गांधी के बहाने एक नज़र अपनी भी

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गांधी के बहाने एक नज़र अपनी भी सफाई पसंद गांधी जी,सफाई और देखभाल का श्रेय बिल्लियों को देते हैं,जो अपने बच्चों को सफाई से रखती है,हमेशा अपने साथ रखती है खुद से चिपकाए और पखाना के बाद अपने पंजों से मिट्टी खोद उसे ढक देती है।

गांधी के बहाने एक नज़र अपनी भी


भारत एक महान लोकतंत्र और उसके महान नेता गांधी वह जल हैं,जो गंगा भी नहीं। इनमें जितनी बार डुबकी लगाइए उतनी बार कुछ न कुछ अनमोल ही हाथ आएगा,और जाएगा कुछ भी नहीं बह कर,बल्कि आपको समृद्ध बनाएगा। इस तरह से गांधी हर गलत का विरोध करते हैं,जो एक बेहतर समाज और देश के लिए उचित नहीं। वे जातिवाद और उसके बंधन का विरोध करते हैं। गांधी कहते हैं -सभी अपने अपने भंगी बने,अपनी गंदगी खुद साफ करें। ऊँच-नीच यानि सभी समुदाय एक दूसरे परिवारों में विवाह करें, जिससे एक दिन ऐसा होते होते यह विभेद ही खत्म हो जाए, जिसमें लोकतंत्र की असली झांकी दिखे। अब आप कहीं भी निगाह दौड़ाएँ और खुद से पूछें- क्या हम लोकतंत्र की झांकी देख पा रहे हैं?
महात्मा गाँधी 

वे कहते हैं -धर्म का मतलब है किसी की हत्या न करना।चोरी न करना। मनुष्य का सबसे प्रमुख धर्म है अहिंसा। हिंसा और ढोंग अधर्म है। जो मनुष्य और पशु के बीच संभव है । हालांकि ये दो जीव अक्सर उलट स्थिति भी देखने को मिल जाती हैं,तब यह लगता है कि यह कोई खेल हैं, इस हिंसक संसार का,जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करता है,तब वह मनुष्य नहीं जानवर की श्रेणी में आता है,और वह चार पैरों वाला आदमी सा,कुत्ते इसी मनुष्यता की मिसाल हैं, अपने मालिक के प्रति वफादार। मनुष्य को भी एक वफादार प्राणी होना चाहिए, कम-से-कम अपने देश के प्रति और अपने परिवार के प्रति वहीं दूसरी ओर भारत एक कृषि प्रधान -किसानों देश है। जहाँ नब्बे प्रतिशत किसान अन्न उपजाते हैं और बाकी दस प्रतिशत अन्य उद्योगों धंधे ( यह आज की बात नहीं,आज उलट स्थिति है 2019 में) आज किसानों की आत्महत्याएँऔर उनकी ही जमीन उनसे छीन लेने की तीकड़मों पर गांधी होते तो क्या करते?

आजाद भारत की राजनीति में सक्रीय भूमिका निभाने वाला एक संत, राजनीतिज्ञ,जो धार्मिक ग्रंथ गीता के साथ साथ टालस्टाय,रस्किन,बुर्नोह,डार्विन को समझता और अपने चित्त में उतारता एक ऐसा इतिहास रचता है,जिसे भारत से अलग कर देखा ही नहीं जा सकता,और ना ही कोई दूसरा मोहनदास गांधी हो सकता है। 

आज के परिदृश्य में गांधी एक जंजाल हो जैसे,इस तरह कि आज ऐसे अभिभावक हैं, जो यह कहते पाए जाते हैं कि 'बहुत गांधी बनने की जरूरत नहीं।' यह सुनते ही एक बात मन में आती है कि आज नैतिक शिक्षा-ज़ग का भला -दूसराें का भला, बसुधैव कुटुंबकम् की भावना से मिलेगा क्या? क्या गांधी एक थोथा चना मात्र रह गए हैं, जिन्हें अपना कर हम गड्ढे में गिर सकतें हैं? तो यह रिस्क क्योंकर लेना? यह सोच जो पल्लवित -पुष्पित हो रहीं है आज। संबंध भी बाजार की जद् में आ गए हैं। स्वार्थ चरम पर है,तो ऐसे वाक्य स्वाभाविक ही लगते हैं,साथ ही बेचैन भी करते हैं।इस सबके साथ साथ तथ्य और संतोष की बात है कि गांधी के देश में गांधी खारिज़ नहीं हो सकते,जिस तरह नानक,कबीर,सूर तुलसी..

