दशा और दिशा

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संस्कृत में गद्य काव्य और पद्य काव्य के अतिरिक्त चंपू काव्य होता है, लेकिन हिंदी में गद्य-पद्य को साथ-साथ लिखने का चलन कम ही है | माड़भूषि रंगराज अयंगर ने इस दिशा में प्रयोग किया है | उनकी प्रथम पुस्तक “ दशा और दिशा ” में 33 रचनाएँ हैं, जिनमें 11 गद्य और 22 पद्य हैं | गद्य रचनाओं में 7 लेख और 4 कथात्मक रचनाएं हैं |

दशा और दिशा   

- पाठक को चिन्तन के लिए विवश करती कृति 
संस्कृत में गद्य काव्य और पद्य काव्य के अतिरिक्त चंपू काव्य होता है, लेकिन हिंदी में गद्य-पद्य को साथ-साथ लिखने का चलन कम ही है | माड़भूषि रंगराज अयंगर ने इस दिशा में प्रयोग किया है | उनकी प्रथम पुस्तक “ दशा और दिशा ” में 33 रचनाएँ हैं, जिनमें 11 गद्य और 22 पद्य हैं | गद्य रचनाओं में 7 लेख और 4 कथात्मक रचनाएं हैं | 

लेखों में दो लेख हिंदी विषय को लेकर हैं | पहला लेख है – ‘ हिंदी : दशा और दिशा ’| इस लेख में वे हिंदी की वर्तमान स्थिति पर विचार करते हैं | एक तरफ उनका मानना है कि कड़े फैसले न लिए जाने के कारण तमिल भाषी लोग हिंदी विरोधी हैं, दूसरी तरफ वे अतिवादिता के विरोधी हैं | वे लिखते हैं – 

“ मैं यदि मेरी कहूँ तो मुझे हिंदी से बेहद लगाव है | लेकिन जिस तरह से हमारे देश में हिंदी के प्रयोग पर या अपनाने पर जोर जबरदस्ती की जाती है उस पर मुझे कड़ी आपत्ति है | कहा जाता है कि हस्ताक्षर हिंदी में करें, कोई इन्हें समझाए कि क्या हस्ताक्षर की कोई भाषा होती है | यदि हाँ तो कल कोई मुझसे कहेगा – आप हिंदी में क्यों नहीं हँस रहे हैं |” ( पृ. – 17 )

वे अंग्रेजी की अवहेलना करके हिंदी को आगे बढाने के पक्ष में भी नहीं लेकिन हिंदी को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं और इस हेतु सुझाव भी देते हैं | दुसरे निबन्ध ‘ अपनी भाषा – हिंदी’ में वे देवताओं के उदाहरण और अंग्रेजों के कृत्य में एकता देखते हुए लिखते हैं कि भाषा का गठबंधन में विशेष स्थान है, इसलिए राष्ट्रव्यापी भाषा होना जरूरी है | वे राष्ट्रभाषा शब्द पर विचार करते हैं और मानते हैं कि अगर कांग्रेस अपने अधिवेशन से पूर्व अन्य राजनैतिक पार्टियों से संपर्क करती तो हिंदी आज राष्ट्रभाषा होती | वे भारत के सन्दर्भ में लिखते हैं – 
“ भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है, भाषा निरपेक्ष नहीं |”( पृ. – 27 )
वे भाषा के उच्चारण को लेकर कहते हैं कि अहिन्दी भाषियों के गलत उच्चारण पर हँसने की बजाए उन्हें सही करने के पक्षधर हैं | 

