पेशोला की प्रतिध्वनि कविता

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पेशोला की प्रतिध्वनि कविता


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पेशोला की प्रतिध्वनि कविता की व्याख्या

अरुण करुण बिम्ब !वह निर्धूम भस्म रहित ज्वलन पिंड!
विकल विवर्तनों से विरल प्रवर्तनों में श्रमित नमित सा -
पश्चिम के व्योम में है आज निरवलम्ब सा .
आहुतियाँ विश्व की अजस्र से लुटाता रहा-
सतत सहस्त्र कर माला से -तेज ओज बल जो व्दंयता कदम्ब-सा.

व्याख्या - सूर्य का लाल प्रकाश मंद हो गया अर्थात संध्या हो गयी है। सूर्यमंडल धूम्र रहित होकर जल रहा है।ऐसा लगता है मानों अनेकों परिवर्तनों के कारण व्याकुल और चक्कर खाने के कारण शांत है। अब वह नतसिर होकर असहाय सा आकाश के पश्चिमी भाग में छिपने जा रहा है। यह सूर्य कभी विश्व की निरंतर आहुतियाँ ग्रहण करता था। वह अपनी हजारों किरणों की माला से कदम्ब वृक्ष के समान तेज़ ,ओज और शक्ति का उदारतापूर्वक दान करता रहा है। 

पेशोला की उर्मियाँ हैं शांत,घनी छाया में-
तट तरु है चित्रित तरल चित्रसारी में.
झोपड़े खड़े हैं बने शिल्प से विषाद के -
दग्ध अवसाद से .
धूसर जलद खंड भटक पड़े हों-
जैसे विजन अनंत में.

व्याख्या - पेशोला की लहरें शांत है। उन लहरों के ऊपर तट पर खड़े ऊँचे ऊँचे वृक्षों की छाया पड़ रही है। नदी के जल में वृक्ष की छाया पड़ने से ऐसा लगता है मानों वे तरल चित्रसारी में चित्रित किये गए हैं। तट पर अनेक झोपड़े बने हैं। झोपड़े दुःख से जले हुए विषद खंडहरों के समान प्रतीत होते हैं।इनकी दशा दयनीय है। विशाल तट पर दूर - दूर हुई झोपड़ियाँ ऐसा लगती है मानों आकाश में धुंधले मेघ खंड बिखर गए हैं। 

कालिमा बिखरती है संध्या के कलंक सी,
दुन्दुभि-मृदंग-तूर्य शांत स्तब्ध,मौन हैं .
फिर भी पुकार सी है गूँज रही व्योम में -
"कौन लेगा भार यह ?कौन विचलेगा नहीं ?

व्याख्या - कवि कहता है कि जैसे जैसे सूर्य डूबता जा रहा है ,पृथ्वी पर वैसे वैसे अन्धकार बढ़ता जा रहा है। यह अन्धकार संध्या के समय सुनहरे तथा सुन्दर वातावरण के लिए एक कलंक के समान है। इस समय दुदुंभी ,मृदंग ,सूर्य आदि वाद्य यत्रों की ध्वनि शांत है अर्थात कहीं से कोई आवाज नहीं आ रही है। इससे हर जगह मौन छाया हुआ है। इस स्तब्ध तथा मौन वातावरण को भंग करती हुई एक पुकार सम्पूर्ण वातावरण में गूँज रही है।  इस मौन वातावरण में पेशोला के तट पर महाराणा प्रताप का स्वर गूँज रहा है कि अब वह मेवाड़ छोड़कर जा रहे हैं उनका उत्तरदायित्व कौन संभालेगा ? अब कौन व्यक्ति है जो कठिन समय में भी विचलित नहीं होगा। 

दुर्बलता इस अस्थिमांस की -
ठोंक कर लोहे से,परख कर वज्र से,
प्रलयोल्का खंड के निकष पर कस कर 
चूर्ण अस्थि पुंज सा हँसेगा अट्टहास कौन?
साधना पिशाचों की बिखर चूर-चूर होके 
धूलि सी उड़ेगी किस दृप्त फूत्कार से?

व्याख्या - कवि कहता है कि गूंजती हुई पुकार पूछ रही हैं कि इस अस्थिमांस के व्यक्तित्व की दुर्बलता पर कौन अट्टहास करेगा। अर्थात वृद्धावस्था की दुर्बलता के कारण वह मेवाड़ का त्याग कर रहे हैं। अब उनके स्थान पर कौन व्यक्ति है जो लोहे से ठोक ,ब्रज से परख कर ,प्रलयकालीन उल्का के खण्डों की कसौटी पर कसकर अपनी हड्डियों की चूर्ण राशि पर हँसते हुए इसकी रक्षा का भार लेगा। ऐसा कौन व्यक्ति होगा जिसकी क्रोधाग्नि में दर्प जैसी फुत्कार से राक्षसों की साधना को चूर चूर कर देगा अर्थात उनके षड्यंत्रों को नष्ट कर देगा। 

कौन लेगा भार यह?जीवित है कौन?
साँस चलती है किसकी कहता है कौन ऊँची छाती कर,
मैं हूँ -मैं हूँ- मेवाड़ में,
अरावली श्रृंग-सा समुन्नत सिर किसका?
बोलो कोई बोलो-अरे क्या तुम सब मृत हों ?

