बिहार के ग्रामीण इलाकों में पिछले एक दशक के दौरान बाल विवाह को लेकर तस्वीर बदली जरूर है, लेकिन पूरी तरह नहीं।
बाल विवाह : बदलती सोच के बावजूद चुनौती बरकरार है
बिहार के ग्रामीण इलाकों में पिछले एक दशक के दौरान बाल विवाह को लेकर तस्वीर बदली जरूर है, लेकिन पूरी तरह नहीं। आज भी अनेक गांवों में ऐसी लड़कियां हैं, जिनकी उम्र किताबों, खेल के मैदान, सपनों और आत्मनिर्भर बनने की होती है, लेकिन उनके हाथों में स्कूल बैग की जगह विवाह की जिम्मेदारियां थमा दी जाती हैं। यह केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं है, बल्कि ऐसा फैसला है जो एक लड़की के स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक अवसर, आत्मविश्वास और भविष्य की संभावनाओं को एक साथ प्रभावित करता है।
किसी लड़की का जीवन केवल उसकी उम्र से तय नहीं होता, बल्कि उसकी सामाजिक स्थिति, परिवार की आर्थिक परिस्थितियाँ, जाति, शिक्षा, रहने का स्थान और उपलब्ध अवसर भी उसके भविष्य को आकार देते हैं। यही कारण है कि बाल विवाह का असर हर लड़की पर एक जैसा नहीं पड़ता। जो लड़की पहले से ही गरीबी, सामाजिक भेदभाव और सीमित संसाधनों के बीच जीवन जी रही होती है, उसके लिए बाल विवाह अवसरों के लगभग सभी दरवाजे एक साथ बंद कर देता है।
हालांकि पिछले दस वर्षों में बिहार में बाल विवाह की स्थिति में काफी सुधार देखने को मिला है। जो बदलाव गांवों में दिखाई देता है, वह आंकड़ों में भी दर्ज हुआ है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-4, 2015-16) के अनुसार बिहार में 20 से 24 वर्ष की आयु की 39.1 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले हो चुका था। वहीं 2019-21 में यह आंकड़ा घटकर 29.9 प्रतिशत रह गया। यानी लगभग 9 प्रतिशत अंकों की कमी दर्ज की गई। यह बदलाव उम्मीद जगाता है, लेकिन यह भी सच है कि बिहार अब भी उन राज्यों में शामिल है जहाँ बाल विवाह की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
बिहार में बाल विवाह की दर में आई कमी के पीछे कुछ कारण भी हैं। पिछले कुछ वर्षों में लड़कियों की शिक्षा पर बढ़ता जोर, विद्यालयों तक बेहतर पहुंच, मुख्यमंत्री साइकिल योजना, पोशाक योजना, छात्रवृत्ति योजनाएं, किशोरी समूहों की सक्रियता, स्वयं सहायता समूहों द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान, पंचायतों की भागीदारी और बाल विवाह निषेध कानून के बारे में बढ़ती जानकारी ने समाज की सोच को धीरे-धीरे बदलना शुरू किया है। कई गैर-सरकारी संगठनों ने भी गांवों में किशोरियों और उनके अभिभावकों के साथ लगातार संवाद कर यह समझाने का प्रयास किया कि जल्दी विवाह किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं की शुरुआत है।
ग्रामीण बिहार में अब पहले की तुलना में माता-पिता की सोच भी बदल रही है। पहले जहां बेटी की शादी को सबसे बड़ी जिम्मेदारी माना जाता था, वहीं अब धीरे-धीरे उसकी शिक्षा और आत्मनिर्भरता को भी उतना ही महत्वपूर्ण समझा जाने लगा है। अनेक परिवार अब अपनी बेटियों को इंटरमीडिएट, स्नातक और व्यावसायिक शिक्षा तक पढ़ाना चाहते हैं।
इसके अलावा सरकारी नौकरियों, स्वास्थ्य सेवाओं, बैंकिंग, डिजिटल सेवाओं, स्वयं सहायता समूहों और निजी क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने भी इस सोच को और मजबूत किया है। यही कारण है कि कई परिवार अब लड़कियों की शादी 20 वर्ष या उससे अधिक आयु में करने को प्राथमिकता दे रहे हैं ताकि वे अपनी पढ़ाई पूरी कर या कौशल प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने पैरों पर खड़ी हो सके।
