कुतिया के अंडे

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कुतिया के अंडे जवानी में मुझ पर देशभक्ति का जुनून सवार रहता था । मैं सेना में भर्ती हो गया और उनकी ‘ मिलिट्री इंटेलीजेंस विंग ‘ में काम करने लगा था । हालाँकि बाद में मैंने वह नौकरी छोड़ दी । लेकिन करकरे साहब मुझे उसी समय से जानते थे ।

कुतिया के अंडे


उन दिनों एक मिशन के तहत हम दोनों को शहर के बाहर एक बंगले में रखा गया था — मुझे और मेरे सहयोगी अजय को । दोपहर में सुनीता नाम की बाई आती थी और वह दोपहर और शाम — दोनों समय का खाना एक ही बार में बना जाती थी । उसे और झाड़ू-पोंछे वाली बाई रमा को ख़ुद करकरे साहब ने यहाँ काम पर रखा था । हम लोग केवल करकरे साहब को जानते थे । उन्होंने ही हमें इस मिशन को पूरा करने का काम सौंपा था ।

जवानी में मुझ पर देशभक्ति का जुनून सवार रहता था । मैं सेना में भर्ती हो गया और उनकी ‘ मिलिट्री इंटेलीजेंस
कुतिया
कुतिया
विंग ‘ में काम करने लगा था । हालाँकि बाद में मैंने वह नौकरी छोड़ दी । लेकिन करकरे साहब मुझे उसी समय से जानते थे । उनके कई अहसान थे मुझ पर । इसलिए जब उन्होंने अजय के साथ मेरी टीम बनाई और हमें मिशन के काम पर लगा दिया तो मैं उन्हें ‘ ना ‘ नहीं कह सका । अजय की कहानी भी मेरे जैसी थी । वह सेना में कमांडो और न जाने क्या-क्या रह चुका था । वैसे भी जिस नेता की हत्या करनी थी वह बहुत ही भ्रष्ट था और उसके बारे में शक था कि वह देशद्रोही ताक़तों से मिला हुआ था । लेकिन ठोस सबूत के अभाव में उस पर क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती थी । मेरा काम केवल गाड़ी चलाना था । टार्गेट पर गोली चलाने का काम अजय का था । हमें इस काम के बदले में मोटी रक़म मिलनी थी ।

शहर के बाहर जिस बंगले में हमें ठहराया गया था , उसके आस-पास अक्सर एक कुतिया घूमती रहती थी । मुझे जीव-जंतुओं से प्यार था । इसलिए शुरू-शुरू में मैं उसे बचा-खुचा खाना डाल देता था । एक दिन उसकी कातर दृष्टि और बेतहाशा हिलती पूँछ को देखकर मैंने उसे मकान के भीतर ले आने का फ़ैसला कर लिया । मैंने उसे बंगले के गैरेज में रख लिया । वहीं उसके बैठने / लेटने के लिए मैंने कुछ फटे-पुराने गद्दे डाल दिए । सुबह-दोपहर-शाम में मैं उसे खाना डाल देता । उसकी आँखों में कृतज्ञता का भाव देखकर मुझे अच्छा लगता था ।

अभी हमें बंगले में आए कुछ ही दिन हुए थे । एक दिन मैं कुतिया को खाना डालने गया तो हैरान रह गया । कुतिया के बैठने की जगह पर छह छोटे-छोटे अंडे पड़े हुए थे । ये अंडे कहाँ से आए ? किसी कुतिया ने अंडे दिए हों , ऐसा तो मैंने कभी नहीं सुना था । मैंने वे अंडे वहाँ से हटाने चाहे तो कुतिया ऐसे गुर्राने लगी जैसे वे अंडे न हों , उसके नवजात पिल्ले हों । हार कर मैंने अंडे वहीं छोड़ दिए । 

मैंने अपने साथी अजय को कुतिया के अंडों के बारे में बताया तो वह बेतहाशा हँसने लगा । कुतिया भी कहीं अंडे देती है ? यह ज़रूर किसी की साज़िश होगी — उसने कहा । मैंने उन अंडों के बारे में दोनों बाइयों रमा और सुनीता से भी पूछा पर उन्होंने भी इस बात पर हैरानी जताई । उनकी अनभिज्ञता ने इस रहस्य को और गहरा कर दिया । 

मैं सुबह सो कर उठता तो गोपाल को सोता हुआ पाता । मैं अपने लिए रसोई में ब्रेड-आमलेट बना कर नाश्ता कर लेता । कुछ खाना कुतिया को डाल आता । अजय देर रात तक इंटरनेट , व्हाट्स-ऐप , फ़ेसबुक और ट्विटर पर व्यस्त रहता था । उसके फ़ेसबुक पर 5000 मित्र थे पर इनमें से अधिकांश इन-ऐक्टिव थे जिन्हें अजय जानता भी नहीं था । करकरे साहब नहीं चाहते थे कि मिशन के दिनों में हम सोशल मीडिया पर ज़्यादा ऐक्टिव रहें । वे हमें इस दौरान ‘ लो-प्रोफ़ाइल ‘ रहने की सलाह देते थे । पर अजय पर इस बात का कोई असर नहीं हुआ था ।

जिस बंगले में हम ठहराए गए थे वहाँ के एक बड़े हॉल में एक लाइब्रेरी थी , जिसमें दुनिया-जहान की किताबें रखी हुई थीं । अक्सर मैं अपनी बोरियत दूर करने के लिए कुत्तों या अन्य जीव-जंतुओं के बारे में लिखी किताबें उठा कर ले आता और पढ़ता रहता ।

