लालटेन - हिंदी कहानी

SHARE:

लालटेन - हिंदी कहानी सूर्यदेव बहुत तेजी से अस्तगामी हो रहे थे I अतः हॉल की लालिमा अब कुछ मद्धिम हो कर कुछ श्यामल हो चली थी I फिर रूचिका सलाई की एक कां

लालटेन 

                                                     

द्विमंजिला आलिशान मकान के भूमितल का बड़ा-सा हॉल I इस समय उसकी दीवारें अस्तगामी सूर्य की मधुर रक्तिम किरणों से रक्ताभ हो गए थे I अभी हॉल तथा कमरों की बत्तियों को जलाने की कोई आवश्यकता तो न थी I पर घर की बारह वर्षीय बेटी ‘रूचिका’ एक पीतल की थाली में एक कपड़ा, सलाई की डिबिया और कुछ फूल लेकर मुख्य द्वार की ओर बढ़ी I मुख्य द्वार के पास ही बायीं दीवार से लगे एक सुंदर शोकेश पर अन्य वस्तुओं सहित उस पीतल की थाल को रखी दी I कुछ ऊपर बने सुंदर काँच के पारदर्शी नकाशीदार शोकेश में रखे हुए एक पुराने लालटेन को आहिस्ते से निकाली I सावधानी से उसके शीशे को उतार कर उसे तथा पूरे लालटेन को कपड़े से साफ़ की I 

लालटेन - हिंदी कहानी

सूर्यदेव बहुत तेजी से अस्तगामी हो रहे थे I अतः हॉल की लालिमा अब कुछ मद्धिम हो कर कुछ श्यामल हो चली थी I फिर रूचिका सलाई की एक कांठी निकाल सलाई पर घिसी, कांठी जल गई I उसी के सहारे उसने लालटेन की बत्ती को जलाई और उसके शीशे को बड़ी सावधानी से फिर चढ़ा दी I लालटेन की पीताभ रौशनी अब पूरे हॉल में फैली गई I इस समय रूचिका के गौर चहरे का एक भाग लालटेन की पीताभ रौशनी में दीप्तमान हो रहा था I उसके कान से लटकते कर्णफूल के जड़ाऊ पत्थर और सुंदर वसन पर जड़े छोटे-छोटे रंगीन शीशे के टुकड़े लालटेन की रौशनी में झिलमिला रहे थे I उससे परावर्तित हो कर प्रकाश पुंज हॉल में जहाँ-तहाँ छोटे-छोटे टिमटिमाते तारों के रूप में प्रतिविम्बित होने लगे I वह लालटेन पर कुछ पुष्प अर्पण कर सांध्य प्रकाश का अभिषेक की I फिर वह एक हाथ में लालटेन और दूसरे हाथ में पुष्पों युक्त उस पीतल की थाल को थामें ऊपर मंजिल की सीढ़ियों पर चढ़ने लगी और उसके साथ ही टिमटिमाते प्रकाश पुंज भी हॉल में अठखेलियाँ करते आगे बढ़ने लगें I 

रमण बाबू हॉल के एक कोने से लगे कोंच पर आराम से बैठे एक पत्रिका देख रहे थे I सांध्य-बत्ती को हाथ जोड़कर सादर प्रणाम किये I तत्पश्चात रूचिका पर नजर पड़ते ही एक पल के लिए वे हतप्रद हो गए I रूचिका के रूप में उन्हें अपनी स्वर्गीय माँ का भान हो आया I सांध्य बेला में उनकी माँ भी इसी लालटेन को जलाकर गाँव के पैत्रिक मकान के दरवाजे पर कुछ देर खड़ी रहती, फिर आँगन और उससे सम्बद्ध कमरों में इसी तरह से प्रकाश को दिखाया करती थीं I माँ को गुजरे तो कोई बीसों वर्ष हो गए I पर आज रूचिका द्वारा सांध्य लालटेन जलाने के उपक्रम में विगत वर्षों की माँ से सम्बन्धित स्मृतियाँ उनके मस्तिष्क में एक-एक कर उभरने लगीं I 

रमण बाबू को तो अपने पिता की स्मरण याद भी न रहा है I तब वे गाँव के ही विद्यालय में पांचवीं या छठी कक्षा में पढ़ते थे I उनके भैया विमल उसी विद्यालय में दशवीं कक्षा में पढ़ते थे I तभी उनके पिता पीलिया रोग से जद्दोजेहद करते अपनी जिम्मेवारियों को उनकी माँ के निर्बल कन्धों पर डाल कर गोलोक गमन किये I माँ ने हाथों की चूड़ियाँ फोड़ीं और माथे के सिंदूर को मिटा कर परिस्थितिवश अपने मन को मजबूत कर अपने दोनों बेटों के सम्मुख आने वाली हर विपत्ति के सामने मजबूत ढाल बन कर खड़ी हो गईं I 

