सफलता की आकांक्षा

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सफलता की आकांक्षा जब हम सफलता की आकांक्षा की बात करते हैं, तब दो शब्द हमारा ध्यान खींचते हैं- 1. सफलता 2. आकांक्षा।

सफलता की आकांक्षा


ब हम सफलता की आकांक्षा की बात करते हैं, तब दो शब्द हमारा ध्यान खींचते हैं- 1. सफलता 2. आकांक्षा। सफलता की आकांक्षा को समझने के लिए इन दोनों शब्दों पर विचार करना आवश्यक है। आकांक्षा व्यक्ति की मूलभूत प्रवृत्ति है। यह व्यक्ति की आन्तरिक चेतना है, जो व्यक्ति को कुछ न कुछ करने को प्रेरित करती है। आकांक्षा विकास प्रक्रिया का आरंभ है। अतः आइए पहले हम आकांक्षा के बारे में ही जानते हैं।

आकांक्षाः

आकांक्षा शब्द का अर्थ इच्छा, अभिलाषा, चाह, कामना आदि होता है। महत्व पाने की आकांक्षा महत्वाकांक्षा कहलाती है। यह किसी वस्तु, लक्ष्य या उपलब्धि को पाने की तीव्र इच्छा को दर्शाता है। हिन्दी में इसे प्रबल आशा या अपेक्षा के रूप में भी जाना जाता है। यह शब्द सकारात्मक संदर्भ में अक्सर उन्नति या उच्च लक्ष्य(Ambition) के लिए भी प्रयुक्त होता है। आकांक्षा सामान्य इच्छा या अभिलाषा से अधिक प्रबल होती है। इसमें कार्य करके परिणाम प्राप्त करने की प्रबल इच्छाशक्ति भी सम्मिलित है।

इच्छा, अभिलाषा और आकांक्षा तीनों ही मन की आग हैं। किंतु आग का तापमान, रंग और धुआँ अलग-अलग होता है। तीव्रता और प्रबलता अलग-अलग होती है। इच्छा तो प्रत्येक व्यक्ति में होती ही है। इसमें तामसिक प्रभाव अधिक होता है।  शायद प्रत्येक प्राणी में भी होती होगी। इच्छा से आगे अभिलाषा होती है। जब इच्छा से आगे गहरी तड़प की अनुभूति हो। उसे प्राप्त करना ही है। यह दीर्घकालीन होती है। खाने की इच्छा हुई। खाना प्राप्त हो गया। इच्छा पूरी हो गई। यह शारीरिक है। अभिलाषा भावना पर आधारित होती है। दिल का मामला है भाई। किसी से प्रेम है। उसके मिलने पर भी तड़प है और न मिलने पर भी तड़प है। यह अतीत की भी हो सकती है और भविष्य में भी हो सकती है।

इच्छा अभिलाषा के स्तर पर पहुँचे यह आवश्यक नहीं। इच्छा तमस और रजस से निकलती है किन्तु अभिलाषा रजस से ही प्रेरित होती है। इसमें तात्कालिकता न होकर गंभीरता होती है। इच्छा भूख है। अभिलाषा तड़प है। आकांक्षा कर्म का आधार है। आकांक्षा में निर्णय का आरंभ है। प्रक्रिया की योजना का आधार है। इच्छा से कुछ नहीं बदलता, निर्णय से कुछ बदलता है, लेकिन दृढ़ संकल्प से सब कुछ बदल जाता है। अन्तिम परिणाम भले ही योजना के क्रियान्वन से मिलता हो, किन्तु आकांक्षा आधार है।

अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने की आकांक्षा थी। निशाना लगाने की संपूर्ण प्रक्रिया के प्रति समर्पित हो गया। वनवास का आनंद लिया, तपस्या की, सभी प्रकार का अपमान सहा, शाप भी स्वीकार किया। यह न इच्छा है, न अभिलाषा है क्योंकि इसमें न तो तात्कालिक सुख है और न ही रोने की तड़प; यह आकांक्षा है दीर्घकालीन कर्म। दार्शनिक कांट के अनुरूप ‍’कर्म के लिए कर्म। महाभारत में युद्ध क्षेत्र में धनुष भी रख दिया। जीत भी नहीं चाहिए। 

