अब ज़्यादा मत सोचिए... आप अभी भी ज़मीन से चिपके हैं, अपने मूल्यों में अडिग, अपने आदर्शों में स्थिर - क्योंकि आपको डर लगता है... गिरने में भी, और उड़ने
उड़ने में क्या हर्ज़ है...!
उड़ने में क्या हर्ज़ है, ज़रा बताइए तो सही! जब हवा मनभावन चले और आप कचरे के झोले या कटी पतंग की तरह बहने को तत्पर बैठे हों, तो भला उड़ने में क्या ही गुरेज़? बस हवा की एक फूँक चाहिए और आप उड़ चलें-कहाँ? ये मत पूछिए। हवा के भरोसे... हवा ही उनका राम, हवा ही श्याम! जिस छत पर हवा पहुँचा दे, वही आपकी मंज़िल। मुफ़्त की हवा की राह में उड़ चलें-जहाँ ले जाए, वहाँ। न कोई दिशा, न मंज़िल, न इरादा-बस उड़ना है।
“और जब हवा बंद हो जाए? तब क्या होगा तुम्हारा? कभी सोचा है!”
हमसे रहा नहीं गया-या थोड़ा जलनखोरी वाला मामला ही समझ लें-इसलिए पूछ बैठे।
तो क्या...!
“गिर पड़ेंगे! ओंधे मुँह! माथा फूट जाएगा!”
“मित्र, ये भी क्या बात कही आपने! अरे मुँह हमारा, माथा हमारा... उड़ें या गिरें... आप क्यों मुँह बिगाड़ रहे हो! भाई साहब, जब उड़ने में कोई हर्ज़ नहीं, तो गिरने में क्यों हो?”
उड़िए, खूब उड़िए मित्र! लेकिन परेशानी ये है कि आप अपने साथ इतनी धूल जो लपेट कर उड़ चले हैं... आप उड़ रहे हैं, लेकिन उसके साथ उड़ रही यही धूल हमारी आँखों में झोंकी जा रही है। आपने पंख भी तो चुरा लिए हैं! एक नहीं, न जाने कितने सारे पंख... ढीले-ढाले, लदे-पिदे से... जब हवा के साथ उड़ना ही है, तो उड़ो न! ये पंख भला क्या काम आएँगे? कम से कम पंखों को कैसे काम में लेना है, ये तो सीख लेते। ये सजावट के लिए नहीं हैं, मित्र!ओह! आपने इसलिए चुरा लिए हैं पंख... आपको डर है कि कहीं हम इन पंखों के सहारे उड़ने न लग जाएँ! चिंता न करो, मित्र। वैसे भी हमने हवा की राह में उड़ना पसंद ही नहीं किया... पंख लगाए भी तो... हवा हमारे विरोध में बहने लगी है! क्या करें! उड़ना कौन नहीं चाहता? सब चाहते हैं, लेकिन अपने-अपने हिस्से का आकाश भी तो हो! अब आकाश भी बँटने लगा है, क्या करें! ऐसे उड़ने से लाभ ही क्या!
इधर बचपन से ही माता-पिता ने हमें ज़मीन से चिपके रहने की शिक्षा दी-"उड़ो, लेकिन पैर ज़मीन पर भी रहें तुम्हारे..."
यार! ये कैसा उड़ना... कि पैर ज़मीन पर ही रहें? फिर बाँध दी गई डोरियाँ... ज़िम्मेदारियों की, संस्कारों की, सिद्धांतों की...! ज़रा ज़्यादा उड़े कि खींच ली जाती है पतंगे। ये क्या कम है कि बिटिया 'सीनियर' पास करके उड़कर कॉलेज पहुँच गई... 'बीए' कर लिया, 'बीएड' कर लिया... बस! खींच ली गई डोरी-"बहुत हो गया, आ जाओ ज़मीन पर!" वो लड़के वाले आ रहे हैं... डोरी समेट ली चर्खी पर... कल दे दी जाएगी किसी अनजान के हाथ में डोरी... वो डाल देगा चर्खी को एक कोने में...
हमने एक बार पूछ भी लिया, "अगर यूँ ही ज़मीन पर रगड़ते रहे तो चप्पलें घिस जाएँगी!"
