संत साहित्य की भूमिका

SHARE:

संत साहित्य की भूमिका भारतीय समाज ने विश्व को गौतम बुद्ध , सम्राट अशोक, महात्मा गॉंधी , डॉ. अब्दुल कलाम जैसे आदर्श पुरूषों की देन दी है, आधुनिक भारतीय युवक उस पथ पर ही मार्गस्थ हों तो भारत एक बार फिर अपनी वैभवशाली परंपरा से जगमगा उठेगा।

संत साहित्य की भूमिका


ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी  , ३ मई, २०२० । विषय:  'संत साहित्य की भूमिका')समर्थ रामदास स्वामी के 'मनाचे श्लोक' का वर्तमान परिवेश के परिप्रेक्ष्य में अवलोकन - समर्थ रामदास स्वामी का जन्म २४ मार्च, १६०८ ई. में महाराष्ट्र के जालना जिले के जांब प्रांत में हुआ। समस्त महाराष्ट्र के लिए वे समर्थ रामदास स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए किन्तु उनका मूल नाम नारायण सूर्याजी ठोसर हैं। समर्थ रामदास स्वामी श्री राम के भक्त एवं हनुमान के उपासक थे, कारणवश उन्होंने रामदास नाम स्वीकार किया। महाराष्ट्र की जनता को सचेत करने हेतु उन्होंने धर्म के माध्यम से राजनीति को जागृत किया। छत्रपति शिवाजी महाराज उन्हें अपना गुरू मानते थे। अपने साहित्य के माध्यम से रामदास स्वामी ने महाराष्ट्र में नव-चेतना निर्माण का अद्भुत कार्य किया। मानसिक बल के साथ साथ रामदास स्वामी शारिरीक बलोपासना के महत्त्व को भी उद्घाटित करते हैं। अपने श्लोकों के द्वारा उन्होंने समाज प्रबोधन किया, प्रजा के मन में स्वधर्म रक्षा के भावों को जागृत करने का प्रयास किया। उनके ग्रंथ 'दासबोध' में लोकोद्धार का किया गया प्रयत्न निम्नलिखित पदों द्वारा उद्धृत होता है,

" उत्तम गुण तितुके घ्यावे । घेऊन जनास शिकवावे।
उदंड समुदाय करावे । परी गुप्तरूपें ।।१८।।
अखंड कामाची लगबग। उपासनेस लावावें जग।
लोक समजोन मग । आज्ञा इच्छिती।।१९।।"

     
समर्थ रामदास स्वामी छत्रपति शिवाजी महाराज को राजनीति एवं धार्मिक उपदेश देते थे। इसप्रकार रामदास
संत साहित्य की भूमिका
संत साहित्य की भूमिका
स्वामी परमार्थ, स्वधर्म निष्ठा , राष्ट्रप्रेम के श्रेष्ठ  प्रतीक है। दासबोध, मनाचे श्लोक, करूणाष्टके, आनंदवनभुवनी, मारूती स्त्रोत्र समर्थ रामदास स्वामी के साहित्य माला के कुछ मोती हैं।वर्तमान स्थिति का अवलोकन करें तो चारों दिशा में संत्रास, भय, निराशा, कुंठा, अकेलेपन का भाव फैला हुआ है। परिणामस्वरूप आधुनिक मनुष्य को अपना जीवन निरर्थक प्रतीत होता है। आज के मनुष्य को कई सामाजिक, सांस्कृतिक , राजनीतिक समस्याओं से उलझना पड़ता है, तब कई बार उसके मन में विद्रोह की भावना उत्पन्न होती है।
    
प्रगति, परिवर्तन और आधुनिकता के नाम पर मानव ने प्रकृति के साथ बड़ा खिलवाड़ किया, पर्यावरण के महत्त्वपूर्ण अंगों को अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए नष्ट किया। परिणामस्वरूप आये दिन प्राकृतिक कोप को मानव सह रहा है। मानव की महत्त्वाकांक्षाओं की भागदौड़ को आज वैश्विक महामारी के कारण थोड़ी -बहुत रोक लगी। व्यक्ति आज फिर एक बार मानवीय संबंधों की कोमलता, अपनी परंपरा, अपने नैतिक मूल्यों का अनुसरण करने लगा । अपने मन को 'क्वारंटाईन' कर उसकी शुद्धि का अवसर मनुष्य को प्राप्त हुआ। वास्तविक समर्थ रामदास स्वामी ने सैकड़ों वर्ष पूर्व मानव के चंचल मन को उपदेश किया है, आज की पृष्ठभूमि पर वह मन की शुद्धि ही कहलाएगी। आधुनिक मनुष्य से नैतिक मूल्यों का विघटन हुआ है तब 'मनाचे श्लोक' का चौथा श्लोक हमें विचार करने के लिए प्रेरक प्रतीत होता है -

