कीड़ों से तितलियों तक रसिक जन यदि कीड़ों-से सिर्फ़ दया की दृष्टि धरें, कलाकार का व्यक्तित्व फिर भी तितली बन ऊँचा निखरे।
प्रकृति का कठोर पाठ
प्रकृति से मानव क्या भला सीख पाएगा,
उसकी हर बोली हिंसा ही गाएगा।
हरियाली के पीछे छिपा अंधकार घना,
उसके हृदय में बसता क्रूरता का तराना।
दो खिड़कियों के बीच
निश्चल, दफ़्तर की कुर्सी पर जड़वत बैठा,
उदास, ऊबा, थका हुआ,
क्षणों की लहरें गिनता हुआ चूर हो रहा हूँ।
सांत्वना खोजती आँखें ऊपर उठती हैं,
ऊपरी खिड़की को भेदती हुई,
पर वहाँ बस एक नारियल-वृक्ष का बिखरा सिर,
सूखा, झुलसा दृश्य,
जो आँखों को और भी प्यासा कर देता है।
पास कहीं समुद्र-गर्जन का आभास,
भयावह बड़बड़ाहट-सी ध्वनि।
डरी हुई आँखें फिर नीचे की खिड़की पर गिरती हैं,
मानो वहीं कुछ राहत मिले।
घना पत्तों का जाल? नहीं,
एक उजड़ा हुआ वृक्ष।
और उसके पास, किसी दलदली मगर का आकार,
फटा हुआ जबड़ा फैलाए
बीभत्स निद्रा में पड़ा है।
ऊपर और नीचे की खिड़कियों के बीच
भटकती रहती हैं आँखें,
भय और वितृष्णा के बुखार में भीगी हुई।
फिर लौटकर टिक जाती हैं फर्श पर।
मेरा चेहरा फिर वैसा ही निर्विकार।
सिर के ऊपर पंखा गूँजता रहता है,
मानो कोई थका हुआ भृंग
अपने टूटे पंखों से मंडरा रहा हो।
और जड़ हो चुकी ज़मीन पर
तीन शब्द पड़े हैं,
मृतप्राय, अंतिम साँस लेते हुए।
मृत्यु-स्वअन्वेषी (या अपनी ही मौत का जासूस”)
भविष्य में किसी समय,
मैं अपनी ही मृत आत्मा का जीवित प्रेत हूँ।
वह जो केवल अपनी उस भावी मृत्यु के कारण को जानने के लिए जीवित है!!”
काँटों की विजयगाथा
फूल नहीं साहब, यह दौर अब फूलों का नहीं,
यह साधारण काँटों का महाकाव्य है।
जहाँ कोमलता अंकुरित होती है,
वहाँ पहरेदार बन खड़े हैं नुकीले साये।
शब्दों के पास अब भी पंख हैं,
पर सवालों पर जंजीरों की मुहर लगी है।
हँसी के पीछे अँधेरा चुभता हुआ बहता है,
होंठों पर जली हुई प्रतिज्ञाएँ,
हथेलियों में वसंत के पक चुके घाव।
रास्तों पर तेज़ी से उठती पत्थर की दीवारें।
अब बारिश भी आने से पहले कीमत पूछती है।
हवा चलती है तो पहला सवाल यही होता है:
“इसमें फायदा किसका है?”
बीजों के पास मिट्टी नहीं बची,
लेकिन हिसाब-किताब चमकते जूते पहनकर चलता है।
दिल किसी पुरानी फाइल की तरह
अभिलेखागार में बंद पड़ा है।
नींद तक पासवर्ड माँगती है।
हाथ मिलाना नोटरी की मुहर के साथ आता है,
दोस्ती अनुबंधों की बारीक पंक्तियों में फँसी हुई है।
गीत कॉपीराइट के दर्द में कराहते हैं।
हरियाली पर ब्रांड नामों की रस्सियाँ बँधी हैं;
ठंडी हवा में एयरटैग लगा है,
धूप सब्सक्रिप्शन पर मिलती है।
समुद्र कपों में बाँट दिए गए हैं,
किनारों पर पहरा बैठा है।
जहाज़ कर वाले रास्तों से गुजरते हैं,
और सितारे भी अब लाइसेंस लेकर चमकते हैं।
फूल नहीं साहब, हमने सीखा है शक करना।
हर मुस्कान पर जाँच की मुहर लगी है।
आँसुओं का भी क्वालिटी कंट्रोल होता है।
अविश्वास बाज़ार में
सड़े फलों की तरह बिक रहा है।
सहारा देना एक प्रीमियम सेवा बन चुका है।
करुणा लाइन में खड़ी है टोकन लेकर।
रास्तों पर कदमों के लिए टोल टैक्स है,
उँगलियों के निशान सुरक्षा के नाम पर जमा हैं।
नीला आसमान एक डेटा बैंक बन गया है,
बचपन किसी ऐप अपडेट जैसा।
फूल नहीं साहब, अब केवल प्रश्न खिलते हैं।
