हार्ट ट्रांसप्लांट

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हार्ट ट्रांसप्लांट हार्ट ट्रांसप्लांट आँसू के घूँट निगलकर वह कहने लगा, ‘मेरी डायरी पिताजी ने पढ़ी और उन्होंने अपने सीने पर हाथ रखा। वह हार्ट अटैक था। वे बस इतना कह पाये कि उन्हें अब मालूम हुआ कि वह फरार हुआ ड्राइव्हर और कोई नहीं, वे स्वयं थे।

हार्ट ट्रांसप्लांट


हार्ट ट्रांसप्लांट फूल मुरझाने के पहले अपनी सारी पंखुड़ियों को फैलाये मुस्करा रहा था। पास खड़ी डाक्टर वसुधा ने कहा, ‘काश! यह बच्चा हमारा होता।’
तब डाक्टर वर्मा ‘हूँ’ --- एक छोटी-सी ‘हूँ’ कहकर रह गये। बीमार बच्चे की दुआ के लिये एक निःसंतान दंपती इससे ज्यादा और क्या कह सकती थी? दिल में तड़पती चाह का यूँ अनायास प्रकट होना जैसे सब कुछ व्यक्त कर जाता है।
‘क्या, कुछ हो भी सकता है, डाक्टर साहब,’ बच्चे के पिता विमल ने एक हताशा से उपजा प्रश्न किया।
‘सुनने की हिम्मत है?’ यह प्रश्न करने की हिम्मत डा. वर्मा नहीं जुटा पाये। वे चुप रहे। विमल की आँखें इस चुप्पी का अर्थ पहले से ही जानती थी। आँसू पी-पीकर वे पहले ही लबालब हो चुकीं थी। उधर वह बच्चा अपनी माँ की गोद में निश्चिंत मुस्कराये जा रहा था।
चहूँओर पसरा सन्नाटा एक पारदर्शी चादर की तरह दर्द को अपने में छिपाने की कोशिश में हार चुका था। आखिरकार डाक्टर ने कह ही दिया, ‘आपके बेटे के दिल में सुराख है।’
हार्ट ट्रांसप्लांट
हार्ट ट्रांसप्लांट
‘फिर?’ यह प्रश्न बेटे की माँ के खामोश आँसुओं ने किया। डाक्टर को इसी प्रश्न का इंतजार था, परन्तु किस रुँधे कंठ में इतनी ताकत थी कि कुछ बोले, कुछ पूछे। सब चुप थे। डाक्टर ने खुद ही स्पष्ट कह दिया, ‘ हमें हार्ट ट्राँस्प्लांट करना पड़ेगा। इसके लिये जल्द से जल्द एक स्वस्थ हृदय का मिलना भी जरूरी है।’
स्वस्थ हृदय कब, कहाँ, किससे, कितने में मिलेगा? ये सारे प्रश्न एक साथ बबूल के काँटों की तरह चुभने लगे। जटिल प्रश्न दर्द को चेतना-शून्य करते तो हैं, पर निष्कर्ष शून्य की परतों के अंदर अपने पंख फड़फड़ाने के सिवाय कुछ नहीं कर पाता है।
डाक्टर ने पास खड़ी नर्स से कहा, ‘सारे टेस्ट करवाकर तुरंत दिखाना और चाहे मैं कहीं भी हूँ बच्चे की हालत की जानकारी लगातार मुझे देते रहना।’
भारी मन से नर्स ने बच्चे को माँ की गोद से उठाकर पलंग पर लिटा दिया और मशीनों में व्यस्त हो गई। कहते हैं कि सिसकियाँ को रोकने से कार्य की दक्षता में स्फूर्ति खुद-ब-खुद जुड़ जाती है। नर्स की तल्लीनता उस वक्त देखने योग्य थी।
विमल असहाय-सा सब देखता रहा। ‘मुझे क्या करना है?’ एक अबोध बालक की तरह उसने नर्स से प्रश्न किया।
नर्स ने पलटकर देखा। बेचारी की नम पलकें चारों ओर फैली धूंध को टटोलती रही जैसे कह रहीं हो कि अब आँसुओं को पूजने के सिवाय किया भी क्या जा सकता है। लेकिन अस्पताल में हौसला कायम रखना स्टाफ का फर्ज होता है। ‘आपको पैसे का इंतजाम करना होगा,’ नर्स ने कहा, ‘हो सकता है कि हृदय मिल जावे।’
