे स्पष्ट रूप से करने के स्थान पर अण्डे के प्रति परम्परागत के स्थान पर वैज्ञानिक तथा आधुनिक दृष्टिकोण रखती है।
शालीन व्यवहार की समर्थक
बीना ग्रेजुएट है और सभी से आशा करती है कि वे भी शालीन व्यवहार करें। बीना का देवर श्याम बीना के दरवाजे के बाहर खड़ा होकर उसे पुकारता है तो यह बीना को बुरा लगता है। वह श्याम को झिड़कती हुई कहती है- "तुम्हें भी आकर इस तरह आवाज देने की जरूरत पड़ती है। इस तरह पुकार रहे थे, जैसे किसी पराये घर में आये हो।" बीना को ससुराल के दकियानूसी और परम्परावादी घर में आकर अपनी शालीनता और स्वच्छता भूल जाने का भी दुःख है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि बीना का स्वभाव अपने घर के सभी लोगों से भिन्न एवं आधुनिक (मनोवैज्ञानिक) है। वह अत्यधिक शालीन और तेजस्विनी है। संक्षेप में, बीना 'अंडे के छिलके' एकांकी की एक ऐसी मुख्य पात्र है जो नई पीढ़ी की स्वतंत्रता और पुरानी पीढ़ी के प्रति सम्मान के बीच एक खूबसूरत सेतु (पुल) का काम करती है। वह आधुनिक भी है और पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा रिश्तों की मर्यादा को भी बखूबी निभाती है।


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