स्त्री विमर्श की जिरह करती नाट्य कृति माधवी | भीष्म साहनी स्त्री विमर्श उत्तर आधुनिक काल के साहित्यक विमर्शों के दौर में उपजा एक गंभीर वैचारिक विमर्श
स्त्री विमर्श की जिरह करती नाट्य कृति माधवी | भीष्म साहनी
स्त्री विमर्श उत्तर आधुनिक काल के साहित्यक विमर्शों के दौर में उपजा एक गंभीर वैचारिक विमर्श है। जिसमें एक स्त्री के प्रति आधुनिक स्वतंत्र चिंतन प्रदान किया गया है । ऐतिहासिक विषय प्रसंग के विश्लेषण के क्रम में जेंडर को एक श्रेणी के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है । भीष्म साहनी ने स्त्री को एक स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान करने के बरक्स कुछ ऐसे साहित्य सृजित किए हैं, जो पुरुष वर्चस्ववादी समाज में नारी की अस्मिता स्थापित करती है । उन्होंने अपनी रचनाओं में इस स्त्रीवादी चिंतन को न केवल स्थापित किया बल्कि उसमें सामान्य पाठक को नारी के प्रति स्वतंत्र चिंतन पोषित करने का आग्रह किया है। उन्होंने जिस जीवन को जिया, जिस संघर्षों को झेला उसी का यथार्थ चित्र अपनी रचनाओं में चित्राकिंत किया है।
'माधवी' नाटक स्त्रीवादी चिंतन पर आधारित है । माधवी को एक मुखर स्त्रीवादी स्वर के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अपनी जीवन परिस्थितियों को कभी पिता, कभी प्रेमी तो कभी राजाओं के आदेश स्वीकार तो करते हैं लेकिन उसके साथ घटित हो रही स्थितियों के प्रति वह पूर्णतः सजग हैं । वह स्त्री को अपनी नियति के प्रति विक्षोभ की चरम स्थिति में भी मौन रहने के बजाय कभी दुःखी होकर तो कभी खुश होकर तो कभी क्षुब्ध होकर प्रतिरोध करती हैं । इस नाटक की अंतरात्मा को लेकर भीष्म साहनी का कहना है -"पितृसत्तात्मक समाज एक नारी को मानवी रूप से वंचित कर किस तरह वस्तु में परिवर्तित कर सकता है और उसका उपभोग कर उपेक्षित करने का अधिकार भी रखता है, इसका साक्षात उदाहरण है यह नाटक 'माधवी' ।"01
'माधवी' नाटक में राजा ययाति द्वारा माधवी को दान में दिए जाने के उपरांत माधवी अपने पिता से आक्रोश भरे स्वर में पूछती है - "आज मेरी मां होती तो क्या मुझे इस तरह दान में दे देती ?"02 इस पर राजा ययाति प्रति उत्तर में कहते हैं - "इस समय मेरा धर्म ही सर्वोपरि है माधवी।"03 एक पुत्री को पिता द्वारा दान दिए जाने के प्रति माधवी की पहली प्रतिक्रिया ही इस नाटक में स्त्रीवादी चिंतन का प्रस्थान बिंदु है । माधवी चुपचाप गरीब गाय की तरह अपने पिता के आदेश का पालन नहीं करती बल्कि उसके साथ हो रहे अन्याय का प्रतिवाद करती है । लेकिन वह हार मानती है और अपने पिता के निर्णय के विरुद्ध नहीं जा पाती । यहां एक सवाल खड़ा होता है कि आज के समाज में एक नारी को क्या इतना अधिकार प्राप्त है कि अपनी जिंदगी का फैसला खुद ले सके । समाज ने आज तक इतना अधिकार एक नारी को नहीं दिया है । एक नारी अपने पिता के यश, प्रतिष्ठा के सामने पुत्री को दान में दिए जाने का विरोध करे, यह भी पूर्णतः सम्भव नहीं है । अतः माधवी की मां होती तो भी शायद उसे दान दिए जाने का प्रतिरोध नहीं कर पाती ।