लेकिन यह बदलाव हर गांव, और हर परिवार तक एक जैसा नहीं पहुंचा है। जिन परिवारों पर गरीबी, सामाजिक भेदभाव और संसाधनों की कमी का दबाव सबसे अधिक है, वहां बाल विवाह का खतरा आज भी ज्यादा दिखाई देता है। NFHS-5 के आंकड़े भी बताते हैं कि बाल विवाह की दर सबसे अधिक आर्थिक रूप से बेहद कमज़ोर परिवारों, कम शिक्षित अभिभावकों और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों में देखने को मिलती है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों में बाल विवाह का प्रतिशत अन्य समुदायों की तुलना में अधिक है। वहीं अन्य समुदायों की बात करें तो इनमें कम आय वर्ग वाले परिवारों में बाल विवाह का जोखिम सबसे अधिक पाया गया है।
इसके पीछे केवल परंपरा जिम्मेदार नहीं है। गरीबी, शिक्षा की कमी, सुरक्षित परिवहन का अभाव, घर से स्कूल की दूरी, रोजगार के सीमित अवसर, दहेज का डर, सामाजिक दबाव और लड़कियों की सुरक्षा को लेकर बनी आशंकाएं भी परिवारों को जल्दी विवाह की ओर धकेलती हैं। कई गांवों में आज भी यह धारणा मौजूद है कि बेटी जितनी जल्दी विवाह कर लेगी, परिवार उतना सुरक्षित रहेगा। ऐसे में यह स्पष्ट हो जाता है कि बाल विवाह केवल एक सामाजिक बुराई नहीं है, बल्कि असमान विकास, गरीबी और अवसरों की कमी का भी परिणाम है।
बाल विवाह का असर शादी वाले दिन से नहीं, उसके बाद के पूरे जीवन में दिखाई देता है। सबसे पहले पढ़ाई छूटती है। फिर रोजगार के अवसर कम होते जाते हैं। धीरे-धीरे आर्थिक आत्मनिर्भरता, फैसले लेने की आजादी और अपने लिए सपने देखने की गुंजाइश भी सिमटने लगती है। इसका दूसरा गंभीर प्रभाव लड़की के स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। कम उम्र में गर्भधारण का खतरा भी बढ़ जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के अनुसार इससे मातृ स्वास्थ्य और नवजात शिशुओं दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है। लेकिन इसका असर केवल शरीर पर नहीं पड़ता। मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका असर पड़ता है। बचपन से सीधे वयस्क जिम्मेदारियों में प्रवेश करने वाली लड़कियां अक्सर तनाव, अकेलेपन और अपनी इच्छाओं को दबाकर जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाती हैं।
इन सबके बावजूद बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों से बाल विवाह के खिलाफ उठने वाली आवाज़ें और बदलाव की कई प्रेरक कहानियां भी सामने आ रही हैं। अनेक पंचायतों में मुखिया, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता, जीविका समूह, शिक्षक और स्वयंसेवी संस्थाएं मिलकर बाल विवाह रोकने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। कई गांवों में किशोरी समूह स्वयं ऐसी शादियों की सूचना प्रशासन तक पहुंचा रही हैं। यह बदलाव बताता है कि जब समुदाय, प्रशासन और परिवार एक साथ खड़े होते हैं, तब वर्षों पुरानी सामाजिक मान्यताओं को भी बदला जा सकता है।
हम आज़ादी के 79वें वर्ष का जश्न मना रहे हैं. विकसित भारत का सपना देख रहे हैं. दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रहे हैं. हर क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी पर गर्व कर रहे हैं। लेकिन इसी देश के अनेक ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसी लड़कियां हैं, जिनका बचपन उनकी इच्छा से पहले विवाह की जिम्मेदारियों में बांध दिया जाता है। यह विरोधाभास हमें सोचने पर मजबूर करता है कि ढ़ेरों उपलब्धियों के बावजूद हम बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई को अब तक पूरी तरह समाप्त क्यों नहीं कर पाए हैं?(यह लेखिका की निजी राय है)
- दिव्या कुमारी
सीतामढ़ी, बिहार


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