कोरोना और कबूतर

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कोरोना और कबूतर मेरे घर की बालकनी में एक कबूतर का जोड़ा आपस में गुटुर गु कर रहा था। कभी वे आपस में एक दूसरे से चोंच लड़ाने लगते तो कभी अपनी - अपनी गर्दन फुलाकर गुटुर गु की आवाज निकालने लगते। कभी दोनों बालकनी की रैलिंग में एक तरफ से घुसकर दूसरी तरफ से निकलने का खेल खेलने लगते।

कोरोना और कबूतर


मेरे घर की बालकनी में एक कबूतर का जोड़ा आपस में गुटुर गु कर रहा था। कभी वे आपस में एक दूसरे से चोंच लड़ाने लगते तो कभी अपनी - अपनी गर्दन फुलाकर गुटुर गु की आवाज निकालने लगते। कभी दोनों बालकनी की रैलिंग में एक तरफ से घुसकर दूसरी तरफ से निकलने का खेल खेलने लगते। वे रैलिंग के एक किनारे से अपना यह खेल शुरू करते और उसके दूसरे सिरे तक एक दूसरे के पीछे – पीछे चले जाते। मैं अपने कमरे के दरवाजे पर कुर्सी पर खाली बैठा उनका खेल देख रहा था। उनका एक दूसरे के पीछे – पीछे बड़ी सहजता से गुटुर गु करते हुए चलना बड़ा मन मोहक लग रहा था। तभी न जाने क्यों उन्होंने अपना खेल खत्म कर दिया और वे वहां रखे पौधों में घूस गए, जो मुझे नागवार गुजरा। वे कहीं पौधों को ना तौड़ दे इसलिए मैं उन्हें वहां से भगाने को दौड़ा। तो वे उड़कर बालकनी की रैलिंग के दूसरे किनारे पर जा बैठे। मै उधर गया तो वे रैलिंग की पहली जगह जा बैठे। यह प्रक्रिया कई बार दोहराई गई किन्तु वे वहां से जाने को तैयार ही नहीं थे अत: मैं गुस्से में बोल पड़ा, अरे, तुम यहां से भाग क्यों नहीं रहे हो?
तभी एक आवाज आई, हम क्यों भागे? 
मैंने इधर उधर देखा, यह आवाज कहां से आई? कौन बोल रहा है?
फिर वही आवाज आई, इधर उधर क्या देखता है? हम बोल रहे है। 
इस अनोखी घटना से अचंभित होते हुए मैंने जिज्ञासा से उनसे पूछा, तुम बोल रहे हो?
ध्यान से देख, अपने कान लगा कर सुन, हम ही बोल रहे है। और अपना इतना बड़ा मुंह ज्यादा देर खुला ना रख, नहीं तो इसमें मक्खी के साथ – साथ न जाने और क्या – क्या घूस जाएगा? 
उनके इस तरह व्यंग करने पर मैंने आश्चर्य से खुला अपना मुंह तुरंत फटाफट बंद कर लिया, ताकि कहीं वास्तव में ही मुंह में कुछ घूस ही ना जाए। 
अब दूसरी तरफ से आवाज आई, हाँ अब ठीक है। अब पूछ, जरुरत के मुताबिक अपना मुंह खोल और बता तू क्या कहना चाहता है?
उनके बोलने से मुझे वैसे ही जोर का झटका लगा हुआ था, इस अनहोनी घटना को देख कर मेरे होश वैसे ही फाख्ता थे। मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हुए देख उसने मेरा प्रश्न खुद ही दोहराते हुए कहा, “यहां से भाग क्यों नहीं रहे हो”? फिर उसका उत्तर देते हुए उसमें से एक ने कहा, हम क्यों भागे? तुम खुद क्यों नहीं भाग जाते यहां से?
मैं क्यों भागूं? यह मेरा घर है। 
तो मेरा घर कहां है? 
मुझे क्या पता?
फिर किसको पता है? किस से जा के पूछूँ? कोई नाम पता बता सकते हो? बड़े कबूतर ने कहा।
मैंने कहा, मैं कैसे बता सकता हूँ? 
थोड़ा शांत हो कर ठंठे दिमाग से सोचो और बताओ आखिर मै कहां जाऊं, कहां रहूं?
यहां और भी तो बहुत से घर है, उनमें से किसी में भी जा कर रह सकते हो।
कोरोना और कबूतर
कोरोना और कबूतर 
