तपते दिन के ख़्वाब

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तपते दिन के ख़्वाब मेट्रो ट्रेन से उतरते ही पसीना बहना शुरू हो गया था और प्यास भी लगने लगी थी हालांकि मेट्रो स्टेशन से ना प्लेसमेंट एजेंसी का ऑफिस दूर था ना ही कोई सख्त गर्मी का महीना था मगर दिल्ली में सितम्बर की 15 तारीख़ की दोपहरी मई-जून के बराबर ही पहुँचने को तैयार थी।

तपते दिन के ख़्वाब


मेट्रो ट्रेन से उतरते ही पसीना बहना शुरू हो गया था और प्यास भी लगने लगी थी हालांकि मेट्रो स्टेशन से  ना प्लेसमेंट एजेंसी का ऑफिस दूर था ना ही कोई सख्त गर्मी का महीना था मगर दिल्ली में सितम्बर की 15 तारीख़  की दोपहरी मई-जून के बराबर ही पहुँचने को तैयार थी।

वैसे तो इंटरव्यू की टाइमिंग सुबह की हुआ करती हैं लेकिन जो मैंने अपने तजुर्बे  में पाया था वो ये कि प्लेसमेंट एजेंसी में बीपीओज़ के इंटरव्यूज़ कभी भी दोपहर 2 बजे से पहले शुरू नहीं होते थे, इसलिए प्लेसमेंट एजेंसी के सुबह 11 बजे बुलाने पर भी मैं उनसे 2 बजे का ही पहुँचने का बताती और वो भी आसानी से मान जाते, क्योंकि वो भी जानते थे कि वहां पहुँच कर हमसे दो चार प्रोफेशनल सवाल के बाद वो हमें इंतज़ार करने को ही कहेंगे।
इंटरव्यू
इंटरव्यू

खैर, दोपहर के 1:45 हो रहे थे और सूरज  में तपती, पसीना बहाती, प्यास को क़ाबू करती मैं बस इंटरव्यू के बारे में ही सोचे जा रही थी । पिछले एक महीने में बीपीओ के लिए मैं कोई 5 से 6 इंटरव्यू तो दे ही चुकी थी कहीं सिलेक्शन, तो कहीं रिजेक्शन दोनों से ही सामना हुआ था मेरा।

5 मिनट बाद ही मैं उस बिल्डिंग के सामने थी जहाँ मुझे बुलाया गया था, मगर अभी 5 मंज़िल ऊपर चढ़ाई भी करनी थी, लिफ्ट नहीं थी सो मैं चल पड़ी सीढ़ियों की तरफ। पसीने से तर-बतर मैं अपने बताये वक़्त से क़रीब दस मिनट पहले ऑफिस में मौजूद थी, ऑफिस के अन्दर पहले से मौजूद कई कैंडिडेट गर्मी और इंतज़ार का मज़ा ले रहे थे (दरअसल कैंडिडेट्स के लिए वेटिंग रूम में एसी नहीं था, टॉप फ्लोर होने की वजह से दोपहर तक वो रूम सूरज में अच्छे से तप चुका था और कूलर-पंखे भी बेकार साबित हो रहे थे)। 

मैंने पहुँचते ही वहां बैठी रिसेप्शनिस्ट को अपना इंट्रोडक्शन (परिचय) दिया जिस पर उसने मुझे दूसरे कैंडिडेट्स के साथ बैठने को कहा और बताया कि हायरिंग  कंपनी के एच आर कुछ ही देर में आने वाले हैं I ये कुछ देर क़रीब एक-डेढ़ घंटे बाद पूरी हुई। 

इस बीच कोई 40 कैंडिडेट्स इंटरव्यू देने के लिए वहां पहुँच चुके थेl एक-एक करके सभी को फर्स्ट राउंड के लिए बुलाया जाने लगा और मेरा नंबर भी आ गया । मैं हमेशा कि तरह घबराई हुई थी मगर मुझे मानना पड़ेगा दोनों एच आर मिस चांदनी और मिस्टर अनिमेष ने जो पॉज़िटिव और अप्रोचिंग माहौल बनाया था उससे सभी कैंडिडेट्स के अन्दर नौकरी पाने के दबाव और इतनी गर्मी के असर के बावजूद जैसे एक ताज़गी आ गई थी, मेरी घबराहट भी काफ़ी हद तक दूर हो गई थी। 