सफलता की आकांक्षा
आकांक्षा है- लंबी
, तपस्या वाली, दिशावाली, सच्चे में कर्म वाली। सतोगुण से प्रभावित। इस प्रकार इच्छा का अभिलाषा में और अभिलाषा का आकांक्षा में परिवर्तित होना, यह परिवर्तित होना न सरल है और न ही सामान्य। इसकी प्रबलता पर निर्भर है। कहा जा सकता है कि सभी आकांक्षा इच्छा भी होती हैं अभिलाषा भी होती है किन्तु सभी इच्छाएं और अभिलाषाएँ आकांक्षा के स्तर पर पहुँचे यह आवश्यक नहीं। इच्छा एकदम प्रारंभिक है। शरीर के स्तर पर है। तात्कालिक है। पशुओं में भी होती है। अभिलाषा भावनात्मक है। हृदय के स्तर पर अनुभूति है। आकांक्षा कर्म के स्तर पर है। शरीर, हृदय और बुद्धि का सुविचारित व सुनियोजित पथ। 

सफलता की इच्छा या कल्पना तो प्रत्येक व्यक्ति करता ही है किंतु सामान्य व्यक्ति को न तो सफलता की परिभाषा की जानकारी होती और न ही उसकी इच्छा आकांक्षा में परिवर्तित हो पाती है। जब तक हमें अपनी इच्छा की ही समझ नहीं होगी, जब तक हमारी अभिलाषा ही स्पष्ट नहीं होगी, जब तक हमारी अभिलाषा आकांक्षा में परिवर्तित नहीं होगी, तब तक हम सफलता की कल्पना ही कैसे कर सकेंगे?

सफलता की आकांक्षा अर्थात कुछ पा लेने कुछ बन जाने और कुछ कर दिखाने की व्यक्ति की भूख सफलता की आकांक्षा है। यह सिर्फ इच्छा नहीं है। आकांक्षा में इच्छा के साथ योजना और प्रयत्न भी सम्मिलित होते हैं। इच्छा, योजना और प्रयत्न का संगम ही आकांक्षा कहा जाता है। आकांक्षा केवल सोचना मात्र नहीं होता। आकांक्षा में सोचने के साथ नियोजन व तत्परता भी सम्मिलित होती है।

सफलता की आकांक्षा का अर्थ जीवन में उच्च लक्ष्यों, उन्नति या वांक्षित परिणाम(पद, प्रतिष्ठा, लक्ष्य, धन आदि) को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा, प्रबल लालसा या अभीष्ट चाह से है। यह केवल सपने देखना नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य के लिए की गई भावनात्मक और प्रेरक योजना है, जो व्यक्ति को मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है। सफलता की आकांक्षा एक प्रबल इच्छा है, जो भविष्योन्मुखी है और क्रियाशीलता का आधार है। यह वह आंतरिक चिंगारी है, जो व्यक्ति को लगातार बेहतर करने के लिए प्रेरित करती है, जिसका परिणाम सफलता कहलाता है।

सफलता की आकांक्षा मुझे कुछ करना है, करके कुछ पाना है, कुछ छोड़कर जाना है की भीतरी आग है। यह आग वरदान भी है और अभिशाप भी, यह नीत्शे को अतिमानव बनाती है तो बुद्ध को घर त्यागने को मजबूर कर देती है। आकांक्षा बुरी नहीं होती। बिना आकांक्षा के तो बच्चा चलना भी नहीं सीख पाएगा। आकांक्षा के बिना व्यक्ति और समाज प्रगति पथ पर अग्रसर नहीं हो सकेगा। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति आकांक्षा के अनुसार चलने लगता है। आकांक्षा का गुलाम हो जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि आकांक्षा व्यक्ति द्वारा नियंत्रित हो, व्यक्ति उससे नियंत्रित न हो। नीत्शे के अनुसार स्वतंत्रता व्यक्ति के अस्तित्व का सार है। इसे स्वीकार करना ही होगा।

