हिंदी नाटक का उद्भव और विकास हिंदी नाटक का उद्भव और विकास hindi natak ka udbhav aur vikas hindi natak ka udbhav aur vikas in hindi भारतेंदु हिंदी नाटक के जन्मदाता ही नहीं अपने युग के सर्वश्रेष्ठ नाटककार भी है .इनकी सफलता का सबसे कारण उनका रंगमंच विषयक ज्ञान और अनुभव था .इनके नाटकों के कथानक इतिहास ,पुराण तथा समसामयिक है .
हिंदी नाटक का उद्भव और विकास
हिंदी नाटक का उद्भव और विकास hindi natak ka udbhav aur vikas hindi natak ka udbhav aur vikas in hindi - नाट्य-शास्त्र के प्रणेता आचार्य भरत के अनुसार सतयुग के अन्त में संसार में अनेक प्रकार की आसुरी प्रवृत्तियों का प्रसार बढ़ जाने से लोगों को बहुत कष्ट हुआ; अत: दुख निवारण के लिए देवताओं ने ब्रह्माजी से कोई खिलौना माँगा। ब्रह्माजी ने चारों वेदों से चार तत्त्व कथोपकथन, संगीत, अभिनय और रस लेकर पंचम वेद के रूप में नाट्य-वेद का उपदेश दिया, तभी नाट्य-वेद का जन्म हुआ। संस्कृत-साहित्य में नाटकों का प्रारम्भ ईसवी पूर्व 3 शताब्दी से पूर्व हुआ। तब से निरन्तर नाटक-रचना होती आ रही है। संस्कृत में काव्य के दो भेद माने गये हैं- रूपक और उपरूपक । रूपक के दस भेदों में नाटक एक मुख्य भेद है, जिसकी कथा पौराणिक या ऐतिहासिक होती है और जिसमें लगभग 5 अंक होते हैं। हिन्दी में नाटक प्रायः दृश्य-काव्य के पर्याय के अर्थ में प्रयुक्त होता है। हिन्दी को उत्तराधिकार रूप में अनेक वस्तुएँ संस्कृत से प्राप्त हुई हैं, उन्हीं में नाटक भी है। हिन्दी में गद्य के अन्य अंगों की तरह नाटक का भी वास्तविक विकास भारतेन्दु युग से ही प्रारम्भ हुआ। भारतेन्दु युग के पूर्व भी कतिपय नाटक-'रुक्मिणी हरण,' 'हनुमन्नाटक', 'प्रबोध चन्द्रोदय' आदि लिखे गये, जिस पर संस्कृत के नाटकों का प्रभाव है तथा उन्हें काव्य नाटक कहना ही अधिक उचित है। इन नाटकों में नाटकीय तत्त्वों का विकास बहुत कम हो पाया है।
हिन्दी नाटक का प्रारम्भ
19वीं शताब्दी में ' आनन्द रघुनन्दन' तथा 'प्रबोध चन्द्रोदय' नाम के दो नाटक लिखे गये। इसके सिवाय लोकरंजन के अनेक नाटक- 'रासलीला', 'पूरनमल भक्त' आदि लिखे गये। 'इन्द्र सभा' शीर्षक नाटक ऐसे नाटकों में प्रसिद्ध रहा। बाबू गोपालचन्द्र जी को हिन्दी का सर्वप्रथम नाटककार होने का गौरव प्राप्त है। तत्पश्चात् भारतेन्दु-युग प्रारम्भ होता है। तब से नाटक-क्षेत्र निरन्तर विकास करता चला आ रहा है।
हिन्दी नाटक का विकास-क्रम समझने की सुविधा के लिए इसे निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है -
भारतेन्दु युग के नाटक