कई बार उनके बड़े भैया विमल अपनी पढ़ाई छोड़कर कुछ काम करने का प्रस्ताव माँ के समक्ष रखें I पर हठी माँ, न मानी I वह तो अपने गोलोकगामी पति को वचन दी थीं कि हर हॉल में बच्चों को शिक्षित कर मजबूत बनायेंगी I अतः कठिन आर्थिक परिस्थिति में आपसी विचार-विमर्श कर माँ ने खेती की जमीनों को गाँव के ही एक महाजन के पास बंधक पर रख दीं और बहुत ही सावधानी से पैसों को दांतों से पकड़ती घरेलू संसार रुपी रथ पर अपने बेटों को सवार कर स्वयं उसका प्रबल सारथी बन गईं I 

संध्या समय जब दोनों भाई कहीं से लौटते, तो दूर से ही इसी जलते लालटेन को लटकाए अपनी माँ को घर के दरवाजे से कुछ आगे नीम के पेड़ के नीचे खड़ी उनके इंतजार करती हुई पाते थे I समय का चक्र परिवर्तित हुआ I विमल अपने कालेज की पढ़ाई पूर्ण कर पास के ही गाँव के विद्यालय में गणित के अध्यापक हो गए I रमण बाबू भी उच्च डिग्री हासिल की और पटना के सचिवालय आफिस में उच्च पद पर आसीन हो गए I माँ पर भी वृद्धा के लक्षण दिखने लगे थे I दोनों भाई अपनी माँ पर जान लुटाते थे I 

माँ का विशेष आदेश था कि पर्व-त्यौहार के अवसर पर परिवार के सभी सदस्य इकट्ठे गाँव पर ही रहें I अतः रमण बाबू की अधिकांश छुट्टियाँ सपरिवार गाँव पर ही माँ तथा भैया की सानिध्यता में ही बीतता था I भैया-भाभी सहित पूरे परिवार का एक साथ खान-पान और रहना, दोनों भाइयों के लिए स्वर्गीय आनंद से कम न था I अब तो माँ भी नहीं रहीं, परन्तु उनके आदेशानुसार प्रचलित पारिवारिक परम्परा आज भी कायम है I 

एक बार दशहरे की छुट्टियों में रमण बाबू गाँव पर आये थे I एक शाम को दोनों भाई किसी विशेष प्रयोजन से घर से निकलें और देर तक न लौटे I आकाश में कुछ बादल छाये हुए थे I शाम तक हवाएँ कुछ तेज होकर बहने लगी थीं I चतुर्दिक अँधेरा फ़ैल चुका था I पर दोनों भाई अब तक न लौटे थे I रात में देर करने की इनकी आदत तो थी, ही नहीं I बेचारी बूढी माँ व्यग्र थी I बहुएँ उन्हें समझातीं रहीं, पर माँ का मन कहाँ मानने वाला था? हाथ में जलते लालटेन को लिये घर से बाहर नीम के पेड़ के नीचे जा कर बेसब्री से खड़ी रही I रह-रह कर आकाश में बिजलियाँ चमक जातीं और वे दूर तक राह को पल भर के लिए आलोकित कर जाती थीं I पर, उस पर वे दोनों न दीखतें I लगभग आधे घंटे सफरी-सी बेचैनी के उपरांत दूर से ही दोनों की काली परछाइयाँ और उनकी बातचीत की मद्धिम आवाजें सुनाई दीं I बेचारी की बूढ़ी आँखें और मन को कुछ ढाढस बंधा I कुछ बूंदा-बंदी भी शुरू हो गई थी I 

दोनों भाइयों को ऐसा ही पूर्वानुमान था कि उनकी वृद्धा माँ जलते लालटेन को हाथ में लिये उनकी राह देख रही होंगीं I पर काम भी बहुत ही जरुरी था I क्या करते? पास आते ही माँ ने प्यार भरी डांट सुनाई, - ‘यह समय हो रहा है, घर लौटने का? यहाँ तुमलोगों के इंतजार में मेरी आँखें फूटी जा रही हैं I’ 

‘माँ! पहले घर तो चलो I घर चल कर बताता हूँ, देर क्यों हुई I’- दोनों भाई माँ को संग लिए आगे बढ़े I लालटेन की रौशनी से दोनों भाइयों की सम्मिलित लम्बी परछाइयाँ दूर तक जा रही थीं I घर में प्रवेश करते ही भैया विमल अपने कंधे से लटकते बैग को उतार कर मेज पर रखें I उसमें से कुछ पुराने कागजात निकालें और माँ के चरणों पर रख दिए I माँ अचम्भित!