फ़ाइनल राउंड पूरा होते-होते हम 40 में से सिर्फ 8 लोग ही बचे रह गए थे और अब फ़ाइनल राउंड के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे थे I इस बीच शाम  भी हो चली थी मगर ढलता सूरज जाते-जाते भी टॉप फ्लोर पर मौजूद उस ऑफिस के कमरे को दहका कर जाना चाहता था इसलिए गर्मी में कोई ख़ास कमी नहीं आई थीl सभी कैंडिडेट्स टाइम पास के लिए आपस में थोड़ी बहुत बातें भी कर रहे थे कोई सॉफ्ट स्पोकन (मृदु भाषी या मीठा बोलने ) होने की अहमियत बता रहा था, तो कोई हाई कॉन्फिडेंस (उच्च आत्मविश्वास ) के फ़ायदे गिना रहा था, किसी को अपने सैलरी से जुड़े मोल-भाव के गुरों पर पूरा यक़ीन था, तो कहीं अपनी पिछली कम्पनीज़ के तजुर्बे र्और बीपीओज़ के माहौल पर चर्चा चल रही थी। 

दो लड़कियां अपने फ़ाइनल राउंड के बारे में बहुत फ़ख्र से बातें कर रही थीं I उनमें से एक का कहना था-"मैं तो पूरे कॉन्फिडेंस के साथ बस इंग्लिश में लगातार बोलती चली जाती हूँ सही हो या ग़लत , आख़िर बीपीओ में फ़्लूएंट इंग्लिश (धाराप्रवाह अंग्रेज़ी ) बोलने वाले का ही तो काम है, मेरा कॉन्फिडेंस लेवल देखकर तो सामने वाला भी कह रहा होगा कि किस क़ाबिल बंदी से पाला पड़ा है। 

इस पर दूसरी लड़की ने हामी भरी और अपनी राय रखते हुए बोली- "हाँ , तुम सही कह रही हो, मैं भी ऐसे ही बोलती हूँ लेकिन प्रेज़ेंटेबल (आकर्षक) होना भी बहुत माएने रखता है इसलिए मैं हमेशा प्रेज़ेंटेबल रहती हूँl"

वहीँ बैठा एक लड़का कह रहा था- "मुझे पता है कि मेरा सिलेक्शन तो हो ही जायेगा और मैक्सिमम सैलरी पैकेज (अधिकतम वेतन) ही मिलेगा, वर्ना मेरे पास दूसरी कम्पनीज़ के भी ऑफ़र हैं, मैं वहां चला जाऊंगा यहाँ अपना वक़्त बर्बाद नहीं करूँगा।”

ये सब बातें चल रही थीं और मैं अन्दर ही अन्दर अपने फ़ाइनल राउंड में दिए गए जवाब में कॉन्फिडेंस, पोलाइटनेस सब तलाश रही थीl सैलरी की बात तक तो पहुंचना ही मुश्किल हो रहा थाl उस वक़्त मैं कहने को तो 5वीं मंज़िल पर मौजूद थी मगर इन सब बातों ने मुझे धम्म से ज़मीन पर पंहुचा दिया थाl

ऐसा तो नहीं था कि यह मेरा पहला इंटरव्यू था और अगर मैं रिजेक्ट होती तो यह रिजेक्शन पहला होता मगर इस तरह की  बातें हमेशा मुझे अपना प्रेज़ेंटेबल ना होना, लहजे में मिठास की कमी और उस पर हिंदी भाषी बैकग्राउंड की याद दिला देती थीं, जहाँ के पढ़े बच्चे पूरे कॉन्फिडेंस के साथ फ़्लूएंट इंग्लिश कम ही बोल पाते हैं और मेरा थोड़ा बहुत कॉन्फिडेंस और थोड़े में बदलना शुरू हो जाता था, अब भी वही हो रहा था।

लेकिन फिर भी मैंने उम्मीद इसलिए नहीं खोई थी क्योंकि भले मेरे लहजे में बहुत सॉफ्टनेस या इंग्लिश में फ्लुएंसी नामचारे की रही हो मगर मैंने फिर भी पूरी सहजता के साथ सही-ग़लत को ध्यान में रखते हुए ही जवाब दिए थे। यही उम्मीद लिए और 'चलो देखते हैं, क्या होता है'  वाले अहसास के साथ मैं वहां बैठी रही।
मैं इसी उधेड़बुन में लगी थी कि तभी रिज़ल्ट अनाउंस हुए और उन दोनों लड़कियों को छोड़कर सभी का सिलेक्शन हो चुका था।

जब सभी सफ़ल कैंडिडेट्स को एक-एक करके जॉइनिंग लैटर लेने के लिए बुलाया जा रहा था उस वक़्त वो दोनों लड़कियां एजेंसी वालों से लड़ रही  थीं कि वो कैसे रह गईं।

मेरा नंबर सबसे आख़िर में आया था, सैलरी पैकेज तो अच्छा था ही लोकेशन भी ज़बरदस्त थी। जब मैं एच आर के ऑफिस से बाहर आ रही थी तो वो लड़कियां ये कहते हुए सीढ़ियों से उतर रही थीं कि इन्हें क़ाबिल लोग चाहिए ही नहीं।

