मुक्तिपर्व दलित उपन्यास के सामाजिक सरोकार

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सुनीत नूतन प्राइमरी स्कूल की एक्जाम में कुल पांच सौ अंक में से चार सौ पचास अंक लेकर पास हुआ था। अव्वल नम्बर से पास होने की घटना चमार टोला की बस्ती के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था।

'मुक्तिपर्व' (दलित उपन्यास) के सामाजिक सरोकार


       
मोहनदास नैमिशराय एक ऐसा नाम है जिसे दलित साहित्य का पर्याय कहा जा सकता है। साहित्य की प्राय: सभी विधाओं में मोहनदास सक्रिय रुप से लिखते हैं। इनकी प्रमुख कृतियों में - अपने–अपने पिंजरे(1,2,3), मुक्तिपर्व, वीरांगना झलकारी बाई, आज बाजार बंद है, क्या मुझे खरीदोगे?, दलित आन्दोलन का इतिहास, अदालतनामा आदि हैं। इन्हें अम्बे‍डकर स्मृति पुरस्कार, पत्रकारिता अवार्ड, अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार और भारत भूषण सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। इसके अतिरिक्त भी बहुत से सम्मान व पुरस्कार इनकी रचना कृति की वजह से मिलते रहते हैं। मोहनदास नैमिशराय द्वारा रचित उपन्यास मुक्तिपर्व में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विषमता का शिकार दलित समाज दिखाई देता है। उपन्यास में ढेढ़ चमार जाति के एक दलित परिवार के माध्यम से उक्त समस्याओं को उजागर किया है। यहाँ शोषण, उत्पीड़न, दरिद्रता, विपन्नता, घृणा, गुलामी भरे जिंदगी से गुजरता हुआ परिवार है। डॉ.बाबा साहब अंबेडकर के मूल विचारों से प्रभावित उपन्यासकार द्वारा 'शिक्षा से ही सामाजिक विषमता से बाहर निकला जा सकता है' का स्वर उपन्यास में मुखरित हुआ नजर आता है।
        ढेढ़ चमार, डोम, भंगी आदि दलित जातियों का सवर्ण समझी जाने वाली तथाकथित ऊँची जातियों द्वारा मानसिक, शारीरिक, आर्थिक, धार्मिक व राजनैतिक आदि सभी क्षेत्रों में शोषण किया जाता था। सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक विषमता विविध रुप में अपनी गहरी जड़े पैठ जमा चुका था। उपन्यास में एक और ऐसा समाज है, जो घोर दरिद्रता से जूझता हुआ दिखाई देता है। वे लिखते हैं - "घर-घर में चूहे थे। बिल्ली चूहों पर झपटती, और उन्हें दाँतों में दबाकर फुर्ती से ले जाती। बस्ती वालों को एक चूहा कम होने का जरा भी अफसोस नहीं होता बल्कि अच्छा ही लगता था। वे बिल्ली को कभी-कभी चूहा पकड़ने के लिए शह भी दे देते थे। … वह ट्रंक के नीचे, घड़े के पीछे, आटा पीसने की चक्की के पास या हँडिया के सामने सतर्क होकर बैठती। ..घर में बर्तन-भांडे उसके जाने-पहचाने थे।"1 दलितों को गुलामी और कमरतोड़ मेहनत-मजदूरी करने के बाद ही इनके कच्चे घरों में दो जून की रोटी नसीब हो पाती थी। उनके साथ जानवरों से भी बत्तर सलूक किया जाता था। ऐसा लगता मानो वे कोई इन्सान नहीं, बल्कि कोई पत्थर हो। एक मानव होकर दूसरे मानव के साथ इस प्रकार का नीच बर्ताव हमारे सभ्य समाज के लिए कतई शोभनीय नहीं है। 
         उपन्यास की कथावस्तु भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के अंतिम पड़ाव और उसके उपरान्त वास्तविकता के धरातल पर तैयार हो रहे सूक्ष्म रूप की सुगबुगाहट दिखाई देती है। जहाँ समाज का एक हिस्सा सारी सुख सुविधाओं व भरपूर आनन्द से लैस है, वहीं दूसरी ओर दुःख, गरीबी, दरिद्रता, विवशता और लाचारी रूपी सागर
मुक्तिपर्व
मुक्तिपर्व
में डूबा हुआ दलित समाज नजर आता है। मुक्तिपर्व उपन्यास में सुख-सुविधाओं से लैस धनी-सम्पन्न समाज जमीदारों, नवाब, काश्तकारों का है, वहीं दूसरा वर्ग ढेढ़ चमार, डोम, भंगी आदि दलितों का है। एक ओर मंदिर-मस्जिद, बाजार, बाग़-बगीचे, पनघट, स्कूल, ऊँची-पक्की इमारते-घर है। वहीं दलितों की बस्तियों में कुड़ाघर, श्मशान, हगनघाट, कलालों की छोटी-छोटी दुकानें तथा नीम के पेड़ के नीचे बने कच्चे मकान। सामाजिक विषमता को अभिव्यक्त करते हुए मोहनदास नैमिशराय उपन्यास कार कह लिखते हैं - "उधर बाग़-बगीचे थे तो इधर जंगल। उधर बाजार थे, पनघट थे, मंदिर थे, इधर श्मशान, कूड़ाघर, कलालों की दुकाने। दोनों तरफ के अपने-अपने संस्कार थे। और अपनी-अपनी संस्कृति। जब वे एक दूसरे से टकराते तो मारकाट होती। सवर्ण लाठियाँ बल्लम चलाते हुए गालियाँ देते, थूकते, खुले आम पेशाब करते और अपनी उद्दण्ड संस्कृति का परिचय देते। फिर भी वे शहर भर में सभ्य कहलाते।"2
         सुनीत नूतन प्राइमरी स्कूल की एक्जाम में कुल पांच सौ अंक में से चार सौ पचास अंक लेकर पास हुआ था। अव्वल नम्बर से पास होने की घटना चमार टोला की बस्ती के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था। जब वह इसी स्कूल में पढ़ाई कर रहा था तब उसने पाठ्यक्रम के एक किताब में एक तस्वीर देखी थी जिसमें एक ब्राह्मण प्याऊ पर लोटे से पानी पीला रहा है, जब कि दलितों को चमड़े से बनी नलकी से पानी पिलाया जाता था। वास्तविक जीवन में पाठ्यक्रम की पूरकता देखकर सुनीत के भीतर कई प्रश्न पैदा हुए जिसने जिज्ञासा और विद्रोह के स्वर को प्रज्ज्वलित करने का कार्य किया। जब सुनीत, मास्टर साहब चौबे तथा बस्ती के लोग प्याऊ पर जाते हैं और पंडित जी से सागर से पानी पिलाने की बात करते हैं। इस पर पंडित कहता है - "पर तुम तो …।
पंडित जी के ओंठो तक आते-आते शब्द जैसे ठहर गए थे। जिन्हें स्वयं सुनीत ने पूरा किया था।" "हाँ-हाँ पंडित जी, हम ढेढ़ चमार है।"3 सुनीत को ढेढ़ चमार होने की वजह से अपमान, अवहेलना और घृणा को सहना पड़ता है। पर वह हार नहीं मानता है बल्कि उल्टा उसमें व्यवस्था के विरूद्ध आक्रोश प्रकट करता है। उसे दलित होने का खामयाजा भुगतना पड़ता है। स्वर्णवादी मानसिकता के सहपाठी स्कूल में उससे बात नहीं करना चाहता है। वह हमेशा कक्षा में खूब मन लगा कर पढ़ाई करता है पर हर बार वह स्कूल में दूसरे नंबर पर ही आता है। आखिर उसके साथ ऐसा क्यों होता है? क्यों कि सवर्ण कभी भी यह नहीं चाहते थे कि उनके स्कूल से कोई दलित प्रथम आये। इसलिए चार-पांच सवर्ण अध्यापक मिलकर राकेश कुमार तथा नगरपालिका कार्यालय अधिक्षक के बेटे अजय शर्मा को स्कूल में प्रथम स्थान दिलवाया जाता था। वास्तव में वे कतई यह नहीं चाहते थे कि कोई दलित पढ़-लिख जाए। यदि वे पढ़-लिख गए, तो उनकी गुलामी के षड्यंत्र को पहचान लेंगे। उपन्यासकार आगे चलकर लिखते हैं - "लोगो को दुःख होता है हमारी आजादी से। पशु-पक्षियों की आजादी उन्हें भाती है। चिड़ियों को वे पिंजरे से मुक्त कर देते है, पर हमारी मुक्ति के सवाल पर चुप्पी साध लेते है। हम स्वंय कुछ कहे तो हमे आँखे दिखाते है। हम पर आग बबूला हो बरसते है। जैसे हम काठ के हो। हमारे भीतर संवेदनाएँ ही न हो। हमारे जिस्म में खून ही नही बहता हो। हम कोई मुर्दा है। अब हम गुलाम तो नही।"4 
        
