इंटरनेट की दुनिया में नागरी प्रचारिणी सभा

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इंटरनेट की दुनिया में नागरी प्रचारिणी सभा इंटरनेट की दुनिया में नागरी प्रचारिणी सभा नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी जो दारानगर कोतवाली के काशी क्षेत्र में स्थित है ,को हमें देश दुनिया की निगाह में देखने झाँकने की अभिलाषा हर किसी विद्वान की जुबान पर कभी न कभी आ ही जाता है आना स्वाभाविक है | तकनीक की दुनिया में लोग अक्सर सोशल साइट फेसबुक का भारत में करीब २४.१ करोड़ यूजर मौजूदा समय में यूजर हैं और साइट पर रचनाएं ,कमेन्ट ,आलेख ,फोटो आदि को पोष्ट करते रहते हैं |

इंटरनेट की दुनिया में नागरी प्रचारिणी सभा


इंटरनेट की दुनिया में नागरी प्रचारिणी सभा नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी जो दारानगर कोतवाली के काशी क्षेत्र में स्थित है ,को हमें देश दुनिया की निगाह में देखने झाँकने की अभिलाषा हर किसी विद्वान की जुबान पर कभी न कभी आ ही जाता है आना स्वाभाविक है | तकनीक की दुनिया में लोग अक्सर सोशल साइट फेसबुक का भारत में करीब २४.१ करोड़ यूजर मौजूदा समय में यूजर हैं और साइट पर रचनाएं ,कमेन्ट ,आलेख ,फोटो आदि को पोष्ट करते रहते हैं | परन्तु यह बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर जब भारत का संविधान बना रहे थे तो उन्होंने विविध संविधानों का अध्ययन किया उन्हीं में जिन संविधानों का अध्ययन किया था उसमे बनारस के दारानगर कोतवाली स्थित नागरी प्रचारिणी सभा का संविधान भी शामिल था | संभवतः लोगों को यह भी पता नहीं होगा कि राज्यसभा की कारवाई के तौर- तरीके सभा के काम करने के तौर - तरीकों जैसे ही है जिस प्रकार भारत का एक प्रधान मंत्री होता है वौसे ही नागरी प्रचारणी सभा के अध्यक्ष को भी प्रधानमंत्री कहते हैं।

विविध आयामों की विशाल साईट विकिपीडिया पर सभा के सन्दर्भ में कहा गया है कि नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी भाषा और साहित्य तथा देवनागरी लिपि की उन्नति तथा प्रचार और प्रसार करने वाली भारत की अग्रणी संस्था है। यह बात सुनने में सामान्य और कम शव्दों की भले ही लगे परन्तु कोई सामान्य बात नहीं है | विश्व पटल पर यह बात अपने आपमें महत्वपूर्ण है | अंकित विकी दस्तावेजनुसार सभा की स्थापना १६ जुलाई, १८९३ ई. को श्यामसुंदर दास जी द्वारा हुई थी। यह वह समय था जब अँगरेजी, उर्दू और फारसी का बोल बाला था तथा हिंदी का प्रयोग करने वाले बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते थे। सर्व विदित है कि इस सभा की स्थापना क्वीन्स कालेज, वाराणसी के नवीं कक्षा के तीन छात्रों - बाबू श्यामसुंदर दास, पं॰ रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने कालेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की थी। सभा के अन्यान्य कार्यो का बिस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है | जैसे हिन्दी विश्वकोश का प्रणयन सभा ने केंद्रीय सरकार की वित्तीय सहायता से किया है। इसके बारह भाग प्रकाशित हुए हैं। देवनागरी लिपि में भारतीय भाषाओं के साहित्य का प्रकाशन और हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं की लिपियों में प्रकाशित करने के लिए योजनाबद्ध रूप से सक्रिय हैं। प्रेमचंद जी के जन्मस्थान लमही (वाराणसी) में उनका एक स्मारक भी बनवाया है।

अखिल भारतीय हिंदी साहित्य संमेलन का संगठन और सर्वप्रथम उसका आयोजन भी सभा ने ही किया था। इसी प्रकार, संप्रति हिंदू विश्वविद्यालय में स्थित भारत कला भवन नामक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पुरातत्व और चित्रसंग्रह का एक युग तो संरक्षण, पोषण और संवर्धन यह सभा ही करती रही। अंततः जब उसका स्वतंत्र विकास यहाँ अवरुद्ध होने लगा और विश्वविद्यालय में उसकी भविष्योन्नति की संभावना हुई तो सभा ने उसे विश्वविद्यालय को हस्तांतरित कर दिया।