‘कितने पैसे?’ इक छोटा-सा प्रश्न विमल के मन में किलबिलाने लगा। 
पर यह छोटा-सा प्रश्न लाखों रुपये माँग रहा था। एक अनिश्चिंतता का माहौल सर्वत्र पसरता देख विमल भारी कदमों से बाहर चला गया।
उस रात जब सारी दुनिया सो रही थी, तब जाग रही थी नर्स की कर्तव्यनिष्ठा, विमल की छटपटाती आत्मा और बच्चे की माँ की दुआऐं जो अनवरत ईश्वर को जगाये रखना चाह रहीं थी। 
अंतिम पहर तक रात्रि स्तवन की काया में सिमटी रही और फिर सुबह सूरज को ऊगना था तथा उसकी प्रथम किरणों को सृष्टि में फुदकना था। ऐसी मान्यता है कि चहकती चिरैयाऐं शुभ संदेश लेकर आती हैं। विमल इसी सोच के साथ खिड़की के बाहर झाँक रहा था। फोन की घंटी बजी। नर्स ने बताया, ‘हार्ट मिल गया है। डाक्टर ऑपरेशन में व्यस्त हैं।’
ऑपरेशन सफल हो गया। अस्पताल अस्पताल न रहा, मंदिर में बदल गया --- ऐसा मंदिर जहाँ ईश्वर ने विमल की प्रार्थना सुन ली थी। परन्तु बार-बार पूछने पर भी डाक्टर ‘डोनर’ का नाम नहीं बता रहे थे। पूरा स्टाफ भी इस विषय में अनभिज्ञ था या फिर कुछ न बताने की कसम खाया हुआ था। ‘दुनिया में इंसानों के बीच ईश्वर होते हैं,’ किसी ने कहा था। एक आवाज भी सुनाई दी कि कोई भी दस-बीस लाख माँग लेता, पर इधर तो डोनर ने अपना नाम तक नहीं बताया था। लोगों ने विमल को कहते सुना, ‘हे ईश्वर! मैं किसे शुक्रिया अदा करूँ?’
तभी नैपथ्य से जैसे एक आवाज उठी जो शायद विमल ही सुन सका था। ‘यह बच्चा डा. वसुधा की गोद में रख दो, विमल।’ हाँ, विमल को याद आया, डाक्टर वसुधा ने ही कहा था, ‘काश! यह बच्चा हमारा होता। एक मरणासन्न बच्चे पर ममत्व का यूँ उमड़ पड़ना अकल्पनीय द्दश्य था --- या फिर वह एक दैविक शक्ति थी जो सिर्फ नारी के हृदय में वास करती है। 
‘क्या, तुमने डाक्टर वसुधा को यह कहते सुना था?’ विमल ने अपनी पत्नी से पूछा, ‘क्यों न हम इसे -----’
पर इसके आगे वह कुछ कह पाता, बच्चे की माँ की आँखें छलछला उठी। वह अनकहे शब्दों को समझ गई थी। विमल की सोच हैरान करनेवाली थी। अपने बच्चे से लिपटी माँ की आँखों से सहसा उमड़ती अश्रुधारा ने उनके शब्दों को अनकहा ही रहने दिया। ममता का इशारा एक नारी सहज समझ जाती है इसलिये नर्स ने भी धीमे से विमल से कहा, ‘नहीं, रहने दो।’
समय बूढ़ा नहीं होता परन्तु वह दुनिया को अतीत में ठकेलने में नहीं हिचकिचाता। डाक्टर वर्मा द्वारा किया गया उक्त ऑपरेशन अंतिम नहीं था। लेकिन इसके बाद हर ऑपरेशन में यकायक उनके हाथ ठिठक जाते थे। ऑपरेशन के दौरान स्टाफ को निर्देश देते समय उनकी आवाज टूटती-दुखती हुई होती --- काँच की किरचनों की तरह जो चुभन भरी वेदना से भरी होती है। 
धीरे-धीरे वे सर्जन कम कन्सलटेंट ज्यादा बनते गये। पर इस पर भी उनकी ख्याति बढ़ती गई थी।
