करवा का व्रत यशपाल

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करवा का व्रत Karwa Ka Vrat by Yash Pal करवा का व्रत कहानी का सारांश Karva Ka Vrat by Yashpal Karva Ka Vrat by Yashpal karva ka vrat ka saransh करवा का व्रत कहानी का सन्देश / करवा का व्रत कहानी की समीक्षा लाजो का चरित्र चित्रण करवा का व्रत शीर्षक की सार्थकता शपाल रचित करवा का व्रत शीर्षक कहानी पारिवारिक जीवन से जुडी एक मनोवैज्ञानिक कहानी है।

करवा का व्रत
Karwa Ka Vrat by Yash Pal 


करवा का व्रत कहानी का सारांश Karva Ka Vrat by Yashpal  Karva Ka Vrat by Yashpal karva ka vrat ka saransh - यशपाल रचित करवा का व्रत शीर्षक कहानी पारिवारिक जीवन से जुडी एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। कहानी का कथानक कन्हैया और उसकी पत्नी लाजो के जीवन की घटनाओं ,आपसी व्यवहारों और आचार विचारों को लक्ष्य करके बनाया गया है। कन्हैया किसी कार्यलय में काम करता है। उसका विवाह लाजो नामक युवती से हुआ है ,जो कक्षा ८ उत्तीर्ण है। उसका मित्र हेमराज अनुभवी व्यक्ति है। हेमराज कन्हैया को समझाता है कि स्त्री को प्यार चाहे जितना ही करो परन्तु उसे सिर पर कभी मत चढाओ। यदि स्त्री एक बार भी बीस पड़ी तो पुरुष को जीवन भर जोरू का गुलाम बनकर रहना पड़ेगा। तुम उसे कभी आभास मत होने दो कि तुम उसके बिना नहीं रह सकते हो। औरत और बिल्ली की जाती एक ही होती है। पहले दिन के व्यवहार का प्रभाव उस पर बराबर बना रहता है। पढ़ी लिखी का मिजाज तो और सातवें आसमान पर होता है। कन्हैया अपने मित्र हेमराज की बात को गाँठ बाँध लेता है। विवाह के कुछ दिन बाद जब कन्हैया लाजो को दिल्ली लाता है ,लाजो के व्यवहार से बड़ा प्रभावित होता है और उसकी मांग पूरी करने की बात भी सोचता है। परन्तु मित्र की सलाह को वह त्याग नहीं पाता है। अपनी मांग पूरी न होने पर लाजो मुंह फुला लेती है। वह सोचती है की जब मनाएंगे तो मान जाउंगी। परन्तु ऐसा नहीं होता है। मनौती के स्थान पर उसे अपने पति के थप्पड़ों का उपहार मिलता है और वह मन मसोस कर रह जाती है। लाजो अपने दुर्भाग्य पर रोकर भी संतोष कर लेती है कि जब किस्मत में यही लिखा है तो दुःख मानने से ही क्या होगा। उसक पति ठीक ढंग से बात नहीं करता है। बराबर उस पर नाराज़ होकर बैठा रहता है। कभी कभी उसकी पिटाई भी करता है। वह बेचारी तरस खाकर उसके इस अत्याचार को सहन करती है ,फिर भी उसकी सेवा में तत्पर रहती है। लाजो को शारीरिक पीड़ा उतनी नहीं सताती थी जितनी कि अपमान की पीड़ा। वह सोचती है कि कन्हैया उसका पति है। वह चाहे जैसा भी है उसके लिए तो वही सब कुछ है।
करवा का व्रत
करवा का व्रत