 ‘ अदृश्य के अस्तित्व का सवाल ’ लेख में वे कहते हैं – 
“ मैं पूजा के लिए मन्दिर जाना पसंद नहीं करता |”
इसका कारण आस्था की कमी नहीं, अपितु उन्हें यह तरीका पसंद नहीं | उन्हें नहीं पता कि वे आस्तिक हैं या
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दशा और दिशा 
नास्तिक क्योंकि लोगों को आस्तिक-नास्तिक की परिभाषा ज्ञात नहीं | वे एक उदाहरण द्वारा दैवीय शक्ति के अभ्युदय की कल्पना करते हैं | वे धर्म को नियन्त्रण तन्त्र कहते हैं | वे प्रबन्धन पर विचार करते हैं और इसी प्रबन्धन के कारण अदृश्य शक्ति का प्रभाव कम हुआ और लोग अब तर्क करने लगे हैं कि भगवान है या नहीं ? वे आखिर में एक सवाल सबके सामने रखते हैं –
“ क्या अब मानव मूल्य शेष रह गए हैं ?” ( पृ. – 46 )

‘ जी...हाँ...जी...’ लेख में वे नौकरी में तरक्की को विषय बनाते हैं | इसे स्पष्ट करने के लिए वे महाभारत के उस प्रसंग को उठाते हैं जब दुर्योधन और अर्जुन युद्ध के लिए कृष्ण से सहायता लेने आते हैं | यहाँ भी वे प्रबन्धन को महत्त्वपूर्ण कारक बताते है और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं – 
“ आपका भाग्य आपके हाथ है, आप अपने भाग्य विधाता हो, मर्जी आपकी आप क्या करना चाहेंगे |” ( पृ. – 60 )ठ

‘ अंध विशवास ’ लेख में वे इस शब्द के शाब्दिक अर्थ पर विचार करते हुए बिल्ली संबंधी अंधविश्वास का उदाहरण देते हुए इस पर विचार करते हैं कि क्या यह जनता को लूटने का तरीका तो नहीं ? फिर अनहोनी होने से डरते भी हैं, लेकिन वे इस विषय पर तर्क-वितर्क करने का सोचते हैं | वे दोस्त से सुनी अंग्रेजी कहानी भी बताते हैं | वे देखते हैं कि बिल्ली नव प्राण है जबकि आदमी पंच प्राण या अधिक से अधिक षट प्राण | इसका विश्लेष्ण करते हुए वे निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि –

“ जब बात इतनी तक आ गई तो समझ आया कि ये रूढ़िवादी विशवास या कहिए ( so called ) अंधविश्वास के भी कारण होते हैं | ( पृ. – 95 )

‘ आ अब लौट चलें ...’ लेख में वे संयुक्त परिवारों के ओर लौट चले का आह्वान करते हैं | इसका विषय नारी स्वंत्रता के लिए चलाए गए राजा राममोहन राय और दयानन्द सरस्वती के आन्दोलन से आज तक की स्थिति है | नारी आगे बढ़ी, लेकिन अब उस पर दोहरा दायित्व है | संयुक्त परिवार टूटे और बचपन खोया | ‘ यातायात की हालत’ में वे अपनी यात्राओं से प्राप्त अनुभवों का ब्यान करते हैं | उन्हें मुंबई सर्वोतम लगता है | दिल्ली के बारे में वे कहते हैं – 

“ यहाँ ट्राफिक नियम के नाम पर कुछ ही नियम हैं, जिनके पालन के लिए ट्राफिक पुलिस लगी है |” ( पृ. – 122 )

बरसात मुंबई में भी समस्या है और दिल्ली में भी | बेंगलूर के बारे में वे लिखते हैं – 
“ लाल बत्ती क्रास न करें और सब ठीक है |” ( पृ. – 124 )

सड़कों के मामले में वे राजस्थान, गुजरात को बेहतर मानते हैं , साथ ही वे कहते हैं कि यहाँ की जनता-जनार्दन सीढ़ी-सादी है | गुजरात के ट्राफिक नियम के बारे में वे लिखते हैं – 

“ ट्राफिक नियम क्या है और क्यों हैं, इसकी खबर तो शायद ट्राफिक पुलिस को भी नहीं है |”

