मीरा के पद NCERT Class 11 Hindi Aroh Chapter 2

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मीरा के पद 

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मीरा के पद की व्याख्या 


मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई 
जा के सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई 
छांड़ि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई ? 
संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोयी 
अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोयी 
अब त बेलि फैलि गयी, आणंद-फल होयी 
दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोयी 
दधि मथि घृत काढ़ि लियो, डारि दयी छोयी 
भगत देखि राजी हुयी, जगत देखि रोयी 
दासि मीरां लाल गिरधर ! तारो अब मोही 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ कवयित्री मीरा के द्वारा रचित है, जो पद नरोत्तम दास स्वामी द्वारा संकलित 'मीरा मुक्तावली' से लिए गए हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री मीरा मोर-मुकुट धारण किए हुए श्रीकृष्ण को अपना पति मानते हुए कहती हैं कि उनके सिवा इस जगत में मेरा कोई दूसरा नहीं | आगे कवयित्री कहती हैं कि मैंने कुल की मर्यादा का भी ध्यान छोड़ दिया है तथा संतों के साथ उठते-बैठते लोक-लज्जा सब कुछ त्यागकर स्वयं को कृष्ण-भक्ति में लीन कर लिया है | कवयित्री मीरा कहती हैं कि कृष्ण के प्रेम रूपी बेल को सींचने के लिए मैंने अपने आँसुओं को नि:स्वार्थ भाव से न्यौछावर किया है | फलस्वरूप, जिस बेल के बढ़ने से आनंद रूपी फल की प्राप्ति हुई है | आगे कवयित्री एक दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार दूध में मथानी डालकर दही से मक्खन निकाला जाता है और शेष छाछ को पृथक कर दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार मीरा ने भी सांसारिकता के ढकोसलेपन से स्वयं को दूर रखा है और अपनी सच्ची और आत्मिक भक्ति से श्रीकृष्ण के प्रेम को प्राप्त किया है | आगे कवयित्री मीरा कहती हैं कि जब मैं भक्तों को देखती हूँ, तो मुझे प्रसन्नता होती है और उन लोगों को देखकर मुझे दुख होता है, जो सांसारिकता के जाल में फँसे हुए हैं | मीरा ख़ुद को श्रीकृष्ण की दासी मानती हैं और श्रीकृष्ण से स्वयं का उद्धार करने की कामना करती हैं | 

(2)- पग घुंघरू बांधि मीरां नाची, 
मैं तो मेरे नारायण सूं, आपहि हो गई साची, 
लोग कहै, मीरां भइ बावरी; न्यात कहै कुल-नासी, 
विस का प्याला राणा भेज्या, पीवत मीरां हाँसी, 
मीरां के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ कवयित्री मीरा के द्वारा रचित है, जो पद नरोत्तम दास स्वामी द्वारा संकलित 'मीरा मुक्तावली' से लिए गए हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री मीरा कहती हैं कि वह कृष्ण के प्रेम में दीवानी हो गई हैं तथा पैरों में घुँघरू बाँधकर नाचने में मग्न है | कवयित्री मीरा कृष्ण के प्रेम में इतना रसविभोर हो गई हैं कि लोग उसे पागल की संज्ञा देने लगे हैं | उनके सगे-संबंधी कहते हैं कि ऐसा करके वह कुल का नाम ख़राब कर रही है | आगे कवयित्री मीरा कहती हैं कि राणा जी ने उसे मारने के लिए विष का प्याला भेजा था, जिसे वह हँसते-हँसते पी ली और अमरत्व को प्राप्त हुई | आगे कवयित्री कहती हैं कि यदि प्रभु की भक्ति सच्चे मन से किया जाए तो वे सहजता से प्राप्त हो जाते हैं | ईश्वर को अविनासी की संज्ञा इसलिए दी गई है, क्योंकि वे नश्वर हैं | 


मीरा के पद पाठ की सारांश

प्रस्तुत पाठ या पद नरोत्तम दास स्वामी द्वारा संकलित मीरा मुक्तावली से लिए गए हैं |प्रस्तुत पहले पद में कवयित्री मीरा ने कृष्ण से अपनी अनन्यता व्यक्त की है तथा व्यर्थ के कार्यों में व्यस्त लोगों के प्रति दुख प्रकट किया है | दूसरे पद में, प्रेम रस में डूबी हुई कवयित्री मीरा समस्त रीति-रिवाजों और बंधनों से मुक्त होने और गिरिधर के स्नेह के कारण अमर होने की बात कर रही हैं...|| 


मीरा के पद पाठ के प्रश्न उत्तर 


प्रश्न-1 मीरा कृष्ण की उपासना किस रूप में करती हैं ? वह रूप कैसा है ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार मीरा कृष्ण की उपासना पति-परमेश्वर के रूप में करती हैं | उनके सिर पर मोर का मुकुट है | वे मन को हरने वाले हैं | कवयित्री मीरा स्वयं को उनकी दासी मानती हैं तथा उनके चरणों में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दी हैं | 

प्रश्न-2 भाव व शिल्प सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –

मीरा
मीरा
(क) अंसुवन जल सींचि-सचि, प्रेम-बेलि बोयी
अब त बेलि फैलि गई, आणंद-फल होयी
(ख) दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से विलोयी
दधि मथि घृत काढ़ि लियो, डारि दयी छोयी

