गोदान में होरी का चरित्र चित्रण

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गोदान का होरी गोदान होरी का चरित्र चित्रण गोदान में होरी का चरित्र चित्रण गोदान उपन्यास में होरी का चरित्र चित्रण गोदान के होरी का चरित्र चित्रण premchand's godan characteristics of horigodan hori character godan me hori ka charitra character sketch of hori in godan in hindi - होरी कृषक जीवन के महाकाव्य के रूप में प्रतिष्ठित 'गोदान' प्रेमचन्द की एक प्रौढ़ रचना है। इसी उपन्यास का नायक होरी है, जो सम्पूर्ण कृषक-जीवन के समस्त गुण-दोषों को समाहित किये भारतीय कृषक जनता का प्रतिनिधित्व करता है।

गोदान में होरी का चरित्र चित्रण


गोदान का होरी गोदान होरी का चरित्र चित्रण गोदान में होरी का चरित्र चित्रण गोदान उपन्यास में होरी का चरित्र चित्रण  गोदान के होरी का चरित्र चित्रण premchand's godan characteristics of horigodan hori character godan me hori ka charitra character sketch of hori in godan in hindi  - होरी कृषक जीवन के महाकाव्य के रूप में प्रतिष्ठित 'गोदान' प्रेमचन्द की एक प्रौढ़ रचना है। इसी उपन्यास का नायक होरी है, जो सम्पूर्ण कृषक-जीवन के समस्त गुण-दोषों को समाहित किये भारतीय कृषक जनता का प्रतिनिधित्व करता है। होरी मानवमात्र के लिए सहानुभूति, स्वकीय बन्धु-बान्धवों के प्रति विश्वास और प्रेम की असीम भावना से युक्त अपने गरिमोचित चरित्र से युक्त है। होरी ग्रामीण कृषक के रूप में अत्यन्त निर्धनता का जीवन व्यतीत करता हुआ भाग्य के सहारे अपना जीवन व्यतीत करता है। साहूकार, पटवारी, पंचायत, धर्म के ठेकेदार, करिन्दा, दरोगा आदि सभी उनका शोषण करते हैं, किन्तु इन विषम परिस्थितियों में वह समाज के समक्ष नतमस्तक रहता है। वह घर-समाज की परम्परा से चली आयी मर्यादा की रक्षा के लिए अपने भाई हीरा को पुलिस के चक्र से बचाने के लिए कर्ज लेता है और झुनिया को आश्रय देने में अपने परिवार का सारा अन्न दण्ड में भरता है। ये परिस्थितियाँ उसे दारिद्र्य के जाल में फंसा देती हैं। अव्यवस्था में रहते हुए भी भूख से व्याकुल होने पर वह पण्डित मातादीन के यहाँ जेठ की दोपहरी में परिश्रम करता है और अन्त मे संघर्ष करता हुआ होरी कारुणिक मृत्यु को प्राप्त होता है। होरी के जीवन का संघर्ष, विपत्तियों और अन्त में करुण मृत्यु भारतीय कृषक समाज की सच्ची कथा है। होरी की मृत्यु कारुणिक वातावरण में यह आशामय संदेश देती है कि उसकी मृत्यु के उत्तरदायी समाज और शोषक वर्ग हैं। होरी के चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं -

मानवता और साहस का प्रतीक

होरी के चरित्र में मानवता और साहस का अपूर्ण समन्वय है। वह ईमानदार और कठोर परिश्रमी होते हुए भी जीवनपर्यन्त दारिद्र्य और शोषण की चक्की में पिसता रहा है। उसका अंतर्मन करुण पुकारों से द्रवित हो उठता है। झूठ और वाक्-चातुर्य से लायी गाय को हीरा जहर देकर मार डालता है, किन्तु मानवता का पोषक होरी उसे निर्दोष घोषित करता है, यद्यपि इससे होरी और धनिया में लड़ाई भी होती है। गोबर के कुकृत्यों का भार लेकर झुनिया जब होरी के यहाँ पहुँचती है, उस समय होरी का साहस और मानवता उसके चरित्र में उदात्तता ला देता है। वह समाज में शोषकों के जाल में जकड़ता चला जाता है, जिसमें वह घुट-घुट कर दम तोड देता है, परन्तु मानवता के पथ से विमुख नहीं होता। मानवता के ये उदात्त गुण ही उसकी जीवन-गाथा बना देते हैं। होरी 'गोदान' के कथानक का नायक मात्र न रहकर भारत की समस्त कषक-संस्कृति का प्रतिनिधि पात्र बन जाता है। 