"मना वासना दुष्ट कामा न ये रे।
मना सर्वथा पापबुद्धी नको रे।।
मना धर्मता नीति सोडूं नको हो।
मना अंतरीं सार वीचार राहो।। ४ ।।

समर्थ रामदास स्वामी मानव को वासना के परे रहने का बोध देते हैं। किसी व्यक्ति, समाज अथवा देश-काल के संदर्भ में बुरा चिंतन करना कदापि योग्य नहीं। इससे नकारात्मक विचार उत्पन्न हो कर उसी मनुष्य की नैतिक अधोगति होती है। वर्तमान परिवेश में मानवीय संबंधों में बढ़ता वैमनस्य , दूराचार, भ्रष्टाचार मानव की मनुष्यत्व  का पतन कर फिर उसे पशुत्व की ओर फेंक रहा है। वास्तविक विज्ञान , तंत्रज्ञान का सही उपयोग प्रकृति के संवर्धन में ही है, न कि प्राकृतिक संहार में। मनुष्य को जहाँ श्रीमान, सज्जन, सद् गृहस्थ, महाशय, महोदय कहकर संबोधित किया जाता है , तब उसका उत्तरदायित्व है कि वह उस भॉंति व्यवहार करे।भारतीय इतिहास में संत साहित्य की उज्ज्वल परंपरा है। महाराष्ट्र की पहचान ही संतों की भूमि ऐसी है। संत जानते थे कि भारत की एकात्मकता बनाये रखने का भक्तिभाव एक मात्र मार्ग हैं। 
      
आज विश्व में फैली महामारी के दाह की चपेट में  विकसित , विकसनशील, अविकसित देश जल रहें है। पृथ्वी का सबसे उन्नत प्राणी एक बिंदूमात्र वाइरस को नष्ट करने में असफल हो रहा है। तब यहॉं किसी धर्म, समाज, देश से बढ़कर मानव संस्कृति का संवर्धन करने की आवश्यकता विश्व के सम्मुख खड़ी है। भौतिक सुखों के पीछे अविरत भागने वाला मानव आज परिस्थितिवश घर की चार दीवारों में क़ैद हुआ, उसकी समस्त उच्छृंकुलता को लगाम लगा। ऐसे संत्रस्त हुए मनुष्य को समर्थ रामदास प्रश्न उपस्थित करते हैं- 

"जनीं सर्व सूखी असा कोण आहे।
विचारें मना तूंचि शोधूनि पाहें।।
मना त्वांचि रे पूर्वसंचीत केलें।
तयासारिखें भोगणें प्राप्त झालें ।।११।।
    
आधुनिक काल में मानव ने उत्क्रांति की, अशक्यप्राय संशोधन किया, यंत्र-तंत्र का सृजन किया और धीरे-धीरे स्वयं यंत्रवत बना। आधुनिकीकरण की परिभाषा मनुष्य के लिए केवल औद्योगिकीकरण बनकर रह गयी। औद्योगिकीकरण से जहाँ भौतिक सभ्यता का जन्म हुआ , वहीं अनेक जटिल समस्या मुँह फैलाकर खड़ी भी हुई। समकालीन मनुष्य भावहीन बनता गया और उसका अस्तित्व अर्थ -केंद्री हुआ। इस मानसिकता से वर्तमान व्यक्ति के भीतर विक्षोभ, ईर्ष्या और विषाद पनपता गया । इतिहास में अस्त्र-शस्त्र के युद्ध हुए, बीसवीं शताब्दी में मानव ने आण्विक युद्ध का संहार देखा, आज एक प्रकार से जैविक युद्ध हमें पराजित करने के लिए नर संहार कर रहा है। आज की इस स्थिति में विवश हुए मानव को 'मनाचे श्लोक' का बीसवाँ श्लोक दिशा प्रदान करता है - 
"बहू हिंपुटी (दुःखी ) होइजे मायपोटीं ।
नको रे मना यातना तेचि मोठी ।।
निरोधें ( छटपटाहट ) पचे कोंडिलें गर्भवासीं ।
अधोमूख रे दुःख त्या बाळकासी।।२०।।"
     
