गठबंधन की राजनीति

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गठबंधन की राजनीति सपा या बसपा का कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ना, दोनों के लिए फायदे का सौदा नहीं रहा। सपा और बसपा ने गठबन्धन बनाकर समग्र विपक्षी एकता को नकारा है। उसका उद्देश्य केन्द्र में सरकार बनाना नहीं है, बल्कि चुनावों के बाद केन्द्र की नई बनने वाली सरकार में सौदेबाजी करने जितनी ताकत जुटाना है।

कठिन है राजनीतिक उजालों की तलाश



आगामी लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में गठबंधनों की राजनीति के नित-नये रंग उभर रहे हैं। सभी राजनीतिक दल चुनाव परिणामों की संभावनाओं की समीक्षा के पश्चात गलतियों को सुधारते हुए जीत को तलाशने में जुट गये हैं। अनेक विरोधाभासों एवं विसंगतियों के बीच राजनीतिक उजालों को तलाशा जा रहा है। सभी दलों के बीच राजनीति नहीं, स्वार्थ नीति देखने को मिल रही है। साझा सरकार के सभी दलों की सोच है कि सरकार में भी रहें और आगामी चुनाव में भी हमारा स्वतंत्र अस्तित्व बना रहे, ठीक इसी तरह विपक्षी महागठबंधनों में भी ऐसी ही मानसिकता देखने को मिल रही है, इसलिये वे गठबंधन से अलग रहकर या छोटे गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रह हैं।लखनऊ में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच ऐसे ही गठबंधन के ऐलान ने आगामी लोकसभा चुनावों की लड़ाई का अनौपचारिक आरंभ कर दिया है। ढाई दशक के शत्रुता एवं कड़वाहट भरे दौर को पीछे छोड़ते हुए सपा और बसपा ने एक-दूसरे से हाथ मिलाने का फैसला यह सोचकर किया है कि चुनाव में दोनों पार्टियां एक-दूसरे को अपने वोट हस्तांतरित करें और उनकी ऊर्जा आपसी लड़ाई में न खर्च हो। इसलिए 80 लोकसभा सीटोंवाले इस राज्य में आधी-आधी सीटें आपस में बांट लेने का निर्णय लिया है। 

यह सचाई है कि सपा या बसपा का कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ना, दोनों के लिए फायदे का सौदा नहीं रहा। तटस्थ होकर देखें तो कांग्रेस को भी ऐसे गठबंधनों से कभी कोई फायदा नहीं हुआ। लेकिन छोटे एवं क्षेत्रीय दल लगातार एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें मांजकर भी चुनाव में जीत के लिये हाथ मिलाने को तत्पर हुए हैं, इस
चुनाव
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तरह अवसरवादिता, नकारात्मकता और सिद्धांतहीनता से बड़ी राजनीति नहीं चलाई जा सकती। पर इस रणनीति में पूर्ण अनुकूलता किसी को नहीं हो रही है। अवसर का लाभ और अपनी मान्यताओं पर कायम रहना, दोनों बातें चाहते हैं, जो आज की स्थिति में संभव नहीं है। कहावत है ”राजनीति में नामुमकिन शब्द नहीं होता।“ सम्पूर्ण साक्षरता का नारा देने वाली संसद के सदस्य शपथ तक नहीं पढ़ सकते। भारत की अखण्डता और एकता को सर्वोपरि मानने वाले क्षेत्रीयवाद, जातीयता को पनपा रहे हैं, जो साम्प्रदायिकता से कम ज़हरीली नहीं है। हकीकत यह है कि सपा और बसपा दोनों पार्टियां मुख्यतः सामाजिक समीकरणों की राजनीति करती हैं जबकि कांग्रेस और भाजपा माहौल बनाकर चुनाव जीतती हैं। लेकिन दो विरोधी धाराओं का मिलन एवं साथ मिलकर चुनाव लड़ना राष्ट्रीय चुनावी परिदृश्यों को प्रभावित कर पायेगी या नहीं, लेकिन यह निश्चित है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति पर इसका गहरा असर देखने को मिलेगा। इससे निश्चित ही कांग्रेस की जमीन सरक गयी है और भाजपा के लिये बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी है। राष्ट्रीय स्तर पर अगले आम चुनाव का स्वरूप त्रिकोणीय नहीं, भाजपा बनाम कांग्रेस जैसा ही रहेगा, लेकिन राज्यों में अलग-अलग तरह की लड़ाइयां दिखेंगी, जिनमें ज्यादातर जगहों पर एक छोर भाजपा या मोदी करिश्मे का होगा। एक तरह से यह भाजपा की मनचाही स्थिति है। वह लड़ाई को मोदी बनाम राहुल का रूप देना चाहती थी, जो उसे बैठे-बिठाए मिल रहा है।