और वो लड़का जो मैक्सिमम सैलरी पैकेज पाने का हक़दार होने दावा कर रहा था, और कम सैलरी पर दूसरी जगह के अपने ऑफर गिना रहा था, वो अभी भी वहीँ टिका हुआ था और एच आर की खुशामदें कर रहा था कि-इतना कम सैलरी पैकेज नहीं सर,थोड़ा तो बढ़ा दीजिये। 

बहरहाल, सूरज डूब चुका था मगर मेरे हिस्से की रोशनी मुझे मिल चुकी थी और दूसरे चुने गए कैंडिडेट्स की तरह मैं भी दिन भर के अपने तजुर्बों के साथ-साथ उस तपते दिन में पूरे हुए ख़्वाब की ताबीर अपने हाथ में लिए जा रही थी।

मेरी ज़िन्दगी की एक याद जिसे मैंने पहली बार क़लम से पन्नों पर सजा दिया .


- Bazigha Qazi बाज़िग़ा क़ाज़ी

COMMENTS

LEAVE A REPLY: 4
  1. मेडम बाज़िगा काज़ी जी, मोहतरमा, आपने अपने इंटरव्यू को बड़े ही ढंग से कागज पर उतारा है.मैं आपका ध्यानाकर्षण चाहूँगा. पहले ही पेराग्राफ में आपने जाहिर किया कि पिछले साक्षात्कारों में आप सेलेक्शन.व रिजेक्शन -दोनों का अनुभव पा चुकी हैं. पर बाद में रह भी लिखा कि यदि रिजेक्शन होता तो यह पहला होता. आपने यहाँ जो भी कहना छुपाना चाहा उसमें मन ने साथ नहीं दिया. अच्छा होता कि इसमें समरूपता होती. आपने बहुत ही अच्छा लिखा है. कृपया ऐसी बारीकियों पर ध्यान दीजिए. यदि मेरे शब्द या विचार आपको ठेस पहुँचाएँ या आघात करें तो क्षमा कर नकार दीजिए.

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  2. अच्छी लगी कहानी

    जवाब देंहटाएं
  3. सर Madabhushi Rangraj Iyengar जी , आपका कमेंट पढ़ने के बाद मैंने वेबसाइट पर प्रकाशित अपने लेख को दोबारा तीन से चार बार फिर से पढ़ा, पढ़ने के बाद पहला अहसास अच्छा, और दूसरा कुछ बुरा हुआ । अच्छा इसलिए कि आपने अपना क़ीमती वक़्त निकाल कर काफ़ी ध्यान से मेरी रचना को देखा है, और बुरा इसलिए क्योंकि पूरी सच्चाई के साथ लिखे गए मेरे इस लेख पर मन में कहीं खोट होने का अंदेशा भी जताया गया l इसके लिए मैं इतना ही कहना चाहूंगी कि इसे लिखते वक़्त मैंने पूरी ईमानदारी बरती है, लेकिन मेरे लिखने में यक़ीनन बहुत कमियां हैं और शायद इसी वजह से मैं सही तरह से अपनी बात को क़लमबद्ध नहीं कर पाई । साथ ही, आपने अपनी क़ीमती राय दी उसके लिए बहुत शुक्रिया । मैं पूरी कोशिश करुँगी कि आपकी सलाह पर अमल कर सकूं और please मुझसे माफ़ी मांगकर मुझे शर्मिंदा न करें । देरी से reply के लिए खेद है और मेरी कोई बात आपको अगर बुरी लगी हो उसके लिए
    आपसे मुआफ़ी की उम्मीद और
    एहतराम के साथ
    बाज़िग़ा क़ाज़ी

    जवाब देंहटाएं
  4. पूरा किस्सा पढकर यही कह सकता हूँ कि आप निरंतर लिखा कीजिये. घटनाओं की जो डिटेलिंग आपके लेख में है, वह निश्चित रूप से काबिले तारीफ़ है. एक कथाकार के लिए, खासकर उपन्यासकार के लिए, ज़रूरी है कि वह किसी भी घटना के सभी पक्षों, सभी पहलुओं को विस्तार के उकेरे. यह क्षमता आपमें भरपूर है.

    शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं
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तपते दिन के ख़्वाब मेट्रो ट्रेन से उतरते ही पसीना बहना शुरू हो गया था और प्यास भी लगने लगी थी हालांकि मेट्रो स्टेशन से ना प्लेसमेंट एजेंसी का ऑफिस दूर था ना ही कोई सख्त गर्मी का महीना था मगर दिल्ली में सितम्बर की 15 तारीख़ की दोपहरी मई-जून के बराबर ही पहुँचने को तैयार थी।
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