‘माँ! यह हमारी पैत्रिक सम्पति है I स्वर्गीय बाबूजी की सम्पति I जिसे हमलोग वर्षों पहले बंधक रखे थे I उनका पूरा हिसाब चुकता कर ले आया हूँ I यह अब तुम्हारी सम्पति है I लो, सम्भालो I अपनी सम्पति को I’ – माँ की अचम्भित जिज्ञासा भाव को विमल भैया ने बड़ी प्रसन्नता-पूर्वक समझाते हुए शांत किया I माँ का गला भर आया I कोई शब्द नहीं निकल पा रहे थे I सामने के ऊँचे तख्ते पर फूलों से सुसज्जित स्वर्गीय पतिदेव का चित्र आज मुस्कुराता जान पड़ा I माँ उन पुराने खानदानी कागजात को उठाईं, उसे माथे से लगाईं और फिर उन्हें चित्र के सम्मुख उन्हें रख दीं I फिर चित्र के सम्मुख गर्व से खड़ी हो गईं और शायद उन्हें सप्रेम उलाहना देती जान पड़ीं, - ‘जिम्मेवारियों से डर कर परलोक गमन करने वाले! देखो, अपने राम-लखन के समान बेटों को I’ माँ ने प्यार से दोनों बेटों के माथे को चुमकर आशीर्वाद दी I 

पटना वापस जाने वाली उनकी रेलगाड़ी रात को नौ-साढ़े नौ बजे की ही रहती थी I शाम होते ही मोटर गाड़ी द्वार पर आ गई थी I कुछ रात होते ही रमण बाबू घर से निकल पड़े I बहुत मना करने पर भी भैया विमल तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ माँ भी इसी जलते लालटेन को अपने हाथ में लिये उन्हें विदा करने निकलीं I रमण बाबू अपनी माता के साथ-साथ उस नीम के पेड़ के नीचे तक पहुँचे I प्रणाम आदि कर मोटर गाड़ी में सवार हुए I गाड़ी आगे बढ़ चली, पर माँ लालटेन लिये वहीं तब तक खड़ी रहीं, जब तक गाड़ी उनकी आँखों से बिल्कुल ही ओझिल न हो गई I   

रमण बाबू के लिए उनकी माता का अंतिम प्रत्यक्ष दर्शन यही था I उनके पटना जाने के कुछ दिन बाद ही एक रात्रि में माँ जो सोईं, फिर न जागीं I दोनों भाइयों ने माँ की चिर विदाई सम्बन्धित समस्त क्रिया-कलापों को बड़ी ही भक्ति-भाव से निर्वाहन किया I 

गाँव में बिजली की पहुँच हो चुकी थी I अतः अब गाँव में भैया विमल के पास व्यवहारिक दृष्टि से उस लालटेन का कोई औचित्य न रह गया था और पटना जैसे राजधानी शहर में रमण बाबू के लिए यही बात लागु होती थी I पर माँ से सम्बन्धित उक्त लालटेन तो दोनों भाइयों के लिए अनमोल वस्तु थी I अतिशय मातृ-प्रेम के कारण दोनों उस मातृ-स्मृति से युक्त बेजान लालटेन पर अपना हक जमाते थे I पर हर बार की भांति  विमल भैया को ही रमण बाबू के प्रेमपूर्ण जिद के समक्ष पराजित होना पड़ा और वह लालटेन अब रमण बाबू के पास अपनी माता की अमूल्य धरोहर सम्पति सदृश मौजूद है I 

पटना में जब रमण बाबू ने अपना आलिशान मकान बनवाया, तो मुख्य द्वारा की बायीं ओर ही उस लालटेन को रखने के लिए बहुत ही सुंदर नकाशीदार एक विशेष शोकेश भी बनवाएँ I कई साथी-मित्रों ने विद्युत् प्रकाशों से जगमगाते राजधानी शहर पटना में उस पुराने लालटेन के अस्तित्व और उसके प्रति अतिशय लगाव को केंद्र कर उनपर पर व्यंग्य भी किये I कुछ ने तो उसे नए घर पर पुराने पैबंद भी बताया I पर ‘सुनिए सबकी, करिए मन की’ के सिद्धांत को अपनाते हुए रमण बाबू ने उस मातृ-स्मृति के आधार विरासतीय अमूल्य सम्पति लालटेन को न केवल अपने पास सुरक्षित ही रखा है, वरन् प्रतिदिन सांध्यकाल स्वयं अपने हाथों से उसे साफ़ कर पहले उसे जलाया करते, तब पाछे घर की अन्य बिजली की बत्तियाँ जलती थीं I बिजली की बत्तियाँ मकान को प्रकाशित किया करती थीं, जबकि वह लालटेन मन को प्रकाशित किया करता था I इधर कुछ वर्षों से उस लालटेन की सेवा और जलाने का कार्य प्रेमवश रूचिका ने आने हाथों में ले ली है I अब तो उस लालटेन को जलाना उनकी पारिवारिक परम्परा में शामिल हो गया है I 

माँ तथा लालटेन सम्बन्धित अनगिनत चित्र रमण बाबू के मस्तिष्क में किसी चलचित्र की भांति अभी प्रदर्शित हो ही रहे थे, कि ‘पिताजी! आप कहाँ खोये हुए हैं?’ – रूचिका के शब्द उनके चंचल मन को स्वप्न लोक से भौतिक लोक में वापस ले आईं I देखा, हॉल सहित सभी कमरों की बत्तियाँ जल चुकी हैं I रमण बाबू कुछ मुस्कुराते हुए बोले, - ‘तुम्हें देख, मैं अपनी माँ की यादों में खो गया था I’ 

रूचिका के मन में अपनी दादी माँ के प्रति प्रेम की भावना को देख कर रमण बाबू काफी संतुष्ट हैं I कल भी सांध्य बेला में फिर वह लालटेन जलेगा I 


(आश्विन शुक्लपक्ष चतुर्थी, मंगलवार, विक्रम संवत 2077, 20 अक्तूबर, 2020)




- श्रीराम पुकार शर्मा,
24, बन बिहारी बोस रोड,
हावड़ा – 711101. (पश्चिम बंगाल)
सम्पर्क सूत्र: 9062366788.