करवा चौथ के दिन प्रत्येक विवाहिता हिन्दू स्त्री व्रत रखती है। इस व्रत का उद्देश्य अपने पति के मंगल कल्याण तथा अगले जन्म में फिर उसे अपने ही पति के रूप में प्राप्त करना होता है। लाजो भी यह व्रत रखती है कि अगले जन्म में इन्ही पति को पुनः प्राप्त करें।वह कन्हैया से व्रत के समानों को लाने के लिए निवेदन करती है। परन्तु सायंकाल वह खाली हाथ आता है। फलतः लाजो को बड़ा दुःख होता है। कन्हैया अपनी भूल न स्वीकार कर उलटे उसे डांटता है। लाजो दुखी हो जाता है। लाजो सोचती है कि इन्ही के लिए व्रत रख रही हूँ और यही डांट रहे हैं .यह सोचकर वह बिना खाए सो जाती है। दुसरे दिन उसका पति जब दफ्तर जाने की तैयारी करता है तब वह उसे खाना खिला देती है। वह दफ्तर जाते समय भी बेरुखी से ही बातें करता है। बेचारी लाजो दिन भर खाए पिए रह जाती है। वह चिंता में पड़ जाती है कि जिस पति के लिए मैं इस व्रत का अनुष्ठान कर रही हूँ वही मुझ पर गुस्सा कर रहा है। बड़ा ही सुख भोग रही हूँ न ? ख़ाक ! अगले जन्म में सुख देंगे। यही जन्म निबाहना दिक्कत हो रहा है तो फिर अगले जन्म के लिए क्यों मुसीबत फान्दू। इसीलिए इस व्रत को तोड़ने के लिए विवश होकर वह रुखी रोटी खाकर व्रत तोड़ती है। संध्या समय कन्हैया दफ्तर से आकर लाजो को फिर मारने लगता है। अब वह क्रोध की सीमा को लांघकर चिल्ला कर कहती है - मारे ले ,मार ले। जान से मार दाल। पीछा छुटे। आज ही तो मारेगा। मैंने कौन सा व्रत रखा है तेरे लिए जो जन्म जन्म मार खाऊ। मार ! मार डाल।"

इसकी बातें सुनकर कन्हैया स्तब्ध रह जाता है। मारने के लिए उसे उसके हाथ और गाली के लिए खुली जुबान दोनों रुक जाते हैं। उसे लगता है कि वह अन्धकार से जिसे कुत्ता समझ कर मार रहा था वह शेर था। लाजो कुछ देर तक फर्श पर पड़ी रोती रही। फिर उठकर वह अपने पति के लिए खाना तैयार करके ढक करके रख देती है और पुनः फर्श पर जाकर लेट जाती है। उसका पति खाना खाकर चला जाता है। जब वह खाना खाने बैठती है तो ज्ञान होता है कि कद्दू की सब्जी में नमक अधिक था। उसे अपनी पति का स्वभाव बदला हुआ दिखाई देता है। जब वह बिस्तर बिछाने लगता है तो लाजो कहती है - मैं आ गयी हूँ। रहने दो। किये देती हूँ। कन्हैया प्रेम व्यक्त करते हुए कहता है - सुबह और पिछली रात भी तुमने कुछ नहीं खाया है। ठहरों ,मैं तुम्हारे लिए दूध ले आऊं। उसी दिन से इनके जीवन में एक नया मोड़ आता है। कन्हैया कहता है - तुम्हे अगले जन्म में मेरी जरुरत है तो क्या मुझे तुम्हारी नहीं। 'इस प्रकार कन्हैया का विचार बदल जाता है। प्रेम की नयी गंगा इनके जीवन भूमि में प्रवाहित हो जाती है। उनके जीवन के फुलवारी में नयी बहार आ जाती है।