व्याख्या - महाराणा प्रताप की प्रतिध्वनि पुकार -पुकार कर रही है कि उनके स्थान पर अब कौन उनका उत्तराधिकारी होकर आजादी सम्बन्धी दायित्व का निर्वाह करेगा ? सच्चे अर्थों में आज मेवाड़ में कौन जीवित है ,जिसकी सांस चल रही है। भाव है कि कौन जीवित व्यक्ति है जो साहसपूर्वक आकर यह कह सके कि अब वह मेवाड़ की रक्षा करेगा। अरावली की भाँती कौन अपना सर ऊँचा करके कह सकता है कि देश की स्वतंत्रता को वह झुकने नहीं देगा। बोलो ! कोई तो बोलो ? क्या तुम सब मृत हो ?


आह,इस खेवा की!- 
कौन थमता है पतवार ऐसे अंधर में 
अंधकार-पारावार गहन नियति-सा- 
उमड़ रहा है ज्योति-रेखा-हीन क्षुब्ध हो!
खींच ले चला है -
काल-धीवर अनंत में,
साँस सिफरि सी अटकी है किसी आशा में .

व्याख्या - पुकार उठ रही है कि आह इस विकट परिस्थिति में आज कोई भी ऐसा व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा है जो इस देश की नौका की खेने का भार उठा सके। क्या कोई इस देश की पतवार नहीं थामेगा ? वास्तव में चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार फैलता जा रहा है। यह अन्धकार का सागर प्रतिक्षण गहरा होता जा रहा है। वह सब नियति का निष्ठुर खेल है जिसके कारण कोई भी इस देश की पतवार थामने को तैयार नहीं है। इस कारण निराशा की रेखाएं भयंकर होती जा रही है। प्रताप का मन इसीलिए अधिक चिंतित और दुखी है क्योंकि उसे कोई शक्तिशाली उत्तराधिकारी प्राप्त नहीं है।इस कारण मेवाड़ की रक्षा सम्बन्धी उसकी समस्त आशाएं धूमिल होती जा रही है। कवि कहता है कि मृत्यु रूपी मछुआ राणा प्रताप को अनंत मृत्यु लोक की ओर खींच कर ले जा रहा है परन्तु उसकी सांस मछली की भाँती इसी आशा में अटकी है कि शायद कोई उत्तराधीकारी के रूप में कह दें कि मेवाड़ की रक्षा की भार वह उठाएगा। 


आज भी पेशोला के-तरल जल मंडलों में,
वही शब्द घूमता सा-गूँजता विकल है .
किन्तु वह ध्वनि कहाँ ?गौरव की काया पड़ी माया है प्रताप की 
वही मेवाड़! किन्तु आज प्रतिध्वनि कहाँ है?

व्याख्या - महाराणा प्रताप के निराशा भरे शब्द आज भी पेशोला की जल चक्रों में घूम रहे हैं। आज भी उनके शब्दों की व्याकुल ध्वनियाँ जब भवरों में चक्कर काट रही है किन्तु उस गौरवशाली मेवाड़ दुर्ग में ,जो प्रताप का निजी धन था ,उनके शब्दों की गूँज नहीं है। भाव यह है कि मेवाड़ दुर्ग के प्रकोष्ठों में विलासिता के कारण महाराणा के शब्द भी खो गए हैं जबकि पेशोला के जल पर आज भी वे तरल रूप में तैर रहे हैं। उसमें उठने वाली भंवरे प्रताप की व्याकुल ध्वनियों की गूँज की प्रतिक हैं। 


पेशोला की प्रतिध्वनि का सारांश peshola ki pratidhwani 

पेशोला की प्रतिध्वनि शीर्षक कविता एक आख्यान गीत है।पेशोला की प्रतिध्वनि कविता लहर काव्य संग्रह में संग्रहित है। इसमें महाराणा प्रताप के अंतिम समय का दृश्य उपस्थित किया गया है। १५७२ ई. में महाराजा उदय सिंह की मृत्यु के बाद महाराणा प्रताप सिंह मेवाड़ के सिंहासन पर विराजमान हुए। स्वाधीनता की रक्षा के लिए वे सम्राट अकबर और उसकी सैन्यशक्ति से निरंतर जूझते रहे। अकथनीय कष्टों को सहकर भी स्वतंत्रता की ज्योति को उन्होंने जीवन के अंतिम समय तक आलोकित रखा। वे आरावाली पर्वत मालाओं के मध्य सिंह की तरह विचरण करते थे। अपार कष्ट सहकर भी उनके दुर्दानीय स्वभाव ने आत्म समर्पण नहीं किया। उनके यौवनपर्यंत ,मुगलों द्वारा मेवाड़ विजय का स्वपन सपना ही रहा।
पेशोला की प्रतिध्वनि
पेशोला की प्रतिध्वनि