भारतेन्दु जी की प्रतिभा बहुमुखी थी। उन्होंने साहित्य के विभिन्न अंगों की पूर्ति का प्रयत्न स्वयं किया तथा अन्य लेखकों को इस कार्य के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने स्वयं कई संस्कृत-नाटकों का हिन्दी में अनुवाद किया तथा दर्जनों नाटकों और प्रहसनों की रचना की। इनके समय में बँगला और अँगरेजी नाटकों का अनुवाद भी हिन्दी में किया गया। भारतेन्दु जी ने नाटकों का नया रूप देकर लेखकों का पथ-प्रदर्शन किया। इनके नाटकों में अभिनेता तथा पात्रों के अनुकूल भाषा के प्रयोग आदि गुणों के कारण स्वाभाविकता आयी। इनके नाटकों को कई भागों में बाँटा जा सकता है- श्रृंगार-प्रधान- जैसे- 'चन्द्रावली', 'प्रेम योगिनी' तथा 'सती प्रताप' आदि; राष्ट्रीय भावना प्रधान, 'नीलदेवी', 'भारतदुर्दशा' आदि तथा हास्य-व्यंगय प्रधान जैसे- 'विषस्य विषमौषधम्', अन्धेर नगरी' आदि उल्लेखनीय हैं।
द्विवेदी युग के नाटक
इस युग के नाटककारों में प्राय: भारतेन्दु के अनुकरण पर नाटक रचना की है। इनमें पं. प्रतापनारायण मिश्र, बाबू रायकृष्ण दास, लाला श्री निवासदास, किशोरीलाल गोस्वामी प्रमुख है। बाबू रायकृष्णदास ने 'महाराणा प्रताप' तथा लालाजी ने 'संयोगिता स्वयंवर' लिखकर अपनी नाटक-कला का परिचय दिया। इस युग में नाटकों के विषय पौराणिक, राजनीतिक तथा सामाजिक रहे हैं। सामाजिक कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य किया गया। 'बूढ़े मुँह मुँहासे' जैसे प्रहसन लिखे गये।
संस्कृत नाटकों के अनुवाद किये गये। इन अनुवादों में भारतेन्दुजी के अनुवाद बड़े सफल रहे। संस्कृत के 'मुद्राराक्षस', 'मालती माधव', 'उत्तर-राम-चरित' 'नागानन्द', 'मृच्छकटिक' आदि नाटकों के सुन्दर अनुवाद किये गये। राजा लक्ष्मण सिंह ने 'अभिज्ञान- शाकुन्तलम्' का अनुवाद किया।
अँगरेजी के कई नाटकों के अनुवाद किये गये। इसी युग में शेक्सपीयर के कई नाटकों का हिन्दी अनुवाद निकला। ये अनुवाद साधारण कोटि के माने जाते हैं। इन अनुवादों के बाद नाटक का दूसरा युग प्रारम्भ हो जाता है।
इस युग में नाटक मण्डलियों का प्रचार अधिक हो गया था। अतः नाटक मण्डलियों के लिए अनेक नाटक लिखे गये, जो अभिनय की दृष्टि से अधिक सफल रहे हैं। यद्यपि उनमें साहित्यिकता का अभाव ही है। इस युग के नाटककारों को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। नारायण प्रसाद 'बेताब' तथा राधेश्याम कथावाचक सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। इन नाटकों का मुख्य उद्देश्य था- दर्शकों को मनोरंजन प्रदान कर पैसा कमाना। यह इन लोगों का व्यावसायिक दृष्टिकोण था, फलत: साहित्यिक सुरुचि की ओर ध्यान नहीं दिया गया। इन नाटकों में नृत्य तथा पद्यों की भरमार रहती थी। कथोपकथन भी प्रायः पद्यों में ही कराया जाता था। इस कारण नाटकों में अस्वाभाविकता आ जाती थी। इसी युग में 'चन्द्रहास' और 'तिलोत्तमा' शीर्षक से नाटकों की रचना गुप्त जी ने की, जो अच्छे कहे जाते हैं। नाटक के क्षेत्र में अनेक नये-नये प्रयोग भी हुए हैं। कतिपय नवीन नाटककारों के भी दर्शन इस युग में हुए । 'कृष्णार्जुन युद्ध' तथा 'अंजना' को लेकर क्रमश: पं. चतुर्वेदी तथा सुदर्शन जी इस क्षेत्र में आये और 'उग्र' जी ने 'ईसा' तथा पं. गोविन्दवल्लभ पन्त ने 'वरमाला' नामक नाटकों की रचना की। अन्तिम चरण में प्रसाद जी ने भी नाटक-रचना प्रारम्भ कर दी थी। प्रसाद जी के नाटकों में नये दृष्टिकोण का श्रीगणेश था, इसी से आने वाला युग प्रसाद-युग से सम्बोधित किया गया।