गोदान का होरी
गोदान का होरी
होरी की जीवन-गाथा अभावग्रस्तता से युक्त है। निर्धनता और शोषण के करुण हालात के मध्य भी वह एक योद्धा की भाँति अडिग रहता है। समाज और धर्म की मर्यादा का पालन करने वाला होरी रूपा के विवाह में कर्ज समझकर दो सौ रुपया वर पक्ष से लेता है, किन्तु इससे उनका अन्तर्वेदना तड़प में परिवर्तित हो जाती है। उसे आत्मग्लानि होने लगती है। लगता है सारे लोग उसक ऊपर थूक रहे हैं- “आज बीस साल तक जीवन से लड़ने के बाद वह परास्त हुआ है और ऐसा परास्त हुआ है कि जो भी आता है, वह उसके मुँह पर थूक देता है।" 

जीवन भर कठिन परिश्रम करने वाला होरी रुग्ण होने पर भी काम बन्द नहीं करता। अन्ततः वह भुखमरी के कगार पर आ जाता है। जेठ की दोपहरी में काम करते समय उसको लू लग जाती है और वह मरणासन्न अवस्था में पहुँच जाता है। समय की स्थिति को उपन्यासकार ने अतिशय करुण और मार्मिक बना दिया है। होरी को एक योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है, जिसने समाज के समक्ष आत्म-समर्पण नहीं किया, अपितु जब तक प्राण था वह अडिग था और स्थिर रहा। 

"जीवन के सारे संकट, सारी निराशाएँ मानो उसके चरणों पर लोट रही थी कौन कहता है, जीवन-संग्राम में वह हारा है, यह उल्लास यह हर्ष, यह पुलक हार के लक्षण हैं ? इन्हीं हारों में उसकी विजय है। उसके टूटे-फूटे वस्त्र उसकी विजय-पताकाएँ हैं।" 

भ्रातृत्वप्रेम 

होरी के चरित्र में अन्य विशेषताओं के साथ उसका भ्रातृत्व प्रेम भी परिलक्षित हुआ है। हीरा को अपने सुख-दुःख में वह सहभागी बनाना चाहता है। उसकी अनुपस्थिति में वह उसकी पत्नी को बच्चे की तरह पालता है। गाय के मर जाने पर भी वह पुलिस से हीरा को गवाही देकर बचा लेता है, किन्तु उसे हर जगह ठोकर और अपमान ही मिलता है। वह परिवार में बड़ा होने के कारण मर्यादा और अपने कर्तव्य का सदैव पालन करता है। यद्यपि हीरा होरी से अलग है, परन्तु उसकी पत्नी झुनिया को वह बहू ही मानता है। दमड़ी बँसौर पुनिया को धक्का दे देता है। इसे देखते ही होरी आग बबूला हो जाता है और उसको लात जमाता हुआ कहता है- “रुपये की गर्मी है तो वह निकाल दी जायेगी, अलग है तो क्या हुआ एक खून तो है। कोई तिरछी आँख से देखे तो आँख निकाल लूँ।" 


धर्मभीरु और भाग्यवादी

होरी धर्मभीरु और भाग्यवादी है। दरिद्रता का अभिशाप वह किसी पर्वजन्म के पाप के कारण ही भोग रहा है। गोबर कर्मवादी है, जबकि होरी भाग्यवादी है। वह गोबर को समझाता है- “वह बात नहीं है बेटा ! छोटे-बड़े भगवान के घर से बनकर आते हैं। सम्पत्ति बड़ी तपस्या से मिलती है। राय साहब ने पूर्व जन्म में जैसे कर्म किये थे, उसका आनन्द भोग रहे हैं, हमने कुछ नहीं किया तो भोगें क्या ?" . 

दातादीन आडम्बरयुक्त, ढोंगी ब्राह्मण को भी वह पूज्य मानता है। वह बिना लिखे-पढ़े हुए रुपयों को चुकाना अपना धर्म मानता है और अन्त में मरते समय कठिन परिश्रम की कमाई बीस आने पैसे को दातादीन गोदान के रूप में लेता है। होरी को संघर्ष एवं आपत्तियाँ भाग्यवादी बना देती हैं। गाँव पंचायत का दिया हुआ दण्ड वह भूखों रहकर भरता है। वह समाज से अलग नहीं रहना चाहता- “पंच में परमेश्वर हैं। उनका जो न्याय है, वह सिर आँखों पर।" 

निर्धनता

होरी का सारा जीवन आर्थिक अभावग्रस्तता और शोषण की करुण गाथा है। वह जीवनपर्यन्त कठिन परिश्रम करता रहा, किन्तु मरते समय उसके पास मात्र बीस आने पैसे थे जो कि गोदान के रूप में दातादीन ने ले लिया। किसी तरह से मजदूरी करके वह परिवार का पेट पालता है। होरी की दीनता और दरिद्रता हृदय विदारक है- “माघ के दिन थे। महावट लगी हुई थी...।" होरी भोजन करके पुनिया के मटर के खेत की मेड़ पर अपनी मडैया में लेटा था। चाहता था शीत को भूल जाये और सो रहे, लेकिन बार-बार कम्बल और फटी हुई मिर्जई और शीत के झोंकों से गीली पुआल, इतने शत्रुओं के सम्मुख आने की नींद को साहस न था। आज तम्बाकू भी न मिली थी जिससे मन बहलता।" 

