भारतीय ज्ञान प्रणाली ऐसे अनूठे दृष्टिकोण-सोच को नज़रिया प्रदान कर रही है, जो वैश्विक पटल पर एक मिसाल है। वर्तमान संदर्भ में भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल
भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार के विविध आयाम
भारतीय ज्ञान प्रणाली ऐसे अनूठे दृष्टिकोण-सोच को नज़रिया प्रदान कर रही है, जो वैश्विक पटल पर एक मिसाल है। वर्तमान संदर्भ में भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल मात्र गौरवगाथा बनकर नहीं रह गयी है बल्कि यह अनुसंधान (Research) और नवाचार (Innovation) के लिए प्रेरणास्रोत बनने का कार्य भी कर रही है। यह सार्वभौमिकता, सार्वकालीनता एवं सर्वव्यापकता को दर्शाने में सक्षम है। इतने वर्ष गुजर जाने के बावजूद भी भारतीय ज्ञान के समृद्ध भंडार को उस प्रकार प्रयोग नहीं किया जा सका है, जिस प्रकार होना चाहिए था। यही वजह है कि भारत सरकार की नई शिक्षा नीति २०२० ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को केंद्र में लाने का भरसक प्रयास किया है। मैं अपने इस शोध लेख के जरिए ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार के विविध आयाम’ विषय को खंगालना चाहूँगा। मेरा यह ध्येय रहेगा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली में निहित अनुसंधान एवं नवाचार की परंपराओं का विश्लेषण किया जा सके साथ ही वर्तमान संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित भी। उक्त विषय के लिए ऐतिहासिक–विश्लेषणात्मक प्रविधि, वर्णनात्मक प्रविधि, तुलनात्मक प्रविधि तथा बहुआयामी शोध प्रविधि प्रयुक्त करके सार्थक सिद्ध किया जा सके ताकि इसके ऐतिहासिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक तथा वर्तमान संदर्भ को जाना जा सके। आज के वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय ज्ञान प्रणाली से अनुसंधान और नवाचार को कितना फ़ायदा पहुँच सकता है? इनके जरिए ज्ञान-विज्ञान और शोध के क्षेत्र में भारत कितना क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है? इन सब सवालों का जवाब आने वाले वक़्त में जरूर मिलेगा।
बीज शब्द: भारतीय ज्ञान प्रणाली, अनुसंधान, नवाचार, समकालीन शिक्षा, नई शिक्षा नीति २०२०.
प्रस्तावना: भारत की पवित्र धरा अपने तालीम, भाषिक अनुपमता, आध्यात्मिकता, सांस्कृतिक वैविध्यता, ऐतिहासिक गौरवगाथा और मनुष्यता की मशाल का डंका सदियों से बजाया है। भारतीय ज्ञान प्रणाली दुनिया की अति प्राचीन और समृद्ध ज्ञान परंपराओं में से एक माना जाता है। यह ज्ञान प्रणाली सिर्फ़ एक देश की कथा नहीं है, बल्कि वैश्विक धरातल पर भारतीय सभ्यता के उत्कर्ष की गौरवगाथा है। यह वह धरती है जिसने अपने ज्ञान के आलोक से पूरे विश्व को आलोकित किया है। भारतीय ज्ञान प्रणाली हजारों वर्षों में विकसित होने वाली बौद्धिक परंपराओं, वैज्ञानिक उपलब्धियों, दार्शनिक चिंतनों और सामाजिक व्यवस्थाओं का एक सम्मिलित स्वरूप है, जिसने मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र—दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र, राज्यशास्त्र, वास्तुशास्त्र, नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र, आयुर्वेद, कृषि, कला, संगीत, साहित्य और शिक्षा जैसे विषयों में गहन विचार प्रस्तुत किया है। इसमें धार्मिक ग्रन्थों ने भी अपनी विशिष्ट भूमिका निभाई है। वह आध्यात्मिकता के साथ-साथ प्रकृति, मानव शरीर, समाज और ब्रह्मांड के ज्ञान भंडार से वाकिफ़ कराया है। भारतीय ज्ञान प्रणाली को जन-जन तक पहुंचाने के लिए ज्ञानमीमांसा और सत्तामीमांसा जैसी तत्वों से वाकिफ़ कराना जरूरी है, ताकि लोगों में गहरी रुचि जाग सके और उनमें ज्ञान का संचार हो सके। वर्तमान समय में भारत सरकार ने ज्ञान के इस समृद्ध भंडार को आधुनिक अनुसंधान, शिक्षा और नवाचार से जोड़ने के लिए अनेक नीतिगत और संस्थागत कदम उठाए हैं, जिनका लक्ष्य मानव जीवन को ऊंचाइयों तक पहुंचाना है।
