Chunauti Himalaya Ki चुनौती हिमालय की

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Chunauti Himalaya Ki चुनौती हिमालय की


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चुनौती हिमालय की summary सारांश


चुनौती हिमालय की पाठ या यात्रा-वर्णन लेखिका 'सुरेखा पणंदीकर' जी के द्वारा लिखा गया एक साहसिक यात्रा वर्णन है | इसमें कश्मीर की ऊँची और ख़ूबसूरत वादियों से लेकर हिमालय की चोटी तक का बेहतरीन सफ़र का वर्णन किया है | 

प्रस्तुत यात्रा वर्णन के अनुसार, जवाहरलाल के मातायन पहुँचने पर वहाँ का एक नवयुवक कुली ने बताया --- "शाब सामने उस बर्फ से ढके पहाड़ के पीछे अमरनाथ की गुफा है |" लेकिन किशन ने कुली की बात काटी और गुफा तक जाने के दुर्गम रास्ते से जवाहरलाल और उनके भाई को आगाह किया | 

तभी जिज्ञासा लिए जवाहरलाल ने पूछा --- "कितनी दूर |" 

"आठ मील दूर, शाब |" --- कुली ने जल्दी से जवाब दिया | कुली की बात सुनकर जवाहरलाल अपने चचेरे भाई
चुनौती हिमालय की
चुनौती हिमालय की
के साथ उत्सुकतावश जाने को तैयार हो गए | जवाहरलाल अपने चचेरे भाई के साथ कश्मीर घूमने निकले थे और जोज़ीला पास से होकर लद्दाखी इलाके की ओर चले आए थे | उन्हें अमरनाथ की गुफा देखना था | किशन ने उन्हें रास्ते की मुश्किलों के बारे में बताया लेकिन इसका उन पर कोई असर नहीं हुआ |मुश्किलों के बारे में सुनकर सफ़र के लिए वे और भी उत्सुक हो गए | उनके साथ कुली तो था ही, किशन और उसकी बेटी भी उसके साथ जाने को तैयार हो गई थी |

अगले दिन सुबह तड़के जवाहरलाल तैयार होकर बाहर आ गए | तिब्बती पठार का दृश्य देखते ही बनता था | दूर-दूर तक वनस्पति रहित उजाड़ चट्टानी इलाका दिखाई देता था | सर्द हवा के झोंके अंतःकरण को ठंडक पहुँचा रहे थे | जवाहरलाल ने हथेलियाँ आपस में रगड़कर गरम कीं और कमर में रस्सी लपेटकर चलने को तैयार थे | हिमालय की दुर्गम पर्वतमाला एक बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने पूरी हिम्मत से स्वीकारा था | गाइड के रूप में किशन उनके साथ था |

प्रस्तुत पाठ के अनुसार, अब जवाहरलाल ने आठ मील की चढ़ाई चढ़नी शुरू कर दी थी | पहाड़ी रास्तों पर आठ कदम चलना मुश्किल था | रास्ता सुनसान था | चारों तरफ़ पथरीली चट्टानें और सफेद बर्फ दिख रहे थे | जवाहरलाल बढ़ते जा रहे थे | ऊपर चढ़ने के साथ-साथ साँस लेने में दिक्कत होने लगी थी | कुली के नाक से खून बहने लगा था | फ़ौरन जवाहरलाल ने उसका उपचार किया | कुछ देर में बर्फ गिरने लगे और फिसलन बढ़ गई | वहाँ चलना मुश्किल होने लगा था | सभी थक भी चुके थे | तभी सामने बर्फीला मैदान नज़र आया, जो शीघ्र ही बर्फ के धुंधलके में ओझल हो गई थी | 

सुबह चार बजे से चढ़ाई करते-करते दिन के बारह बजे तक वे लगभग सोलह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर आ गए थे | लेकिन अभी भी अमरनाथ की गुफा का कुछ पता नहीं चल पा रहा था | जवाहरलाल अपने अथक हौसलों और प्रयासों के साथ हिमालय को चुनौती देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे | परेशानियों से कुली ने उन्हें वापस कैंप में चलने की सलाह दी | किन्तु, जवाहरलाल लौटने के बारे में जरा भी सोच नहीं रहे थे | उन्हें अमरनाथ पहुँचना था | वे ठान चुके थे | तभी किशन ने बताया कि अमरनाथ की गुफा तो दूर बर्फ के मैदान के पार है |  फिर तो जवाहरलाल में और भी जोश आ गया | वे और फुर्ती से आगे बढ़ने लगे | आगे उन्हें गहरी खाइयाँ, बर्फ से ढंके गड्ढे और फिसलन मिली |  कभी पैर फिसलता तो कभी बर्फ में पैर अंदर फंस जाता था | चढ़ाई मुश्किल थी लेकिन जवाहरलाल को इसमें मजा आ रहा था | 