यानि तुम्हारा घर तो केवल तुम्हारा घर, और किसी दूसरे का घर सबका घर! जो प्रश्न तुम मुझ से कर रहे हो क्या वही प्रश्न किसी दूसरे के भी नहीं होंगे? क्या मुझे “चल आगे देख” का जुमला ही सुनते रहना नहीं पड़ेगा? तुम लोग तो इस ग्रह के सर्व श्रेष्ठ, सबसे बुद्धिमान प्राणी हो अत: अपनी एक मीटिंग बुलाओ और आपस में सलाह मशविरा करके हमें थोड़ी सी जगह दे दो जहां हम शांति सुकून से रह सके, फिर आप खुद भी आराम से जिओ और हमें भी जीने दो।
आगे कबूतर ने थोड़ा विन्रम भाव से पूछा, हे प्राणी श्रेष्ठ, आज कल तुम पूरे दिन यही बैठे कुर्सी क्यों तोड़ते रहते हो? मेरा मतलब, बैठे रहते हो?
उसे विन्रम भाव से बात करते देख मैंने कहा, आपमें में भी यह आदमी का दोगला पन कब से आ गया? अभी तक तो बड़े तू तड़क से बातें कर रहे थे फिर अचानक आपकी जबान ने यह मिश्री सी कैसे घुलने लगी?
मिश्री विश्री छोड़ो, मैं तो इसलिए पूछ रहा था कि पहले तो तुम हप्ते में एक आध दिन या सिर्फ सुबह ही थोड़ी देर दिखाई देते थे पर अब पूरे दिन यही जमे रहते हो। 
पर, उससे आपको क्या?
अरे यार सीधी - साधी बात है, तुम नहीं होते थे तो हम अपने घर यानी इस बालकनी में आराम से जैसे चाहो वैसे रहते थे। पर अब तुम्हारे दिन भर के धरने के कारण हम परेशान है, यह हमारी निजी जिंदगी में तुम्हारी दखलंदाजी है। सोचो, अगर हर वक्त कोई तुम्हारे सिर पर डंडा लेकर सवार रहे तो तुम खुश होंगे क्या? अब हमें तुम्हारे अघोषित कायदे कानून के हिसाब से अपनी जिंदगी जीनी पड़ रही है। अभी थोड़ी देर पहले ही हम उन पौधों की तरफ क्या चले गए तुम तो पागलों की तरह हमारे पीछे दौड़ पड़े। “खाली दिमाग शैतान का घर” वाली कहावत तो तुमने सुना ही होगी?
सुना और सुना, सब वक्त की बात है, मैंने उनसे कहा।
देखो मैं तो अच्छी व सच्ची खरी बात कर रहा था पर वह भी तुम्हें काटें की तरह चुभ रही है। इसका मतलब मैं गलत नहीं हूँ, कहीं न कहीं कुछ न कुछ तो गड़बड़ है।
यार कुछ देर तो अपने घर शांति से बैठने दो।
चलो तुम तो मानने वाले नहीं है कि यहां दूनिया जहान में हमारा भी कही कोई थोड़ा बहुत हक़ है, हमें भी कही किसी जगह को अपना कहने का अधिकार है। फिर भी यह तो बता परेशान क्यों है? घर में ऐसे दूबगें बैठे हो जैसे दरवाजे पर कोई तुम्हें मारने के लिए बंदूक लिए बैठा हो?
बंदूक वाला होता तो उससे बचने का कोई न कोई रास्ता मिल जाता किन्तु यहां तो उससे भी खतरनाक बैठा है।
हे सारे जहान के मालिक, सारी दूनिया को अपनी उंगली पर नचाने वाले, धरती, नभ, पाताल को अपने पग से नापने वाले, तुम यह क्या कह रहे हो? तुम्हारे पास न जाने कितने प्रकार के अत्यंत शक्तिशाली दिव्य अस्त्र शस्त्र है जिनसे तुम मिनटों में सारी पृथ्वी को नष्ट करने का दावा करते हो फिर तुम किसके भय से इस तरह दुम दबाएँ बैठे हो?
कबूतर महाशय, मैं घर में दुम दबाएँ बैठा हूँ बस इसी बात से उसकी ताकत का अंदाजा लगा लो। मैं क्या – क्या कर सकता हूँ, कितना ताकतवर हूँ, इस समय वे सब उस पर वार करने के लिए छोटे पड़ रहे है जो उसे रोकने में बिल्कुल भी कारगर साबित नहीं हो रहे है।
पर तुम्हारे पास एक और भी तो जबरदस्त अचूक ताकत है।
वो क्या? मैंने थोड़ा प्रफुलित आशा भरी नज़र से उसकी ओर देखा।
धर्म, मजहब, रिलिजन जिनमें बड़े – बड़े दावे किये जाते है। 