स्वतंत्रता अपने आपमें सफलता ही है। स्वतंत्रता के आनंद की अनुभूति करने की सामर्थ्य वही कर सकता है, जिसमें मानव गरिमा पर गौरवान्वित होने का भाव व साहस होता है। जी, हाँ! स्वतंत्रता की चाहत सभी को होती है किंतु उसकी जिम्मेदारी उठाने की सक्षमता व तत्परता बहुत कम लोग उठा पाने में समर्थ होते हैं। नीत्शे के अनुसार मानव भले ही स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त हैं, किंतु इस स्वतंत्रता की रक्षा करने की सामर्थ्य व साहस बहुत कम लोगों में होता है।अधिकांश लोग अपने स्वतंत्र रहने के जोखिम को नहीं उठा पाते और अपनी स्वतंत्रता का अर्पण कर देते हैं।

स्वतंत्रता मिल जाने से ही हम स्वतंत्रता के हकदार नहीं हो जाते। स्वतंत्र रूप से निर्णय करना, निर्णय करने के उत्तरदायित्व को स्वीकार करना, निर्णय पर काम करना, उसके परिणामों को स्वीकार करना और उसके परिणामों के उत्तरदायित्व को स्वीकार करने वाला ही प्रामाणिक व्यक्ति होता है। ऐसा व्यक्ति ही स्वतंत्रता का हकदार होता है। स्वतंत्रता का उपयोग करने वाला व्यक्ति ही अपने अस्तित्व को स्वीकार व प्रमाणित करता है। वास्तव में ऐसा व्यक्ति ही सफ़ल कहा जा सकता है।

जो अपनी स्वतंत्रता को दूसरों को अर्पित कर देते हैं, अर्पण की सीमा तक उनकी जिम्मेदारी भी दूसरों की हो जाती हैं। जो निर्णय करता है, उस निर्णय के लिए वही जिम्मेदार होता है। जो निर्णय करने और उसके उत्तरदायित्व को स्वीकार करने के लिए तैयार होता है, निर्णय करने का अधिकार उसी का होता है। जिसे अधिकार है, वही अधिकारी है। अपने निर्णय करने का अधिकार अपने पास रखना और उसका प्रयोग करते हुए उसका उत्तरदायित्व स्वीकार करना ही मानव जीवन है। यही मानवीय गरिमा सच्ची अभिप्रेरणा है। जीवन वैसा नहीं होता, जैसा आप चाहते हैं; जीवन वैसा होता है, जैसा आप इसे बनाते हैं। जीवन बनाने का आधार कर्म है और कर्म का आधार आकांक्षा है।

आकांक्षा मूल प्रवृत्ति है, का आशय यह है कि यह व्यक्ति की आन्तरिक चेतना से उद्भूत होती है। आकांक्षा में प्रेरणा और अभिप्रेरणा दोनों ही समाहित होती है। किसी वस्तु की इच्छा करना मात्र नहीं है। कर्म के लिए प्रेरणा और कर्म की  निरंतरता के लिए अभिप्रेरणा अनिवार्य घटक है। आकांक्षा अभिप्रेरणा की मूल है। आकांक्षा व्यक्ति की इच्छा में इतनी प्रबलता अपेक्षित है कि व्यक्ति उसके लिए कर्म करने के लिए तत्पर हो जाए। मन-वचन-कर्म की एकता की माँग आकांक्षा में रहती है।

अभिप्रेरणा किसी भी व्यक्ति के जीवन का आधार है। अभिप्रेरित व्यक्ति ही कर्म करने को तत्पर होता है। अभिप्रेरणा के बिना व्यक्ति निष्क्रियता की ओर बढ़ता है। निष्क्रियता तो जीवन से दूर ले जाती है। कर्म के लिए प्रेरणा और कर्म की  निरंतरता के लिए अभिप्रेरणा अनिवार्य घटक है। प्रेरणा और  अभिप्रेरणा के बिना सफलता की बात करना तो कपोल कल्पना ही कही जा सकती है। 