प्रसाद युग और नाटक
प्रसाद जी का युग नाटक के क्षेत्र में संक्रान्ति-युग कहा जा सकता है। नाटक रचना के दृष्टिकोण में परिवर्तन हो रहा था। प्रसादजी स्वयं भारतीय गौरव की महत्त्वपूर्ण घटनाओं से प्रेम रखते थे और उन्होंने खोजपूर्ण दृष्टि से अनेक ऐतिहासिक नाटकों की रचना की। 'अजातशत्रु', 'चन्द्रगुप्त', 'स्कन्दगुप्त', 'राज्यश्री' आदि नाटकों में प्राचीन भारत के वैभव तथा वातावरण का चित्र खींचा गया। इसमें ऐतिहासिक कथानक को साहित्यिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने कुछ पौराणिक कथाओं को भी नाटक का विषय बनाया। इनमें 'सज्जन', 'विशाख', 'जनमेय का नागयज्ञ' आदि मुख्य हैं। इन नाटकों की कथावस्तु पौराणिक है, किन्तु नाटककार प्रसाद ने इन्हें मौलिक रूप दिया है। इन्होंने प्रतीकात्मक शैली पर 'कामना' नाटक लिखा। प्रसाद जी के नाटकों में नाटकीय तत्त्व का सुन्दर विकास है। उनमें साहित्यिक सौष्ठव है, फिर भी वे अभिनय की दृष्टि से काफी कठिन हैं। उनमें दार्शनिक विचारधारा है और वे साहित्यिक दृष्टि से पूर्ण हैं। प्रसाद जी ने अपने ऐतिहासिक नाटकों में नवीन तथा खोजपूर्ण दृष्टि का परिचय दिया है। उनके नाटक दुखान्त नहीं हैं, पर उनमें दुखद घटनाओं का अभाव नहीं है। उन्होंने नारी पात्रों के चरित्र-चित्रण पर विशेष ध्यान दिया है। उनके नाटकों में कल्पना और इतिहास का मधुर समन्वय है। 'एक घूँट' नामक एकांकी नाटक भी उन्होंने लिखा है।
आलोच्य युग में पौराणिक तथा ऐतिहासिक नाटकों की रचना का क्रम चलता रहा। मैथिलीशरण गुप्त ने 'तिलोत्तमा' तथा 'अनघ' की रचना की। मिश्रबन्धुओं के 'पूर्व भारत' तथा 'उत्तर भारत' और बद्रीनाथ का 'बेनु चरित्र' पौराणिक नाटक सामने आये। जगन्नाथप्रसाद शर्मा मिलिन्द ने 'प्रताप-प्रतिज्ञा', वियोगी हरि ने 'प्रबुद्ध-यमन' तथा उदयशंकर भट्ट ने 'चन्द्रगुप्त मौर्य' नामक सुन्दर ऐतिहासिक नाटक लिखे। इस प्रकार के नाटकों में अतीत के गौरव की झाँकी है। इस युग में समस्या मूलक नाटक भी लिखे गये, जिनमें समाज में प्रचलित अनेक समस्याओं पर विचार किया गया है। दूसरे समाजिक नाटक भी लिखे गये। इस प्रकार के नाटक जगन्नाथ प्रसाद शर्मा मिलिन्द, लक्ष्मीनारायण मिश्र तथा प्रेमचन्द आदि ने लिखे।
इस युग में पुरानी परम्परा के अनुसार प्रहसनों की रचना की गयी। राधेश्याम ने 'कौंसिल की मेम्बरी', पं. गोविन्दवल्लभ पन्त ने 'कंजूस की खोपड़ी' तथा भट्ट जी ने 'विवाह का विज्ञापन' आदि प्रहसन लिखे। मौलिक नाटकों के सिवाय अनेक अनुवाद भी संस्कृत और अँगरेजी से हिन्दी में किये गये। गाल्सवर्दी के 'सिल्वर बाक्स' का 'चाँदी की डिबिया' नाम से अनुवाद किया गया और भी अनेक नाटकों का अनुवाद किया गया। संक्षेप में प्रसाद-युग हिन्दी नाटक का स्वर्ण-युग है। इस युग में नाटकों की भाषा, शैली आदि सभी तत्त्वों का पूर्ण विकास हुआ।