समकालीन मनुष्य समाज से विद्रोह करता रहा है। व्यक्ति विरूद्ध समष्टि की लड़ाई तो युगों युगों से चल रही है। विकसित तंत्रज्ञान के कारण मानवीय जीवन पद्धति मे पिछले युगों की तुलना अमुलाग्र परिवर्तन हुआ है। औद्योगिकीकरण , नगरीकरण का संबंध मनुष्य की बौद्धिकता से है। जहाँ मानव व्यक्तिगत विकास करता है, वहॉं उसके साथ समाज के उन्नत भविष्य की भी कामना करता है। इस प्रक्रिया में उसकी अन्य सामाजिक समूह के साथ प्रतियोगिता आरंभ होती है। केवल अपने आप को श्रेष्ठ दर्शाने के लिए विश्व में दो महायुद्ध हुए, जिसकी विभिषिका  आज भी संसार भुगत रहा है।  समाज में पाप-पुण्य, अच्छे -बुरे की कसौटी तय करने के लिए अनेक धर्म ग्रंथों का सृजन हुआ, पर आधुनिक काल में मानव पा रहा है कि जिस प्रामाणिकता को वह प्रमाणित मान रहा था , वह तो आज के युग में कालबाह्य साबित हुए। समाज उसे हमेशा ही what to do और what not to  do की शिक्षा देता रहा, पर इसमें उसका व्यक्तिगत अस्तित्व मानों नष्ट हुआ। मनुष्य वास्तविक समाज प्रिय प्राणी है, किन्तु आधुनिक मनुष्य अपनी त्रासदी के कारण एकांत प्रिय बनता जा रहा है। समर्थ रामदास स्वामी के इस संदर्भ के विचार प्रेरणादायी है,
"जनीं सांगतां ऐकतां जन्म गेला ।
परी वादवेवाद तैसाचि ठेला ।।
उठे संशयो वाद हा दंभधारी ।
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ।।११२।।
   
समर्थ रामदास स्वामी अपने श्लोकों द्वारा विविध युगीन सापेक्षाओं पर मानों प्रश्न छेड़ रहें है। समकालीन स्थिति में मानवीय संबंधों का खंडन हो रहा है। इस परिस्थिति मे मूल्यहीन समाज एक रिक्तता की अनुभूति कर रहा है। मनुष्य का यह संक्रमण उसे भयाक्रांत बना रहा है, वह अपने आप्त जनों पर ही संदेह करने के लिए विवश कर रहा है। व्यक्ति की इस घुटन का कारण उसकी उक्ति और कृति में भेद है। अपने एक सौ पंद्रहवें श्लोक में रामदास स्वामी लिखते हैं,
"तूटे वाद संवाद तेथें करावा ।
विवेकें अहंभाव हा पालटावा ।।
जनीं बोलण्यासारिखे आचरावें ।
क्रियापालटें भक्तिपंथेचि जावें ।।११५।।"
     
समाज की निरंतर गतिमान प्रक्रिया मे आज का व्यक्ति टूटन, घुटन, विघटन, शोषण का शिकार हुआ है। मनुष्य को हमेशा ही अपनी बुद्धि एवं शक्ति का अभिमान रहा है। यहीं कारण है कि वह कुंठित एवं संत्रस्त जीवन जीने के लिए अभिशप्त रहा है। आज मनुष्य को यथार्थ का बोध करते हुए 'मनाचे श्लोक' में रामदास स्वामी एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं,
"अविद्यागुणें मानवा ऊमजेना ।
भ्रमें चूकले हीत तें आकळेना ।।
परीक्षेविणें बांधिलें दृढ नाणें ।
परी सत्य मिथ्या असें कोण जाणे ।।१४३।।"
   
