गुब्बारे वाला बच्चा

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गुब्बारे वाला बच्चा गुब्बारे वाला बच्चा आज श्रद्धा का दिमाग बिल्कुल ही खराब हो चुका है।कभी घर के काम कभी ऑफिस की डांट।पति था की कुछ समझता ही नहीं।खुद की कमाई से तो घर चलता नहीं।आधी जिम्मेदारी श्रद्धा के कंधों पे थी।ऐसे अपने पेशे में वो खुद भी आगे बढ़ने को इच्छुक थी।

गुब्बारे वाला बच्चा


गुब्बारे वाला बच्चा आज श्रद्धा का दिमाग बिल्कुल ही खराब हो चुका है।कभी घर के काम कभी ऑफिस की डांट।पति था की कुछ समझता ही नहीं।खुद की कमाई से तो घर चलता नहीं।आधी जिम्मेदारी श्रद्धा के कंधों पे थी।ऐसे अपने पेशे में  वो खुद भी आगे बढ़ने को इच्छुक थी।हमेशा से ही।उसने शादी के पहले ही रोहन को बोल दिया था कि वो अपनी नौकरी नहीं छोड़ेगी और आगे बढ़ेगी अपने पेशे में।पर उसे नहीं पता था कि रोहन इस बात का फायदा उठाने लगेगा।और उसि पे ज्यादा जीमेदारी आ जाएगी।ऊपर से सास ससुर!उफ़! पूरे दिन उनके सवालों का सामना करो।कब आओगी कब जाओगी?खाना पीना?वगैरह वगैरह!!ओह!

श्रद्धा घर से निकल यूंही सुनसान राहों पे पैदल चलने लगती है।क्या ज़िन्दगी दी है भगवान ने।कोई मेरे लिए नहीं सोचता। मैं घर की जरूरतें पूरी करते करते खुद को खो बैठी हूं।ना खाने की सुध है ना आराम।यहां सबको मुझसे काम है पर मेरी किसी को मेरी नहीं पड़ी।

वहीं से एक बच्चा 🎈 गुब्बारे बेचता हुआ जा रहा था।उसने कहा दीदी लेलो- 10की ही है। श्रद्धा बोली- मैं कोई बच्चि दिखती हूं तुम्हें?गुब्बारे से खेलूंगी।जाओ यहां से।मेरा दिमाग पहले से ही खराब है।
गुब्बारे वाला बच्चा
गुब्बारे वाला बच्चा

बच्चा बोला - दीदी खेल ही लो।हंसने खेलने से दिमाग अच्छा हो जाता है।
श्रद्धा गुस्से में बोली - तेरा दिमाग ठीक करूं मैं!पढ़ने की उम्र में मां बाप ने रोड़ पे गुब्बारे बेचने भेज दिया।तू मुझे सिखाने चला है।

बच्चा हंस के बोला - दीदी मैं समझ गया आपका दिमाग क्यू खराब है।आप ना खुद ही सब सोच लेते हो।पूछते  ही नहीं,जानते ही नहीं। श्रद्धा सकपका के उसे देखने लगी।

बच्चा बोला - जरूरी तो नहीं मैं यंहा गुब्बारे बेच रहा हूं तो मेरे मां बाप खराब हो गए। मैं रात्रि कक्षा में पढ़ता हूं। मां तो मुझे जन्म देते मर गई।बाबू जी मजदूर हैं।आजकल बीमार हैं तो मुझे रात्रि कक्षा में भेज रहे हैं। मैं थोड़ा काम कर लेता हूं।खाना भी तो मिलना चाहिए ना दीदी।और देखो मैं गुब्बारे बेचते बेचते गणित सीख रहा हूं फिर वो खिलखिला के हंस पड़ा।

श्रद्धा को लगा जैसे वो  सबसे समझदार , बिना शिकायतों से घिरा ,खुशहाल बच्चा हो।और उसके पढ़े लिखे पैसे किसी चीज का कोई मोल नहीं।

वो बैठ कर बच्चे का हाथ थाम लेती है।मुझे ये सारे गुब्बारे दे दे।मुझे ही ज़िन्दगी का हिसाब सीखने की सबसे ज्यादा जरूरत है। बच्चा खुश हो जाता है।उसने कभी 200रुपए एक साथ नहीं कमाए थे। श्रद्धा भी बेहद खुश थी क्यूंकि उसने कभी ज़िन्दगी को समझा ही नहीं बस शिकायते हीं की थी।

लौट कर उसने देखा घर में सब उसे ढूंढ रहे थे।रोहन उसे देखते हीं खुश हो गया। कंहा चली गई थी?हम सब परेशान थे।तुम ये नौकरी छोड़ दो।इतना परेशान रहती हो।हम कम में रह लेंगे पर खुश रहेंगे। मैं तो कब से ये कहना चाहता था।पर शादी के पहले की तुम्हारे काम ना छोड़ने की शर्त के कारण चुप था।पर बहुत हुआ।मां भी कह रहीं थी कि तुम जहां जिसमें खुश हो मैं करने दूं।उन्हें लगता है तुम मेरे  कारण काम नहीं छोड़ रही।तभी सासू मां आ गई।बोली अरे बहू मैं तो दिन रात तुम्हारे आने जाने का पूछते रहती हूं कि आजकल जमाना ठीक नहीं।पता रहे कहां हो।कोई जरूरत हो तो मैं हूं ना।बूढ़ी हूं पर हमेशा तुम्हारे साथ हूं।

श्रद्धा का गला भर आया।वो सबको किस नजरिए से देख रही थी अबतक।उसने गुब्बारे दिखाते हुए कहा मैं ऐसे भर के फूल गई थी।फिर सोचा बिना बात के भरी बैठी हूं।ये तो बहुत हल्की परेशानी है।क्यूं ना इसे हवा में उड़ा दूं। उसने सारे गुब्बारे हवा में उड़ा दिए।और आजाद हो गई अपने बनाए सोचो से।रोहन और मां जी भी हल्के हो गए।उसे खुश देख। सबकी आंखों में खुशी थी और श्रद्धा की आंखो में धन्यवाद ईश्वर के लिए जो उसे गुब्बारे वाले बच्चे में दिखे थे।

          समाप्त



- प्रेरणा सिंह

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