आज जब हम गांधी की 150वीं जयंती मना रहे हैं,तो खुशी इस बात की है कि साहित्यक समाज में गांधी ज्यादा सक्रीय दिखाई दे रहें हैं। गांधी विशेषांक द्वारा गांधी को फिर फिर याद किया जा रहा है, बनिस्पत ज़मीनी और राजनैतिक स्तर पर,जहाँ गांधी सिर्फ़ एक ढोल हैं, जिन्हें जब -तब आवश्यकता अनुसार पीट दिया जाता है,और फिर सब कुछ अपने ढर्रे पर! आज जो देश के हालात हैं मसलन-महिलाओं के साथ अत्याचार- बलात्कार ही देखिए,ऐसे में गांधी क्या चुप बैठने वाले थे? नहीं,वे अनशन करते, अहिंसात्मक उपदेश देते- बेटियों-स्त्रियों के प्रति भावनाओं और जिम्मेदारीयों का एहसास कराते,यही तो हैं गांधी। 

नौजवान देश का भविष्य हैं,और हम आज नहीं समझ रहे कि उन्हें कौन सी दिशा ऊपर उठा सकती है-आगे ले जा सकती है। आज सब कुछ उलट- भ्रामक है-विभेद की भावना ही- राजनीति का पहला और आखिरी अध्याय रह गया है।जब नौजवान समय गवा चुके होंगे तो वे लौटेंगे जरूर गांधी की ओर, यही विश्वास है भारतीय लोकतंत्र की पूंजी और गांधी।
आभा बोधिसत्त्व
आभा बोधिसत्त्व

गांधी नीरे भावुक नहीं हैं,यह बात भी आज समझना जरूरी है, जरूरी है उनकी दूर- दृष्टि,उनके सर्वागिण विकास और समरसता को समझना। राम के रास्ते चल कर गांधी भी वसुधैवकुटुंबकम् पर यकीन रखते हैं। बातें खत्म नहीं होने वाली...

समय के पाबंद गांधी ज्यातातर खिचड़ी खाते थे उनका मानना था कि यह सुपाच्य भोजन है,और इसमें समय बर्बाद नहीं होता।यह बात विद्यार्थियों को जरूर समझ लेनी चाहिए,खास कर उन्हें जो घर से दूर रह कर, सुंदर भविष्य की तैयारी में लगे हैं, खिचड़ी चूल्हें पर पकता हुआ छोड़,हम अन्य दूसरे काम निपटा सकते हैं। वे मानते थे स्वाद के प्रति अति झुकाव तबीयत के लिए ठीक नहीं।और जो लोग आवश्यक से अधिक भोजन करते हैं,वे भी स्वस्थ्य नहीं।

सफाई पसंद गांधी जी,सफाई और देखभाल का श्रेय बिल्लियों को देते हैं,जो अपने बच्चों को सफाई से रखती है,हमेशा अपने साथ रखती है खुद से चिपकाए और पखाना के बाद अपने पंजों से मिट्टी खोद उसे ढक देती है। धीरे धीरे बच्चे भी सब सीख जाते हैं,इस तरह बिल्ली एक अच्छी शिक्षिका है।

रस्किन, सुकरात, डार्विन, टालस्टाय बुहोर्न, मौलाना रूम,टैगोर जैसे लेखकों- संतों को महत्व देते हुए इनके साहित्य और दर्शन को अपनाते चलते हैं गांधी।इस तरह महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी अहिंसा,प्रेम बीज को ही सर्वोपरि मानता है,जिसको अपनाए बिना किसी भी देश या समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं..




- आभा बोधिसत्त्व


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