करवा का व्रत कहानी का सन्देश / करवा का व्रत कहानी की समीक्षा

लेखक ने इस कहानी के द्वारा सन्देश दर्शाया है कि पारिवारिक जीवन को सुख ,शान्ति ,सम्रिधिमय बनाने के लिए पति और पत्नी में आपसी प्रेम ,विश्वास तथा सद्व्यवहार आदि का होना अति आवश्यक है। जब तक पुरुष नारी को कुचलता और दबाता रहेगा ,उसके प्रेम और त्याग को उसकी विवशता समझकर अपने पुरुष अहंकार का पोषण करता रहेगा तब तक पारिवारिक जीवन को सुख शांतिमय बनाने में असमर्थ रहेगा। नारी या पत्नी को दबाव ,अत्याचार तथा शोषण का पात्र नहीं समझना चाहिए।आज के आधुनिक प्रगतिशील समाज में नारी भी नर की तरह अपने मर्यादित ढंग से जीने का अधिकार समझती है। अपने ऊपर वर्षों से हो रहे अत्याचार और अनाचार को अब वह कतई बर्दास्त करने की मनस्थिति में नहीं है। आज की नारी देश और समाज के जागरण से अनभिज्ञ नहीं है। उसके चरित्र में पुरुष के अत्याचार के विरुद्ध क्रांति का स्वर मुखरित हो रहा है। अब वह पुरुष का अत्याचार कभी नहीं सह सकती है। अतः पुरुष को अब नारी के प्रति अपने आचरण और व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा और उसके सेवा ,त्याग और मौन साधना को समझकर उसके स्वाभाविक चारित्रिक गुण को समझना होगा। पुरुष को अपने झूठे अहंकार को त्यागकर नारी को अपने अंग के रूप में स्वीकार करने से पुरे परिवार ,समाज और देश सबका कल्याण है।

लाजो का चरित्र चित्रण 

करवा का व्रत यशपाल रचित प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एवं पारिवारिक कहानी है। कहानी का प्रमुख पात्र लाजो है। सम्पूर्ण कहानी में लाजो का चरित्र ही प्रधान भूमिका निभा रहा है। एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में लाजो की भावनाओं और कार्यों ने कहानी के कथानक को एक संजीवनी शक्ति प्रदान की है। लाजो का चरित्र एक ऐसी नारी के चरित्र के समान है जो पुरानी नारी और आधुनिक नारी जीवन के मिलन पर खड़ी दिखाई देती है। लाजो आदर्श पतिभक्त स्त्री है - वह न तो अनपढ़ है और न तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली है। वह तो अपना जीवन पति के लिए अर्पित और समर्पित करने वाली है। प्राचीन मान्यताओं और संस्कृति के कारण वह करवा व्रत रखती है।उसका पति उसके प्रति सद्व्यवहार नहीं करता है। पति द्वारा अपमानित होकर भी यह कहना - मेरा पति है ,जैसा भी है मेरे लिए तो वही सब कुछ है। " वह उसके कल्याण और पुनः अगले जन्म में उसे पति के रूप में प्राप्त करने के लिए भगवान् से प्रार्थना करती है।

लाजो के चरित्र में बेहद सहनशीलता भरी हुई है। पति द्वारा उपेक्षित होकर भी वह अपनी शिकायत को मन में दबाये रखती है। स्वयं भूखे रहकर और पति के आने पर चुपचाप खाना परोसकर उन्हें प्रेम से खिलाती है। फिर भी उसका अहंकारी पति आकर उस पर बरसता और मारता है। अंत में उसका धैर्य समाप्त हो जाता है और रोती हुई अपना गुस्सा व्यक्त करने के लिए वह लाचार हो जाती है।वह चिल्लाती हुई कह उठती है - मार ले ,मार ले ! जान से मार दाल ,पीछा छुटे ! आज ही तो मारेगा ! मैंने कौन सा व्रत रखा है ,तेरे लिए जो जनम जनम मार खाऊँगी।  मार ,मार डाल। '

लाजो का गुस्सा और खीझ स्वाभाविक है।वास्तव में एक आदर्श सहनशील भारतीय स्त्री है ,जिसके चरित्र में विश्वास ,त्याग और प्रेम साधना के विशेष गुण भरे पड़े है। यह उसका चारित्रिक दूषण नहीं ,बल्कि एक भूषण है। इस प्रकार लाजो के चरित्र में प्राचीनता और आधुनिकता दोनों का एक मेल दिखाई पड़ता है।

करवा का व्रत शीर्षक की सार्थकता 

करवा का व्रत इस कहानी का सार्थक और सफल शीर्षक है। यह शीर्षक कहानी के कथ्य और प्रधान पात्र लाजो की सम्पूर्ण भूमिका के साथ गहराई से जुड़ा दिखाई देता है। यह शीर्षक करवा व्रत की महत्ता को बेदाग़ स्पष्ट कर कहानी में उसकी चार चाँद बेजोड़ भूमिका का अहसास कराता है। अतः इस शीर्षक की सटीकता स्पष्ट दिखाती है।


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करवा का व्रत यशपाल
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