पाजेब जैनेन्द्र कुमार

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पाजेब जैनेन्द्र कुमार Pajeb by Jainendra Kumar पाजेब कहानी की शैली पाजेब कहानी की समीक्षा पाजेब कहानी में बाल मनोविज्ञान पाजेब में अंतर्निहित बाल मनोविज्ञान pajeb story by jainendra kumar summary जैनेंद्र की कहानी पाजेब pajeb jainendra kumar Pajeb by Jainendra Kumar पाजेब जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा लिखी गयी एक बाल मनोवैज्ञानिक कहानी है।पाजेब कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गयी कहानी है।

पाजेब जैनेन्द्र कुमार
Pajeb by Jainendra Kumar


पाजेब जैनेन्द्र कुमार पाजेब कहानी की शैली पाजेब कहानी की समीक्षा पाजेब कहानी में बाल मनोविज्ञान पाजेब में अंतर्निहित बाल मनोविज्ञान pajeb story by jainendra kumar summary जैनेंद्र की कहानी पाजेब pajeb jainendra kumar  Pajeb by Jainendra Kumar पाजेब जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा लिखी गयी एक बाल मनोवैज्ञानिक कहानी है।पाजेब कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गयी कहानी है।आपके साहित्य में दर्शन और मनोविज्ञान का समावेश है। इनकी कहानियों में बाहरी और स्थूल कार्यकलापों की अपेक्षा अंतर्मन के उद्घाटन पर विशेष जोर दिया गया है। इसीलिए इनकी कहानियों में व्यक्तित्व की प्रधानता है। बच्चों में देखा देखी की आदत होती है।यही नक़ल का रुप ले लेती है। कहानी के प्रारम्भ में मुन्नी ने जब पड़ोस की संग सहेलियों को नए किस्म की पाजेब पहने देखा तो हठधारण कर लिया कि उसे भी वैसे ही पाजेब चाहिए। माता -पिता को बाल हठ के सामने झुकना पड़ता है। दोपहर को बुआ आई। उसने अगले इतवार को पाजेब लाने का वायदा किया। बच्चे जल्दी बहल जाते हैं। इतवार को बुआ पाजेब ले आई। मुन्नी पाजेब पहन कर खुश हो गयी। घर - आँगन ,बाहर-भीतर ,घूमती फिरी।  सबसे प्रशंसा पाने के लिए सबको दिखाती फिरी। भाई आशुतोष भी खुश हुआ। बच्चों में भोलापन तो होता ही है ,साथ ही ईर्ष्या ,हठ और रूठना जैसी आदतें भी होती है। आशुतोष ने साइकिल की फरमाईश कर डाली। बुआ ने जन्मदिन पर साइकिल दिलाने का वायदा किया तो वह मान गया। पाजेब का उत्साह थोड़ी देर में समाप्त हो गया। पाजेब उतार कर रख दी गयी। 
पाजेब जैनेन्द्र कुमार
पाजेब जैनेन्द्र कुमार

एक दिन पाजेब न मिलने पर उसकी खोज हुई।माता - पिता ने बंसी नौकर पर शक किया। जब उसने इनकार कर दिया कि उसने पाजेब नहीं ली तो बेटे आशुतोष पर शक किया। शक भी बिना किसी आधार बिना किसी तर्क और छानबीन की। आशुतोष अचानक प्रश्नों की बौछार से बचने के लिए कभी कुछ उत्तर देता कभी कुछ। वह डांट और मार से बचना चाहता था। पिता सच उगलवाने के लिए साम दाम दंड भेद सभी नीतियाँ अपना रहे थे। बालक तन के कोमल और मन के पवित्र होते हैं। वे झूठ बोलने में माहिर नहीं होते। पिता ने जब पडोसी बालक छुन्नू का नाम लिया तो आशुतोष ने जाने बचाने के समर्थन में सर हिला दिया। जब उसे छुन्नू से पाजेब लाने को कहा गया तो आशुतोष ने कहा ,उसके पास नहीं हुई तो वह देगा कहाँ से। 

आशुतोष को पतंग का शौक था। फिर पतंग वाले पर शक हुआ। जब आशुतोष ने पतंग वाले के पास जाने से इनकार कर दिया। उधर छुन्नू की माँ ने भी छुन्नू की पिटाई कर डाली। आड़े - तिरक्षे प्रश्नों से सत्य को कबूल करवाने की कोशिश की गयी। अंत में जब आशुतोष को पकड़ कर जबरदस्ती पतंगवाले के पास लेकर जा रहे थे ,उसी समय बुआ जी आ जाती है। उनके पास कुछ जरुरी कागजात थे। वे अपनी वास्कट की जेब से पाजेब निकाल कर रख देती है और कहती है कि वह भूल से उसके साथ चली गयी थी। पाजेब को देखकर सब हतप्रभ रह जाते हैं। 