हीरक जयंती पर सभा के ६० वर्षीय इतिहास के साथ हिंदी तथा अन्यान्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का इन ६० वर्षों का इतिहास, नारीप्रचारिणी पत्रिका का विशेषांक, हिंदी शब्दसागर का संशोधन-परिवर्धन तथा आकर ग्रंथों की एक पुस्तकमाला प्रकाशित करने की सभा की योजना थी। यथोचित राजकीय सहयोग भी सभा को सुलभ हुआ, परिणामतः सभा ये कार्य सम्यक् रूप से संपन्न कर रही है।

अमरउजाला दैनिक नें लिखा कि सितम्बर 14, 2015 - खड़ी बोली हिंदी को आकार देने वाली नागरी प्रचारिणी सभा, आज बदहाली के दौर से गुजर रही है। हिंदी के प्रचार और शोध के लिए 16 जुलाई, 1893 में स्थापित संस्था नागरी प्रचारिणी सभा.|दैनिक जागरण फरवरी 17, 2013 - जागरण संवाददाता, आगरा: नागरी प्रचारिणी सभा में हिंदी साहित्य और भाषा का संगम होता है। इसी उद्देश्य और हिंदी के प्रसार के लिए ही सभा की स्थापना की गई है। वही फेशबुक काम में कहा गया कि - हिन्दी के महान सेवक : बाबू श्यामसुन्दर दास डॉ॰ श्यामसुंदर दास (सन् 1875 - 1945 ई.) हिंदी के अनन्य साधक, विद्वान्, आलोचक और शिक्षाविद् थे। हिंदी साहित्य और बौद्धिकता के पथ-प्रदर्शकों में उनका नाम अविस्मरणीय है। हिंदी- क्षेत्र के साहित्यिक -सांस्कृतिक नवजागरण में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है |
नागरी प्रचारिणी सभा
नागरी प्रचारिणी सभा

काशी नागरी प्रचारिणी सभा की दयनीय हालत ये तस्वीरें काशी नागरी प्रचारिणी सभा के आर्य भाषा पुस्तकालय की हैं। ... आप हिंदी साहित्य के इतिहास पर काम कर रहे हों या औपनिवेशिक उत्तर भारत के राजनीतिक सामाजिक इतिहास पर; तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं, ग्रन्थों और हिंदी के अनेक साहित्यकारों के निजी संग्रह आपको यहीं मिलेंगे। ... 'सरस्वती' के यशस्वी संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी सरीखे हिंदी के तमाम साहित्यकारों ने अपना समूचा निजी संग्रह (पत्राचार सहित) भी सभा को दे दिया था।

नागरी प्रचारिणी सभा ....विश्व बाजार में में हिंदी में नागरी प्रचारणी सभा को भी अग्रणी रूप में देखा जाने लगा है | यद्यपि देश के अन्यान्य कोनों में इंटरनेट की सुचारू सुविधा का अभी भी अभाव है | यही वजह है कि लोग मानते हैं कि इंटरनेट का इस्तेमाल मात्र अमीर और मध्यम वर्गीय लोग ही कर रहे हैं | जब की ऐसा नहीं है |आप कहीं सफर में निकलें जहां भी देखें तो युवाओं को इंटरनेट पर ही देखेंगे | विकी खोज में अभी भी बहुत कुछ कार्य का सम्पादन शेष होना है ऐसा अनुमान है उन बची हुए कार्यों को भी संस्था पूर्ण कराने में सफल होगी | जैसेनागरीप्रचारिणी सभा : संक्षिप्त परिचय नागरी प्रचारिणी सभा की भाषा-नीति हिंदी शब्दसागर - हिन्दी शब्द देवनागरी या रोमन में लिखकर उनके अर्थ ढ़ूँढ़िये।हिन्दी विश्वकोश - इसके निर्माण में नागरी प्रचारिणी सभा का प्रमुख योगदान है।हिन्दी का विकास और नागरी प्रचारिणी सभा काशी से ही अदालती भाषा का मिला आसन आदि कार्य संस्था कराने में संलिप्त होगी ऐसा मेरा अपना विचार है |http://m.bharatdiscovery.org/india/ साईट पर भी सभा ........ में 16 जुलाई, 1893 को इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने निर्धारित की और आधुनिक हिन्दी के जनक भारतेन्दु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई 'बाबू राधाकृष्ण दास' इसके पहले अध्यक्ष हुए। काशी के 'सप्तसागर मुहल्ले' के घुड़साल में इसकी बैठक होती थीं। बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना। पहले ही साल जो लोग इसके सदस्य बने उनमें महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी, इब्राहिम जार्ज ग्रियर्सन, अंबिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे भारत ख्याति के विद्वान् थे।