यकायक उन्हें एक बड़ी गहरी खाई दिखाई दी |जवाहरलाल संभलते-संभलते लड़खड़ाकर खाई में गिर पड़े | रस्सी के सहारे में लटकने लगे | रस्सी ही उनका एकमात्र सहारा था, जिसे वे कसकर पकड़े थे | उन्होंने खाई की दीवार से उभरी चट्टान को मजबूती से पकड़ लिया और पथरीले धरातल पर पैर जमा लिए | पैरों तले धरती के एहसास से जवाहरलाल की हिम्मत बढ़ गई थी | फिर स्वयं के प्रयास और भाई, कुली एवं किशन के सहयोग से वे ऊपर पहुँच गए | जवाहरलाल कपड़े झाड़कर फिर से चलने को तैयार हो गए थे | यानी ज़िंदगी मौत को मात देकर फिर से आगे बढ़ने को बिल्कुल तैयार थी | आगे गहरी और चौड़ी खाइयों की संख्या बहुत थी | खाइयाँ पार करने का उचित सामान भी किसी के पास न था | इसलिए न चाहकर भी जवाहरलाल को अमरनाथ तक का सफर अधूरा छोड़कर वापस लौटना पड़ा | 

अंतत: इस यात्रा वर्णन से पता चलता है कि जवाहरलाल की दृढ़ता और इच्छाशक्ति के सानने हिमालय की ऊँची-ऊँची और दुर्गम चोटियाँ बोनी नज़र आ रही थीं...|| 



चुनौती हिमालय की प्रश्न उत्तर  


प्रश्न-1 जवाहरलाल को अमरनाथ तक का सफ़र अधूरा क्यों छोड़ना पड़ा ?

उत्तर-  आगे का रास्ता ज्यादा ख़तरनाक था | आगे गहरी और चौड़ी खाइयों की संख्या बहुत थी | खाइयाँ पार करने का उचित सामान भी किसी के पास न था |इसलिए जवाहरलाल को अमरनाथ तक का सफ़र अधूरा छोड़ना पड़ा | 

प्रश्न-2 जवाहरलाल, किशन और कुली सभी रस्सी से क्यों बँधे थे ?

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, जवाहरलाल, किशन और कुली सभी रस्सी से इसलिए बँधे थे, क्योंकि अगर वे कहीं पहाड़ पर से गिर जाए, तो रस्सी का सहारे लटक जाएँगे | इस तरह से उनकी जानें बच जाएंगी | 

प्रश्न-3 ‘जवाहरलाल को इस कठिन यात्रा के लिए तैयार नहीं होना चाहिए |' तुम इससे सहमत हो तो भी तर्क दो, नहीं हो तो भी तर्क दो | अपने तर्कों को तुम कक्षा के सामने प्रस्तुत भी कर सकते हो | 

उत्तर-  मैं इससे सहमत हूँ | जिस रास्ते पर जवाहरलाल जा रहे थे, वह रास्ता यकीनन ख़तरनाक और जान हथेली पर लेकर चलने जैसा था | लेकिन फिर भी कुछ सफ़र मज़बूत इरादे और हौसलों से जीता जाता है | जो इरादे, दृढ़ता और हौसले बेशक जवाहरलाल के पास थे | बस उनके पास इस ख़तरनाक रास्तों पर चलने के लिए पर्याप्त सामान न था, जिसकी जरूरत दुर्गम यात्रा में निश्चित तौर पर पड़ती है | चुँकि, जवाहरलाल को खुद पर भरोसा था, इसलिए वे बिना थके आगे बढ़ रहे थे | फिर भी बेहतर यही होता कि वे पूरी तैयारी से इस सफ़र का आगाज़ करते | 


चुनौती हिमालय की पाठ का शब्दार्थ


दृष्टि -            नज़र
निराला -        अनोखा, अनूठा
स्पर्श -           छूना 
गाइड -          रास्ता बताने वाला 
दूभर -           मुश्किल 
वीरान -          सुनसान, सन्नाटा 
सुकून -          शान्ति, इतमीनान 
स्फूर्ती -          तेजी
उपचार -        इलाज
इरादा -          इच्छा, विचार 
हिम -            बर्फ
शिखर -         चोटी
मुकुट -          ताज 
ओझल -       आँखों से दूर होना 
दुर्गम -           कठिन 
ढल जाएगा -  बीत जाएगा
हिदायत -       चेतावनी
तादाद -         संख्या


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