कथावाचक कथा वाचन करते हुए कहते हैं - "विलक्षण लोगों की जीवन यात्रा कभी भी सीधे रास्ते से नहीं होती। वह सदा टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होती है।"04 ऋषि विश्वामित्र एक विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न गुरु हैं, राजा ययाति विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न राजा हैं, गालव विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न शिष्य हैं और माधवी विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न युवती हैं। माधवी को ही उन टेढ़े मेढ़े रास्तों से चलना पड़ता है। माधवी को ही एक असंभव शर्त को पूरा करने की जिम्मेदारी दी जाती है, और किसी को नहीं। क्योंकि वह एक माधवी लता है और पुरुष के सहयोग के बिना कुछ भी नहीं कर सकती। पुरुष मानसिकतावादी समाज एक नारी को मुसीबत की ऐसी दलदल में धकेल देती है, जहां से उबर पाना उसके लिए संभव ही नहीं हो पाता।
माधवी को सबसे पहले एक बेटी के रूप में संघर्ष करना पड़ता है। माधवी को दानवीर ययाति की बेटी होने का खामियाजा भुगतना पड़ता है। राजा ययाति अपनी आन-बान-शान के लिए इकलौती बेटी को एक अपरिचित व्यक्ति मुनिकुमार गालव के हाथों सौंप देते हैं। राजा ययाति तनिक भी नहीं सोचते कि माधवी की भावनाओं को ठेंस पहुंच सकती है। एक अकेली युवती एक युवक के साथ कितनी असुरक्षित जिंदगी जी सकती है, इसके बारे में ययाति का पल भर भी न सोचना हैरान करने वाली बात है।
माधवी जब गालव के साथ आठ सौ अश्वमेधी घोड़े की तलाश में निकल पड़ती है तब उसकी सुरक्षा का सवाल खड़ा होता है। ऋषि विश्वामित्र द्वारा गालव को इस असंभव सी गुरु दक्षिणा की याचना करना और उसे संभव करके दिखाने की निरर्थक कोशिश करना निहायत मूर्खता पूर्ण कार्य है। उस निरर्थक कोशिश में एक माधवी लता के रूप में एक अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न युवती को झोंक देना और भी अन्यायपूर्ण कार्य है। एक बाप का अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर पलभर भी न सोचना और एक युवक के साथ दुर्लभ लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भेज देना कितनी गैर जिम्मेदाराना हरकत है।
इस नाटक की कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है माधवी की मासूमियत खत्म होती जाती है । वह प्रतिदिन स्त्री-पुरुष के संबंधों को समझने का नया पाठ पढ़ती है । माधवी का गालव के साथ ऋषि विश्वामित्र की गुरु दक्षिणा की शर्तों को पूरा करने के लिए आठ सौ अश्वमेधी श्वेत वर्णी और श्याम कर्णी घोड़ों की तलाश में निकल पड़ती है । गालव माधवी को अपनी लक्ष्य-पूर्ति के लिए साधन मात्र समझता है । वह कभी भी माधवी की भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं करता । वह केवल उसे एक मशीन की तरह, टूल की तरह इस्तेमाल करता है । माधवी को पुरुष की इस स्वार्थी मानसिकता पर बड़ा क्रोध होता है । लेकिन उसे व्यक्त नहीं कर पाती, क्योंकि उस समय का समाज उसे यह कार्य करने से रोकता है।
माधवी जब अयोध्या नरेश हर्यश्च के राज दरबार में एक साल रूकती है और वहां एक पुत्र रत्न को जन्म देती है, जो चक्रवर्ती सम्राट बन सकता है, उसके मन को गहरी पीड़ा पहुंचती है । क्योंकि शर्त अनुसार माधवी राजा हर्यश्च को एक पुत्र रत्न प्रदान करेगी और बदले में दो सौ अश्वमेधी घोड़े गालव प्राप्त करेगा। राजा हर्यश्च के अंत:पुर में प्रवेश करने से पहले माधवी अपनी आंतरिक पीड़ा इन शब्दों में व्यक्त करती है - "यह कैसा नाटक खेला जाने लगा है गालव ? मुझे लगता है, मैं अंत:पुर में नहीं किसी कारावास में जा रही हूं, पर यह समय कट जाएगा । मैं एक-एक दिन गिनूंगी न जाने हम फिर कब मिलेंगें ।"05
