सारा आकाश उपन्यास में समर और प्रभा की सुहागरात | राजेंद्र यादव

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सारा आकाश उपन्यास में समर और प्रभा की सुहागरात | राजेंद्र यादव राजेंद्र यादव के उपन्यास सारा आकाश में समर और प्रभा की सुहागरात का दृश्य उपन्यास की

सारा आकाश उपन्यास में समर और प्रभा की सुहागरात | राजेंद्र यादव


राजेंद्र यादव के उपन्यास सारा आकाश में समर और प्रभा की सुहागरात का दृश्य उपन्यास की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह दृश्य न केवल दोनों पात्रों के बीच की दूरी और गलतफहमी को उजागर करता है, बल्कि मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार की जटिलताओं, सामाजिक दबावों और युवा मन की उलझनों को भी दिखाता है।

सुहागरात एक ऐसा समय होता है जब दो अनजान या जाने पहचाने युवक और युवती शादी के पवित्र गठबन्धन में बँधकर पहली बार मिलते हैं और रातभर अपने प्यार का इजहार करके अपने साथी की भावना को तोलते हैं। सभी के लिए यह एक प्रसन्नता का अवसर होता है। लेकिन यहाँ पर सब कुछ उलटा ही हुआ। न तो समर प्रभा से बोला और न प्रभा ने ही हिम्मत दिखाई। दोनों में कोई बोलचाल नहीं हुई। प्रभा पर इसका क्या प्रभाव पड़ा यह तो उसने प्रकट नहीं किया केवल उसके आँसू ही उसके हृदय की तकलीफ को बयां करने वाले थे। पहल युवक की तरफ से होती है क्योंकि लड़की तो नये वातावरण में आकर संकोच व शर्म के मारे चुपचाप सिमटी सी बैठी रहती है। यहाँ बातचीत न होने का कारण समर ही रहा।
सारा आकाश उपन्यास में समर और प्रभा की सुहागरात | राजेंद्र यादव
हल्के से धक्का देकर भाभी ने पीछे से किबाड़ बन्द कर दिये तो समर कमरे में आ गया। उस समय प्रभा जंगले में सिर रखके खड़ी थी, जैसे खड़ी खड़ी सो गई हो। थोड़ी देर समर यों ही खड़ा रहा और फिर धीरे से आकर पलंग के सिरे पर इस तरह बैठ गया जैसे डर लग रहा हो। सोचा था कि पलंग पर जाकर सो जायेगा और सुबह से पहले जागना उसने नहीं जाना। मन ही मन वह दुहराता रहा. नारी अंधकार है, नारी मोह, नारी माया है, नारी देवत्व की ओर उठते हुए मनुष्य को बाँधकर राक्षसत्व के गहरे अंधे कुएं में डाल देती है।

नारी पुरुष की सबसे बड़ी कमजोरी है। इस कमरे में आने से पहले वह सोच रहा था कि जैसा सभी विवाहों में होता है, प्रभा सजीली नव-वधू की तरह गठरी बनी होगी, उसी साज-सज्जा से उसका स्वागत करने को तैयार होगी। यही तो वह क्षण है जब उसे अपने को सावधान रखना होगा। लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया और वह चुपचाप सामने के जंगले पर खड़ी रही। इस समय तो बस कमरे के सन्नाटे में स्टूल पर रखे पंखे की खड़खड़ाहट की आवाज ही आ रही थी। विवाह के समय पर पड़ोसी से बिजली उधार ले ली थी। समर भरसक उपेक्षा और लापरवाही दिखाना चाहता था। वह बुद्ध की तरह पंखे को देखता रहा फिर धीरे से पलंग पर आड़ा ही लेट गया। वह सोच रहा था कि वह आकर उसे क्षमा माँगेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

कभी-कभी चूड़ियों की खनक सुनाई पड़ती थी। वह सोचने लगा कि यहाँ आया ही क्यों ? कहीं और चला जाता तो ऐसा अपमान तो न होता। वह मैट्रिक तक पढ़ी है और उसके (समर के) घरवाले बेपढ़े हैं। वह समझती है कि दूसरे लड़कों की तरह वह भी उसे मनायेगा और खुशामद करेगा। पहले उसने सोचा था कि वे दोनों शिक्षित हैं, समझदार हैं। आपस में बातें करके अपने को अधिक से अधिक योग्य बनाने की ओर ध्यान देंगे। लेकिन नहीं। इसकी मर्जी यही है तो यही सही।

जब कुछ क्षण यों ही बैठे-बैठे बीत गये तो वह एक झटके से उठकर खड़ा हो गया और भड़ाक से दरवाजा खोला तो लगा चौंककर उसने सिर उठाकर देखा। एक क्षण वह बाहर रुका और सीढ़ियाँ चढ़कर खुली छत पर आ गया। सभी लोग चारपाइयों या जमीन पर सो चुके थे। उसने कुछ नहीं देखा और एक कोने में धरती पर सो गया। लेकिन रातभर नींद न आई और सोचता रहा कि मान लो, अभी उठे और बिना किसी से कुछ कहे बाहर निकल पड़े—कलकत्ता, बम्बई या हरिद्वार।

इस प्रकार यह दृश्य उपन्यास का आधार बन जाता है जहां गलतफहमियाँ ego क्लैश और संयुक्त परिवार की घुटन शुरू से ही दिखाई देती है। समर का आंतरिक द्वंद्व प्रभा का स्वाभिमान और दोनों की दूरी आगे चलकर पूरी कहानी को आकार देती है।यह हिस्सा बेहद यथार्थवादी है और दिखाता है कि छोटी-छोटी पूर्वधारणाएँ रिश्ते को कितना नुकसान पहुँचा सकती हैं।

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