COMMENTS

LEAVE A REPLY
नाम

अंग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश,3,अकबर इलाहाबादी,11,अकबर बीरबल के किस्से,62,अज्ञेय,29,अटल बिहारी वाजपेयी,1,अदम गोंडवी,3,अनंतमूर्ति,3,अनौपचारिक पत्र,16,अन्तोन चेख़व,2,अमीर खुसरो,6,अमृत राय,1,अमृतलाल नागर,1,अमृता प्रीतम,5,अयोध्यासिंह उपाध्याय "हरिऔध",5,अली सरदार जाफ़री,3,अष्टछाप,3,असगर वज़ाहत,11,आनंदमठ,4,आरती,11,आर्थिक लेख,7,आषाढ़ का एक दिन,13,इक़बाल,2,इब्ने इंशा,27,इस्मत चुगताई,3,उपेन्द्रनाथ अश्क,1,उर्दू साहित्‍य,179,उर्दू हिंदी शब्दकोश,1,उषा प्रियंवदा,1,एकांकी संचय,7,औपचारिक पत्र,31,कक्षा 10 हिन्दी स्पर्श भाग 2,17,कबीर के दोहे,19,कबीर के पद,1,कबीरदास,10,कमलेश्वर,5,कविता,1168,कहानी सुनो,2,काका हाथरसी,4,कामायनी,5,काव्य मंजरी,11,काव्यशास्त्र,4,काशीनाथ सिंह,1,कुंज वीथि,12,कुँवर नारायण,1,कुबेरनाथ राय,2,कुर्रतुल-ऐन-हैदर,1,कृष्णा सोबती,2,केदारनाथ अग्रवाल,1,केशवदास,1,कैफ़ी आज़मी,4,क्षेत्रपाल शर्मा,45,खलील जिब्रान,3,ग़ज़ल,122,गजानन माधव "मुक्तिबोध",12,गीतांजलि,1,गोदान,6,गोपाल सिंह नेपाली,1,गोपालदास नीरज,10,गोरख पाण्डेय,3,गोरा,2,घनानंद,1,चन्द्रधर शर्मा गुलेरी,2,चमरासुर उपन्यास,7,चाणक्य नीति,5,चित्र शृंखला,1,चुटकुले जोक्स,15,छायावाद,6,जगदीश्वर चतुर्वेदी,10,जयशंकर प्रसाद,24,जातक कथाएँ,10,जीवन परिचय,45,ज़ेन कहानियाँ,2,जैनेन्द्र कुमार,3,जोश मलीहाबादी,2,ज़ौक़,4,तुलसीदास,7,तेलानीराम के किस्से,7,त्रिलोचन,1,दाग़ देहलवी,5,दादी माँ की कहानियाँ,1,दुष्यंत कुमार,7,देव,1,देवी नागरानी,23,धर्मवीर भारती,2,नज़ीर अकबराबादी,3,नव कहानी,2,नवगीत,1,नागार्जुन,18,नाटक,1,निराला,32,निर्मल वर्मा,1,निर्मला,26,नेत्रा देशपाण्डेय,3,पंचतंत्र की कहानियां,42,पत्र लेखन,178,परशुराम की प्रतीक्षा,3,पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र',3,पाण्डेय बेचन शर्मा,1,पुस्तक समीक्षा,102,प्रयोजनमूलक हिंदी,4,प्रेमचंद,23,प्रेमचंद की कहानियाँ,89,प्रेरक कहानी,15,फणीश्वर नाथ रेणु,1,फ़िराक़ गोरखपुरी,9,फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,24,बच्चों की कहानियां,86,बदीउज़्ज़माँ,1,बहादुर शाह ज़फ़र,6,बाल कहानियाँ,14,बाल दिवस,3,बालकृष्ण शर्मा 'नवीन',1,बिहारी,1,बैताल पचीसी,2,भक्ति साहित्य,128,भगवतीचरण वर्मा,6,भवानीप्रसाद मिश्र,3,भारतीय कहानियाँ,60,भारतीय व्यंग्य चित्रकार,7,भारतीय शिक्षा का इतिहास,3,भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,7,भीष्म साहनी,5,भैरव प्रसाद गुप्त,2,मंगल ज्ञानानुभाव,22,मजरूह सुल्तानपुरी,1,मधुशाला,7,मनोज सिंह,16,मन्नू भंडारी,4,मलिक मुहम्मद जायसी,2,महादेवी वर्मा,15,महावीरप्रसाद द्विवेदी,1,महीप सिंह,1,महेंद्र भटनागर,73,माखनलाल चतुर्वेदी,3,मिर्ज़ा गालिब,39,मीर तक़ी 'मीर',20,मीरा बाई के पद,22,मुल्ला नसरुद्दीन,6,मुहावरे,4,मैथिलीशरण गुप्त,10,मैला आँचल,3,मोहन राकेश,10,यशपाल,9,रंगराज अयंगर,42,रघुवीर सहाय,5,रणजीत कुमार,29,रवीन्द्रनाथ ठाकुर,22,रसखान,11,रांगेय राघव,2,राजकमल चौधरी,1,राजनीतिक लेख,18,राजभाषा हिंदी,63,राजिन्दर सिंह बेदी,1,राजीव कुमार थेपड़ा,4,रामचंद्र शुक्ल,2,रामधारी सिंह दिनकर,21,रामप्रसाद 'बिस्मिल',1,रामविलास शर्मा,8,राही मासूम रजा,8,राहुल सांकृत्यायन,1,रीतिकाल,3,रैदास,2,लघु कथा,103,लोकगीत,1,वरदान,11,विचार मंथन,60,विज्ञान,1,विदेशी कहानियाँ,31,विद्यापति,4,विविध जानकारी,1,विष्णु प्रभाकर,1,वृंदावनलाल वर्मा,1,वैज्ञानिक लेख,6,शमशेर बहादुर सिंह,5,शमोएल अहमद,5,शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय,1,शरद जोशी,3,शिवमंगल सिंह सुमन,5,शुभकामना,1,शेख चिल्ली की कहानी,1,शैक्षणिक लेख,37,शैलेश मटियानी,2,श्यामसुन्दर दास,1,श्रीकांत