मविलास शर्मा की आलोचना पद्धति रामविलास शर्मा हिंदी साहित्य की आलोचना के क्षेत्र में एक प्रमुख और प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में उभरते हैं, जिनकी सम
रामविलास शर्मा की आलोचना पद्धति
रामविलास शर्मा हिंदी साहित्य की आलोचना के क्षेत्र में एक प्रमुख और प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में उभरते हैं, जिनकी समीक्षा पद्धति ने बीसवीं शताब्दी के मध्य से हिंदी आलोचना को एक नई दिशा प्रदान की। वे मूलतः मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित थे और उनकी आलोचना में साहित्य को सामाजिक, ऐतिहासिक तथा आर्थिक संदर्भों में देखने की प्रवृत्ति प्रमुख रूप से दिखाई देती है। रामविलास शर्मा का जन्म 1912 में हुआ था और उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक ग्रंथ लिखे, जिनमें साहित्य को केवल सौंदर्यबोध या व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि समाज की गतिशीलता और वर्ग संघर्ष के प्रतिबिंब के रूप में विश्लेषित किया। उनकी पद्धति 'प्रगतिवादी समीक्षा' के रूप में जानी जाती है, जो हिंदी आलोचना की आधारभूत स्तंभ बन गई, जहां साहित्य का मूल्यांकन उसकी सामाजिक प्रासंगिकता और जनवादी मूल्यों के आधार पर किया जाता है।यह पद्धति न केवल विषयगत दृष्टि से विस्तृत है, बल्कि कार्य की गहराई में भी उतरती है, जहां वे साहित्यकारों की रचनाओं को उनके युग की सामाजिक परिस्थितियों से जोड़कर देखते हैं।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण और भौतिकवादी व्याख्या
रामविलास शर्मा की आलोचना में मार्क्सवाद की गहरी आस्था स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है, जो उन्हें भाववादी दर्शन का कट्टर विरोधी बनाती है।वे साहित्य को भौतिकवादी दृष्टिकोण से देखते थे, जहां रचना का मूल्य उसके सामाजिक प्रभाव और वर्गीय संरचना में निहित होता है। उदाहरण के लिए, वे परंपरा को प्रगतिशील और पतनशील में विभाजित करते थे, जिसमें प्रगतिशील तत्वों को आगे बढ़ाने की वकालत करते थे, जबकि रूढ़िवादी या सामंती मूल्यों का विरोध करते थे उनकी यह दृष्टि आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा का समृद्ध विकास मानी जाती है, जहां शुक्ल जी की ऐतिहासिक दृष्टि को मार्क्सवादी फ्रेमवर्क में विस्तारित किया गया। रामविलास शर्मा साहित्य को समाज से अलग करके नहीं देखते थे; बल्कि वे मानते थे कि साहित्य समाज की उत्पादक शक्तियों और संबंधों का प्रतिफलन है। इस पद्धति में वे साहित्यकार की रचना को उसके व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक घटनाओं से जोड़कर मूल्यांकित करते थे, जैसे कि 1857 के संघर्ष को उन्होंने देशी सामंतों के स्वार्थ से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय संघर्ष के रूप में व्याख्यायित किया। उनकी आलोचना में प्रतिऔपनिवेशिक चिंतन भी प्रमुख है, जहां वे उपनिवेशवाद के प्रभाव को साहित्य में खोजते थे और जनवादी विचारधारा को मजबूत करने पर जोर देते थे।उनकी समीक्षा पद्धति की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे साहित्य को भाषा, इतिहास और संस्कृति के अंतर्संबंधों में देखते थे। उदाहरणस्वरूप, उनकी कृतियों जैसे 'प्रगति और परंपरा', 'आस्था और सौंदर्य', 'आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना' तथा 'मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य' में वे साहित्य की समस्याओं को प्रगतिशील चेतना से जोड़ते हैं।
प्रमुख साहित्यकारों की समीक्षा: प्रेमचंद और निराला के संदर्भ में
रामविलास शर्मा प्रेमचंद और निराला जैसे साहित्यकारों की रचनाओं की समीक्षा में अपने सिद्धांतों को लागू करते थे। प्रेमचंद पर उनकी पुस्तक 'प्रेमचंद' उनकी पहली प्रमुख आलोचना कृति है, जहां उन्होंने प्रेमचंद की कहानियों को किसान और मजदूर वर्ग के संघर्ष से जोड़ा। इसी प्रकार, निराला की समीक्षा में वे उनके साहित्य को सामाजिक विद्रोह और प्रगतिशील मूल्यों के प्रतिनिधि के रूप में देखते थे, जो हिंदी समीक्षा का एक दुर्लभ उदाहरण है। उनकी पद्धति में साहित्य का रूप और माध्यम भी महत्वपूर्ण होता है, जहां वे मानते थे कि भाषा और शैली समाज की गतिशीलता को प्रभावित करती है।यह दृष्टि उन्हें अन्य आलोचकों से अलग करती है, क्योंकि वे साहित्य को केवल सौंदर्यात्मक अनुभव नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे।
आलोचना पद्धति की प्रासंगिकता और प्रभाव
रामविलास शर्मा की आलोचना पद्धति का विस्तार इतिहास और भाषा विज्ञान तक भी पहुंचता है, जहां वे साहित्य को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने की बात करते थे। उनकी रचनाएं अत्यंत विस्तृत हैं, जिसमें अनुवाद कार्य भी शामिल हैं, और वे सामंतवाद विरोधी तथा जनवादी दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते थे।शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना में उनका योगदान अपरिमित है, जहां वे भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर मूल्यांकन करते थे। उनकी यह पद्धति हिंदी साहित्य को वैश्विक संदर्भों से जोड़ती है, जैसे कि मार्क्सवादी सिद्धांतों के माध्यम से प्राचीन साहित्य का मूल्यांकन। कुल मिलाकर, रामविलास शर्मा की आलोचना पद्धति ने हिंदी आलोचना को एक वैज्ञानिक और सामाजिक आधार प्रदान किया, जो आज भी प्रासंगिक है और भावी आलोचकों के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। उनकी दृष्टि ने साहित्य को मात्र कला से ऊपर उठाकर सामाजिक क्रांति का हिस्सा बना दिया, जिससे हिंदी साहित्य की समझ में गहराई आई।


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