यह अंधकार कोई दीवार नहीं, बस एक पतली-सी परत है— जैसे आधा सच, आधा चेहरा, और मैं… उन दोनों के बीच अटका हुआ एक अधूरा बयान। परछाइयाँ सुइयों की तरह नहीं,
मुक्ति नहीं उस जलते चक्र से
प्रभात आता है,
और सूर्य एक वर्दी पहने बच्चे-सा
ब्रह्मांड के विद्यालय में खड़ा होकर
अपनी प्रतिज्ञा दोहराता है,
रोशनी को पसीने की तरह बहाते हुए—
हर दिन, वैसे ही।
दोपहर तक,
वह अपनी धूप को पानी-सा
जलते हुए पेट में उँडेलता है,
समय की मुट्ठी में रेंगता हुआ,
अनवरत, अनथका।
उसकी ढलती किरणें पतली हो जाती हैं,
एक थकी मुस्कान बिखेरती हुई,
और फिर चुपचाप
अपने ही बनाए अँधेरे के घर में उतर जाता है,
जहाँ उसका शरीर जलता, सूखता, विलीन होता है।
फिर भी कहीं ठिकाना नहीं—
ग्रह और उपग्रह घूमते रहें,
सूर्य वहीं रहता है,
उसके सिर में धँसा हुआ
समय का तपता चक्र।
मुक्ति नहीं,
जब तक सब कुछ
अँधेरी मिट्टी में समा न जाए।
मुक्ति नहीं
मनुष्यों के लिए भी—
जिनके भीतर
उसी सूर्य की तरह
एक जलता हुआ मन बसता है।
न्याय का वृक्ष
मैं न्याय के पक्ष में खड़ा हूँ—
डगमगाता हुआ भी, फिर भी अडिग।
न्याय के हाथ, कहते हैं लोग,
वे चट्टान तोड़ते हाथ हैं—
दीनता के कंधों पर टिके हुए,
थकान में भी हथौड़े उठाए।
सूखे शरीर पर
क्रोध धूल बनकर चिपका है,
और एक रक्तपिपासु कोट
घुटन की सिलवटों में लिपटा हुआ।
निर्दयी सत्ता, मानवता से खाली,
भलाई के उपदेश रटवाती है,
और कंकाल-सी विवशता को
मजबूर करती है पढ़ने को
उस कुल्हाड़ी का निर्णय,
जो सद्गुण के गले की ओर उठती है।
फिर भी, मैं न्याय की ओर देखता हूँ।
एक खोखला वृक्ष है वह—
जिसमें बस इतनी ताकत है
कि घास को रौंद सके,
पर तूफानों को थाम न सके।
कंकाल बनकर उठते जीवन में
यह मानव-वृक्ष न्याय का
हर पल मरता रहता है,
जीते हुए भी
मृत्यु का अभ्यास करता हुआ।
फिर भी, मैं खड़ा हूँ—
न्याय के पक्ष में,
जहाँ निर्दयी लोगों के आशीर्वाद
पैरों की ठोकर बनकर गिरते हैं,
और यह कविता—
करुणा भरी आँखों में
ठहरा एक आँसू—
सूखने से इंकार करती है।
मेरे और मेरे घर के बीच की दूरी
मौन का नक्षत्र-घर
मुझे देखता रहता है।
एक शांत आकाशगृह,
बिना पलक झपकाए,
जैसे उसे पता हो
मेरे भीतर के अनकहे दरारों का मानचित्र।
मेरे और मेरे घर के बीच
कैसी यह अजीब दूरी है—
न रास्तों में नापी जाती,
न कदमों में सिमटती,
बल्कि जागती रातों में,
उन शब्दों में
जो कभी जन्म ही नहीं ले पाए।
मैं अपने ही द्वार पर खड़ा हूँ,
एक परिचित अजनबी बनकर,
सोचता हुआ—
कब मेरा घर
मुझसे इतना दूर हो गया?
छल की उर्वर मिट्टी
हर ओर कोई न कोई छल छिपा है—
कभी घाव बनकर, कभी बस एक धीमी सरगोशी बनकर।
पर यह केवल विनाश नहीं,
यही तो वह गहरी, उर्वर मिट्टी है
जहाँ जीवन अपने बीज छुपाकर अंकुरित होता है।
इसी अँधेरी धरती में
सच अपनी जड़ें तेज करता है,
और नाज़ुक उम्मीदें
हरियाली बनकर ऊपर उठती हैं—
जिद्दी, जीवित, अडिग।
संदेह का नागरिक
यह अंधकार कोई दीवार नहीं,
बस एक पतली-सी परत है—
जैसे आधा सच, आधा चेहरा,
और मैं…
उन दोनों के बीच अटका हुआ
एक अधूरा बयान।
परछाइयाँ सुइयों की तरह नहीं,
बल्कि विचारों की तरह चुभती हैं—
धीरे, गहराई से,
और हर चुभन के बाद
एक नया अलगाव जन्म लेता है।
शब्द—
ये शोरगुल भरे, वीरता का मुखौटा पहने शब्द—
मौन की छाती में
लगातार धँसते खंजर हैं।
और अजीब है,
हर वार के बाद
मौन ही और गहरा हो जाता है।
मेरे भीतर एक अष्टफलक है—
आठ कोनों में बँटा हुआ मैं,
हर कोण से झाँकता एक नया संदेह।
क्या ये कोने ही
धीरे-धीरे मेरी चिता की लकड़ी बन रहे हैं?
या मैं ही
अपने अंत का बढ़ई हूँ?
कैद का दरवाज़ा खुला है—
पर बाहर भी
उतनी ही भीड़ है जितनी भीतर।
मैं बाहर निकलकर भी
कैदी ही रहता हूँ,
क्योंकि ताले अब
लोहे के नहीं,
विचारों के हैं।
जीवन की आत्मा?
वह शायद वही है
जो हर दिन मरकर भी
अगले दिन उठ खड़ी होती है।
और मृत्यु की आत्मा?
वह शायद वही है
जो हर जीवित क्षण में
धीरे-धीरे साँस लेती है।
इस तरह—
जीवन और मृत्यु
कोई विरोधी नहीं,
बल्कि एक ही सिक्के के दो संदेह हैं,
जिन्हें मैं
हर दिन उछालता हूँ,
और हर बार
दोनों ही तरफ हार जाता हूँ।
- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
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