युवा-मन में अमित कुमार यादव ने पंडित मदनमोहन मालवीय जी पर चर्चा में  लिखा - नागरी प्रचारिणी सभा से वे अन्त तक जुड़ कर हिन्दी के लिए कार्य करते रहे। हिन्दी शब्द सागर की पूर्ति पर उन्होंने सभा के नये भवन का शिलान्यास किया था। प्रस्तर मंजूषा में ताम्र पर मालवीयजी के संबन्ध मे लिखा गया -इस स्थल पर नागरी प्रचारिणी सभा काशी के नवीन भवन का शिलान्यास संस्कार माघ शुक्ल ५ सं. १९८५ विक्रमी को महामना पं मदन मोहन मालवीय के कर कमलों से संपन्न हुआ।

मालवीयजी स्वयं भी रचनाकार थे। बाल्यकाल से ही वे `मकरन्द' नाम से लिखते थे तथा उनकी रचनाओं का प्रकाशन बाल कृष्ण भट्ट के हिन्दी प्रदीप में होता था। बी.ए. पास करने के बाद ही उन्होंने इलाहाबाद में साहित्य समाज की स्थापना की थी जहाँ साहित्य चर्चा तथा हिन्दी प्रचार का कार्य होता था।हिंदी कुञ्ज काम में बाबू श्यामसुन्दर दास हिंदी के पारखी लेखक सुखमंगल सिंह ,प्रथम संस्मरण -हिंदी साहित्य का इतिहास -रामचन्द्र शुक्ल आदि ने भी नागरी प्रचारणी सभा को विश्व पटल पर स्थापित करने में अहम् भूमिक का कार्य किया |

प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में सन १८९३ से सन १९१३ तक में -
१- नागरी नीरद : 1893, साप्ताहिक, मिर्जापुर, संपादक : बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'

२- नागरीप्रचारिणी पत्रिका : 1896, त्रैमासिक, कशी, संस्थापक : श्यामसुंदरदास, रामनारायण मिश्र, शिवकुमार सिंह

३-उपन्यास : 1898, काशी, मासिक, संपादक : पं० किशोरीलाल गोस्वामी;

४- सरस्वती : 1900, मासिक, इलाहाबाद (प्रारंभ में काशी से); संपादक : श्याम सुन्दर दास व चार अन्य (1900-03), महावीर प्रसाद द्विवेदी (1903-20), पं० देवीदत्त शुक्ल (1920-47), प्रकाशन काल : (1900-82)

५- सुदर्शन : 1900, मासिक, काशी, संपादक : देवकीनंदन खत्री, माधवप्रसाद मिश्र

६- समालोचक : 1902, जयपुर, संपादक : चंद्रधर शर्मा गुलेरी

७- अभ्युदय : 1907, साप्ताहिक, प्रयाग, संपादक : मदनमोहन मालवीय

८- इन्दु : 1909, मासिक, वाराणसी, संपादक : अम्बिका प्रसाद गुप्त, रूप नारायण पाण्डेय; जयशंकर प्रसाद की आरंभिक रचनाओं को प्रकाशित करने का श्रेय।

९- मर्यादा : 1910, 1921-23, मासिक, वाराणसी, संपादक : कृष्णकांत मालवीय, पद्यकांत मालवीय, लक्ष्मीघर बाजपेयी।

१०- प्रताप : 1913, साप्ताहिक, कानपुर से प्रकाशित, संपादक : गणेश शंकर विद्यार्थी

११- प्रभा : 1913, मासिक, खण्डवा (कानपुर), संपादक : कालूराम, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', माखनलाल चतुर्वेदी आदि | नागरी प्रचारिणी सभा, बनारस (काशी). सन्‌ 1896 में नागरी प्रचारिणी पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ।

नागरी प्रचारिणी सभा, बनारस (काशी) सन्‌ 1896 में नागरी प्रचारिणी पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। इसके इसके संस्थापक श्री वेणी प्रसाद थे। बाबु श्यामसुंदर दास पं. सत्यनारायण मिश्र और ठाकुर शिवदान सिंह के प्रयत्नों के फलस्वरूप 16 जुलाई, 1897 को काशी में ’नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इसके कार्यकत्ताओं के प्रयास से 1898 ई. में कचहरियों में नागरी का प्रवेश हुआ और आवेदन-पत्र सम्मन आदि हिन्दी में लिखे जाने लगे। आर्य भाषा पुस्तकालय की स्थापना की गई इसमें विभिन्न भाषा-भाषाओं की पुस्तकें तथा पाण्डुलिपियाँ संगृहित हैं|


- सुखमंगल सिंह

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