पलायन की राह में बच्चों के टूटते सपने

SHARE:

पलायन को रोकने के लिए रोज़गार के अवसरों को गांवों के नजदीक बढ़ाना प्रभावी उपाय हो सकता है, जिससे लोगों को अपने घर छोड़ने की आवश्यकता कम हो।

पलायन की राह में बच्चों के टूटते सपने


भारत जैसे विशाल देश में रोज़गार की तलाश में पलायन एक ऐसी सच्चाई है, जो लाखों परिवारों की नियति बन चुकी है। गांवों में रोज़गार के सीमित अवसर, खेती पर निर्भरता, सूखा, बाढ़, और बुनियादी सुविधाओं की कमी लोगों को शहरों की ओर धकेल देती है। यह पलायन केवल एक व्यक्ति का नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार का होता है, जिसमें छोटे-छोटे बच्चे और किशोरियां भी शामिल होती हैं। शहर पहुंचने के बाद इन परिवारों की ज़िंदगी अक्सर स्लम बस्तियों में सिमट जाती है, जहाँ न तो रहने की उचित व्यवस्था होती है और न ही शिक्षा और पोषण जैसी मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो पाती हैं।

विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, देश में करोड़ों लोग रोज़गार की तलाश में हर साल गांवों से शहरों की ओर जाते हैं। अनुमान है कि वर्ष 2025 तक भारत में 2 करोड़ से अधिक नए प्रवासी शहरों में बसने की ओर बढ़ रहे हैं, जिनमें से बड़ी संख्या मज़दूर वर्ग की है और इनमें से अधिकतर लोग सस्ती ज़मीन और आवास न मिलने के कारण स्लम बस्तियों में रहने को मजबूर हो जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश के शहरी क्षेत्रों में लगभग 6.5 करोड़ से अधिक लोग ऐसी बस्तियों में रहते हैं, जो कुल शहरी आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा है।

राजस्थान की राजधानी जयपुर के पास स्थित झालाना डूंगरी की कुंडा लालखा बस्ती इस समस्या का एक जीवंत उदाहरण है। जयपुर शहर से लगभग 5 किमी की दूरी पर स्थित यह बस्ती उन परिवारों का ठिकाना बन चुकी है, जो राजस्थान के अलग-अलग जिलों के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों से रोज़गार की तलाश में यहाँ आए हैं। इन परिवारों के अधिकांश सदस्य निर्माण कार्य, पत्थर तोड़ने, सफाई, घरेलू काम या अन्य दिहाड़ी मजदूरी में लगे हुए हैं। दिन भर की कड़ी मेहनत के बावजूद उनकी आमदनी इतनी नहीं होती कि वे पक्के मकान में रह सकें। परिणामस्वरूप, वे टीन, प्लास्टिक और अस्थायी सामग्री से बने छोटे-छोटे झोपड़ीनुमा घरों में रहने को मजबूर होते हैं।

पलायन की राह में बच्चों के टूटते सपने
ऐसी बस्तियों में रहने वाले परिवारों के बच्चों और किशोरियों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक होती है। पलायन के कारण बच्चों की शिक्षा सबसे पहले प्रभावित होती है। जब परिवार बार-बार स्थान बदलते हैं, तो बच्चों का स्कूल में नामांकन स्थायी नहीं रह पाता। कई बार दस्तावेजों की कमी या स्थानीय पहचान पत्र न होने के कारण बच्चों का स्कूल में प्रवेश भी नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप, वे पढ़ाई से दूर होते चले जाते हैं और धीरे-धीरे बाल मजदूरी की ओर धकेल दिए जाते हैं। लड़कियों की स्थिति और भी कठिन होती है, क्योंकि घर के छोटे बच्चों की देखभाल, पानी लाना, खाना बनाना जैसे घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ जाती है, जिससे उनकी पढ़ाई पूरी तरह छूट जाती है।

पोषण की दृष्टि से भी ऐसे परिवारों के बच्चे और किशोरियाँ गंभीर चुनौतियों का सामना करती हैं। इन बस्तियों में रहने वाले परिवारों की आय नाममात्र होने के कारण वे पौष्टिक आहार का खर्च नहीं उठा पाते। कई बार दिन में केवल एक या दो बार ही भोजन मिल पाता है, जिसमें दाल, हरी सब्जी, दूध और फल जैसी आवश्यक पोषक सामग्री का अभाव होता है। इस कारण उनमें कुपोषण, एनीमिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं सामान्य होती हैं।

स्लम बस्तियों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव इन समस्याओं को और गहरा बना देता है। देश के कई शहरी स्लम क्षेत्रों में साफ पेयजल, शौचालय और बिजली जैसी सुविधाएँ पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। आंकड़ों के अनुसार, गैर-मान्यता प्राप्त स्लम बस्तियों में केवल लगभग 64 प्रतिशत परिवारों को ही नल के पानी की सुविधा मिल पाती है, जबकि शेष परिवारों को दूर से पानी लाना पड़ता है। इसके अलावा, स्वच्छता सुविधाओं की कमी के कारण गंदगी, मच्छरों और संक्रमण का खतरा बना रहता है, जिससे बच्चों में डायरिया, बुखार और त्वचा रोग जैसी बीमारियाँ आम हो जाती हैं। संकरी गलियाँ, खुले नाले और कूड़े के ढेर इन बस्तियों की पहचान बन जाते हैं, जो बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

राजस्थान में स्लम बस्तियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025 तक राजस्थान में लगभग 5 लाख से अधिक परिवार इन बस्तियों में निवास कर रहे हैं, जो पलायन की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है। जयपुर जैसे बड़े शहरों में यह स्थिति और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, जहाँ बढ़ती आबादी और सीमित संसाधनों के कारण स्लम बस्तियों का लगातार विस्तार हो रहा है। झालाना डूंगरी की कुंडा लालखा बस्ती भी इसी विस्तार का एक हिस्सा है, जहाँ रोज़गार की तलाश में आए परिवार बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

इन समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, सरकार और स्थानीय प्रशासन को पलायन करने वाले परिवारों के बच्चों के लिए पोर्टेबल शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, ताकि वे किसी भी स्थान पर जाकर अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। इसके लिए मोबाइल स्कूल, अस्थायी शिक्षण केंद्र और डिजिटल शिक्षा साधनों का उपयोग किया जा सकता है। साथ ही, स्लम बस्तियों में आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना जरूरी है, ताकि बच्चों को नियमित टीकाकरण, पोषण आहार और स्वास्थ्य जांच की सुविधा मिल सके।

पलायन को रोकने के लिए रोज़गार के अवसरों को गांवों के नजदीक बढ़ाना प्रभावी उपाय हो सकता है, जिससे लोगों को अपने घर छोड़ने की आवश्यकता कम हो। साथ ही गांव स्तर पर ही स्वयंसेवी संस्थाओं और सामुदायिक संगठनों की भागीदारी से बच्चों और किशोरियों के लिए विशेष प्रशिक्षण, कौशल विकास और शिक्षा कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं, जो उनके भविष्य को नई दिशा दे सकते हैं। जरूरी है एक ऐसे रोडमैप तैयार करने की जिससे पलायन करने वाले परिवारों के बच्चों और किशोरियों को सुरक्षित, स्वस्थ और शिक्षित जीवन का अवसर मिल सके।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)



- चंपा देवी,
जयपुर, राजस्थान

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका