भारतीय राजनीति में भाषा की भूमिका क्या है ?

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भाषाई राजनीति और भारतीय समाज भाषा मनुष्य की चेतना का निर्माण करती हैI भाषा लोकतन्त्र की वाणी भी है, व्यवहार भी, संस्कार भी I जीवन का कोई ऐसा पक्ष

भाषाई राजनीति और भारतीय समाज


भाषा मनुष्य की चेतना का निर्माण करती हैI भाषा लोकतन्त्र की वाणी भी है, व्यवहार भी, संस्कार भी I जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं है जो भाषा से अछूता हो Iजागरण हो या स्वप्न हम भाषा की दुनिया में ही जीते हैं I हमारी भावनाएं, हास परिहास , पीड़ा की अभिव्यक्तियों और संवाद को संभव बनाते हुए भाषा सामाजिक जीवन को संयोजित करती है I उसी के माध्यम से हम दुनिया देखते भी हैं और रचते भी हैं I भाषा की बेजोड़ सर्जनात्मक शक्ति साहित्य , कला और संस्कृति  के अन्यान्य पक्षों में प्रतिबिम्बित होती है I इस तरह भाषा हमारे अस्तित्व की सीमाएं तंय करती चलती है I विभिन्न प्रकार के ज्ञान-विज्ञान के संकलन, संचार और प्रसार  के लिए भाषा अपरिहार्य हो चुकी है I भाषा के आलोक से ही हम काल का भी अतिक्रमण कर पाते हैं और संस्कृति का प्रवाह बना रहता है I हमारी भाषा नीति और शिक्षा के आयोजन में अभी भी जरूरी संजीदगी नहीं आ सकी है I इसका स्पष्ट कारण हमारी औपनिवेशिक मनोवृत्ति है I इसका परिणाम यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी स्वाधीनता और स्वराज्य हमसे कोसों दूर है I  भाषा और संस्कृति साथ-साथ चलते हैं I यदि सोच -विचार एक भाषा में करें और शेष जीवन दूसरी भाषा में जिए तो भाषा और जीवन दोनों में ही प्रामाणिकता  क्षतिग्रस्त होती जायगी I दुर्भाग्य से आज यही घटित हो रहा है I भारतीय भाषाएं इतनी समर्थ हैं कि इनके द्वारा ज्ञान का सृजन और स्थानान्तरण किया जा सकता है I साथ ही औपचारिक शिक्षा, अर्थव्यवस्था एवं अन्य सामाजिक-राजनीतिक कार्यों के लिए इसका प्रयोग सुगमतापूर्वक किया जा सकता है I 

“हिन्दी हो या अँग्रेजी या तमिल, बंगला, उड़िया या सिंधी ये तमाम भाषाएँ भारत में नदियों की तरह एक जगह से
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भारतीय राजनीति में भाषा की भूमिका क्या है ?
दूसरी जगह प्रवाहित होती रही, अपने साथ उद्गम स्थलों की विशेषताओं को भी ले जाती रहीं I भारत को बहुरंगी देश बनाने में इन भाषाओं का बड़ा योगदान रहा है I लेकिन अफसोस की राजनीति ने अपने स्वार्थ के लिए इनपर कुटिल चालों के बाँध बनाने शुरू कर दिए और अब इसके डूब क्षेत्र में आकर हमारी विशिष्ट पहचान के गुम होने का खतरा बढ़ गया है I”1  राजनीतिबाज अपनी स्वार्थ  सिद्धि  के लिए भाषाओं के नाम पर हमें लड़ा रहे हैं। जो काम अंग्रेजों ने किया, स्वतंत्रता के पश्चात हमारे नेताओं के कंधों पर बैठकर अंग्रेजी ने भी यही काम किया, बांटो और राज करो। अपनी सहोदर भाषाओं के नाम पर हमारे दिमाग में कितना विद्वेष भर दिया गया है । भाषा के नाम पर जितने आंदोलन मैं देखता हूं, उनमें अंग्रेजी का विरोध शायद ही कहीं होता हो ? हम लड़ते रहे, वे बढ़ते रहे। और इस प्रकार धीरे-धीरे पूरे देश पर अंग्रेजी का साम्राज्य स्थापित होता गया। इससे सभी भारतीय भाषाएँ हाशिए पर जाती रहीं है। उन्होंने आशा की किरण के रूप में नई शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए कहा, ‘हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि हम अपने राज्य की संस्कृति की रक्षा के लिए अंग्रेजी के स्थान पर मातृभाषा माध्यम के लिए कोशिश करें। कम से कम प्राथमिक स्तर तक तो अंग्रेजी माध्यम न हो । लेकिन जब भाषा का मुद्दा उठता है तब हमारी बुद्धि विलोपित हो जाती है । आज का राजनीतिक माहोल देखकर लगता है की इस व्यवस्था को बदलना होगा. जनता की अपेक्षाएँ  होती है, आकांक्षाएँ होती है उसके साथ खेलना बंद करना पड़ेगा I भाषा के प्रश्नों को उलझाना कई तरह की राजनीतिक जरूरतों को पूरा करता है I शची मिश्र कहती है , “आज राजनीति में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है I  क्षेत्रीयता के उभार ने भाषाई अस्मिता के संघर्ष को बल दिया है I मगर भाषा की राजनीति में भाषाओं के विकास का मुद्दा गौण होता जा रहा है I भाषाई कट्टरता का विस्तार   जा रहा है I सच्चाई तो यह है की मूलभूत राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं पर पर्दा डालने के लिए भाषा के मुद्दे को उछाला जा रहा है जब विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे थे, बुंदेलखंड में पानी के लिए आहाकार मचा था तभी मराठी बनाम हिन्दी का मसला सामने आया जिसने विदर्भ और बुंदेलखंड की समस्या को पीछे ढकेल दिया I आज बिहार और उत्तरप्रदेश की प्रशासनिक कमजोरी और अराजकता ने भोजपुरी के मुद्दे को उछाला है I”2  

आचार्य चाणक्य कहा करते थे कि भाषा, भवन, भेष और भोजन संस्कृति के निर्माणक तत्त्व हैं। किसी भी संस्कृति की निर्मित इन चारों के समन्वय से होती है । भाषा ही एकमात्र साधन है जो हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और संस्कृति की रक्षा कर सकती है। हमारे लिये विचारणीय प्रश्न यह होना चाहिये कि हिंदी के समर्थन में प्रचंड जनसंख्या खड़ी करनेके अंतर्राष्ट्रीय लाभ क्या हैं और उनका उपयोग कर पाने के लिये हमारे पास क्या क्या पर्याय हैं। लाभ गिनाने हों तो चीन और उनकी भाषा मंडारिन की ओर हमें देखना चाहिये जो संख्यााबल के मुद्दे पर आज अंगरेजी को भी मात देती है। हिंदी भी दे सकती है। लेकिन हिंदी के पक्षधरों को समझना पडेगा कि कन्नड, मराठी, असमिया इत्यादि की अस्मिता को बचाए बिना, बल्कि अवधी, ब्रज, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, झारखंडी इत्यादि की अस्मिता के बिना हिंदी को समर्थन नही मिलनेवाला । और यदि इन सारी भाषाओं के साथ हम हिंदी को एकात्म भाव से जोडते हैं तो हिंदी की समृद्धि अधिक तीव्र गति से होगी। हमें याद रखना चाहिए कि देश की भाषाओं से ही देश की संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, परंपराएँ, धर्म, आध्यात्म और राष्ट्रीय अस्मिता सब कुछ है।  शिक्षा नीति- 2020 के अनुसार भारतीय भाषाएं पूर्व विद्यालयी स्तर से लेकर शोध के स्तर तक औपचारिक शिक्षा का माध्यम बननी चाहिए I साथ ही भाषाओं को केवल उनके साहित्य तक सीमित न रख  इतिहास, कला, संस्कृति तथा विज्ञान जैसे विषयों को पढ़ाने का माध्यम बनाया जाना चाहिए I  इस तरह भाषा के समुचित प्रयोग द्वारा समाज को लोकतांत्रिक और समावेशी बनाया जा सकता है I भाषारूपी बांध के माध्यम से  विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ा जा सकता है I सभी भारतीय भाषाओं में वह क्षमता विद्यमान है I भाषाओं को जाँत, धर्म, पंथ, देश या वंश से जोड़कर देखना गलत है I हमें इस बात को बहुत ही व्यापक रूप से देखने की आवश्यकता है I 

भाषा का सम्बन्ध केवल साहित्य से है, इस धारणा को तोड़ कर उसकी अन्य क्षेत्रों में व्याप्ति को समझना जरूरी हैI तभी अनुवाद और रटन की अध्ययन संस्कृति के स्थान पर मौलिक सृजन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सकेगा I आज की प्रचलित परिपाटी में कुछ विषयों को अंग्रेजी के माध्यम से पढ़ाया जाना रूढ़ सा बना दिया  गया हैI  सूचना एवं प्रौद्योगिकी, चिकित्सा एवं विधि के विषय इसके प्रमुख उदाहरण है I  इस दिशा में भारतीय भाषाओं के माध्यम से पहल होनी चाहिए I यह भी उल्लेखनीय है कि कला, शिल्प, खेल और देशज ज्ञान को अपनी भाषा के माध्यम से ही खोजा और संरक्षित किया जा सकता है I नीति का यह मानना है कि  ज्ञान, विज्ञान और कौशल की दृष्टि से भाषाओं को रोजगार की दुनिया में स्थापित किया जाना चाहिए I  शिक्षा नीति में प्राचीन भाषाओं के लिए आदरभाव विकसित करने और भाषा शिक्षकों की नियुक्ति को प्रोत्साहन देने का सुझाव स्वागत योग्य है जहां तक पूर्व विद्यालयी शिक्षा का प्रश्न है , मातृभाषा का प्रयोग करते हुए सोचने विचारने की प्रक्रिया का सूत्रपात  करना ही सर्वथा हितकर होगा I बच्चे की भाषा सीखने की सहजात क्षमता का उपयोग करते हुए सीखने का सक्रिय परिवेश बनाया जा सकता है I बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए चित्र वाली किताबों एवं अन्य भाषा शिक्षण सहायक सामग्री का विकास करना आवश्यक होगा I प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण को अनिवार्यत: लागू किया जाना ही श्रेयस्कर है I अत: भारतीय भाषाओं में भी उच्च स्तरीय शोध होना चाहिए I नई शिक्षा नीति कला, शिल्प, इतिहास, देशज विज्ञान और लोक विद्या को भी औपचारिक शिक्षा के दायरे में लाने को सोच रही है I इनमें प्रवेश के लिए अपनी भाषा ही उपयुक्त होगी I  भारतीय भाषाओं को व्यावसायिक शिक्षा में यथोचित स्थान देते हुए रोजगार बाजार से जोड़ना होगाI प्रशासन में भी भारतीय भाषाओं के उपयोग पर ध्यान दिया जाना जरूरी है क्योंकि जो भी नीति बनती है उसके पालन की जिम्मेदारी प्रशासन की ही होती है, उन्हें भी भाषाओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी को ठीक तरह से निभानी जरूरी है। 

जिस तरह गंगा अनेक सहायक नदियों से मिलकर ही सागर तक की यात्रा करती हैं और  अपने साथ उन नदियों को भी सागर तक पहुंचाती है उसी तरह हिंदी से अलग होते ही बोलियों का अस्तित्व भी संकट में आ जाएगा। हिंदी हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की संवाहक है। वह राष्ट्रीय संपर्क और संवाद का एकमात्र माध्यम है ।यदि हम इस माध्यम अथवा आधार को ही कमजोर कर देंगे तो देश अपने आप कमजोर हो जाएगा। हमारी भारतीयता कमजोर हो जाएगी। यदि हमें भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता को अक्षुण्ण रखना है तो हिंदी के संयुक्त परिवार को टूटने से बचाना होगा और कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हर भारतीय जनमानस को अपनी मानसिकता को बदलना होगा I भाषा को भाषा के रूप में देखना होगा I भाषा के नाम पर राजनीति करनेवालों को एक संदेश देना होगा की, हम सभी एक है I अब हमें भाषा के नाम पर लड़ना बंद करना होगा I भाषा कभी तोड़ती नहीं वह तो जोड़ती है I भाषा के नाम पर राजनीति करनेवाले कुछ कुटिल राजनीतिज्ञों की विकृत चालों को कुचलना होगा I भारत जैसे बहुभाषी देश में लोगों की भावनिकता का फायदा उठानेवाले लोगों को एकता के माध्यम से सबक सीखाना होगा I 
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संदर्भ -- 
https://deshbandhu.co.in/editorial/politics-on-language-59589-https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/nbteditpage/language-dialects-and-politics/
विभिन्न पत्र- पत्रिकाएँ एवं इंटरनेट की वेब साइटस
 
 
 
 

- डॉ. रोहिदास धोंडीबा गवारे
 सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग
      अ. र. भा. गरुड महाविद्यालय,शेंदुर्नी
                         तहसील – जामनेर जि. जलगांव,
                        महाराष्ट्र 424204 मो. 9637525680

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