सुना था कि विमल ने लाख कोशिश की थी पर हार्ट डोनर की बात रहस्य बनी रही। वह एक अलौकिक घटना थी जिसे समय ने अपने विस्तृत पंखों में समेटकर विस्मृति के अथाह गर्भ में रख दिया था। सच, पवित्र आत्माओं का संसार अद्भुत सौन्दर्य से भरा होता है। 
लेकिन इक्तिफाक से यह किस्सा ताजा हो उठा जब किसी पत्रिका ने वयोवृद्धों का स्मरण कर उनके अनुभवों की श्रंखला प्रकाशित करने का विचार किया। उस पत्रिका ने इक दल का गठन किया जो वृद्धजनों से संपर्क कर उनके जीवन के अद्भुत क्षणों की, विलक्षण अनुभवों की, प्रेरणादायक घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने लगा था।
इस समय डा. वर्मा 85 वर्ष के हो चुके थे। साक्षात्कार के लिये चेतन को भेजा गया था। अपनी डायरी में चेतन ने लिखा, ‘डा. वर्मा उम्र की उस पायदान पद पर आ चुके थे जहाँ चिंतनमग्न संत विराजमान होते हैं।’ उनसे अविस्मरणीय घटना के बारे में पूछा तो उन्होंने इसी ऑपरेशन का जिक्र किया और बताया कि उस नन्हें बच्चे का हार्ट ट्राँस्प्लांट के समय वे भावुक हो उठे थे। एक नन्हा-सा दिल छिद्रमय होने के बावजूद धड़कते रहने की कोशिश कर रहा था। इस बहादुर दिल की उत्साहित धड़कनों को यकायक बंद करना कठिन काम था --- एक निर्मम हत्या की तरह। पर यह आवश्यक था, नया हार्ट लगाने के लिये। ‘यह मेरा कर्तव्य था --- एक प्रतिज्ञा की पूर्ति को संपन्न करने,’ वर्माजी ने कँपते शब्दों में कहा।
‘कैसी प्रतिज्ञा?’ इस प्रश्न के उभरते ही वर्माजी की आँखें अश्रूपूर्ण हो उठीं। इस प्रश्न के साथ वह क्षण भी आ गया जो वर्माजी वर्षों से अपने अंतः में छिपाये रहस्य को और अधिक न छिपा सके थे। उन्हीं के शब्दों को चेतन ने अपनी डायरी में उतार लिया।
‘हमारी कोई संतान नहीं थी। पर इस कमी को मेरी पत्नी वसु ने कभी जाहिर नहीं किया, बल्कि वह सदा इसी प्रयास में रहती कि मुझमें इस कमी की तड़प न जग पावे। वह अपने जीवन का हर क्षण गंभीरता से आँकती और पूर्ण सतर्कता बरतती। लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ जब उसने बच्चे को देखते ही अनायास कहा, ‘काश! यह बच्चा अपना होता।’ उसके इन शब्दों में  करुणा थी --- ममता थी। तब मैंने अहसास किया कि एक मरणासन्न नाजुक बच्चे को देख अपने अंतस्थ में जाग्रत ममत्व को सर्मपित करना नारी ही जानती है।
भूपेन्द्र कुमार दवे
भूपेन्द्र कुमार दवे
‘मैं उस समय चुप रहा पर मेरी पत्नी के हृदय में उठी ममत्व की वह दारुण पुकार मेरे हृदय में प्रतिवनित होने लगी। फलतः मेरी आत्मा भीतर ही भीतर संकल्प लेने लगी कि किसी भी तरह से बच्चे को बचाना है।
‘मुझे वह क्षण भी याद है जब वसु रात की ड्यूटि पूरी कर घर जाने के पहले उस बच्चे के पास आयी थी। मैं वहाँ मौजूद था। मैंने सुना कि वह प्रार्थना कर रही थी, ‘हे ईश्वर! मेरी उम्र इस बच्चे को दे दो।’