माधवी मुनि कुमार गालव से प्रेम करती है। उसके मन में गालव के प्रति गहरा प्रेम है। गालव के साथ सुखद वैवाहिक जीवन जीनव का सपना भी देखती रहती है। राजा हर्यश्च के रनिवास में रहकर पुत्र वसुमना को जन्म देती है। वह सोचती है कि उसका बेटा यदि गालव की तरह होता तो कितना अच्छा होता। काशी नरेश दिवोदास के पास एक साल का अनुबंधित वैवाहिक जीवन व्यतीत करती हुई माधवी प्रतर्दन नामक पुत्र को जन्म देती है। बदले में दो सौ घोड़े लेकर गालव के साथ काशी नगरी से प्रस्थान करते हैं। वहां से दोनों प्रेमी भोजनगर के राजा उशीनर के पास पहुंचते हैं। वहां से दो सौ अश्वमेधी घोड़े के बदले में माधवी को एक साल तक अनिच्छा से या यों कहें मजबूर होकर एक वर्ष का सह जीवन उशीनर के साथ व्यतीत करना पड़ता है। वहां माधवी शिवि नाम के पुत्र को जन्म देकर दो सौ घोड़े लेकर लौटती है।
पितृसत्तात्मक समाज द्वारा स्त्री की अवहेलना और शोषण की कहानी है- 'माधवी' । गुरु दक्षिणा की पूर्ति के लिए एक शिष्य द्वारा एक प्रतिभा संपन्न नारी को तीन-तीन राजाओं, राजपुरूषों के हवाले कर देना निश्चय ही नारी की भावनाओं के साथ बहुत बड़ी फायरिंग है, कुठाराघात है । माधवी पितृसत्तात्मक समाज के षड्यंत्र का शिकार होकर एक मशीन बनकर दु:खद जीवन जीती है । वह अपने प्रेम मातृत्व और त्याग जैसी भावनाओं के साथ नाइंसाफी करने को मजबूर है । माधवी और गालव के बीच प्रेम संबंध है। वह गालव से प्रेम करती है लेकिन दूसरे पुरुषों के साथ सह जीवन व्यतीत करती है। वह कई बार संकेत भी करती है कि गालव से प्रेम के कारण ही उसने खुद की भावनाओं की तिलांजलि दे दी । वह गालव से कहती है - "तुम ऋण मुक्त होने के लिए यह सब प्रयास कर रहे हो ना ? और मैं ? मैं तुम्हें प्राप्त करने के लिए…. गालव ।"06
हमेशा से ही पितृसत्तात्मक समाज नारी से एक ही उम्मीद करता आया है कि नारी पुत्र रत्न प्राप्ति के लिए गर्भ धारण करे और अपने पति के लिए कामिनी नारी भी बनी रहे । महाराज ययाति की पुत्री माधवी को जो वरदान प्राप्त हुआ था कि वह चक्रवर्ती सम्राट को जन्म देगी और जन्म के पश्चात अनुष्ठान के द्वारा चिर कौमार्य प्राप्त कर सकेगी। यह स्त्री की देह के प्रति पितृसत्तात्मक व्यवस्था में एक टूल मात्र है। माधवी को तीनों राजाओं- हर्यश्च, दिवोदास, उशीनर और ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में रह कर पुत्र रत्न प्रदान करने की विडंबना झेलनी पड़ी है । यह एक नारी के लिए सबसे दु:खद क्षण है । एक नारी जब एक पुत्र को जन्म देती है वह क्षण उसकी जिंदगी के सुखद क्षण होता है और एक मां अपने नवजात शिशु पुत्र को देख कर अब दुःख दर्द भुला देती है लेकिन यहां माधवी उन सुख से भी वंचित रह जाती है क्योंकि वरदान में उसे पुत्र रत्न प्राप्ति का ही प्रावधान है जो कि प्रकृति के अनुकूल नहीं है। प्रकृति के नियम को तोड़ना हर किसी के लिए दुखद हो सकता है। माधवी का यह वरदान उसे दुःख के सागर में धकेल देता है।
गालव की गुरु दक्षिणा स्वरूप छह सौ अश्वमेधी घोड़े ऋषि विश्वामित्र को मिल जाते हैं। मुनि कुमार गालव गुरु दक्षिणा प्रदान करके ऋण मुक्त हो जाता है, एक आदर्श शिष्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजा ययाति के आश्रम में एक भव्य आयोजन में उसका दीक्षांत समारोह सम्पन्न होता है। गालव माधवी के ऊपर यह दोषारोपण जब करते हैं कि पुत्रों को जन्म देने के बाद वह कमजोर पड़ गई है। गालव के इस आक्षेप से क्रुद्ध होकर माधवी कहती है - "एक कर्तव्य मेरे पिता का, एक कर्तव्य मुनिकुमार गालव का; दोनों के कर्तव्य मेरे माध्यम से पूरे हो रहे हैं। पिता ने मुझे सौंपकर अपना कर्तव्य निभा दिया, और मुनिकुमार ने घोड़े बटोरकर अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। एक दानवीर बन गया, दूसरा आदर्श शिष्य। और माधवी? मोह की मारी माधवी कर्तव्य से गिर गई। वह किसी बड़े काम का दायित्व वहन नहीं कर सकती । यही ना ?"07