महानगरीय जीवन की चकाचौंध में व्यक्ति मानवीय प्रेम की ऊष्मा को ढुँढ रहा हैं, किन्तु चारों ओर वह केवल स्वार्थ और दंभ का अनुभव करता है। रामदास स्वामी मनुष्य की इस पाखण्डी वृत्ति के विरूद्ध अध्यात्म के माध्यम से मुक्ति का मार्ग दिखलाने की सफल चेष्टा करते हैं।
" मनाचीं शतें ऐकतां दोष जाती ।
मतीमंद ते साधनायोग्य होती ।।
चढे ज्ञान वैराग्य सामर्थ्य अंगीं ।
म्हणे दास विश्वासतां मुक्ति भोगी।।२०५।।"
  
अपने कुल २०५ श्लोकों के द्वारा समर्थ रामदास स्वामी परंपरागत मान्यताओं के स्थान पर नये आदर्शों की स्थापना करते है। आधुनिक व्यक्ति जिस जीवन को निरर्थकता मान बैठा है, उस जीवन की सार्थकता 'मनाचे श्लोक' का अध्ययन कर प्राप्त होती है। परंपरागत मूल्यों के प्रति वितृष्णा का भाव न रखकर अगर आज मानव नये मूल्यों की भी स्वीकार करेगा तो उसका जीवन अधिक सफल एवं सहज होगा। समाज में फैली अराजकता को देख जहाँ मन उद्विग्न होता है, वहॉं रामदास स्वामी के श्लोक मन को शांति प्रदान करते हैं। भारतीय समाज ने विश्व को गौतम बुद्ध , सम्राट अशोक, महात्मा गॉंधी , डॉ. अब्दुल कलाम जैसे आदर्श पुरूषों की देन दी है, आधुनिक भारतीय युवक उस पथ पर ही मार्गस्थ हों तो भारत एक बार फिर अपनी वैभवशाली परंपरा से जगमगा उठेगा। समर्थ रामदास स्वामी का श्लोक इसका ही प्रतिक है,
"देह त्यागितां कीर्ति मागें उरावी ।
मना सज्जना हेचि क्रीया धरावी ।।
मना चंदनाचेपरी त्वां झिजावें ।
परी अंतरीं सज्जना नीववावें ।।८।।"


संदर्भ : श्री मनाचे श्लोक
प्रकाशक : सुमंगल प्रेस प्रा. लि.

- शोधछात्रा : सौ. गौतमी अनुप पाटील,
हिंदी विभाग,गुरू नानक खालसा महाविद्यालय , माटुंगा , मुंबई।
शोध निर्देशक : डॉ. मृगेन्द्र राय
ई मेल: save.gautami@gmail.com
भ्रमणध्वनि : 9920898979