वस्तुत: मुक्तिपर्व उपन्यास में छूत–छात से पीड़ित दलित समाज की पीड़ा को मर्मस्पर्शी चित्रण किया गया है। इसमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक, राजनैतिक विषमता का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करके वर्तमान संदर्भ की समस्याओं को उजागर करती है, समाज को जागृत करती है। एक ओर ढेढ़ चमार, डोम, भंगी जैसे दरिद्र, शोषित, उपेक्षित दलित लोग जो कच्चे घरों में रहते है तथा नवाबों-जमींदारों के हवेली एवं खेतों में कमरतोड़ मेहनत और गुलामी करते हैं। तो वहीं दूसरी ओर नवाब, जमींदार तथा सवर्ण वर्ग जो अपने-आप को शुद्ध, स्वच्छ, सभ्य कहलवाते हैं। ऐशो-आराम, भोग-विलास भरे जीवन व्यतीत करते हुए नजर आते हैं। यह वर्तमान समाज में व्याप्त पूंजीवादी, बाजारवादी, जातिवादी, सामन्तवादी तथा भोगवादी से जोड़कर उसका पर्दाफाश किया है। लेखक ने यह भी दर्शाया है कि किस प्रकार समाज में दलितों के साथ उपेक्षा, घृणा, दुत्कार, डांट–फटकार, जानवरों-सा व्यवहार करते हैं। वे प्रत्येक क्षेत्र में दलित-पीड़ितों के साथ ऐसा शोषण करते हैं कि मानो वे कोई इंसान नहीं बल्कि जानवर या जिन्दा लाश हो।

सन्दर्भ-सूची  
1. नैमिशराय मोहनदास, मुक्तिपर्व, सं.-2011, अनुराग प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या - 10
2. वही, पृष्ठ संख्या - 65 
3. वही, पृष्ठ संख्या - 54 
4. वही, पृष्ठ संख्या - 111 



आनन्द दास
सहायक प्राध्यापक, श्री रामकृष्ण बी. टी. कॉलेज (Govt. Spon.), दार्जिलिंग
संपर्क - 4 मुरारी पुकुर लेन,कोलकाता-700067, ई-मेल - anandpcdas@gmail.com, 9804551685, 7003871776

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