तब उन्होंने अपनी चप्पल निकाल कर हमारे माथे पर दो चटकाते हुए समझाया-"बहुत हवा में उड़ोगे तो चप्पल सीधी माथे पर आ गिरेगी!"
बात तुरंत समझ में आ गई... हमें पैर की चप्पलों को घिसना मंज़ूर था... मगर माथे पर गिरे ये मंज़ूर नहीं!
लेकिन साहब, आदमी की बात यहीं नहीं रुकती। जब बात को हवा लग जाए, तो उसका उड़ना स्वाभाविक है..! पैसे, शोहरत और ताक़त की भट्ठी में तपकर आदमी और उसकी बात हलकान हो उठती है... ज़मीन पर टिकना मुश्किल हो जाता है। जैसे बरसात के मौसम में कीट–पतंगों के पंख निकल आते हैं, वैसे ही... और फिर? फिर वो उड़ने लगते हैं, तैरने लगते हैं, मंडराने लगते हैं - आत्ममुग्धता के बादलों में। ये बादल, जो गहरे, कारे, कजरारे... लेकिन बरसने वाले नहीं... सिर्फ गरजने वाले बदरा! सारी आदमियत को अपनी काली बदरी से ढँक देने वाले बदरा!
देखो तो कैसे अट्टहास कर रहे हैं ये... बेमौसम के बादल हैं साहब... बिल्ली का गू हैं - न लीपने को, न पोतने को... लेकिन चिंता न करें मित्र, ये अवसरवादिता के बादल जैसे ही टकराते हैं हकीकत के पहाड़ों से... अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। कब टपके, कहाँ टपके, टपके या टपकाए गए - राम जाने! बड़े लोगों की बड़ी बातें साहब...
मेरे एक रिश्तेदार हैं - अभी हाल ही में दो रुपये का तेल–पानी कही से क्या मिला, बाँध लिया अपनी पूँछ पर। क्या बताएँ... ऐसे रॉकेट की तरह सुर्र हवा में उड़े कि कई दिन तो नज़र ही नहीं आए! इतने ऊँचे चले गए, कि अगर हम पास जाकर देखना भी चाहें साहब, तो हमारी टोपी गिर जाए। लेकिन ये क्या... जैसे-जैसे वो ऊपर गए, वैसे-वैसे वो छोटे होते गए! इतने बड़े आदमी... देखने में छोटे! माजरा कुछ उल्टा सा... उन्हें इतनी ऊँचाई से हम छोटे लग रहे हैं... बात ही ऐसी है... उनकी मजबूरी है... हम पहुँच नहीं पा रहे हैं वहाँ तक। वरना अगर हम भी ज़मीन छोड़ दें और उनकी ऊँचाई तक पहुँच जाएँ... तो शायद उनका बड़प्पन कुछ देख पाएँ...!
बड़ी अजीब बात है न - उड़ने के साथ यही एक लोचा है... डोरी सँभाले नहीं सँभलती... ये खुद ही झटका देकर डोरी खींच लेते हैं अपनी। पतंग इनकी, डोरी इनकी, अकड़ इनके बाप की... ज़मीन से नाता टूटता है और मान्यताएँ, मूल्य और संस्कार की डोरियाँ छूटने लगती हैं। कटे पंखों से पेंगुइन जैसे फड़फड़ा रहे हैं वो...
अब ज़्यादा मत सोचिए... आप अभी भी ज़मीन से चिपके हैं, अपने मूल्यों में अडिग, अपने आदर्शों में स्थिर - क्योंकि आपको डर लगता है... गिरने में भी, और उड़ने में भी। बाकी लोगों को उड़ने दीजिए... कभी-न-कभी तो हवा बंद होगी ही... फिर सब आएँगे धड़ाम से ज़मीन पर। और तब... आप होंगे वहाँ, उन्हें उठाने के लिए।
लेकिन हो सकता है, वो आप पर दोषारोपण कर दें, मित्र - कि “आपसे देखा नहीं गया हमारा उड़ना...!” इसलिए... तनिक दूर ही रहो...! वैसे भी, उन्होंने पहले ही कह दिया है... जब गिरने में कोई हर्ज़ नहीं, तो उड़ने में कहाँ से होने लगा!


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