विश्लेषण: प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक भारतीय विद्वानों ने अपने ज्ञान, तर्क, अनुभव और प्रयोग के जरिए इस पावन भूमि को धन्य किया है। भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार सुदीर्घ समय का फल है। आज के दौर में भारतीय ज्ञान प्रणाली के जरिए अनुसंधान और नवाचार को अत्यंत व्यापक, बहुआयामी और उपयोगी बनाया जा सकता है- शर्त यह है कि हम इसे वैज्ञानिक दृष्टि, आलोचनात्मक सोच और समावेशी-पारदर्शी नीतियों के साथ अपनाएँ। भारतीय ज्ञान प्रणाली एक समग्र (Holistic) दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें ज्ञान केवल बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवन-प्रबंधन का साधन है। यह प्रणाली आधुनिक विज्ञान विश्लेषणात्मक (Analytical) दृष्टिकोण अपनाने से बाज़ नहीं आता है, वहीं भारतीय परंपरा की संश्लेषणात्मक (Synthetic) दृष्टिकोण पर बल देने भी नहीं चुकता है। इस प्रणाली में ‘सत्य की खोज’ की आशा और ‘लोकमंगल’ की कामना विद्यमान है। डॉ. कृष्ण कांत द्वारा संपादित पुस्तक 'संस्कृति, संहिता और कक्षा' में आनंद दास लिखते हैं - "संस्कृति, संहिता और कक्षा भारतीय ज्ञान प्रणाली वर्तमान सामाजिक समस्याओं को संबोधित करने के लिए स्वास्थ्य, मनोविज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, प्रकृति, पर्यावरण और सतत विकास सहित कई क्षेत्रों में अधिक अध्ययन-अनुसंधान को समर्थन, प्रोत्साहन तथा सुविधा प्रदान करना चाहती है।"1 यह प्रणाली समकालीन पाठ्यक्रम के माध्यम से भावी पीढ़ी निर्माण करने के लिए संकल्पित है जो न केवल बुद्धि को विकसित कर सकता है बल्कि समाज को एक संतुलित और स्थायी मार्ग दर्शाने में भी सहयोग कर सकता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे सिद्धांतों पर आधारित है, जो आज के सतत विकास लक्ष्यों को लिए विश्व कल्याण की भावना को प्रोत्साहित करता है।
‘अनुसंधान’ शब्द के लिए अंग्रेजी में ‘Research’ और हिंदी में गवेषणा, शोध, खोज आदि जैसे शब्द प्रयुक्त किए जाते हैं। वह व्यवस्थित और वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी विषय या समस्या के बारे में नई जानकारी प्राप्त की जाती है या पहले से उपलब्ध ज्ञान या मौजूदा ज्ञान की सत्यता की जांच की जाती है। आर. ए. शर्मा के शब्दों में – “अनुसन्धान में नवीन तथ्यों की खोज की जाती है तथा नवीन सत्यों का प्रतिपादन किया जाता है।”2 अनुसंधान किसी सोद्देश्य निर्दिष्ट समस्या को आधार बनाकर क्रमबद्ध-व्यवस्थित तरीक़े से परीक्षण द्वारा बेहतर, नवीन और सामयिक ज्ञान की खोज है। डॉ. एच. के. कपिल के अनुसार – “अनुसन्धान एक ऐसा व्यवस्थित तथा नियन्त्रित अध्ययन है। जिसके अन्तर्गत सम्बन्धित चरों व घटनाओं के पारस्परिक सम्बन्धों का अन्वेषण तथा विश्लेषण उपयुक्त सांख्यिकीय विधि तथा वैज्ञानिक विधि के द्वारा किया जाता है, तथा प्राप्त परिणामों से वैज्ञानिक निष्कर्षों, नियमों तथा सिद्धान्तों की रचना, खोज व पुष्टि की जाती है।”3 प्रत्येक अनुसंधान किसी न किसी समस्या का तार्किक एवं वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करता है, जिससे जुड़ी हुई कुछ नवीन अवधारणाओं, प्रतिस्थापनाओं और सिद्धांतों का निर्माण होता है। आज़ तक मानव जीवन में जितनी प्रगति हुई है और जितनी भी सुख-सुविधाएं हासिल की है, कहीं ना कहीं उन सबका श्रेय अनुसंधान को जाता है। सभ्यता के विकास का इतिहास देखें तो स्पष्ट होता है कि सामाजिक परिवर्तन के पीछे अनुसंधान की निर्णायक भूमिका रही है। चाहे वह विज्ञान का क्षेत्र हो, सामाजिक संरचना हो, अर्थव्यवस्था हो या साहित्य का क्षेत्र ही क्यों ना हों। मानव जीवन की प्रगति-विकास अनुभवों से, तात्कालिक-आकस्मिक घटनाओं