अब न रहने योग्य है यह गाँव | हिंदी नवगीत

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अब न रहने योग्य है यह गाँव अब न रहने योग्य है यह गाँव शासन है प्रदूषित। मौन व्रत हैं रख लिए वागीश नहीं झाँके अब न रहने योग्य है यह गाँव हैं कभी अवनी

अब न रहने योग्य है यह गाँव


ब न रहने
योग्य है यह गाँव
शासन है प्रदूषित।

मौन व्रत हैं
रख लिए वागीश
नहीं झाँके
अब न रहने योग्य है यह गाँव
हैं कभी अवनीश
अब न रहने
योग्य है यह छाँव
वाशन है प्रदूषित।

अब न गोबर
खाद वाले खेत
'रेट सिंड्रोम'
से प्रपीड़ित चेत
अब न रहने
योग्य है यह ठाँव
राशन है प्रदूषित।

कंठ के स्वर
अब गए हैं सूख
खा रही हैं
ठोकरें हर भूख
अब न रहने
योग्य है 'डुमराँव'
प्राशन है प्रदूषित।

पुरवा टहल रही

पुरवा टहल रही पछुए सँग
झूम रही है डाल।
नदी बहाकर ले जाती है
देह पुरानी नाव

मरघट के आँगन में दौड़ें
दुख के उभरे घाव
बहुत दिनों के बाद जगे हैं
भूले-बिसरे भाव
लयता फेंक रही मछुए-सा
एक दर्द का जाल।

हर जीवन के आस-पास है
एक सुहानी धूप
भागदौड़ की इस नगरी में
खुदे मौत के कूप
अनहोनी के समय अबोले
बदल रहे हैं रूप
मौसम बोल रहा कछुए से
और बढ़ा कुछ चाल।

नया उजास लिए है भादो
चला रातभर भोर
बदल गया परिदृश्य भूख का
मचा हुआ है शोर

आँसू से कविता लिखता है
बँधा नाँद पर ढोर
टपक रहा है मन महुए-सा
खदक रही है दाल।


रेल पटरियों पर कुहरा है

चलते-चलते
कितनी लंबी रात हो गई
जाड़े की।

समय-घड़ी तो
ठीक चल रही
ट्रेनें धीमी
रेल-पटरियों पर कुहरा है

काम खड़ा है
फुटपाथों पर
धुंध बहुत है
टेंट-गठरियों पर कुहरा है
चलते-चलते
अचरज ऋतु की बात हो गई
जाड़े की।
 
अपने-आप
हुए दिन छोटे
घुप्प अँधेरा
छतों-अटरियों पर कुहरा है
किरणों का
आगमन रुका है
सूर्य लेट है

पेड़-डगरियों पर कुहरा है
चलते-चलते
वाहन की गति घात हो गई
जाड़े की।

खड़खड़ करती
नयी बसों की
बंद खिड़कियों पर कुहरा है
बातचीत की
हँसीखुशी की

मंद झिड़कियों पर कुहरा है
चलते-चलते
धूप ठंड की जात हो गई
जाड़े की।

चाँपाकल पर
नदी-नहर पर
घास-छपरियों पर कुहरा है
खड़ी फसल पर
डीह महल पर
गाँव-शहरियों पर कुहरा है

चलते-चलते
जलते हीटर मात हो गई
जाड़े की।


बदलावों की द्विभा-दौड़

गाँवों की
गवनई खो गई
चौपालों पर भीड़ नहीं है।

शहरीकरण
हुआ मनमौजी
आया बस्ती में
काट रहा

शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'
मधुवन उसास का
अपनी मस्ती में
हैं देहात से
पंछी गायब
पेड़ों पर अब नीड़ नहीं है।

अपने ही अब
बना रहे हैं
अपनों से दूरी
गाँव
शहर की ओर भागते
श्रम की मजबूरी
दिल्ली क्या थी?
अब कैसी है?
अब शहरों में चीड़ नहीं है।

जमकर
नाच रही कड़वाहट 
गली मुहल्ले में
अंत्योदय
मुँह मार रहा है

फैले गल्ले में
बदलावों की
द्विभा-दौड़ में
अब सिक्कों की बीड़ नहीं है।


गद्दी बाबा

दोपहरी में
गद्दी बाबा
'मार्हा' फाँक रहे हैं।

उठते हैं वे चार बजे ही
पढ़ते हैं गीता
नीचू लोटा पानी लाता
सेवा में सीता
पूजा करके
गद्दी बाबा
तुलसी बाँट रहे हैं।

बिना शुल्क के 'मुड़िया' भाषा
रोज पढ़ाते हैं
हाथ देखते फिर भविष्य फल
भाग्य बताते हैं
ठंड लगी तो
गद्दी बाबा
काढ़ा फाँट रहे हैं।

रही नौकरी चटकल ही की
भाया कलकत्ता
कहते हैं कि बीने कुछ दिन
सड़क-सड़क गत्ता
नब्बे-वर्षी
गद्दी बाबा
ऊपर झाँक रहे हैं।

एक झोंपड़ी वही हवेली
अपना पक्का घर
चन्द्र-चंद्रिका
की आशा है ऊँचा होता सर
उम्र रजाई
गद्दी बाबा
हँस-हँस टाँक रहे हैं।



- शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'
'शिवाभा',14 विवेकानंद कालोनी 
भगवानपुर ,वाराणसी-221005 उ.प्र.
संपर्क 9412212255

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