जब मैं पहली बार मंच पर गया जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं जो हमेशा के लिए दिल में बस जाते हैं। उनमें से एक पल मेरे लिए वह था, जब मैं पहली बार मंच पर खड़
जब मैं पहली बार मंच पर गया निबंध
जब मैं पहली बार मंच पर गया जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं जो हमेशा के लिए दिल में बस जाते हैं। उनमें से एक पल मेरे लिए वह था, जब मैं पहली बार मंच पर खड़ा हुआ। आज भी जब उस दिन को याद करता हूँ तो हथेलियों में पसीना आने लगता है, गले में कुछ अटक जाता है और दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं।
चुनाव और पहला उत्साह
कक्षा नौवीं में था मैं। स्कूल में वार्षिक समारोह का आयोजन हो रहा था और हमारे हिंदी शिक्षक ने मुझे एक छोटा-सा भाषण देने के लिए चुना। विषय था - 'हमारे सपनों का भारत'। जब शिक्षक महोदय ने मेरा नाम पढ़ा तो पहले तो मुझे लगा कि शायद मैंने गलत सुना। लेकिन जब पूरा कक्षा मेरी तरफ मुड़कर देखने लगा तो सच सामने आ गया। मैं। मंच पर। सबके सामने।पहले तो बहुत जोश आया। मैंने सोचा - कितना आसान है! बस कुछ लाइनें याद करनी हैं, थोड़ा जोश से बोलना है और हो गया। लेकिन जैसे-जैसे तारीख नज़दीक आती गई, उत्साह धीरे-धीरे डर में बदलने लगा। रात को सोते वक्त बार-बार लगता कि कहीं मैं भूल न जाऊँ। कहीं बीच में अटक न जाऊँ। कहीं लोग हँस न पड़ें। सपने में भी मैं मंच पर खड़ा होता और अचानक मेरे मुँह से आवाज़ गायब हो जाती।समारोह के दिन सुबह से ही पेट में गड़बड़ थी। बार-बार शौचालय जाना पड़ रहा था। हाथ-पैर ठंडे पड़ गए थे। मैंने कई बार आईने के सामने खड़े होकर अभ्यास किया, लेकिन हर बार लगता कि आवाज़ काँप रही है। माँ ने कहा, "बेटा बस मुस्कुराते रहना, सब ठीक हो जाएगा।" पर मुस्कुराना भी कितना मुश्किल था उस समय!
मंच पर चढ़ने का वह क्षण
जब मेरा नंबर आया तो पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए। नाम पुकारा गया - "रजनीश सिंह, कक्षा नौवीं 'ब'।" मैं धीरे-धीरे मंच की सीढ़ियाँ चढ़ा। हर कदम के साथ लग रहा था कि दुनिया की सारी नज़रें सिर्फ़ मुझ पर हैं। लाइटें बहुत तेज़ थीं। सामने सैकड़ों चेहरे धुंधले दिख रहे थे। माइक के सामने खड़े होते ही एक पल को लगा कि मैं भूल गया हूँ सब कुछ। दिमाग़ एकदम खाली।फिर अचानक पहली पंक्ति याद आई - "आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय, सम्माननीय शिक्षकगण और मेरे प्यारे मित्रों..."
बस यहीं से शुरू हो गया। जैसे ही मैंने पहला वाक्य पूरा किया, लगा कि शायद मैं मर नहीं रहा हूँ। धीरे-धीरे शब्द अपने आप आने लगे। कभी थोड़ा अटका, कभी आवाज़ काँपी, पर मैं बोलता रहा। बीच में एक बार मैंने नीचे देखा तो अपनी कक्षा के बच्चे ताली बजा रहे थे। किसी ने मुट्ठी दिखाई। किसी ने अंगूठा। वो छोटा-सा समर्थन मेरे लिए बहुत बड़ा हो गया।जब भाषण खत्म हुआ और मैं नीचे उतरा तो लगा जैसे मैंने कोई पहाड़ जीत लिया हो। पैर अभी भी काँप रहे थे, पर अब वो डर के नहीं, उत्साह के काँप रहे थे। कई बच्चों ने आकर कहा - "यार तूने तो कमाल कर दिया!" शिक्षक महोदय ने सिर पर हाथ रखकर कहा - "बहुत अच्छा किया बेटा, पहली बार में इतना अच्छा बोलना सबके बस की बात नहीं।"उस दिन मुझे समझ आया कि मंच पर खड़े होने का डर सिर्फ़ इसलिए नहीं होता कि हम बोल नहीं पाएँगे। डर इस बात का होता है कि लोग हमें क्या सोचेंगे। पर जैसे ही हम वो पहला कदम उठा लेते हैं, वो डर धीरे-धीरे पिघलने लगता है। और सबसे खूबसूरत बात ये कि पहली बार मंच पर जाने के बाद हर अगली बार थोड़ा आसान लगता है।
डर को गले लगाना और आगे बढ़ना
आज भी जब कभी कोई बड़ा मंच नज़र आता है, वो पुराना पसीना, वो पुरानी धड़कनें याद आ जाती हैं। पर अब वो डर नहीं, बल्कि एक मुस्कान बनकर आती हैं। क्योंकि मुझे पता है - मैं उस दिन भी डरते-डरते उतरा था, पर उतरा तो था। और यही सबसे बड़ा सबक है - शुरू करना, चाहे कितना भी डर लगे।पहली बार मंच पर जाना सिर्फ़ बोलने की बात नहीं था। वो मेरे लिए अपने डर को गले लगाने और फिर उसे धीरे-धीरे छोड़ने की शुरुआत थी।


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