से तथा प्रयत्नों एवं भूल से भी होती रहती है पर अनुसंधान समाज को बेहतर दिशा प्रदान करने में सक्षम है। वर्तमान समय में अनुसंधान सर्वव्यापी है। आज़ नई शिक्षा नीति २०२० के तहत भारतीय ज्ञान प्रणाली के संदर्भ में इसके महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान केवल अकादमिक गतिविधि बनकर नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का द्योतक भी है। यह नैतिक और व्यावहारिक चुनौतियों को जोड़ते हुए मानवता को अज्ञान से ज्ञान की ओर, स्थिरता से प्रगति की ओर और भ्रम से सत्य की ओर ले जाने के लिए आग्रही है।
‘नवाचार’ शब्द के लिए अंग्रेजी में ‘Innovation’ शब्द प्रयुक्त होता है जिसका आशय नवीनता या परिवर्तन से है। शंकर शरण श्रीवास्तव का मानना है कि – “किसी विधि, तौर-तरीक़े या सामग्री जिनका उपयोग पहले किया जाता था, उनमें सुधार की प्रक्रिया ही नवाचार है। नवाधार कुछ ऐसा लागू करना है जो नया और पहले से भिन्न हो।”4 नवाचार शब्द का प्रयोग नवीन प्रावधानों के चलते वैज्ञानिक विकास युग में इसका महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। नवाचार विकासोन्मुख रहने वाली प्रक्रिया को दर्शाने वाली एक अवधारणा है। नवाचार वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी नए विचार, विधि, उत्पाद या तकनीक का सृजन कर किसी वस्तु / प्रक्रिया को और अधिक उपयोगी व प्रभावी बनाया जा सकता है। नवाचार केवल मात्र नई तकनीक या नए आविष्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सोचने, समझने, काम करने और समस्याओं को समाधान करने के नए-नए तरीक़ो को इजात करता है। वैश्वीकरण और जनसंचार के आधुनिक संसाधन युग में आवश्यकता के रूप में इसे स्थापित कर दिया है। आज के युग (२०२६) में नवाचार को प्रगति का प्रमुख साधन बना दिया गया है परंतु हमारे समक्ष यह भी प्रश्न आ खड़ा होता है कि क्या नवाचार हरेक परिस्थिति में उपयोगी है, या इसके साथ कुछ समस्याएँ या चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई भी हैं? इन सब पर जरूरी मंथन और आलोचनात्मक विचार परिपाद्य करके द्वारा ही जान सकते हैं। आधुनिकता के दौड़ में आज़ नवाचार समाज की जरूरत बन गया है, जिसके बिना विकास और प्रतिस्पर्धा असंभव है। इसके बिना तेज़ी से बदलती दुनिया में हम क़दम से क़दम मिलाकर चलना मुश्किल हो गया है। पर इसे अंधाधुंध अपनाने की जगह एक संतुलित वातावरण और नैतिक दृष्टिकोण पैदा करना अत्यंत आवश्यक है। आज़ नई शिक्षा नीति २०२० और भारतीय ज्ञान प्रणाली में नवाचार का संबंध प्रमुख रूप से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी एवं रूचिपूर्ण बनाने से जोड़कर देखा जा रहा है। भारतीय ज्ञान प्रणाली के अन्तर्गत नवाचार उन सभी नवीन अवधारणाओं, विचारों, विधियों, सिद्धान्तों, प्रयोगों और सूचनाओं को सम्मिलित करता है जो अधुनातन चिन्तन से निकल कर सामने आया हो। आज़ (२०२६) भारतीय ज्ञान प्रणाली के नजरिए से नवाचार को केवल प्रगति का प्रतीक मानना पर्याप्त नहीं है; बल्कि भारत के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और नैतिक विकास के नजरिए से भी देखना जरूरी है। नवाचार तभी सार्थक सिद्ध होगा जब तक वह समावेशी, सतत और पूर्णत: मानव-केंद्रित ना बन जाए। वर्तमान समय में भारतीय ज्ञान प्रणाली को उपयुक्त और पुनः प्रासंगिक बनाने के लिए उसे आधुनिक अनुसंधान एवं नवाचार से जोड़ने के प्रयास हो रहा है। इस संदर्भ में अनुसंधान और नवाचार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। इस शोध लेख में भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार के ऐतिहासिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक और समकालीन योगदान को समझने का प्रयास करेंगे।
भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार का योगदान :
