हैप्पी बर्थडे टू यू

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हैप्पी बर्थडे टू यू टेक्नोलॉजी का जमाना न होता और सोशल प्लेटफार्म की सुविधा न होती, तो निश्चित ही हम दूर रहकर भी नजदीकियों का एहसास न कर पाते | आज मेरी सबसे अच्छी दोस्त "भावना राजवाड़े" का जन्मदिन है | जो मेरी छोटी सी दुनिया का एक अटूट, मासूम और ख़ूबसूरत हिस्सा है | इनसे मिलना तो 2013 से अबतक नहीं हो पाया है, पर भावना आज भी मेरी यादों में मजबूती से शामिल है | दरअसल, हमारी मुलाक़ात बी.एड. कॉलेज में हुई थी |

हैप्पी बर्थडे टू यू



टेक्नोलॉजी का जमाना न होता और सोशल प्लेटफार्म की सुविधा न होती, तो निश्चित ही हम दूर रहकर भी नजदीकियों का एहसास न कर पाते | 

आज मेरी सबसे अच्छी दोस्त "भावना राजवाड़े" का जन्मदिन है | जो मेरी छोटी सी दुनिया का एक अटूट, मासूम और ख़ूबसूरत हिस्सा है | इनसे मिलना तो 2013 से अबतक नहीं हो पाया है, पर भावना आज भी मेरी यादों में मजबूती से शामिल है | दरअसल, हमारी मुलाक़ात बी.एड. कॉलेज में हुई थी | जहाँ हम सौ विद्यार्थी अध्ययनरत् थे | 'फादर जेरोम मिंज' हमारे प्रिंसिपल हुए करते थे और संस्था के काबिल डायरेक्टर के रूप में 'फादर कल्यानुस मिंज' का योगदान अभुलनीय है | खासकर उनका पढ़ाने और बोलने का अंदाज़ हरदिल अज़ीज़ था | बिल्कुल किसी जादू के खेल की तरह उनका लेक्चर हुआ करता था | मनोरंजन से भरपूर और पत्थर की लकीर की तरह हमेशा के लिए दिलो-दिमाग़ में छप जाने वाली शिक्षाप्रद बातें हुआ करती थीं |

"सेंट जेवियर्स" हम सौ विद्यार्थियों के लिए महज एक शिक्षण संस्थान नहीं था | बल्कि शिक्षा के अतिरिक्त हमारे लिए बेहतर संस्कार, अनुशासन और प्रेरणा का अद्वितीय स्रोत भी था | फलस्वरूप, हम सौ लोग सिर्फ एक-दूसरे का नाम ही नहीं जानते थे, बल्कि एक-दूसरे के दुख-सुख में भी बढ़-चढ़कर सहभागिता निभाते थे | सच कहुँ, अगर कोई ये अजूबा करने को तैयार हो जाए और मुझसे कहे --- "  गुजरे हुए वक़्त में, तुम अपने कौन से पसंदीदा वक़्त को दुबारा जीना चाहते हो ? मुझे बताओ, मैं उसे वापस ला दूँगा |" तो मैं उत्साहित होकर यही कहूंगा --- " मुझे फिर से अपने बी.एड. कॉलेज का लाइफ जीना है...|"

मुझे अच्छे से याद है, 'फादर प्रबोध' हम सौ विद्यार्थियों का प्रेसिडेंट हुआ करते थे | उन दिनों कॉलेज में एक फंक्शन के लिए मुझे नाटक लिखने और उसे प्ले करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी | मैं कॉलेज के ऑडिटोरियम में अपने नाटक के लिए ऑडिशन ले रहा था | तभी एक लड़की मेरे सामने आयी और बोली --- " मनव्वर सर, मैं भी इस नाटक में काम करना चाहती हूँ |" वो लड़की कोई और नहीं, बल्कि भावना थी | साँवला से तनिक गोरा रंग-रूप और मध्यम कद-काठी की मालकिन थी वो | उसके पूरे चेहरे पर सिहलियों के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे | शायद, इसी वजह से उसके स्वभाव में झिझकपन था, कि क्या पता उसे नाटक में शामिल किया जाएगा कि नहीं | उसकी नजरें झुकी थीं | तभी मुझे कॉलेज की प्रोफेसर 'मिस प्रिमा' की बातें याद आ गई | वो हमेशा कहा करती थीं --- " जब भी किसी से बातें करो, तो आई कॉन्टेक्ट बनाकर बात करो | ये उत्तम व्यक्तित्व का पहचान है...|" फिर क्या था, मैंने फ़ौरन भावना को संबोधित करते हुए कहा था --- " झुकी नज़रें किसी अपराध से कम नहीं, क्या आपसे कुछ गलती हुई है...?"