COMMENTS

LEAVE A REPLY

Advertisements

आपको ये भी रोचक लगेगा

नाम

अंग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश,3,अकबर इलाहाबादी,11,अकबर बीरबल के किस्से,62,अज्ञेय,27,अटल बिहारी वाजपेयी,1,अदम गोंडवी,3,अनंतमूर्ति,3,अनौपचारिक पत्र,16,अन्तोन चेख़व,2,अमीर खुसरो,6,अमृत राय,1,अमृतलाल नागर,1,अमृता प्रीतम,5,अयोध्यासिंह उपाध्याय "हरिऔध",4,अली सरदार जाफ़री,3,अष्टछाप,3,असगर वज़ाहत,11,आनंदमठ,4,आरती,11,आर्थिक लेख,5,आषाढ़ का एक दिन,12,इक़बाल,2,इब्ने इंशा,27,इस्मत चुगताई,3,उपेन्द्रनाथ अश्क,1,उर्दू साहित्‍य,177,उर्दू हिंदी शब्दकोश,1,उषा प्रियंवदा,1,एकांकी संचय,7,औपचारिक पत्र,31,कबीर के दोहे,19,कबीर के पद,1,कबीरदास,10,कमलेश्वर,5,कविता,789,कहानी सुनो,2,काका हाथरसी,4,कामायनी,5,काव्य मंजरी,11,काव्यशास्त्र,4,काशीनाथ सिंह,1,कुंज वीथि,12,कुँवर नारायण,1,कुबेरनाथ राय,1,कुर्रतुल-ऐन-हैदर,1,कृष्णा सोबती,2,केदारनाथ अग्रवाल,1,केशवदास,1,कैफ़ी आज़मी,4,क्षेत्रपाल शर्मा,35,खलील जिब्रान,3,ग़ज़ल,85,गजानन माधव "मुक्तिबोध",10,गीतांजलि,1,गोदान,6,गोपाल सिंह नेपाली,1,गोपालदास नीरज,8,गोरख पाण्डेय,3,गोरा,2,घनानंद,1,चन्द्रधर शर्मा गुलेरी,2,चाणक्य नीति,5,चित्र शृंखला,1,चुटकुले जोक्स,15,छायावाद,6,जगदीश्वर चतुर्वेदी,9,जयशंकर प्रसाद,22,जातक कथाएँ,10,जीवन परिचय,26,ज़ेन कहानियाँ,2,जैनेन्द्र कुमार,2,जोश मलीहाबादी,2,ज़ौक़,4,तुलसीदास,5,तेलानीराम के किस्से,7,त्रिलोचन,1,दाग़ देहलवी,5,दादी माँ की कहानियाँ,1,दुष्यंत कुमार,7,देव,1,देवी नागरानी,23,धर्मवीर भारती,2,नज़ीर अकबराबादी,3,नव कहानी,2,नवगीत,1,नागार्जुन,16,नाटक,1,निराला,27,निर्मल वर्मा,1,निर्मला,26,नेत्रा देशपाण्डेय,3,पंचतंत्र की कहानियां,42,पत्र लेखन,144,परशुराम की प्रतीक्षा,3,पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र',3,पाण्डेय बेचन शर्मा,1,पुस्तक समीक्षा,71,प्रेमचंद,23,प्रेमचंद की कहानियाँ,89,प्रेरक कहानी,15,फणीश्वर नाथ रेणु,1,फ़िराक़ गोरखपुरी,9,फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,24,बच्चों की कहानियां,84,बदीउज़्ज़माँ,1,बहादुर शाह ज़फ़र,6,बाल कहानियाँ,14,बाल दिवस,3,बालकृष्ण शर्मा 'नवीन',1,बिहारी,1,बैताल पचीसी,2,भक्ति साहित्य,119,भगवतीचरण वर्मा,5,भवानीप्रसाद मिश्र,3,भारतीय कहानियाँ,60,भारतीय व्यंग्य चित्रकार,7,भारतीय शिक्षा का इतिहास,3,भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,7,भीष्म साहनी,5,भैरव प्रसाद गुप्त,2,मंगल ज्ञानानुभाव,22,मजरूह सुल्तानपुरी,1,मधुशाला,7,मनोज सिंह,16,मन्नू भंडारी,3,मलिक मुहम्मद जायसी,2,महादेवी वर्मा,12,महावीरप्रसाद द्विवेदी,1,महीप सिंह,1,महेंद्र भटनागर,73,माखनलाल चतुर्वेदी,3,मिर्ज़ा गालिब,39,मीर तक़ी 'मीर',20,मीरा बाई के पद,22,मुल्ला नसरुद्दीन,6,मुहावरे,4,मैथिलीशरण गुप्त,8,मैला आँचल,3,मोहन राकेश,9,यशपाल,9,रंगराज अयंगर,42,रघुवीर सहाय,5,रणजीत कुमार,29,रवीन्द्रनाथ ठाकुर,21,रसखान,11,रांगेय राघव,2,राजकमल चौधरी,1,राजनीतिक लेख,13,राजभाषा हिंदी,47,राजिन्दर सिंह बेदी,1,राजीव कुमार थेपड़ा,4,रामचंद्र शुक्ल,1,रामधारी सिंह दिनकर,18,रामप्रसाद 'बिस्मिल',1,रामविलास शर्मा,8,राही मासूम रजा,8,राहुल सांकृत्यायन,1,रीतिकाल,3,रैदास,2,लघु कथा,77,लोकगीत,1,वरदान,11,विचार