अब देखना यह होगा कि नई गाइडलाइन सरकारी स्कूलों की दशा और दिशा को कितना बदल पाएगी?
नई गाइडलाइन से कितनी बदलेगी सरकारी स्कूलों की तस्वीर?
6 मई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने “स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (एसएमसी) गाइडलाइंस 2026” जारी की। इन नई गाइडलाइंस में पहली बार स्कूल प्रबंधन में अभिभावकों की भूमिका को केंद्र में रखा गया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि अब स्कूल प्रबंधन समितियों में 75 प्रतिशत सदस्य बच्चों के माता-पिता या अभिभावक होंगे, जबकि आधे सदस्य महिलाओं को बनाया जाएगा। हर स्कूल में मासिक बैठक, सामाजिक ऑडिट, तीन साल का विकास प्लान और शिक्षा की गुणवत्ता की निगरानी जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य की गई हैं।
शिक्षा मंत्रालय का यह कदम अचानक नहीं आया। इसके पीछे वर्षों से सरकारी स्कूलों की गिरती हालत, कमजोर निगरानी, घटती शिक्षा गुणवत्ता और सरकारी स्कूलों से लोगों का टूटता भरोसा सबसे बड़ा कारण है। दरअसल, भारत में सरकारी स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं हैं, बल्कि करोड़ों गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चों के भविष्य की उम्मीद हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकारी स्कूलों की स्थिति लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि अब गरीब परिवार भी मजदूरी कर, कर्ज लेकर या अपनी जरूरतें कम करके बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने लगे हैं।
सरकार को महसूस हुआ कि केवल ऊपर से योजनाएं बनाकर शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधर सकती। जब तक गांव और मोहल्ले के लोग, खासकर अभिभावक, सीधे स्कूल की निगरानी और फैसलों में शामिल नहीं होंगे, तब तक सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति नहीं बदल पाएगी। देश में शिक्षा का ढांचा बहुत बड़ा है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस के अनुसार भारत में लगभग 14.7 लाख स्कूल संचालित हैं। इनमें करीब 10.2 लाख सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल हैं, जबकि लगभग 4.5 लाख निजी स्कूल हैं। देश में लगभग 8 लाख प्राथमिक विद्यालय, करीब 3 लाख माध्यमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय और लगभग डेढ़ लाख उच्च माध्यमिक विद्यालय संचालित हो रहे हैं।
बात अगर बिहार की करें तो यहां लगभग 72 हजार से अधिक सरकारी स्कूल और करीब 18 से 20 हजार निजी स्कूल संचालित हैं। लेकिन संख्या अधिक होने के बावजूद सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बेहद असमान है। ग्रामीण भारत के सरकारी स्कूलों की हालत कई जगह बेहद खराब है। आज भी हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त बेंच नहीं हैं। कई स्कूलों में बिजली नहीं है, इंटरनेट नहीं है, पुस्तकालय नहीं हैं और विज्ञान प्रयोगशालाएं केवल कागजों में मौजूद हैं। बरसात में छत टपकती है और गर्मी में बच्चे बिना पंखे के बैठते हैं। लड़कियों के लिए अलग शौचालय न होने की वजह से किशोरियों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है। कई गांवों में स्कूल भवन तो हैं, लेकिन नियमित पढ़ाई नहीं हो रही।
सबसे बड़ी समस्या शिक्षकों की कमी और जवाबदेही का अभाव है। देश के कई राज्यों में लाखों शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। एक शिक्षक कई कक्षाओं को संभालने को मजबूर होता है। कई बार शिक्षक गैर-शैक्षणिक कार्यों जैसे चुनाव ड्यूटी, सर्वे और सरकारी योजनाओं में लगा दिए जाते हैं। इससे पढ़ाई का स्तर लगातार गिरता है। कई जगह अभिभावकों को यह तक नहीं पता होता कि स्कूल में पढ़ाई सही ढंग से हो रही है या नहीं। यही वजह है कि शिक्षा मंत्रालय ने अब स्कूल प्रबंधन समितियों को मजबूत करने का फैसला किया है, ताकि अभिभावक सीधे स्कूल के कामकाज पर नजर रख सकें।
सरकारी स्कूलों की गिरती स्थिति का सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि गांवों में भी निजी स्कूल तेजी से बढ़ने लगे हैं। पहले निजी स्कूल केवल शहरों तक सीमित थे, लेकिन अब छोटे कस्बों और गांवों में भी अंग्रेजी माध्यम और पब्लिक स्कूलों की भरमार दिखाई देती है। गरीब परिवारों को लगता है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं है। उन्हें विश्वास है कि निजी स्कूलों में अनुशासन, नियमित पढ़ाई और अंग्रेजी शिक्षा बेहतर मिलती है। यही कारण है कि दिहाड़ी मजदूर और किसान भी फीस भरने के लिए अतिरिक्त मेहनत करते हैं।
हालांकि कई छोटे निजी स्कूलों की गुणवत्ता भी बहुत अच्छी नहीं होती, फिर भी लोग उन्हें सरकारी स्कूलों से बेहतर मानते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि निजी स्कूलों में अभिभावकों की भागीदारी और जवाबदेही अधिक दिखाई देती है। यदि पढ़ाई कमजोर होती है तो अभिभावक सीधे स्कूल प्रशासन से सवाल करते हैं। सरकारी स्कूलों में यह व्यवस्था लंबे समय तक कमजोर रही। कोविड महामारी के बाद यह अंतर और बढ़ गया। निजी स्कूलों ने ऑनलाइन पढ़ाई और डिजिटल शिक्षा को तेजी से अपनाया, जबकि अधिकांश सरकारी स्कूल तकनीकी संसाधनों की कमी से जूझते रहे। ग्रामीण और गरीब बच्चों की पढ़ाई सबसे ज्यादा प्रभावित हुई। इससे सरकारी स्कूलों की कमजोरियां और अधिक उजागर हो गईं।
सरकार शिक्षा सुधार को लेकर बड़े दावे कर रही है। केंद्रीय बजट 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय के लिए लगभग 1.39 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसमें स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग को लगभग 83,562 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। सरकार का कहना है कि इस राशि का उपयोग स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लास, लैब, लड़कियों के हॉस्टल और शिक्षक प्रशिक्षण पर किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल बजट बढ़ाने से सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदल जाएगी?
असल बदलाव तब आएगा जब योजनाओं का सही उपयोग हो और स्थानीय स्तर पर निगरानी मजबूत बने। नई एसएमसी गाइडलाइंस इसी दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही हैं। अब अभिभावक केवल बच्चों को स्कूल भेजने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे स्कूल की गुणवत्ता, सुरक्षा, सुविधाओं और योजनाओं की निगरानी में भी भागीदार बनेंगे। सरकार चाहती है कि स्कूल केवल सरकारी संस्थान न बनकर समुदाय की साझा जिम्मेदारी बने ताकि इनकी तस्वीर बदल सके। अब देखना यह होगा कि नई गाइडलाइन सरकारी स्कूलों की दशा और दिशा को कितना बदल पाएगी?(यह लेखिका के निजी विचार हैं)
- कविता कुमारी
सीतामढ़ी, बिहार


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