प्रेरणा बाह्य होती है, जो कुछ समय के लिए ही टिकती है; जबकि अभिप्रेरणा आंतरिक होती है। प्रेरणा भौतिक पदार्थ या सुविधा हो सकती है, जबकि अभिप्रेरणा आन्तरिक संकल्प होती है, जो निरंतर कार्यरत रहने को मजबूर करती है। वह किसी बाह्य स्रोत पर आश्रित नहीं है, अतः दीर्घकाल तक बनी रह सकती है। इसी लिए यह विकास का आधार कही जा सकती है। इसी से इच्छा, कामना या आकांक्षा निकलती है, यह कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मानव विचारशील प्राणी है। प्रत्येक विषय पर उसका अपना दृष्टिकोण होता है। उसका अपना दर्शन होता है। इसी कारण यह कहा जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति एक दार्शनिक है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना दर्शन होता है। यह अलग बात है कि किसका दर्शन कितने लोगों को समाज में स्वीकार होता है। 

दार्शनिक स्तर पर भले ही भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण पाए जाते हों, किंतु प्राकृतिक रूप से मानवीय आवश्यकताएं समरूप होती हैं। मानवीय आवश्यकताएं ही मानव को प्रेरित करती हैं। मानवीय आवश्यकताएँ मूलभूत अस्तित्वगत अनिवार्यताएँ हैं। मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति मानवीय अस्तित्व के लिए आवश्यक होती हैं। इनके बिना अस्तित्व पर संकट होता है। अस्तित्व के बाद सुरक्षा, संबन्ध और गरिमा की बात आती है। आवश्यकताओं की अनिवार्यता को देखते हुए मानवीय आवश्यकताओं के विभिन्न स्तर होते हैं। उन्हीं स्तरों के आधार पर मानव उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरित व अभिप्रेरित होता है। दर्शनशास्त्र इसे संकल्प, संवेग और जीवनदृष्टि के जोड़ के रूप में देखता है। आकांक्षा के तीन तल माने जाते हैं-

तल

सवाल

उदाहरण


1.जैविक तल

जीवित रहना, अस्तित्व बनाए रखना, आगे बढ़ना

रोटी, कपड़ा और मकान की अवधारणा अर्थात अच्छा खाना, सुरक्षित घर और विकास के अवसर।


2.सामाजिक तल

दूसरों की नजर अर्थात समाज में स्थान

पद, पैसा और प्रशंसा यह सामाजिक पैमाने पर तौलना है।


3.आत्मलब्धि या आत्मसंतुष्टि तल

मैं क्यों हूँ? क्या हूँ? क्या लाया था? क्या छोड़कर जाना है?

जीवन को सार्थक बनाना, जीवन की उपयोगिता सिद्ध व स्वीकार करन॥


 

इस प्रकार आकांक्षा अपने आपमें विकास का आधार है। आकांक्षा न केवल व्यक्ति को सोचने के लिए, योजना बनाने के लिए, कार्यक्रम बनाने के लिए, रणनीति बनाने के लिए अभिप्रेरित करती है; वरन उन पर काम करने के लिए भी प्रेरित करती है। भले ही यह आकांक्षा व्यक्तिगत अस्तित्व की रक्षा करना हो, सुरक्षा करना हो, विकास करना हो, समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाना हो या अपनी आत्मानुभूति, आत्मलब्धि या आत्मसंतिुष्टि प्राप्त करना हो। प्रत्येक आकांक्षा हमें सफलता की सीढ़िया उपलब्ध करवाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि आकांक्षा सफलता की पहली सीढ़ी है।


- डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

प्राचार्य,जवाहर नवोदय विद्यालय,कालेवाला,ठाकुरद्वारा,मुरादाबाद-244601 (उत्तर प्रदेश) चलवार्ता 09996388169, ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com ,बेब ठिकाना : www.rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in, ww.rashtrapremi.webpress.com

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