उत्तर- भाव व शिल्प सौंदर्य

(क) भाव सौंदर्य -- प्रस्तुत पंक्तियाँ कवयित्री मीरा द्वारा रचित पद से उद्धृत हैं | कवयित्री मीरा कहती हैं कि कृष्ण के प्रेम रूपी बेल को सींचने के लिए मैंने अपने आँसुओं को नि:स्वार्थ भाव से न्यौछावर किया है | फलस्वरूप, जिस बेल के बढ़ने से आनंद रूपी फल की प्राप्ति हुई है | अर्थात् वह कहती हैं कि श्रीकृष्ण से प्रेम करने का मार्ग सरल नहीं है | इस प्रेम की बेल को सींचने के लिए बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | 

शिल्प सौंदर्य -- यहाँ व्रजभाषा में सुंदर अभिव्यक्ति हुई है, जो राजस्थानी मिश्रित है | साँगरूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है | जैसे -- आणंद-फल, अंसुवन जल, प्रेम-बेलि | ‘सींचि-सचि’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है | बेलि बोयी में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग भी हुआ है | गेयता है | 

(ख) भाव सौंदर्य -- प्रस्तुत पंक्तियाँ कवयित्री मीरा द्वारा रचित पद से उद्धृत हैं | कवयित्री मीरा एक दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कहती हैं कि जिस प्रकार दूध में मथानी डालकर दही से मक्खन निकाला जाता है और शेष छाछ को पृथक कर दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार उसने ने भी सांसारिकता के ढकोसलेपन से स्वयं को दूर रखा है और अपनी सच्ची और आत्मिक भक्ति से श्रीकृष्ण के प्रेम को प्राप्त किया है | इन पंक्तियों में मीरा के मन का मंथन और जीवन जीने की सुंदर शैली का चित्रण हुआ है | इसमें संसार के प्रति वैराग्य भाव निहित है | 

शिल्प सौंदर्य -- यहाँ दही जीवन के प्रतीक के रूप में प्रयोग हुआ है | अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है | प्रतीकात्मकता के रूप में है -- ‘घृत’ भक्ति का, ‘छोयी’ संसार का प्रतीक है | ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है | गेयता है | तत्सम शब्दावली भी शामिल है | 

प्रश्न-3 लोग मीरा को बावरी क्यों कहते हैं ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, मीरा कृष्ण-भक्ति में इतना लीन हो गई हैं कि अपना सर्वस्व न्योछावर कर दी हैं | संतो के साथ उठते-बैठते उन्हें किसी मर्यादा का ध्यान नहीं रहा है | कृष्ण के प्रेम में उन्होंने राज-परिवार छोड़ दिया, मंदिरों में भजन गाया और नृत्य किया | लोक-लज्जा का त्याग करके वह कृष्ण भक्ति में खोई रहीं, उनकी भक्ति के इसी बावलेपन के कारण लोग उन्हें बावरी कहते हैं | 

प्रश्न-4 विस का प्याला राणा भेज्या, पीवत मीरां हाँसी --इसमें क्या व्यंग्य छिपा है ? 

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति में कवयित्री मीरा का अद्भुत आत्मविश्वास प्रकट हुआ है | राणा (मीरा के ससुर) ने उसे मारने के लिए विष का प्याला भेजा था, जिसे वह हँसते-हँसते पी ली और अमरत्व को प्राप्त हुई थी | इस तरह मीरा को मारनेवालों की सभी योजनाएँ विफल हो गईं और मीरा आनन्दित होकर हँसने में मग्न थी | 

प्रश्न-5 मीरा जगत को देखकर रोती क्यों हैं ? 

उत्तर- कवयित्री मीरा जगत को देखकर इसलिए रोती हैं कि उन्हें संसार के लोग मोह-माया में लिप्त नज़र आते हैं | मीरा के अनुसार, ऐसे लोगों का जीवन व्यर्थ है | 

प्रश्न-6 लोक-लाज खोने का अभिप्राय क्या है ? 

उत्तर- लोक-लाज खोने का अभिप्राय अपनी पारिवारिक व सामाजिक सीमाओं के बंधनों को ध्वस्त करके आगे बढ़ना है | अर्थात् समाज की मर्यादाओं का उल्लंघन करके मीरा साधु-संतों के साथ नाचती-गाती थी | 


प्रश्न-7 मीरा ने ‘सहज मिले अविनासी’ क्यों कहा है ? 

उत्तर- कवयित्री मीरा के अनुसार, कृष्ण अनश्वर हैं, जिसे पाने के लिए सच्चे मन से सहज भक्ति करनी पड़ती है | अंतत: इसी भक्ति से ईश्वर प्रसन्न होकर भक्तों को मिल जाया करते हैं | 



मीरा के पद पाठ के कठिन शब्द शब्दार्थ 

• अंसुवन जल -   अश्रुरूपी जल से 
• आणद -          आनन्दमय, 
• फल -             परिणाम, 
• कानि -            मर्यादा
• ढिग -              साथ
• बेलि -              प्रेम की बेल
• विलोयी -          मथी
• छोयी -             सारहीन अंश, छाछ 
• आपहि -           बिना प्रयास के, स्वयं 
• साची -            सच्ची, सत्य 
• न्यात -             कुटुंब या घर के लोग
• कुल-नासी -       कुल का नाश करने वाली
• विस -              विष, गरल 
• पीवत -            पीती हुई
• हाँसी -             हँस पड़ी या हँसने की क्रिया 
• सहज -            स्वाभाविक तौर पर 
• राजी -             खुश 
• रोई -               दुखी हुई | 



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