" नहीं तो....!" --- भावना मेरी आँखों में आँखें डालकर बोली थी | वाकई, तब उसकी बड़ी-बड़ी आँखें देखने लायक थीं |

इतने में कविता दीदी भी नीलम को लेकर पहुँच गई और कहने लगी --- " मनव्वर, तुम्हें नाटक के लिए दो छात्र का कैरेक्टर चाहिए था न, एक मिल गई है...|"

" और दूसरी मुझे मिल गई है..." --- मैंने नाटकीय अंदाज़ में भावना की ओर संकेत करते हुए कविता दीदी से बोला था | तत्पश्चात्, हम सभी एक पल के लिए शांत हो गए थे | मानो वक़्त ज़रा चेतनाशून्य हो गया हो | लेकिन
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दूसरे ही पल एकाएक ठहाके लगाकर हंसने लगे | वहाँ का तात्कालीन वातावरण खुशनुमा हो गया था | भावना भी नाटक में शामिल होकर बेहद ख़ुश थी | बाद में हम दोनों अच्छे और सच्चे दोस्त बन गए थे | एक-दूजे की ज़िंदगी को भली-भाँति समझते थे | मैं उसे 'राजवाड़े' कहकर  संबोधित किया करता था और वो मुझे 'हैंडसम' कहती थी | वह अपने चेहरे पर सिहलियों के निशान से परेशान और चिंतित रहती थी | उसके घर पर कई लड़के वाले उसे देखने आते थे | परन्तु, हर बार नतीजा यही होता था कि वे आते, भावना को देखते, खाते-पीते और यह आश्वासन देकर चले जाते कि घर जाकर जवाब देंगे | पर अफ़सोस ! जवाब का इंतज़ार, रात को देखे गए ख़्वाब की तरह होते थे, जिनका हकीकत से कोई नाता नहीं होता था | वह उदास व हताश हो जाती थी | कभी-कभी एकान्त में बैठकर दिल के दर्द आँसूओं के ज़रिए निकाला करती थी | लंच के समय में, मैं उसे समझाता --- " भावना, तुम्हारे चेहरे पर सिहलियों के निशान है, तो इसमें तेरा क्या कसूर ? देखना, तुम्हारे जीवन में भी एकदिन तेरे सपनों का राजकुमार जरूर आएगा | वो तुम्हारे हर पीड़ा को समझेगा | तुम्हें बहुत ख़ुश रखेगा | बस तू सब्र रख और विपरीत परिस्थितियों का दृढ़ता से सामना कर...|"

वो अपने आँसूओं को पोंछते हुए बोली थी --- " हैंडसम, आप झूठी तसल्ली मत दो | ये सब सिर्फ कहने वाली बातें हैं | मेरी ज़िंदगी में ऐसा कुछ नहीं होगा...|"

मैं फिर से अपनी बातों पर बल देते हुए कहता --- " होगा, क्यूँ नहीं होगा ! तुम देखना, तुम्हारे प्रति मेरी बातें सच होंगी...|"

फिर अचानक वो अपने सारे ग़म का पुलिंदा दिल के किसी कोने में दफ़न करके मुझसे बोल पड़ती --- " ओए हैंडसम ! अब आप अपने लम्बे-चौड़े डॉयलॉग का चैप्टर बंद करो और चलो बेल बज गई है | 'सिस्टर नीलमणी' क्लास लेने आती ही होंगी...|"

