भारत में प्राथमिक शिक्षा का महत्व

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भारत में प्राथमिक शिक्षा का महत्व Primary Education in India भारत में प्राथमिक शिक्षा को निःशल्क और अनिवार्य बना दिया गया है किन्त अभी तक इसे अनिवार्य (Compulsory) नहीं बनाया जा सका है। फलत: अनेक बच्चों ने अभी भी शिक्षा प्राप्त करना प्रारम्भ नहीं किया है। वस्तुतः शिक्षा के प्रति इस उदासीनता के लिए देश में व्याप्त निरक्षरता तथा माता-पिता अभी भी अपने बच्चों को स्कूल भेजना आवश्यक नहीं समझते ।

भारत में प्राथमिक शिक्षा का महत्व
  Primary Education in India 


भारत में  प्राथमिक शिक्षा को निःशल्क और अनिवार्य बना दिया गया है किन्त अभी तक इसे अनिवार्य (Compulsory) नहीं बनाया जा सका है। फलत: अनेक बच्चों ने अभी भी शिक्षा प्राप्त करना प्रारम्भ नहीं किया है। वस्तुतः शिक्षा के प्रति इस उदासीनता के लिए देश में व्याप्त निरक्षरता तथा माता-पिता अभी भी अपने बच्चों को स्कूल भेजना आवश्यक नहीं समझते । प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय एवं अवराधन (Wastage and Stagnation) शिक्षा के प्रसार में भारी विघ्न उपस्थित करते हैं। आठवीं पंचवर्षीय योजना में देश के लगभग 95 प्रतिशत बच्चों को स्कूल भेजने का उद्देश्य रखा गया है। अनुमान है कि निर्धनता के कारण हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय होता है। भारत में प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य बालक को योग्य बनाना है और इस स्तर पर बच्चे के शारीरिक,
भारत में प्राथमिक शिक्षा
भारत में प्राथमिक शिक्षा 
मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं भावात्मक विकास पर विशेष ध्यान देने का उद्देश्य निर्धारित किया गया है। यहाँ की प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्यों तथा अमेरिका और ग्रेट-ब्रिटेन की प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्यों में पर्याप्त समानता है। यहाँ भी प्राथमिक शिक्षा को क्रियात्मक बनाने की चेष्टा स्पष्ट दिखलाई देती है। स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यहाँ की प्राथमिक शिक्षा में कृषि एवं कुछ अन्य विषयों को स्थान दिया गया है। भारत में प्राथमिक शिक्षा 6 से 11 वर्ष के बच्चों के लिए मानी जाती है। यह शिक्षा पंचवर्षीय होती है। हमारे यहाँ प्राय: दो प्रकार के प्राथमिक स्कूल होते हैं (1) सामान्य स्कूल-जहाँ शिल्प का शिक्षण नहीं होता, तथा (2) बेसिक स्कूल जिसमें शिल्प के माध्यम से शिक्षण की प्रधानता होती है। सामान्यतः सभी प्राथमिक स्कूल, बेसिक स्कूल के स्वरूप में परिवर्तित हो गए हैं, किन्तु अभी शहरी क्षेत्र में बहुत से ऐसे प्राथमिक स्कूल पाए जाते हैं जो बेसिक स्कूल से कुछ भिन्न पाठ्यक्रम चलाते हैं। कोठारी कमीशन, 1964-66 ई.(Kothari Commission, 1964-66) ने बेसिक शिक्षा को सात वर्षीय बनाने का सुझाव दिया है । इस सात वर्षीय प्राथमिक स्कूल में प्रथम चार कक्षाएँ निम्न प्राथमिक की तथा अन्तिम तीन कक्षाएँ उच्च प्राथमिक मानी जाएँगी । निम्न स्तर पर 6 से 10 वर्ष तथा उच्च स्तर पर 10 से 13 वर्ष के बच्चे शिक्षा प्राप्त करेंगे। अभी तक ऐसा कार्यक्रम लागू नहीं किया जा सका है। प्राथमिक शिक्षा का यह स्वरूप अमेरिकी प्राथमिक स्कूलों के समान प्रतीत होता है।

संसद ने छह से 14 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के लिए संविधान के 86 वें संशोधन अधिनियम,2002 को पारित किया। इस कानून को लागू करने के उद्देश्य से विस्तृत तंत्र बनाने के लिए दूसरा विधेयक लाने का भी प्रस्ताव किया गया है। 