इधर मैं महसूस करने लगा था कि आज-कल चारों ओर सब उल्टा-पुल्टा हो रहा था । हम दोनों सेना के भूतपूर्व अधिकारी थे । लेकिन हमें एक राजनीतिक हत्या को अंजाम देने का काम सौंपा गया था जो गैर-क़ानूनी था । हाल ही में अख़बारों में गाँधीवादी माने जाने वाले एक बड़े आदमी की असलियत का भांडा-फोड़ हो गया था । दरअसल वह पर्दे के पीछे एक चरमपंथी दक्षिणपंथी संगठन का सक्रिय सदस्य था लेकिन गाँधीवाद का मुखौटा लगा कर वह जनता को बेवक़ूफ़ बना रहा था । 

एक दिन मैं सुबह उठा तो आकाश से मरे हुए पक्षियों की बारिश होने लगी । अगली सुबह मैंने अख़बार में पढ़ा कि कल ही विदेश में कहीं मरी हुई मछलियों की बरसात हुई थी । यह सब देख-पढ़ कर किसी अनिष्ट की आशंका से मेरा माथा चकराने लगता । एक दिन भरी दोपहरी में अँधेरा-सा छा गया । अगले दिन यह ख़बर आई कि भरी गर्मी में देश के किसी राज्य में बर्फ़बारी हो गई । अमावस की रात में भी कभी-कभी मुझे आकाश में सितारे नज़र नहीं आते । जब मैं आईने में देखता तो मुझे ऐसा लगता जैसे मेरी परछाईं अपना मुँह मोड़ लेना चाहती हो । उधर वह कुतिया उन अंडों को ऐसे से रही थी जैसे वह कोई पक्षी हो और उन अंडों में से उसके पिल्ले निकलेंगे । ऐसे समय में देश में होने वाले आम चुनाव के नतीजे आ गए और एक ग़ैर-धर्म-निरपेक्ष सरकार चुनाव जीत गई । दुनिया जैसे किसी मकड़ी का जाला बन गई थी । कलयुग शायद इसी को कहते थे ।

अजय को उस कुतिया से चिढ़ थी । आए दिन वह कहता रहता — “ कुतिया भी कहीं अंडे देती है ! यह तो वैसे ही हुआ जैसे किसी मुर्ग़ी ने पिल्ले दे दिए हों । यह कुतिया नहीं , भूतनी है , भूतनी । भगाओ इसे यहाँ से । “ पता नहीं क्यों , सब कुछ उल्टा-पुल्टा होने वाले इस युग में मुझे कुतिया के अंडे देने वाली बात अस्वाभाविक होते हुए भी युग के अनुकूल ही लग रही थी । 

नियत दिन से एक दिन पहले करकरे साहब हमसे मिलने शाम को हमारे बंगले पर पहुँचे । हमें अपने टार्गेट से कल होने वाली मुलाक़ात की जगह और समय के बारे में ‘ ब्रीफ़ ‘ किया गया । हमें दो रिवाल्वर और एक ए. के. 47 राइफ़ल और उसकी मैगज़ीन मुहैया कराई गई । कल के मिशन के लिए हमें काले शीशे वाली एक एस.यू.वी. गाड़ी टोयोटा फ़ॉर्च्यूनर भी उपलब्ध कराई गई । हत्या करने के बाद हमें नेशनल हाइवे से होते हुए राज्य से बाहर निकल जाना था , जहाँ हमारे छिपने का बंदोबस्त कर दिया गया था । करकरे साहब ने हमें पुलिस की चेकिंग से बचने के लिए फ़ेक आइ.डी. कार्ड भी उपलब्ध करा दिए । गाड़ी पर नक़ली नंबर प्लेट लगा दिया गया था ताकि इसके मालिक का पता न लग सके ।

नियत दिन सारी तैयारी कर लेने के बाद हम दोनों सुबह दस बजे गाड़ी में जा बैठे । मैंने कुतिया और उसके अंडों को भी गाड़ी में रख लिया क्योंकि मुझे लगा कि हमारे जाने के बाद कहीं वह भूखी न मर जाए । हमारे हथियार हमारे साथ थे । जिस भ्रष्ट नेता की हत्या करनी थी वह सुबह ग्यारह बजे मंदिर चौक के पास वाले बजरंग बली के मंदिर में माथा टेकने आने वाला था । हमने सुबह साढ़े दस बजे से मंदिर के पास ‘ पोज़िशन ‘ ले ली । ग्यारह बज गए । फिर साढ़े ग्यारह बज गए । लेकिन हमारा टार्गेट मंदिर में माथा टेकने नहीं आया । करकरे साहब ने हमें फ़ोन पर उनसे बात करने से सख़्त मना किया हुआ था । लिहाज़ा हम उनसे सम्पर्क नहीं कर सकते थे ।

जब बारह बज गए तो मैं गाड़ी से उतरा और स्थिति का मुआयना करने के लिए टहलता हुआ मंदिर तक गया । तभी मेरे पीछे एक ज़ोरदार धमाका हुआ । उस धमाके से मैं घायल हो कर नीचे गिर पड़ा । किसी तरह उठ कर जब मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो हमारी गाड़ी के पास गहरा काला धुआँ छाया हुआ था । धुआँ छँटने पर मैंने पाया कि सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो जाने वाले इस युग में दरअसल किसी ने हमारी ही गाड़ी के नीचे बम लगा कर उसे रिमोट टाइमर की मदद से उड़ा दिया था । ज़ाहिर है , अजय , वह कुतिया और उसके अंडे — सब उस धमाके में नष्ट हो गए ...

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प्रेषक : सुशांत सुप्रिय
A-5001 ,
गौड़ ग्रीन सिटी ,
वैभव खंड ,
इंदिरापुरम् ,
ग़ाज़ियाबाद - 201014
( उ. प्र. )
मो : 8512070086 
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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