भारतीय धर्म साधना एवं समाज व्यवस्था में नारी को भोग्या और भोग विलास की सामग्री के रूप में स्वीकार किया गया है। मनुस्मृति में पुरुष समाज के प्रति नारी को महज सेविका के रूप में प्रतिष्ठा दी गई है। लेकिन आज के नारी पुरुष की सेविका बन कर नहीं बल्कि उसके हमसफर बनकर जिंदगी जीना चाहती है। हमारी समाज व्यवस्था नारी को आत्म निर्वासन और विद्रोह जैसे संकटों से घेरना चाहता है। जब भी नारी समाज के लिए कुछ करना चाहती है तब 'हीरोइजम' यानी नायकवाद बनने से पुरुष रोकता है। जब जब नारी मानव कल्याण के लिए त्याग एवं बलिदान देती आई है तब-तब पुरुष उस हीरोइजम का श्रेय अपने ऊपर ले लेता है। चाहे 'रामायण' हो या 'महाभारत' या अन्य पुराण रामायण सभी में नारी के त्याग समर्पण का श्रेय पुरुष लेता आया है। नारी तो केवल दरकिनार कर दी जाती है और गुमनामी और अकेलेपन की नियति स्वीकार कर लेती है।
महाराज ययाति का स्वयंबर भी एक भ्रम है। अपने अपराधबोध से मुक्ति पाने के लिए ययाति केवल यह भ्रम रचता और पिता होने का फर्ज अदा करता है। लेकिन माधवी अब उस चिर कौमार्य और चिर सौंदर्य को प्राप्त करना नहीं चाहती क्योंकि वह मन से खुद को कुवांरी नहीं समझती गालव के आग्रह के बावजूद माधवी द्वारा अनुष्ठान करने से मना कर देना और गालव के साथ भी शादी करने से मना कर देना नारी के स्वाभिमानी व्यक्तित्व को सार्थक करता है। यहां एक नारी अपने दुर्बल तथा कमजोर मानवीय भावों तथा विचारों के बंधन में नहीं बंधती । उस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करती है । स्वयं बालक के मन में माधवी के रूप सौंदर्य के प्रति जो आकर्षण है, उसे माधवी तोड़ के रख देती है। क्योंकि गालव को माधवी से प्रेम नहीं बल्कि उस रूप सौंदर्य के प्रति सिर्फ आकर्षण है।
माधवी जिस पुरुष के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देती है वह पुरुष अंततः उसके प्रति अनासक्त हो जाता है। माधवी उस पर कुठराघात करते हुए कहती है - "मुझे देखकर ठीठक क्यों गये गालव ? अब मैं पहले जैसे माधवी तो नहीं हो सकती हूं ना ।" 08 अधेड़ उम्र की अनाकर्षक स्त्री माधवी के प्रति गालव के मन में कोई आकर्षण, कोई प्रेम नहीं रह गया है। वह एक अनावश्यक तुच्छ वस्तु बन गई है। जिसका अब कोई इस्तेमाल नहीं हो सकता। इसीलिए गालव उसे अपनी जिंदगी से निकाल देता है या खुद उसकी जिंदगी से दूर चला जाता है। माधवी की आशीर्वादमय जिंदगी अभिशापमय हो जाती है। वह अपने अभिशप्त जीवन को एकांत में अकेली निर्जन जंगल में व्यतीत करने का फैसला लेती है और अपने पिता ययाति के आश्रम से दूर चली जाती है।
माधवी ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में रहकर सेविका के रूप में उनकी सेवा करके गालव को ऋण मुक्त करने का निवेदन करती है। ऋषि विश्वामित्र भी माधवी के अनुपम रूप सौंदर्य के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। माधवी को पाकर ऋषि परम सुख प्राप्त करते हैं और अपने शिष्य गालव को गुरु दक्षिणा से मुक्त कर देते हैं। अपना कर्तव्य पूरा करके माधवी गालव के पास लौटती है, तब गालव उसे स्वीकार करने से इन्कार कर देता है। गालव कहता है कि माधवी गुरु विश्वामित्र के आश्रम में उनकी पत्नी के रूप में रह चुकी है। अतः उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करना नीति विरूद्ध है।