‘यद्यपि डाक्टर होने के नाते मैं भावनाओं में कम ही बहता हूँ फिर भी उस वक्त न जाने क्यों वसु की इस प्रार्थना ने मुझे विचलित कर दिया। इस प्रार्थना में न जाने क्यों मुझे अंतिम इच्छा की सी बू आने लगी थी। आत्मा जब रोती है तो उसके गर्म आँसू रगों में जाकर आंदोलित हो उठते हैं। ‘नहीं, हे ईश्वर! इस प्रार्थना को मत सुनना --- इसमें नादानी की झलक है। इसकी अवहेलना करना ही उचित है --- पुण्य है,’ मैं एक तरह से ईश्वर से गिड़गिड़ाकर कह रहा था। परन्तु .... ।
‘ईश्वर ने ममता की शक्ति को सर्वोपरी मानकर, मेरी बात को कोई तबज्जो नहीं दी। वसु जब घर जा रही थी तब वसू की स्कूटि को पीछे से आती कार ने अपनी चपेट में ले लिया। रात का समय था। सड़क लगभग सूनसान थी। वसू को तड़पता छोड़ कार का ड्रायव्हर अपनी रफ्तार बढ़ाकर फरार हो गया।’ 
यह कहते समय अश्रुबिन्दु डाक्टर की आँखों में तैरते स्पष्ट दिखने लगे। कुछ रुककर उन्होंने आगे कहा, ‘घटनास्थल पर कुछ लोगों ने वसु को पहचान लिया और अस्पताल पहुँचाकर मुझे फोन किया। वसु को गंभीर चोटें लगी थी। अस्पताल में मुझे सारे डाक्टर हताश नजर आ रहे थे। मैं कंप उठा। देखते ही देखते वह क्षण भी आ गया जब वसु ने आँखें खोली और मुझे देखकर मुस्काई। वह बस इतना कह पायी, ‘मेरा शरीर दान कर देना। क्यों --- यह तो आपको मालूम है।’ यह अंतिम इच्छा जाहिर करते अस्पष्ट शब्द सुन मैं सन्न रह गया।’ डाक्टर फिर चुप हो गये और मैं मूर्तिवत् बैठा उनको ताकता रहा। मेरी भी आँखें छलछला उठीं थी। डाक्टर के हाथ को अपनी हथेलियों में लेकर मैं अवरुद्ध कंठ से बस यही कह पाया, ‘डाक्टर साहब! मैं ही वह बच्चा हूँ जिसके अंदर आपकी इन ऊँगलियों ने हृदय प्रत्यारोपण किया था।’ 
‘सच,’ डाक्टर ने कहा और उनकी आँखें चकित हो चेतन को घूरने लगी --- एकटक --- अविचल।
और तब .... एक अलौकिक प्रकाश चेतन को चकाचोंध कर गया। 
डाक्टर वैसे ही निश्चल कुर्सी पर बैठे रहे। चेतन जा चुका था और उसके पीछे वह रहस्य भी उड़ता चला गया --- एक नवजात परिंदे के बच्चे की तरह जिसने अभी अभी उड़ना सीखा था। एक अजीब निस्तब्धता कमरे में फैलती जा रही थी और डाक्टर वर्मा निर्विकार, निर्जीव कुर्सी पर बैठे शून्य में अपनी पथराई नजरों से देख रहे थे। 
तभी फोन की घंटी बज उठी। ‘मैं चेतन बोल रहा हूँ,’ एक थरथराती आवाज आयी।
‘बोलो बेटा।’
‘जी,’ चेतन सिसक रहा था। आँसू के घूँट निगलकर वह कहने लगा, ‘मेरी डायरी पिताजी ने पढ़ी और उन्होंने अपने सीने पर हाथ रखा। वह हार्ट अटैक था। वे बस इतना कह पाये कि उन्हें अब मालूम हुआ कि वह फरार हुआ ड्राइव्हर और कोई नहीं, वे स्वयं थे।
                            
 .... भूपेन्द्र कुमार दवे




यह रचना भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ''बूंद- बूंद आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैसंपर्क सूत्र - भूपेन्द्र कुमार दवे,  43, सहकार नगररामपुर,जबलपुरम.प्र। मोबाइल न.  09893060419.           

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