उत्तर आते हैं तो साथ में मूल्यसूची भी लाते हैं।
सत्य सात ताले लगे अलमारी में कैद है,
और झूठ सुनने के लिए हेडफोन सुविधा उपलब्ध है।
शोर माइक्रोफोन टेस्ट की तरह अनंत है,
यहाँ तक कि ख़ामोशी को भी स्पॉन्सर मिल गया।
लहरें QR कोड पढ़कर किनारे आती हैं,
और तट पर बोर्ड लगा है: प्रवेश निषेध।
पक्षियों को उड़ने के लिए बुकिंग करवानी पड़ती है,
बसंत चर्चा में टलता जा रहा है।
फूल नहीं साहब, दर्द ही शिक्षक बन गया है।
घावों को नोट्स की तरह पढ़ना पड़ता है।
कठोरता नया पाठ्यक्रम है,
जली हुई हथेलियाँ प्रमाणपत्र हैं।
खून की गंध पहचानना ही
अब पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
साहस परीक्षा है,
डर उसका प्रायोगिक भाग,
और असफलता सप्लीमेंट्री पेपर।
जीवन बार-बार खुद को लिखने की माँग करता है,
जबकि उम्मीद चंदन की तरह
टूटकर भी फिर से फैल जाती है।
फूल नहीं साहब, घरों को पंख लग गए हैं।
किराया रीढ़ बन गया है,
यात्रा रसोईघर।
पते गूगल में रहते हैं,
यादें आँसुओं में।
पड़ोसी केवल खुली खिड़कियों जैसे हैं।
दरवाज़ों पर कैमरों के कान लगे हैं,
चिट्ठियों से गिरफ्तारी से ज़्यादा पूछताछ होती है।
समाचार कैप्सूल की तरह निगले जाते हैं।
कल एक दवाई की पर्ची बन गया है।
सुबह अलार्म का उद्योग है,
और शाम स्क्रीन की रोशनी का सहारा।
फूल नहीं साहब, नौकरियाँ कंगारू की तरह छलाँग लगाती हैं।
कोहनियों के पास रोबोट बैठे हैं।
कोड दफ़्तर की बेंचों पर बर्फ बनकर जम गया है।
मज़दूर का चेहरा लॉगिन स्क्रीन हो गया है।
लंच ब्रेक मीटिंग की छाया में खो गया।
तनख़्वाह हवा की तरह निकल जाती है,
बाकी बचती है EMI की साँस।
छुट्टी कैलेंडर का सपना बन चुकी है।
ट्रेन की खिड़की में दौड़ते पल,
लौटने पर कोई पहचान नहीं छोड़ते।
फूल नहीं साहब, राजनीति काँटों का मुकुट पहनती है।
वायदों के फूल केवल ऑफर के मौसम में खिलते हैं।
वोटों पर मौसमी छूट लगी है।
भाषण गीले पटाखों की तरह फूटते हैं।
सवाल किसी लॉज में ठहर जाते हैं,
उत्तर सफ़र पर निकल जाते हैं।
जनता के हाथों में लंबा इंतज़ार है।
कुर्सियों को पहिए मिल गए,
दिलों को बेड़ियाँ।
दस्तावेज़ बूढ़े हो रहे हैं,
सपने बंदी बनाए गए हैं।
फूल नहीं साहब, प्रकृति भी उलझनों में है।
बारिश टूटी पटरियों पर बहती है।
नदियाँ इमारतों की सीढ़ियाँ चढ़ रही हैं।
पहाड़ घायल पैरों से चलते हैं।
जंगलों के पते मिटा दिए गए हैं।
जानवर डरकर शहरों की ओर भटकते हैं।
सूरज वैश्विक समझौते पढ़ते-पढ़ते जल रहा है,
चाँद बिल भरकर फीका पड़ गया।
धरती माँ कहीं छिपकर रोती है,
और हमें केवल रिंगटोन सुनाई देती है।
फूल नहीं साहब, रिश्तों को भी पासवर्ड चाहिए।
प्रेम ऑनलाइन टाइपिंग संकेतों में बदल गया है।
दिल डिलीवरी ट्रैकिंग पर चलता है।
परिचय फ़िल्टरों के रास्ते आता है।
शब्दों के साथ रिफंड नीति जुड़ी है,
गलतियाँ डिलीट नहीं होतीं।
माता-पिता स्टेटस अपडेट बन गए हैं,
बच्चे नोटिफिकेशन।
दादी की कहानियाँ स्क्रॉल में खो गईं,
और ख़ामोशी ब्लैकआउट स्क्रीन बन गई।
फूल नहीं साहब, आत्मा भी वीज़ा आवेदन भर रही है।
विश्वास इमिग्रेशन लाइन में खड़ा है।
मंदिरों में मेटल डिटेक्टर लगे हैं।
प्रार्थनाएँ क्यू मैनेजमेंट से गुजरती हैं।
दीयों का भी बीमा है,