माधवी पुरुष के कर्तव्य-बोध पर कटाक्ष करती हुई कहती है, "कर्तव्यपरायण दानव… तीनों राजा मेरे बच्चों को साथ लेकर यहां पहुंच गए हैं। जैसे मछली पकड़ने के लिए कांटे में छोटी मछली लगा दी जाती है, वे मेरे बच्चों को मेरे सामने लाकर मुझे प्रलोभन देंगे। सभी कर्तव्य के पक्के, सभी महामानव। तुमने मेरे यौवन की आहुति देकर अपनी गुरु-दक्षिणा जुटाई है।"09 मुनि कुमार गालव के प्रति माधवी का यह प्रहार यथोचित है। गालव ने अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिए माधवी का तबतक इस्तेमाल करता है जबतक उसका स्वार्थ सध न जाता। स्वार्थ सध जाने के बाद उसे अपनी जिंदगी से निकाल बाहर करता है। यही पुरुष मानसिकता वाली सोच गालव को बहुत नीचा गिरा देती है और माधवी को बहुत ऊंचा स्थान प्रदान करती है। यही सोच एक दिव्य- विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न नारी को पैरों तले रौंद देती है।
निष्कर्ष - समग्रत: माधवी भीष्म साहनी द्वारा रचित एक सफल स्त्रीवादी चिंतन को साकार करती नाट्य कृति है। पौराणिक कथा के बहाने स्त्री देह की सत्ता और ताकत की राजनीति का भंडाफोड़ करने वाला यह नाटक एक नारी को नया आयाम प्रदान करता है। नारी केवल सौंदर्य की प्रतिमूर्ति नहीं होती, त्याग-बलिदान की पराकाष्ठा के के रूप में नारी जीवित नहीं रहती बल्कि वह अपने वजूद की लड़ाई में सक्रिय होकर समाज निर्माण में सक्रिय भागीदारी दर्ज कराती है। पौराणिक कथा प्रसंगों के माध्यम से लेखक ने नारी के प्रति आधुनिक दृष्टिकोण रखने और प्राचीन बंदिशों से मुक्त करके नारी को स्वतंत्र करने की अपील पुरूष समाज से की है। विशिष्ट समालोचिका सुजाता कुलकर्णी के शब्दों में कहें तो - " 'माधवी' नाटक एक बेहद नाटकीय और संभावनाओं से भरे स्त्रीवादी कथानक को प्रस्तुत करता है । नारी के शोषण और समाज के दोयम दर्जे के लिए उत्तरदायी कारणों को समझा जा सकता है । यह ताकत की राजनीति को उखाड़ कर रख देता है।"10 माधवी यहां एक माधवी लता के रूप में पुरुष रूपी वृक्ष के सहारे तकलीफ भारी जिंदगी जीती है । वह शुरू से लेकर आखिरी तक पुरुष का ही सहारा लेकर, पुरुष की ही सेवा करते हुए जिंदगी गुजार देती है।
संदर्भ ग्रंथ सूची -
माधवी, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला पेपरबैक संस्करण - 2018, पृष्ठ - आवरण पृष्ठ
माधवी, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ - 20
माधवी, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, पृष्ठ -21
माधवी, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ - 79
माधवी, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ - 44
माधवी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -83
माधवी, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ - 65
माधवी, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -107
माधवी, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ - 116
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- डॉ. दयानिधि सा
सहायक प्राध्यापक, विभाग प्रमुख, हिंदी विभाग
महात्मा गांधी स्नातक महाविद्यालय, भुक्ता
जिला- बरगढ़, ओड़िशा पिन - 768045
मो.- 9178281452 ईमेल - drdayanidhi77@gmail.com


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