Sarva Shiksha Abhiyan (सर्व शिक्षा अभियान)  योजना सन् 2001 में शुरू की गई थी। इस योजना के उद्देश्य हैं  
  1. छह से 14 वर्ष की आयु वर्ग के सभी बच्चे स्कूल/शिक्षा गारंटी योजना केन्द्र/ब्रिज पाठयक्रम में जाएं .
  2. छह से 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चे 2007 तक पाँच वर्ष की प्राथमिक शिक्षा पूरी कर लें .
  3. छह से 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चे 2010 तक आठ वर्षों की स्कूली शिक्षा पूरी कर लें.
  4. संतोषजनक गुणवत्ता वाली प्राथमिक शिक्षा पर मुख्य ध्यान दें, जिसमें जीवन के लिए शिक्षा पर जोर हो. 
  5. सभी प्रकार लागक और सामाजिक असमानता शुरुआती स्तर पर 2007 तक और प्राथमिक शिक्षा स्तर पर वर्ष 2010 दूर हो,
  6. बीच में स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति 2010 तक पूरी तरह खत्म हो। 

Sarva Shiksha Abhiyan (सर्व शिक्षा अभियान)

Sarva Shiksha Abhiyan (सर्व शिक्षा अभियान)  कार्यक्रम के तहत केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच साझेदारी नौवीं पंचनामा 485 : 15, दसवीं पंचवर्षीय योजना में 75 : 25 और उसके बाद 50 : 50 के अनुपात में है। - ये कार्यक्रम परे देश में चलाए जा रहे हैं, जो 11 लाख रिहायशी इलाकों के 19.2 करोड़ बच्चों की जरूरतों को परा करते हैं। इस योजना के दायरे में 8.5 लाख प्राथमिक और उच्चतर प्राथमिक स्कूल तथा २३ लाख शिक्षक हैं। इस योजना में उन इलाकों में नए स्कूल खोलने की व्यवस्था है,जहाँ स्कूली सुविधाएं नहीं हैं। साथ ही इसमें अतिरिक्त कमरे बनाकर, शौचालयों और पेयजल की व्यवस्था कर मौजूदा ढाँचे को मजबत बनाने की बात कही गई। एस.एम.ए. का विशेष ध्यान बालिकाओं और कमजोर तबकों के बच्चों पर है। इस कार्यक्रम के तहत बच्चों को मुफ्त पाठ्य-पुस्तक उपलब्ध कराने जैसी कई पहल की गई हैं।इलाकों तक में भी कंप्यूटर शिक्षा मुहैया कराकर डिजिटल विभेद को दूर करने का इरादा रखता है। 

वर्ष 2003-04 के दौरान एस.एस.ए. ने 596 जिलों में वार्षिक जिला प्राथमिक शिक्षा योजना के तहत 67,190 नए स्कूलों को मंजूरी दी; 3,98,189 नए शिक्षकों की नियुक्ति की; 40,960 स्कूली भवनों का निर्माण किया; 68.779 अतिरिक्त कमरे बनवाए; 46,272 शौचालयों का निर्माण किया; 33,161 स्कूलों में पेयजल की व्यवस्था की; 47,04,400 बच्चों को ई.जी.एस. सुविधाएँ दीं; 64,18,328 बच्चों को ए.आईई:  बच्चों को आईई.डी. सुविधाएं मुहैया कराई,4,69,59,451 बच्चों को मुफ्त पाठ्य-पुस्तकें दीं; 6,93,303 स्कूलों को अनुदान उपलब्ध कराया और 29,67,053 शिक्षकों के लिए शिक्षक अनुदान दिया। केन्द्र सरकार के राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों को 2698.38 करोड़ रुपये जारी किए। 

उपरोक्त विवेचन से यह संकेत मिलता है कि हमारी भारतीय प्राथमिक शिक्षा में ग्रेट ब्रिटेन की तरह सांस्कृतिक गुणों का एवं चारित्रिक गुणों का विकास, अमेरिका की तरह लोकतान्त्रिक गुणों का विकास और रूस की तरह श्रम के प्रति आदर उत्पन्न करने का उद्देश्य निहित है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमें प्राथमिक शिक्षा के लिए अभी बहुत प्रयास करना है। इस स्तर पर हमें अपव्यय और अवरोधन (Wastage and Stagnation) को रोकना है। 

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