उनका विश्वास था कि जब तक राजपूत महलों के भोग विलास में तल्लीन नहीं होते तब तक उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता। मृत्यु के करीब आने पर उन्हें स्वभावतः भविष्य की चिंता सताने लगी। उनके सामने एक ही प्रश्न चिह्न था - मेरे बाद क्या होगा ? यह चिंता इसीलिए भी विशेष रूप से थी कि उन्हें अपने पुत्र अमर सिंह से विशेष आशा नहीं थी। इस आंशका का जन्म एक साधारण सी घटना से हुआ था। कर्नल टॉड ने लिखा है कि अमर सिंह एक बार अपने पिता से मिलने पेशोला झील के तट पर आये। उन्हें इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि झोपड़ी की छत नीची है और उन्हें झुककर चलना चाहिए।परिणामस्वरुप जब वे लौटने लगे तो उनका साफा छत से निकले हुए एक बांस में उलझकर खींचता चला गया। इस पर महाराणा प्रताप की निगाह गयी और उन्होंने सोचा कि जो व्यक्ति अपने सर के साफे को नहीं संभाल सकता ,वह राज्य सिंहासन को कैसे संभाल सकेगा? पेशोला झील के तट पर महाराणा प्रताप का अंतिम पौरुषपूर्ण स्वर गूंजता है - कौन लेगा भार यह ? घोर चुप्पी से युक्त वातावरण में जैसे कोई कह रहा है ,उनके वीर सैनिकों में कौन ऐसा पराक्रमी योद्धा है जो मेवाड़ की रक्षा का दायित्व वहन करेगा तथा मेवाड़ को मुगलों की पराधीनता से आजाद कराएगा। वह कौन है जो बाधाओं के सम्मुख धैर्य और साहस के साथ अविचल रहेगा। मेवाड़ के योद्धाओं में वह कौन पराक्रमी वीर है जो आगे आकर यह कहने का साहस करता है कि मेवाड़ की आजादी का शेष दायित्व उसके कन्धों पर है। 

पेशोला की प्रतिध्वनि कवि का संदेश

पेशोला की प्रतिध्वनि शीर्षक आख्यान गीत में कवि ने राणा प्रताप के माध्यम से भारतीय गौरव के एतिहासिक दस्तावेज़ के एक पृष्ठ को खोला है तथा शौर्य ,पराक्रम ,त्याग और बलिदान को देशवासियों के सम्मुख रखकर उन्हें जगाने का प्रयास किया है।इसमें कवि भारतीय इतिहास के गौरवशाली ,स्वनामधन्य योद्धा और वीर महाराणा प्रताप का स्मरण कर देश की वर्तमान दयनीय अवस्था पर आंसू बहाता है। प्रस्तुत कविता में मेवाड़ की गौरव गाथा सांकेतिक है। प्रताप के देश पर आज संकट के मेघ मंडरा रहे हैं।उन्हें पुनः प्रताप जैसे युद्धवीर की आवश्कता है। आज इस वीर भूमि से वीरता कहाँ चली गयी है। आज तो चारों ओर स्तब्धता और शून्यता है। हर जगह संध्या के कलंक की कालिमा उतरी हुई है।पेशोला की उर्मियाँ शांत है ,झोपड़ें विषाद के शिल्प से बने दग्ध अवसाद के सदृश्य खड़े हैं।प्रकृति ने भी उदासी की चादर ओढ़ ली है।कवि प्रश्न करता है - अस्थि मांस की दुर्बलता लेकर इस मेवाड़ में कौन ऐसा है जो छाती ऊँची करके कह सके कि लोहे से ठोंक कर और व्रज से परीक्षा कर यह परख लिया जाए कि क्या वह पिशाचों की लीला को विखेर कर चूर - चूर कर देगा और उन्हें धुल सा उड़ा देगा। कवि पुनः प्रश्न करता है - कोई बोलता क्यों नहीं ? क्या सब मर गए हैं ? क्या इस अंधड़ में ,अन्धकार के सागर में कोई पतवार थामनेवाला नहीं हैं।कवि की आशा उसी की खोज में उस क्षीण ज्योति के लिए क्षुब्ध होकर अटकी है। लेकिन कवि अंत में पुनः दुत्कार भरा आत्मीय संबोधन कर पूछता है - 

गौरव की काया पड़ी माया है प्रताप की 
वही मेवाड़!
किन्तु आज प्रतिध्वनि कहाँ है?"

वस्तुतः आज गौरवशाली प्रताप की प्रतिध्वनि भी सुनाई नहीं देती है। 
इस प्रकार प्रस्तुत कविता में कवि ने ने मातृभूमि की दुर्दशा का चित्रण कर पराधीन भारत के नवयुवकों को राष्ट्रीय भावना से उद्देलित करने की कोशिश की है। यह कविता प्रसादजी की राष्ट्रीयता तथा देश प्रेम का सशक्त ,ज्वलंत उदाहरण है। इसके द्वारा कवि ने ब्रिटिश शासन की अधीनता से देश को मुक्त कराने का भी सराहनीय प्रयास किया है। 


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