हमारी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखते हुए उसे आधुनिक और उपयोगी बनाने के लिए अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान प्रणाली कुछ इस प्रकार योगदान कर रहा है:
1. दर्शन और तर्कशास्त्र के क्षेत्र में : भारतीय ज्ञान प्रणाली की जड़ें वैदिक काल से दिखाई देती हैं। यह धार्मिक ग्रंथों, आचार संहिताओं और लोक परंपराओं के सहारे विकसित हुई है। गौतम बुद्ध, महावीर और आदि शंकराचार्य जैसे आचार्यों ने ज्ञान को तर्क, अनुभव और आत्मबोध से जोड़कर देखा है। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत जैसे दर्शनों में अनुसंधान की विधि, प्रमाण, तर्क और विश्लेषण की वैज्ञानिक परंपरा विकसित हुई है। इसमें प्रकृति, ब्रह्मांड, गणना, चिकित्सा और सामाजिक व्यवस्था पर सुविचारित दृष्टिकोण मिलता है। आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के माध्यम से दार्शनिक नवाचार प्रस्तुत किया, जिसने भारतीय चिंतन को एक नई दिशा दी। कणाद द्वारा प्रतिपादित वैशेषिक दर्शन में परमाणु सिद्धांत की अवधारणा मिलती है। यह आधुनिक परमाणु सिद्धांत की पूर्वपीठिका माना जाता है। यह समग्र दृष्टिकोण आज के अनुसंधान और नवाचार के नजरिए से अंतःविषय (Interdisciplinary) अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
2. गणित और खगोलशास्त्र के क्षेत्र में : भारतीय गणितज्ञों ने शून्य, दशमलव पद्धति और बीजगणित को जो नया आयाम दिया, उससे आधुनिक कंप्यूटिंग और विज्ञान का विकास संभव हो पाया है। आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक ‘आर्यभटीय’ में पृथ्वी की परिधि, ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या और त्रिकोणमिति का वर्णन दर्शाया है। वहीं भास्कराचार्य की रचना लीलावती गणितीय अनुसंधान का अद्भुत उदाहरण है। इन विद्वानों ने गणित को न केवल सैद्धांतिक विषय माना है बल्कि व्यावहारिक जीवन की समस्याओं के समाधान हेतु भी विकसित किया है। शून्य और स्थान-मूल्य प्रणाली ने वैश्विक गणित को नया आयाम दिया, जिससे आधुनिक कंप्यूटिंग और विज्ञान का विकास संभव हुआ है। आज डेटा साइंस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में गणितीय मॉडलिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि प्राचीन भारतीय गणितीय ग्रंथों का पुनर्पाठ और वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए, तो नए एल्गोरिद्म और संगणनात्मक पद्धतियों में नवाचार लाने की अपार क्षमता नज़र आएगी।
3. स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में : भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद के अनुभव, प्रयोग और निरीक्षण पर आधारित है। चरक द्वारा रचित ‘चरक संहिता’ में रोगों के निदान, औषध निर्माण और चिकित्सा पद्धति का वैज्ञानिक विश्लेषण मिलता है। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग किए हैं। प्लास्टिक सर्जरी और मोतियाबिंद ऑपरेशन का वर्णन भारतीय चिकित्सा अनुसंधान की उच्च अवस्था को दर्शाता है। आज (२०२६) योग को विश्वभर में स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के साधन के रूप में अपनाया जा रहा है। आयुर्वेद में शरीर, मन और आत्मा के संतुलन पर आधारित समग्र स्वास्थ्य दृष्टिकोण मिलता है, जो आज भी प्रासंगिक है। आज अनुसंधान और नवाचार का प्रयोग करके कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) बनाकर और मानसिक स्वास्थ्य तकनीकों के साथ योग का समन्वय करके ‘डिजिटल वेलनेस’ प्लेटफॉर्म विकसित किए जा रहे हैं।