"ओ...रियली...! अभी-अभी तो मेरी एक्टिंग परवान चढ़ना शुरू किया था..., और बेल बज गई...| ओह...!" --- मैंने नाटकीय अंदाज़ का सहारा लेकर बोला था |

" ओ... हो....! मेरे सुपरस्टार को पढ़ाई के टाईम में एक्टिंग का भूत सवार है | अब बाकी का एक्टिंग मुम्बई जाकर कर लेना | वरना, सिस्टर नीलमणी के गुस्से का शिकार आज हम दोनों ही बनेंगे |" --- भावना ने बड़ा गज़ब का भाव-भंगीमा का सहारा लेकर बोला था | तत्पश्चात्, हम दोनों क्लास चले गए थे |

कब एक साल का बी.एड. सत्र पलक झपकते गुज़र गया, पता ही न चला | हम अलग-अलग जगहों से आकर भी एक परिवार का हिस्सा बन गए थे | हम में से किसी को भी जुदाई स्वीकार नहीं थी | मानो पूरी ज़िंदगी एक-दूजे के साथ हम जीने को तैयार थे | सबकी आँखों से आँसूओं की कतार ज़ारी थी | हम में से ऐसा कोई नहीं था, जो फूट-फूटकर न रोया हो | बच्चे तो बच्चे, प्रोफेसर भी भावुकता से भरे थे | उनकी आँखें भी नम थीं | बल्कि प्राचार्य 'फादर जेरोम मिंज' यह कहने पर मजबूर हो गए कि --- " ऐसा जीनियस, क्रिएटिव और शानदार बी.एड. सत्र न कभी था और सम्भवतः न कभी हो पाएगा | तुम सभी को उज्जवल और कामयाब भविष्य के लिए हमारी संस्था की ओर से ढेरों शुभकामनाएं और आशीर्वाद...|"

एक-दूजे को भुलाना मुश्किल था, पर भूलना पड़ा | न चाहकर भी हमें अपनी-अपनी मंज़िलों की तरफ़ कदम बढ़ाना पड़ा | अंतत: हम ढेरों हौसले, ज्ञान और विभिन्न क्रियाकलापों का अनुभव लेकर इस उम्मीद से अपने-अपने रास्ते का राही बन गए कि कभी न कभी, किसी न किसी मोड़ पर हम पुनः मिलेंगे |

कहने-लिखने को तो बहुत कुछ है | भावना के ऊपर पूरा नॉवेल लिखा जा सकता है | कभी वक़्त ने मोहलत दिया और परिस्थितियाँ मेरे अनुकुल रहीं तो निश्चित ही एक नॉवेल भावना को डेडीकेट करूंगा | पर आज फेसबुक के माध्यम से ही सही, मैंने राजवाड़े को "हैप्पी बर्थ डे टू यू" कहा है | जी हाँ, फेसबुक ही तो है, जिसने मुझे बताया कि भावना की शादी हो गई है | मेरी दुआओं के अनुकुल सचमुच उसके सपनों का राजकुमार मिल गया है | एक सीक्रेट बताऊँ ! फेसबुक ने तो मुझे उसकी दुल्हन वाली फोटो भी दिखाई है | अब इतना जान ही गए, तो ये भी बता देता हूँ कि मैंने तो उसके राजकुमार की तस्वीर भी देखी है | दोनों की जोड़ी वाकई, बहुत सुन्दर है | भगवान इन्हें लम्बी उम्र दे |

उस राजकुमार को बहुत-बहुत धन्यवाद, जिसने समाज के ढकोसले को दरकिनार करके भावना का सिर्फ हाथ ही नहीं थामा, बल्कि अल्प सुन्दर लड़कियों के प्रति ओछी सोच रखने वाले लोगों को ये बता दिया कि व्यक्ति की खूबसूरती उसके चेहरे से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व से झलकती है...||
    

                                   
                       
     - मनव्वर अशरफ़ी
                          जशपुर (छत्तीसगढ़) 

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  1. मेरी कहानी प्रकाशित करने के लिए सम्पादक मंडल को हार्दिक धन्यवाद | 🙏

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