वर्मा,1,श्रीलाल शुक्ल,1,संयुक्त राष्ट्र संघ,1,संस्मरण,11,सआदत हसन मंटो,9,सतरंगी बातें,33,सन्देश,28,समसामयिक हिंदी लेख,77,समीक्षा,1,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना,17,सारा आकाश,15,साहित्य सागर,21,साहित्यिक लेख,26,साहिर लुधियानवी,5,सिंह और सियार,1,सुदर्शन,3,सुदामा पाण्डेय "धूमिल",7,सुभद्राकुमारी चौहान,7,सुमित्रानंदन पन्त,19,सूरदास,6,सूरदास के पद,21,स्त्री विमर्श,10,हजारी प्रसाद द्विवेदी,1,हरिवंशराय बच्चन,27,हरिशंकर परसाई,22,हिंदी कथाकार,12,हिंदी निबंध,230,हिंदी लेख,457,हिंदी समाचार,124,हिंदीकुंज सहयोग,1,हिन्दी,7,हिन्दी टूल,4,हिन्दी आलोचक,7,हिन्दी कहानी,32,हिन्दी गद्यकार,4,हिन्दी दिवस,71,हिन्दी वर्णमाला,3,हिन्दी व्याकरण,45,हिन्दी संख्याएँ,1,हिन्दी साहित्य,9,हिन्दी साहित्य का इतिहास,21,हिन्दीकुंज विडियो,11,aaroh bhag 2,14,astrology,1,Attaullah Khan,2,baccho ke liye hindi kavita,67,Beauty Tips Hindi,3,Class 10 Hindi Kritika कृतिका Bhag 2,5,Class 11 Hindi Antral NCERT Solution,3,Class 9 Hindi Kshitij क्षितिज भाग 1,17,Class 9 Hindi Sparsh,15,English Grammar in Hindi,3,Godan by Premchand,6,hindi ebooks,5,Hindi Ekanki,13,hindi essay,222,hindi grammar,51,Hindi Sahitya Ka Itihas,63,hindi stories,582,ICSE Hindi Gadya Sankalan,11,icse-bhasha-sanchay-8-solutions,18,Kshitij Bhag 2,10,lok-sabha-in-hindi,18,mb,72,motivational books,10,naya raasta icse,9,NCERT Class 10 Hindi Sanchayan संचयन Bhag 2,3,NCERT Class 11 Hindi Aroh आरोह भाग-1,20,ncert class 6 hindi vasant bhag 1,14,NCERT Class 9 Hindi Kritika कृतिका Bhag 1,5,NCERT Hindi Rimjhim Class 2,13,NCERT Rimjhim Class 4,14,ncert rimjhim class 5,19,NCERT Solutions Class 7 Hindi Durva,12,NCERT Solutions Class 8 Hindi Durva,17,NCERT Solutions for Class 11 Hindi Vitan वितान भाग 1,3,NCERT Solutions for class 12 Humanities Hindi Antral Bhag 2,4,NCERT Solutions Hindi Class 11 Antra Bhag 1,19,NCERT Vasant Bhag 3 For Class 8,12,NCERT/CBSE Class 9 Hindi book Sanchayan,6,Nootan Gunjan Hindi Pathmala Class 8,18,Notifications,5,nutan-gunjan-hindi-pathmala-6-solutions,7,nutan-gunjan-hindi-pathmala-7-solutions,18,question paper,13,quizzes,8,Rimjhim Class 3,14,Sankshipt Budhcharit,5,Shayari In Hindi,14,sponsored news,2,Syllabus,7,UP Board Class 10 Hindi,3,Vasant Bhag - 2 Textbook In Hindi For Class - 7,11,VITAN BHAG-2,5,vocabulary,19,
ltr
item
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika: लालटेन - हिंदी कहानी
लालटेन - हिंदी कहानी
लालटेन - हिंदी कहानी सूर्यदेव बहुत तेजी से अस्तगामी हो रहे थे I अतः हॉल की लालिमा अब कुछ मद्धिम हो कर कुछ श्यामल हो चली थी I फिर रूचिका सलाई की एक कां
https://1.bp.blogspot.com/-Ygu7BUVG5WU/YDkLJWG7TpI/AAAAAAAAPTc/-eEWlHrP1YAzZ8DU7LUjm9FVneC0xY0uwCNcBGAsYHQ/s320/kerosene.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-Ygu7BUVG5WU/YDkLJWG7TpI/AAAAAAAAPTc/-eEWlHrP1YAzZ8DU7LUjm9FVneC0xY0uwCNcBGAsYHQ/s72-c/kerosene.jpg
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika
https://www.hindikunj.com/2021/02/lalten-hindi-kahani.html
https://www.hindikunj.com/
https://www.hindikunj.com/
https://www.hindikunj.com/2021/02/lalten-hindi-kahani.html
true
6755820785026826471
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All आपको ये भी रोचक लगेगा Categories ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy विषय-तालिका