प्रसादोत्तर युग और नाटक
प्रसाद-युग के बाद भारतीय समाज की विभिन्न समस्याओं और परिस्थितियों का साहित्य पर अधिक प्रभाव पड़ने लगा। नाटककारों ने अपने नाटकों में इन समस्याओं का चित्रण करना प्रारम्भ किया। इस युग में नाटककारों में चतुरसेन शास्त्री, सेठ गोविन्ददास, उदयशंकर भट्ट, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र, रामकुमार वर्मा, विष्णुप्रभाकर आदि प्रमुख हैं। इस युग के नाटकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। 'सिन्दूर की होली', 'अंगूर की बेटी', 'छाया और बन्धन' आदि इस युग के अच्छे नाटक हैं। इन नाटकों में नाटकीय तत्त्वों की व्यवस्था उपयुक्त तथा सुन्दर हो सकी है। कथावस्तु का विकास संगठित रूप में किया गया है। उसमें अभिनेयता का अभाव नहीं है।
नाटकों का वर्तमान युग
वर्तमान युग में छाया नाटक तथा रेडियो नाटक भी लिखे जा रहे हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा के एकांकी अधिक प्रसिद्ध हो रहे हैं। रेशमी टाई, पृथ्वीराज की आँखें आदि ऐसे ही नाटक हैं। इस युग में नाटकों का अभिनय कम होता है। अत: नाटकों का साहित्यिक महत्त्व ही अधिक ध्यान में रखा जाता है। इसमें रंगमंच की योजना की योग्यता गौण हो जाती है। नाटकों में रसनिष्पत्ति पर विशेष ध्यान रखना पड़ता है, पर आज इसका भी अभाव-सा है, क्योंकि आज नाटक-रचना दर्शक के लिए न होकर पाठकों के लिए हो रही है।
स्वतंत्रता के पश्चात हिंदी नाटक पूरी तरह से यथार्थवाद की ओर झुक गया जहाँ काल्पनिक और ऐतिहासिक नायकों के बजाय आम आदमी की पीड़ा, मध्यम वर्गीय परिवारों के टूटने और अस्तित्ववादी संकटों को केंद्र में रखा गया। मोहन राकेश जैसे नाटककारों ने 'आषाढ़ का एक दिन' और 'आधे-अधूरे' जैसी रचनाओं के माध्यम से भाषा और रंगमंच के बीच एक नया सेतु बनाया जिसने आधुनिक जीवन की विसंगतियों को बखूबी उभारा। वर्तमान समय में हिंदी नाटक विभिन्न प्रयोगों से गुजर रहा है जहाँ नुक्कड़ नाटक, रेडियो नाटक और आधुनिक तकनीकी मंचन ने इसे और भी विविधता प्रदान की है, जिससे यह विधा आज भी समाज के लिए एक सशक्त आईने की तरह काम कर रही है।
दृश्य-काव्य का लक्ष्य होता है- प्रेक्षकों में भावना का विकास करना तथा उन्हें मनोरंजन प्रदान करना, साथ ही साथ उनमें सुरुचि को बढ़ाना। आज के नाटकों का विकास सर्वाङ्गीण नहीं कहा जा सकता। हिन्दी में नाटक-साहित्य का विकास-क्रम कुछ रुक-रुक कर हुआ है। आशा है, भविष्य में निरन्तर नाटकों का विकास होता जायेगा तथा नाटक रचना अपने सभी उद्देश्यों की पूर्ति में सफल होगी।

Very nice
जवाब देंहटाएंआधुनिक हिंदी नाटक अंग्रेजी नाटकों से किस प्रकार प्रभावित है स्पष्ट कीजिए
जवाब देंहटाएंHindi natak ke usbhv vikash ki vivechana kijiye
जवाब देंहटाएंमोहन राकेश जी का आधे -अधूरे नाटक रंगमंच की दृष्टि से सर्वोत्तम नाटक है क्या ?
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