पाजेब कहानी का उद्देश्य 

पाजेब कहानी के माध्यम से जैनेन्द्र कुमार जी ने पाठकों को यह दिखाना चाहते हैं कि माता पिता या अभिभावक कभी कभी बिना सोचे समझे अपने अनुभव या आयु के महत्व को दर्शाने के लिए बच्चों पर ऐसे आरोप थोप देते हैं जो असत्य होते हैं। बच्चे भय के कारण उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। उन्हें स्वयं भी दुःख होता हैं ,लेकिन अपने बड़ों के सामने वे व्यक्त नहीं कर पाते हैं। अतः माता - पिता को बिना सोचे समझे बच्चों पर संदेह नहीं करना चाहिए। इससे बच्चों के मन में माता - पिता के लिए गलत धारणाएं बन जाती है। वह माता - पिता को शत्रु भी समझने लगते हैं। बार - बार विवश करने पर बच्चा झूठे आरोप को स्वीकार कर लेता हैं जिसे माता - पिता अपनी उपलब्धि समझते हैं। बच्चे को इस प्रकार विवश करने से उसमें अपराधवृत्ति आ सकती है। खोयी पाजेब आशुतोष की बुआ के पास मिलने पर माता - पिता हतप्रभ रह गए। पर आशुतोष को कोई ख़ुशी नहीं हुई क्योंकि वह उस अपराध की इतनी सजा पा चुका था जो उसने किया ही नहीं था। इस प्रकार पाजेब बालमनोवैज्ञानिक के चित्रण के साथ साथ बच्चों पर बिना सोचे समझे शक करने वाले माता - पिताओं पर एक व्यंग है। 

पाजेब कहानी शीर्षक की सार्थकता 

पाजेब कहानी जैनेन्द्र कुमार की बालमनोवैज्ञानिक कहानी है।  मुन्नी का पाजेब के लिए मचलना बाल हठ है। पाजेब मिलने पर उसका प्रदर्शन तथा बहुत जल्दी मन भर जाना बाल मन की स्वाभाविकता है।बच्चों का कोई भी भाव स्थायी रूप से नहीं रहता है। मुन्नी ने पाजेब पाने की जिद की और पाजेब पाजेब पायी भी। वह ख़ुशी शाम तक शांत भी हो जाती है।पाजेब का शौक पूरा हो जाता है। अब उसे पाजेब से कोई वास्ता नहीं है। जब उसकी पाजेब खोई तो पुरे भर में भूचाल आ जाता है। मुख्य रूप से शक आशुतोष पर ही किया जाता है। अंत में जब बुआ पाजेब निकालकर सबके सामने रखी तो लेखक चौक जाता है।तब लेखक को अपने किये हुआ का पश्चताप होता है। पूरी कहानी में पाजेब छाया हुआ है। अतः पाजेब शीर्षक के माध्यम से लेखक ने अपने उद्देश्य की पुष्टि की है। 

पाजेब कहानी में आशुतोष का चरित्र चित्रण 

पाजेब कहानी जैनेन्द्र कुमार की बालमनोवैज्ञानिक कहानी है।प्रस्तुत कहानी में आशुतोष मुख्य पात्र है। वह लेखक का पुत्र है। वह बहुत भोला - भाला है।जब मुन्नी के लिए पाजेब आती है तो वह भी बड़ा खुश होता है। लेकिन वह भी अपने लिए कुछ मांग कर बैठता है।वह अपनी बुआ से साइकिल की मांग करता है।दुसरे दिन पाजेब  न मिलने पर बंसी नौकर पर शक किया जाता है। उसके इनकार करने के बाद आशुतोष पर शक किया जाता है। कभी प्यार से कभी डांट से ,कभी लालच से उसे सच कबूल करवाया जाता है।वह डर के कारण पाजेब की चोरी की बात स्वीकार तो कर लेता है ,लेकिन वह जानता है कि वह झूठ बोल रहा है।उसे एक के बाद एक अनेकों झूठ बोलने पड़ते हैं। माता -पिता द्वारा ही उसके अपराध में छुन्नू को शामिल करवाया जाता है।वह पतंग वाले के पास पाजेब बेचने की बात स्वीकार कर लेता है। कहानी के अंत में जब बुआ जी आती है तो वह स्वयं पाजेब निकाल कर देती हैं।अतः ऐसी स्थिति में उसे न ख़ुशी होती है न ही वह अपनी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।इस प्रकार आशुतोष एक मासूम ,सरल वृत्ति व सहनशील पात्र है ,जो किसी स्थिति का विरोध नहीं कर पाता है। 


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