सपा और बसपा ने गठबन्धन बनाकर समग्र विपक्षी एकता को नकारा है। उसका उद्देश्य केन्द्र में सरकार बनाना नहीं है, बल्कि चुनावों के बाद केन्द्र की नई बनने वाली सरकार में सौदेबाजी करने जितनी ताकत जुटाना है। इसका मतलब मोटे तौर पर यही निकलता है कि चुनावों के बाद यदि लोकसभा में भाजपा या कांग्रेस में से किसी भी पार्टी को सरकार गठित करने के लिए मदद की जरूरत पड़ेगी तो उसकी जमकर कीमत वसूली जाएगी। मगर राजनीति ऊपर से देखने में लगती है भीतर से वैसी नहीं होती है और इसकी हकीकत अलग होती है। यह निश्चित है कि अपने-अपने जातिगत आधार पर इन दोनों ही पार्टियों में इतनी शक्ति नहीं बन पाती कि वे भावी सत्ता में अपनी निर्णायक भूमिका अदा कर सके। इसलिये इन दोनों दलों का साथ चुनाव लड़ने का निर्णय राजनीतिक सूझबूझ का तो द्योतक है ही। लेकिन ये दल मिल कर जिस तरह का राजनीतिक परिदृश्य निर्मित किया हैं उसके तहत मतदाता जातिगत दायरों और मजहब के सांचों में खुद-ब-खुद कैद हो जायेगा। ऐसी ही राजनीति करते हुए अब तक कांग्रेस को इस राज्य की सत्ता से दूर रखा गया है और  जिसमें सपा एवं बसपा के साथ भाजपा लखनऊ में सत्ता में बैठती रही हैं। इस बार भी ऐसा ही कुछ देखने को मिलेगा। 

जनाकांक्षाओं को किनारे किया जा रहा है और विस्मय है इस बात को लेकर कोई चिंतित भी नजर नहीं आता। जो शिखर पर हो रहा है उसी खेल का विस्तार आज उत्तर प्रदेश की राजनीति के आस-पास भी दिखाई दे रहा है। उससे भी ज्यादा विस्मय यह है कि हम दूसरांे पर सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगा रहे हैं, उन्हीं को गलत बता रहे हैं और हम उन्हें जगाने का मुखौटा पहने हाथ जोड़कर सेवक बनने का अभिनय कर रहे हैं। मानो छलनी बता रही है कि सूप (छाज) में छेद ही छेद हैं। एक झूठ सभी आसानी से बोल देते हैं कि गलत कार्यों की पहल दूसरा (पक्ष) कर रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए स्वयं कुछ भी कर गुजरने को तैयार हंै और इस तैयारी में विचारधाराएं, आदर्श हाशिए पर जा चुके हैं। ऐसी स्थिति में दागदार चरित्रों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। एक गन्दी मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है, जबकि यहां तो गांव/नगर की हर गली के मोड़ पर दीयासलाई लिए खड़ा है, सभी कुछ नष्ट करने के लिए। इसलिये भविष्य का जो राजनीति चरित्र बन रहा है उसके प्रति भी लोगों को एहसास कराना होगा, जहां से राष्ट्रहित, ईमानदारी और नए मनुष्य की रचना, खबरदार भरी गुहार सुनाई दे। अगर ये एहसास नहीं जगाया तो कौन दिखाएगा उनको शीशा? कौन छीनेगा उनके हाथ से दियासलाई? कौन उतारेगा उनका दागदार चोला? कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि उत्तर प्रदेश की सियासी फिजां को बदलने में सपा व बसपा को सफलता मिली कि इस राज्य के नागरिकों की पहचान मतदाता से बदल कर जाति और हिन्दू -मुसलमान में तब्दील हो जायेगी। मगर प्रदेश की इस राजनीतिक लड़ाई का ताल्लुक कभी भी राष्ट्रीय नीतियों या राज्य के विकास के मुद्दों से नहीं रहा। लेकिन दूसरी तरफ यह भी हकीकत है कि इसी राज्य के लोगों ने 1996 के लोकसभा चुनावों को छोड़कर कभी भी राष्ट्रीय मुद्दों को अपनी नजरों से ओझल नहीं होने दिया, 2014 के लोकसभा के चुनावों में तो राष्ट्रीय मुद्दे इस कदर प्रभावी हुए कि इन्होंने बसपा को एक भी सीट नहीं दी और सपा को भी चार-पांच सीटों पर समेट दिया। इससे पहले 2009 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को 23 सीटें देकर यहां के लोगों ने सन्देश दिया कि देश के चुनावों में जात- पात का बन्धन नहीं रहना चाहिए। इस बार लोकसभा चुनाव ‘वोटबैंक’ के हस्तांतरण से नहीं बल्कि ‘विचारधारा’ के हस्तांतरण से तय होने जा रहे हैं, उत्तर प्रदेश को जीतने के लिए अन्ततः साम्प्रदायिकता का मसले ही केन्द्र में रहने वाला है, तीन तलाक अध्यादेश हो या राम मन्दिर का मसला- चुनाव जीतने का हथियार बनने वाला है। रह-रह कर सात दशकों में वे ही मुद्दें शक्ल बदलकर सामने लाये जा रहे हैं। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हम अपने को, समय को अपने भारत को, अपने पैरों के नीचे की जमीन को पहचानने वाला साबित नहीं कर रहे हैं। जिन्दा कौमें पांच वर्ष तक इन्तजार नहीं करतीं, हमने चैदह गुना इंतजार कर लिया है। यह विरोधाभास नहीं, दुर्भाग्य है, या सहिष्णुता कहें? जिसकी भी एक सीमा होती है, जो पानी की तरह गर्म होती-होती 50 डिग्री सेल्सियस पर भाप की शक्ति बन जाती है। देश को बांटने एवं तोड़ने वाले मुद्दे भी कभी तो भाप बनेंगे? 



- ललित गर्ग
बी-380, निर्माण विहार, दूसरा माला दिल्ली-110092
मो, 9811051133

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