भट्टों की आग में तपती ज़िंदगियाँ: प्रवासी मजदूर महिलाओं और किशोरियों की मुश्किलें

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भारत जैसे विशाल देश की अर्थव्यवस्था की असली नींव उन करोड़ों श्रमिकों के कंधों पर टिकी है, जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं।

भट्टों की आग में तपती ज़िंदगियाँ: प्रवासी मजदूर महिलाओं और किशोरियों की मुश्किलें


भारत जैसे विशाल देश की अर्थव्यवस्था की असली नींव उन करोड़ों श्रमिकों के कंधों पर टिकी है, जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। विभिन्न सरकारी आकलनों और श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 47 से 50 करोड़ श्रमिक कार्यरत हैं, जिनमें से करीब 90 प्रतिशत यानी लगभग 42 से 43 करोड़ मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। यह वह वर्ग है, जिसे न तो नियमित वेतन मिलता है और न ही सामाजिक सुरक्षा की पूरी गारंटी। राजस्थान की बात करें तो यहाँ भी असंगठित क्षेत्र का दायरा बहुत व्यापक है। राज्य में लगभग 2.5 से 3 करोड़ श्रमिक हैं, जिनमें से करीब 2.2 करोड़ से अधिक मजदूर असंगठित क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

इन असंगठित मजदूरों में एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जो रोज़गार की तलाश में अपने घरों को छोड़कर दूसरे राज्यों में प्रवास करते हैं। राजस्थान के विभिन्न जिलों में स्थित ईंट-भट्टों, पत्थर खदानों और निर्माण कार्यों में इन प्रवासी मजदूरों की भारी भागीदारी देखने को मिलती है। खासतौर पर अजमेर, भीलवाड़ा, जयपुर, अलवर और जोधपुर जैसे जिलों में ईंट-भट्टा उद्योग में प्रवासी मजदूरों की संख्या अधिक है। विभिन्न श्रम संगठनों के अनुमानों के अनुसार, केवल राजस्थान के ईंट-भट्टों में ही हर साल 8 से 10 लाख प्रवासी मजदूर काम करने आते हैं।

इन प्रवासी मजदूरों का बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से आता है। उदाहरण के तौर पर अजमेर और भीलवाड़ा के कई ईंट-भट्टों में काम करने वाले मजदूरों में लगभग 60 से 70 प्रतिशत मजदूर छत्तीसगढ़ और बिहार से आते हैं, जबकि शेष मजदूर उत्तर प्रदेश, झारखंड और  ओडिशा से आते हैं। ये लोग अपने पूरे परिवार के साथ यहाँ आते हैं, जिसमें महिलाएं और किशोरियाँ भी शामिल होती हैं।

ईंट-भट्टों की दुनिया बाहर से देखने पर सिर्फ मिट्टी, धूल और मेहनत की कहानी लगती है, लेकिन इसके भीतर कई ऐसे सच छिपे हैं जिन्हें अक्सर हम नजरअंदाज कर देते हैं। खुले आसमान के नीचे, चिमनियों के धुएं के बीच और ईंटों से बने कच्चे घरों में रहने वाली ये किशोरियाँ काम के साथ-साथ अपने भविष्य के सपने भी बुनती हैं। वे भी चाहती हैं कि उन्हें शिक्षा मिले, वे खेलें-कूदें और एक सम्मानजनक जीवन जिएँ। लेकिन हकीकत यह है कि उनके सपने अक्सर भट्टों की तपती आग में ही बुझ जाते हैं।

इन किशोरियों और महिलाओं के हाथों से बनी ईंटें हमारे घरों को मजबूत छत देती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वे खुद उन्हीं ईंटों के बीच असुरक्षित और असुविधाजनक जीवन जीने को मजबूर हैं। लाखों ईंटों के बीच पनप रही इन जिंदगियों के पास बुनियादी सुविधाएं तक नहीं होतीं हैं। अधिकतर भट्टों पर न तो शौचालय की व्यवस्था होती है और न ही स्नानघर। महिलाओं और किशोरियों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है, जहाँ उन्हें हर समय असुरक्षा का भय बना रहता है।

भट्टों की आग में तपती ज़िंदगियाँ: प्रवासी मजदूर महिलाओं और किशोरियों की मुश्किलें
अजमेर के जेएमडी बुबानी ईंट-भट्टे पर काम करने आई छत्तीसगढ़ की एक गर्भवती महिला भारती चौहान (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि कई बार शारीरिक परेशानी के दौरान उन्हें बार-बार शौच के लिए जाना पड़ता है, लेकिन खुले में जाने के दौरान किसी पुरुष के दिख जाने पर उन्हें रुकना पड़ता है। यह स्थिति न केवल असुविधाजनक है, बल्कि उनकी गरिमा और स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरा है। माहवारी के दौरान इन किशोरियों और महिलाओं की समस्याएँ और भी बढ़ जाती हैं। इस समय साफ-सफाई और निजता की सबसे अधिक जरूरत होती है, लेकिन भट्टों पर इसकी कोई व्यवस्था नहीं होती। छत्तीसगढ़ से आई किशोरी हेमलता (बदला हुआ नाम) बताती है कि उन्हें मजबूरी में खुले में जाना पड़ता है और कई बार शर्मिंदगी और डर का सामना करना पड़ता है। वहीं चाँदनी (बदला हुआ नाम) कहती है कि एक ही कमरे में पूरे परिवार के साथ रहने के कारण उन्हें सैनिटरी पैड बदलने के लिए भी पर्याप्त निजता नहीं मिल पाती है।

हालांकि सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनका उद्देश्य उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाना है। ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से असंगठित मजदूरों का पंजीकरण किया जा रहा है, ताकि उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के तहत वृद्धावस्था में पेंशन की सुविधा दी जाती है। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के माध्यम से कम प्रीमियम पर बीमा सुरक्षा प्रदान की जाती है। इसके अलावा आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीब परिवारों को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलता है। महिलाओं की स्वच्छता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए स्वच्छ भारत मिशन और उड़ान योजना जैसी पहल भी शुरू की गई हैं, जिनका उद्देश्य शौचालय निर्माण और सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रवासी मजदूरों तक इन योजनाओं का लाभ पूरी तरह से नहीं पहुंच पाता। इसका मुख्य कारण उनका लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन करना है, जिससे वे सरकारी योजनाओं की स्थायी सूची में शामिल नहीं हो पाते। ऐसे में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। इनमें सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एण्ड एक्शन जैसी कई संस्थाएं हैं जो राजस्थान के अजमेर और भीलवाड़ा के लगभग 20 ईंट-भट्टों पर काम कर रही हैं, जहाँ हर महीने करीब 400 महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जा रहे हैं और उन्हें स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

आज जरूरत है कि हम इन प्रवासी मजदूरों, विशेषकर किशोरियों और महिलाओं की स्थिति को गंभीरता से समझें, क्योंकि उन्हें भी सम्मानजनक जीवन, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए। यह उनका अधिकार भी है। जब तक देश की इन अनदेखी नींवों को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक विकास की इमारत भी अधूरी ही रहेगी। यह केवल सरकार और किसी एनजीओ की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे इन आवाज़ों को सुनें और इनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में एक कदम बढ़ाएं।(यह लेखक के निजी विचार हैं)



- छोटू सिंह रावत
अजमेर, राजस्थान

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