4. कृषि और पर्यावरण के क्षेत्र में : कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कृषि प्रबंधन और जल संरक्षण की नीतियों का उल्लेख मिलता है। भारतीय पारंपरिक कृषि प्रणाली जैव विविधता, मिश्रित खेती, प्राकृतिक उर्वरक, जल संरक्षण और ऋतुचक्र के अनुसार खेती की तकनीक विकसित की थी जो आज के ‘सस्टेनेबल एग्रीकल्चर’ की अवधारणा से भारतीय ज्ञान प्रणाली काफी मेल खाता है। आज जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि संकट गहरा रहा है। पारंपरिक बीज संरक्षण, वर्षा जल संचयन, और जैविक खेती के सिद्धांत आधुनिक अनुसंधान के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकता है। यदि पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणाली को आधुनिक कृषि तकनीक, ए.आई. इंटेलिजेंस, ड्रोन, सेंसर, डेटा एनालिटिक्स के साथ जोड़ा जाए, तो अत्याधुनिक ‘स्मार्ट सस्टेनेबल एग्रीकल्चर’ मॉडल विकसित किया जा सकता है।
5. निर्माण के क्षेत्र में : दिल्ली का लौह स्तंभ, सांची का स्तूप, अजंताऔर एलोरा की गुफ़ाएँ, तबोमठ, बृहदेश्वर मंदिर, कुतुब मीनार, भटनेर किला, लखनऊ का इमामबाड़ा, वेंकेटेश्वर मंदिर और कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे निर्माण अद्भुत इंजीनियरिंग के उदाहरण हैं, जो उस समय के वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचार का परिणाम है। प्राचीन भारतीय स्थापत्य में पर्यावरणीय संतुलन का विशेष ध्यान महत्व दिया जाता था और स्थानीय सामग्री और जलवायु के अनुरूप मंदिरों व भवनों का निर्माण किया जाता था। आज ‘ग्रीन बिल्डिंग’ और ऊर्जा-कुशल वास्तुकला के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान प्रणाली से प्रेरणा लेकर नवाचार किए जा सकते हैं।
6. शिक्षा प्रणाली के क्षेत्र में : भारतीय ज्ञान प्रणाली को पुनर्स्थापित करने के लिए पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है ताकि अनुसंधान-नवाचार को बढ़ावा मिल सके। इसे आगे बढ़ाने में नई शिक्षा नीति २०२० की भूमिका अग्रणी दिखाई देती है। भारतीय ज्ञान प्रणाली में शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि शोध-आधारित थी। इसमें गुरु-शिष्य की प्रणाली प्रसिद्ध थी, जिसकी शिक्षा अनुसंधान-नवाचार आधारित थी। वैसे भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार प्रयोगशाला आधारित प्रक्रिया में विश्वास नहीं रखता है। यह जीवनानुभव, पर्यवेक्षण (Observation), तर्क (Logic), प्रमाण (Evidence) और संवाद (Dialogue) पर आधारित व्यवस्था पर विश्वास रखता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रमाण रहा है। आज शिक्षा में इन चीज़ों को अपना कर भारत फिर से अपना डंका पूरी दुनिया में बजा सकता है। आज शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन ग्रंथों का डिजिटलीकरण, संस्कृत पांडुलिपियों का अनुवाद और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से विश्लेषण नवाचार के नए मार्ग खोल रहे हैं।
7. सामाजिक-आर्थिक विकास के क्षेत्र में : भारतीय ज्ञान प्रणाली सतत विकास करने की अपार क्षमता है। वह आज शिक्षा से लेकर साहित्य तक साहित्य से लेकर विज्ञान तक अपनी भूमिका को दर्शा रहा है। भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान-नवाचार अपना कर भारत को विकसित देश की श्रेणी में खड़ा कर सकते हैं – बशर्तें वह सही दिशा में अग्रसर हों। भारतीय ज्ञान प्रणाली के जरिए आज हम आयुर्वेद-योग उद्योग का वैश्विक विस्तार कर सकते हैं, पर्यटन में वृद्धि कर सकते हैं, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र का विकास कर सकते हैं, विश्व स्तर पर ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत कर सकते हैं- जैसी बहुत सारी चीजें संभव हैं।
8. समकालीन चुनौतियाँ प्रदान करने के क्षेत्र में: भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार के समक्ष कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं, जो इसके विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं। इसके समक्ष आने वाली चुनौतियाँ कुछ इस प्रकार हैं, जिनमें प्राचीन ग्रंथों की प्रामाणिक व्याख्या की कमी, प्रामाणिक स्रोतों की कमी, आधुनिक विज्ञान से समन्वय का अभाव, भाषा संबंधी समस्या, वित्तीय और संस्थागत समर्थन की कमी, जागरूकता की कमी, वैश्विक मान्यता की चुनौती तथा आधुनिक वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप परीक्षण की आवश्यकता हैं।