व्यवहारकुशलता

होरी के चरित्र में व्यवहारकुशलता भी देखने को मिलती है। वह चालाक या बेईमान नहीं है, किन्तु कुछ परिस्थितियाँ उसे झूठ बोलने पर बाध्य कर देती हैं। वह प्रकृति से निश्छल एवं परोपकारी है। सामान्य कृषकों की भाँति उसमें भी कुछ चतुराई आ गयी है। वह अपने स्वार्थ के लिए बड़े-बड़े लोगों से परिचय बनाता है। अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ही वह राय साहब की खुशामद और आदेशों का पालन करता रहता है। वह स्वयं विचार करता है "मालिकों से मिलते-जुलते रहने का ही यह प्रसाद है कि सब उसका आदर करते हैं, नहीं तो उसे कौन पूछता ! पाँच बीघे के किसान की बिसात ही क्या ? यह कम आदर नहीं है कि तीन-तीन, चार-चार हल वाले भी उसके सामने सिर झुकाते हैं।" 


परिवार-पोषक

होरी एक सद्गृहस्थ होने के नाते उदार पिता और आदर्श पति के रूप में परिवार का पोषण करता है। उसे अपने परिवार से असीम प्रेम है। यदा-कदा वह साधारण किसानों की भाँति धनिया की पिटाई भी कर देता है, किन्तु सामान्यतः उसका व्यवहार मधुर एवं स्नेहिल है। परिवार के लिए वह कुछ झूठ और छल प्रपंच का भी आश्रय लेता है। यद्यपि इस कृत्य से उसे काफी पश्चाताप होता है। दरिद्रता एवं विवशता उसे छल-प्रपंच के लिए विवश कर देते हैं । नित्य की दरिद्रता उसे निर्लज्ज बना देती है। तकाजे, गाली-गलौज से वह तनिक भी भयभीत नहीं होता है कि उधार की चीजें वह मुफ्त समझने लगता है। अस्सी रुपये की गाय लेते हुए वह सोचता है- “यही होगा न कि भोला बार-बार तकादा करने आयेगा, बिगड़ेगा, गालियाँ देगा पर इससे अपना क्या बिगड़ता है।" 

चरित्र में यथार्थता

होरी की कथा उस भारतीय कृषक-वर्ग का बोध कराती है, जो , जीवन-पर्यन्त जमींदार, पटवारी, साहूकार, पंचायत, पुलिस और कारिन्दों द्वारा शोषित होकर छटपटाता रहता है। वह कर्मठता और श्रम की चक्की में पिसता है और कभी भी निर्धनता और दरिद्रता के दल-दल से निकल नहीं पाता है। वह जीवनभर अपने द्वार पर गाय रखने की अभिलाषा करता है, परन्तु उसे मृत्यु के समय भी गोदान के लिए गाय नहीं मिलती है। होरी के चरित्र की यथार्थता वास्तव में भारतीय कृषक-वर्ग की करुण गाथा का परिचायक है। दरिद्रता-पीड़ित होरी के परिवार का करुण चित्र पूरे कृषक वर्ग की करुण स्थिति का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर देता है। आर्थिक विपन्नता और दरिद्रता की स्थिति बेलारी गाँव के होरी की ही नहीं, वरन् भारत के उन समस्त कषकों की है, जो आज भी शोषण की चक्की में पिस रहे हैं। 

निष्कर्ष 

इस प्रकार स्पष्ट है कि होरी का चरित्र एक सामान्य कृषक की तरह है, जिसमें कतिपय अवगुण हैं, जो किसानों में सामान्यतया विद्यमान रहते हैं। होरी के जितने भी दोष उसके चरित्र में हैं, विवशताजन्य और परिस्थितियों के प्रतिकूल होने के कारण हैं। वह इनको समझता है और पश्चाताप भी करता है। संघर्षों से जूझता हुआ होरी एक कर्मठ योद्धा की भाँति जीवनपर्यन्त अपने पथ पर अडिग रहता है, स्त्री की फटकार, पुत्र का व्यंग्य, मालिक की घुड़कियाँ, महाजनों की गालियाँ सब कुछ सहन करता हुआ वह कभी पीछे नहीं हटता तथा जीवन-संघर्ष में मिटकर हार नहीं मानता है। इस तरह होरी का चरित्र उदात्त एवं विवशताजन्य है, जिस शोषक-व्यवस्था का शिकार होता है, वही शोषक-व्यवस्था उसके प्राण ले लेती है, किन्तु उसे पथ से विचलित नहीं कर पाती। 


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