मंथन,60,विज्ञान,1,विदेशी कहानियाँ,24,विद्यापति,4,विविध जानकारी,1,विष्णु प्रभाकर,1,वृंदावनलाल वर्मा,1,वैज्ञानिक लेख,5,शमशेर बहादुर सिंह,5,शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय,1,शरद जोशी,3,शिवमंगल सिंह सुमन,5,शुभकामना,1,शेख चिल्ली की कहानी,1,शैक्षणिक लेख,17,शैलेश मटियानी,2,श्यामसुन्दर दास,1,श्रीकांत वर्मा,1,श्रीलाल शुक्ल,1,संयुक्त राष्ट्र संघ,1,संस्मरण,10,सआदत हसन मंटो,9,सतरंगी बातें,33,सन्देश,23,समीक्षा,1,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना,16,सारा आकाश,13,साहित्य सागर,21,साहित्यिक लेख,17,साहिर लुधियानवी,5,सिंह और सियार,1,सुदर्शन,1,सुदामा पाण्डेय "धूमिल",6,सुभद्राकुमारी चौहान,6,सुमित्रानंदन पन्त,17,सूरदास,5,सूरदास के पद,21,स्त्री विमर्श,10,हजारी प्रसाद द्विवेदी,1,हरिवंशराय बच्चन,26,हरिशंकर परसाई,21,हिंदी कथाकार,12,हिंदी निबंध,188,हिंदी लेख,380,हिंदी समाचार,84,हिंदीकुंज सहयोग,1,हिन्दी,7,हिन्दी टूल,4,हिन्दी आलोचक,7,हिन्दी कहानी,32,हिन्दी गद्यकार,4,हिन्दी दिवस,50,हिन्दी वर्णमाला,3,हिन्दी व्याकरण,43,हिन्दी संख्याएँ,1,हिन्दी साहित्य,9,हिन्दी साहित्य का इतिहास,22,हिन्दीकुंज विडियो,11,aaroh bhag 2,13,astrology,1,Attaullah Khan,1,baccho ke liye hindi kavita,58,Beauty Tips Hindi,3,Class 10 Hindi Kritika कृतिका Bhag 2,5,English Grammar in Hindi,3,Godan by Premchand,6,hindi ebooks,5,Hindi Ekanki,9,hindi essay,180,hindi grammar,50,Hindi Sahitya Ka Itihas,59,hindi stories,486,ICSE Hindi Gadya Sankalan,11,Kshitij Bhag 2,10,mb,72,motivational books,10,naya raasta icse,8,ncert class 6 hindi vasant bhag 1,11,NCERT Rimjhim Class 4,14,ncert rimjhim class 5,18,NCERT Vasant Bhag 3 For Class 8,12,Notifications,5,question paper,10,quizzes,8,Shayari In Hindi,13,sponsored news,2,Syllabus,7,UP Board Class 10 Hindi,3,Vasant Bhag - 2 Textbook In Hindi For Class - 7,11,VITAN BHAG-2,5,vocabulary,19,
ltr
item
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika: संत साहित्य की भूमिका
संत साहित्य की भूमिका
संत साहित्य की भूमिका भारतीय समाज ने विश्व को गौतम बुद्ध , सम्राट अशोक, महात्मा गॉंधी , डॉ. अब्दुल कलाम जैसे आदर्श पुरूषों की देन दी है, आधुनिक भारतीय युवक उस पथ पर ही मार्गस्थ हों तो भारत एक बार फिर अपनी वैभवशाली परंपरा से जगमगा उठेगा।
https://1.bp.blogspot.com/-c_KwpeNQK-w/XvQxKXNNw_I/AAAAAAAANq0/2hVsZkWwyfg6IaoH9tiRrKVYVwqexgXAQCNcBGAsYHQ/s1600/sant-sahitya-ki-bhumika.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-c_KwpeNQK-w/XvQxKXNNw_I/AAAAAAAANq0/2hVsZkWwyfg6IaoH9tiRrKVYVwqexgXAQCNcBGAsYHQ/s72-c/sant-sahitya-ki-bhumika.jpg
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika
https://www.hindikunj.com/2020/06/sant-sahitya-ki-bhumika.html
https://www.hindikunj.com/
https://www.hindikunj.com/
https://www.hindikunj.com/2020/06/sant-sahitya-ki-bhumika.html
true
6755820785026826471
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All आपको ये भी रोचक लगेगा Categories ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content