किस की बात करते हो? आज उसने उन सब पर मोटे – मोटे ताले लटकवा दिए। हर रोज़ चौबीसों घंटे जहां पैर रखने को जगह नहीं मिलती थी वे सब घोर शांति की चादर ओढ़े आराम फरमा रहे है।    
पर तुम्हारे पास कितने ही तथाकथित चमत्कारी दिव्य पुरुष भी तो है जो अपनी ओजस्वी वाणी से सारी दूनिया जहान के कल्याण की बात अपना सीना ठोक – ठोक कर करते रहते है। 
इस संकट की घड़ी में मेरा मस्तिष्क वैसे ही सुन्न पड़ा जा रहा है ऊपर से आप व्यंग बाण चला रहे हो।
नाराज क्यों होते हो दूनिया जहान के मालिक, मैं तो तुम्हें तुम्हारी ताकत याद दिलवा रहा हूँ जिन्हें तुम सदियों क्या, हजारों वर्षों से अपनी ताकत मानते, समझते आए हो। 
आप मुझे मेरी परम्पराएं, रीति रिवाज, पूजा पद्धति याद दिला रहा हो?
हाँ, तुम्हारे ही तो ये सब घड़े हुए है। यहां कितने ही बड़े – बड़े अचूक असरदार तंत्र – मंत्र, झाड़ – फूंक, ताबीज, टोटके और न जाने क्या – क्या है? मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, मेरी मान्यताएं ही सही है, सारी दूनिया जहान को मेरे अनुसार ही चलना चाहिए। कितना खून बहाया गया इन सब के पीछे, कितने लोगों की जिंदगी नरक बना दी गई यह सब तुम्हारे ही इतिहास का हिस्सा है।
क्या कहना चाहते हो मेरे भाई? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।
समझ नहीं आ रहा या समझना नहीं चाहते, दिन में आंखे बंद करने से रात नहीं हो जाती।
आप तो उपदेश देने लगे।
मेरी बात उपदेश और जो आप पढ़ते, सुनते गाते, गुनगुनाते आए हो उसके बारे में कभी सोचा है वह सब कितना व्यावहारिक है? कितना ज्ञान के लिए तो कितना इस दूनिया और कितना दूसरे जहान के लिए। यहां आदमी को ढंग से जीने नहीं दोगे। जब वह प्रश्न करेगा तो उसे अगली दूनिया के सपने दिखाओगे। 
अब बस करो मेरे मालिक। 
वास्तव में संकट में हो तभी तो मुझे भी मालिक बना लिया नहीं तो तुम मेरे जैसे को कहां घास डालने वाले थे। मैं तुम्हें तुम कह रहा हूँ और तुम मुझे आप कह कर सम्बोधित कर रहे हो तभी मुझे तुम्हारी पतली हालत और गंभीर हालात का अंदाजा हो गया था। अन्यथा तुम ठहरे उंची नाक वाले, तुम कहां अपनी नाक नीची होने देने वाले थे। वैसे, पहली बार तुम्हें सुना के मजा आ गया, दिल बाग – बाग हो गया। 
ठीक है, सब वक्त – वक्त की बात है, फंसा हूँ तो बोल ले।
अरे तुम तो नाराज हो गए. हमारी बातों में असली मुद्दा तो रह ही गया, तुम परेशान क्यों हो?
कोरोना की वजय से।
यह क्या है? इसका नाम तो पहली बार सुन रहा हूँ।
यह एक खतरनाक वायरस है जिसने सारी दूनिया में तबाही मचाई हुई है, उसके आगे सब त्राहिमाम – त्राहिमाम कर रहे है। सब अपने घरो में दुबक कर बैठे है।  
पर, क्या तुम इसका अभी तक कोई इलाज नहीं खोज पाए?
नहीं, जिस दिन मेरे चेहरे पर थोड़ी रौनक दिखाई दे उस दिन समझ लेना कुछ आशा की किरण दिखाई दे रही है।

ठीक है महाशय, तुम्हारे साथ मेरी पूरी – पूरी सहानुभूति है। तुम्हें मेरी शुभकामनाएं, तुम शीघ्र से शीघ्र इस संकट से बाहर निकलो। यह कहते हुए दोनों कबूतर खुले आसमान की सैर को निकल गए। आदमी तो आखिर आदमी ही होता है, उसे किसी दूसरे की आज़ादी पसंद कहां, उन्हें खुले आसमान में उड़ते देख मैं ठंडी आहे भर कर रह गया। 


- जय तोमर
गाज़ियाबाद, यूपी


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