दान की रसीद कटती है।
ईश्वर QR स्कैन बन गया है,
पाप कुकी पॉलिसी जैसा।
मोक्ष Terms and Conditions में छिपा है,
सिर्फ दया ही अब भी ऑफलाइन बची है।
फूल नहीं साहब, कला भी बंधनों में है।
मंच टिकट माँगते हैं।
कविताएँ क्यूरेटर की अनुमति पर निर्भर हैं।
चित्र फ्रेम के नियमों में कैद हैं।
नृत्य के पीछे स्पॉन्सर बोर्ड खड़े हैं।
संगीत एल्गोरिद्म के रास्ते चलता है।
प्रतिभा पर मूल्य टैग लगा है,
आलोचना सब्सक्रिप्शन पर मिलती है।
कलाकार स्वयं को भूल चुका है,
और कला अकेले दम तोड़ रही है।
फूल नहीं साहब, यात्राएँ काँटों वाले जूते पहनती हैं।
रात भी कस्टम पूछताछ से गुजरती है।
सीमाएँ पासपोर्ट पर दर्द की स्याही बनती हैं।
सपनों को हर सड़क पर चेकपोस्ट मिलती है।
ट्रॉली के पहिए कहानियाँ सुनाते हैं।
होटल की खिड़कियों में अजनबी शहर झलकते हैं।
वापसी के रास्ते में
हम स्वयं अपने लिए अजनबी हो जाते हैं।
फिर भी साहब, भीतर कहीं
एक छोटी-सी हरी उम्मीद चमकती है।
काँटे सिखाते हैं
दर्द के बीच सीधा खड़ा रहना,
टूटकर भी बढ़ते जाना।
अगर हाथ मिल जाएँ,
तो पत्थर भी पिघल सकते हैं।
शब्द फिर से साझा सत्य बन सकते हैं।
नदियों को रास्ता मिल सकता है,
जंगल फिर सपने देख सकते हैं।
मनुष्य अपना हृदय खोल सकता है।
समय बदल सकता है,
अगर हम एक-दूसरे के साथ खड़े रहें।
यही आकांक्षा है साहब।
फूल नहीं, न्याय का भाला चाहिए;
करुणा की ढाल,
सत्य की तलवार।
साझेदारी की खेती,
स्वतंत्रता की फसल।
कल का भार सबके कंधों पर बराबर हो।
शब्दों में हाथों की गर्मी हो।
शासन में आँखें हों और जवाबदेही भी।
प्रकृति को विश्राम मिले।
ऐसा जीवन जहाँ काँटे भी सुगंधित लगें।
तो आइए साहब, निडर होकर चलें।
भविष्य के सपने देखने वाले नहीं,
वर्तमान के निर्माता बनें।
लॉटरी अब केवल सरकारी वादे हैं।
बचाने वाले हाथ हमारे भीतर ही हैं।
हम काँटों को समेटेंगे,
और उन्हीं से एक नई दुनिया बनाएँगे, साहब।”
अंधकार के छोर पर
हर बार की तरह
मैं फिर अंधकार में उतर जाता हूँ,
जहाँ मेरी रोशनी की पगडंडियाँ
संध्या के आगे जाकर
चुपचाप समाप्त हो जाती हैं।
वहीं कहीं
चिंता अपने कीचड़ भरे पंजे फैलाती है,
और अंधेरे की नोक तक
धीरे-धीरे रेंगती चली आती है।
रास्ते तो अनेक हैं,
पर हर रास्ता
अंधकार के अंतिम छोर पर
घुटने टेक देता है।
रात का संरक्षण
हमेशा मुझे बाँहों में भर लेने को आतुर रहता है,
मुझे कसकर जकड़ लेने को,
ताकि मैं
एक जीवित अस्तित्व बनकर
दिन की ओर लौट सकूँ।
आज भी,
उस भय के भीतर
जिसे मैं अपनी साँसों के नीचे दबाए रखता हूँ,
मेरे चारों ओर
सिर्फ परछाइयाँ ही परछाइयाँ हैं।
और मैं…
अस्तित्व और अंधकार के बीच
टिमटिमाती हुई एक लौ की तरह
खड़ा हूँ।
रेखाएँ और विश्व
चित्रों में अनेक आकाश उकेरे जाते हैं,
पूरा ब्रह्मांड।
फिर उन्हें मिटा दिया जाता है,
और दोबारा रचा जाता है आकाश;
बादल घेर लेते हैं
उस अनंत शून्य के वन को।”
कीड़ों से तितलियों तक
रसिक जन यदि कीड़ों-से
सिर्फ़ दया की दृष्टि धरें,
कलाकार का व्यक्तित्व फिर भी
तितली बन ऊँचा निखरे।
- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
Kerala state, email:binoymb2008@gmail.com,
phone:9847245605(office)


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