9. भारत सरकार के प्रमुख कदम : भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार नीतिगत, संस्थात्मक, अकादमिक और वित्तीय ढांचे तैयार कर रही है। नई शिक्षा नीति २०२० के माध्यम से शिक्षा में संरचनात्मक परिवर्तन, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (ए.आई.सी.टी.ई.) द्वारा IKS डिवीजन की स्थापना, आयुष मंत्रालय के माध्यम से चिकित्सा क्षेत्र में शोध, तथा संस्कृति मंत्रालय द्वारा ‘ज्ञान भारतम’ के तहत प्राचीन पांडुलिपियों का संरक्षण, डिजिटल और शोध के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है- ये सभी प्रयास भारत को ज्ञान-आधारित वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर कर रहे हैं। देश के विभिन्न IITs, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में भारतीय ज्ञान प्रणाली से संबंधित केंद्र स्थापित किए जाने योजना पर बल दिया जा रहा है। सरकार भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) विषयों पर प्रतियोगिताएँ, गतिविधियाँ, मल्टीमीडिया और ए.आई. जैसी को बढ़ावा देकर स्कूल स्तर पर छात्रों को पारंपरिक ज्ञान से जोड़ा जा रहा है। भारतीय ज्ञान प्रणाली को आगे ले जाने के लिए प्रतियोगिताओं, प्रदर्शनियों और जागरूकता अभियानों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
10. भविष्य की संभावनाएँ : भारतीय ज्ञान प्रणाली में सतत विकास (Sustainable Development), पर्यावरण संरक्षण, वैकल्पिक चिकित्सा, मानसिक स्वास्थ्य, नैतिक शिक्षा, डिजिटल आर्काइव, सामाजिक समरसता और धार्मिक-सांस्कृतिक जैसे क्षेत्रों में नवाचार की अपार संभावनाएँ हैं। यदि भारतीय ज्ञान प्रणाली को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ा जाए तो यह वैश्विक समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इस प्रकार हम उपर्युक्त बिन्दुओं के जरिए भारतीय ज्ञान प्रणाली में अनुसंधान और नवाचार के योगदान को जानने व समझने का प्रयास किया है।
निष्कर्ष : भारतीय ज्ञान प्रणाली में ऐतिहासिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, अनुसंधान, नवाचार तथा समकालीन अनुप्रयोग—सभी आयामों को समाहित करता है। इसमें केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का आधार है। इसकी समग्र दृष्टि, नैतिक आधार और प्रकृति-सम्मत सिद्धांत आधुनिक अनुसंधान और नवाचार को नई दिशा दे सकता है। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय ज्ञान प्रणाली सतत विकास और समग्र विकास जरिए पूरे विश्व के लिए मिसाल बन सकता है।
संदर्भ सूची:
1.डॉ. कृष्ण कांत, मुख्य संपादक, संस्कृति, संहिता और कक्षा, अखंड पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2025, पृष्ठ संख्या – 272.
2.शर्मा ए.आर., शिक्षा अनुसन्धान, आर. लाल बुक डिपो, नवीन संस्करण- 1999-2000, मेरठ, पृष्ठ संख्या -17.
3.कपिल के. डॉ. एच., अनुसंधान विधियाँ, एच. पी. भार्गव पब्लिकेशन्स, सत्रहवां संस्करण: 2019, आगरा, पृष्ठ संख्या – 1.
4. श्रीवास्तव शरण शंकर, शिक्षा में नवाचार एवं आधुनिक प्रवृत्तियाँ, भार्गव बुक हाऊस, द्वितीय संस्करण: 1989-90, आगरा, पृष्ठ संख्या – 6.
- श्री आनंद दास,
सहायक प्राध्यापक, श्री रामकृष्ण बी. टी. कॉलेज (Govt. Aided.), दार्जिलिंग
संपर्क - 27 गांधी रोड, बागमारी हाउस, दार्जिलिंग - 734101,
पोस्ट ऑफिस- दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल
ई-मेल - anandpcdas@gmail.com, 9382918401, 9804551685



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