बंगाल में चौड़ी सड़कों के बावजूद जाम रोज की समस्या है | चेन्नई में ट्राफिक बहुत है, लेकिन जाम कम है | असम मेघालय में ट्राफिक कम है | शहरों में विशिष्ट अतिथियों के आवागमन को वे एक बड़ी बीमारी मानते हैं | वाहन टकराने पर बड़े वाहन  को जिम्मेदार माना जाना पूरे भारत की परंपरा है | अंत में वे इस लेख के बारे में बताते हैं – 

“ यह लेख केवल जानकारी के लिए है, किसी आलोचना के लिए नहीं |

” ( पृ. – 131 ) कहानियों में ‘ जान का ऑफर ’ राधिका की कहानी है, जो रंजन और संदीप से प्यार करके दो नावों की सवारी कर रही है | रंजन भावुक किस्म का इंसान है | वह प्यार के लिए जान देने को तैयार है | जब राधिका का झुकाव संदीप की तरफ हो जाता है, तो वह संदीप से अलग होना चाहती है मगर किए गए वायदे अडचन बनते हैं | आखिर में वह रंजन का वध कर देती है | 

‘ आँखों का डाक्टर ’ में बचपन की मासूमियत का चित्रण है तो ‘ चेट कॉल ’ में बेटा शब्द के प्रयोग का असर दिखाया है | 

‘रिश्ते दिल के ...’ वे दोस्ती के रिश्तों का महत्त्व प्रतिपादित करते हैं |

इस पुस्तक की शेष 22 रचनाएँ पद्य हैं | मुक्त छंद की इन कविताओं में अनेक विषयों को उठाया गया है | 

‘ शुद्धता ’ कविता का अंत गद्यात्मक है | 
‘ प्रगति ’ में वे मिथिहास में नारी पर हुए अत्याचारों को विषय बनाते हैं | 
‘ यथोचित ’ में वे बदलते मानव और उसके व्यवहार को वर्णित करते हैं | 
‘ परिभाषा ’ में वे लिखते हैं – 
“ ज़िंदगी शतरंज की बाज़ी नहीं है / जीत लो या हार लो...” ( पृ. – 50 )
इस कविता के माध्यम से वे जीवन की परिभाषा समझने का आह्वान करते हैं | ‘ चाँद पाना चाहता हूँ ’ और ‘ चौदहवीं का चाँद ’ चाँद को केंद्र में रखकर लिखी गई कविताएँ हैं | 
‘ चौदहवीं का चाँद’ कविता आर्मस्ट्रांग के चाँद पर पहुँच जाने से मन में उठी टीस का बयान है – 
“ कि चाँद पर किसी ने कदम धर दिए हैं ” ( पृ. – 61 )
“ होली मुबारक / होली मिलन मुबारक ” ( पृ. – 65 ) कहकर वे होली त्यौहार को कविता में पिरोते हैं | 
दशहरे पर कविता है, मयकशी पर कविता है | वे भूकम्प का कारण खनन को मानते हैं | 
‘ एक विचार’ और ‘ मेरा प्यार’ में प्यार को विषय बनाया है ‘ एक विचार’ में वे प्यार मर्जी से करना चाहते हैं तो ‘ मेरा प्यार’ में अपने प्रेम को जमाने के प्रेम से अलग दिखाते हैं | 
‘ वार’  नज़रों की कटारी से मारे वार को दिखाती है तो ‘ बिछना-बिछाना’ में ख़ुद बिछ जाने पर व्यंग्य है | 
‘ शहंशाह’ में वक्त का महत्त्व है तो ‘ मानसिकता’ में प्रकृति के प्रकोप का जिक्र है |
‘ अम्मी की अठन्नी ’ कविता में वे अब्बू की सख्ती को ब्यान करते हैं, जिसने उनके जीवन का दशा दी है – 
“ अब्बू अगर ख्याल नहीं करते, तो / आखिरकार यही होता कि /
आप इस वक्त, यह / न पढ़ रहे होते / न मैं होता और /
न ही मेरी यह रचना होती |” ( पृ. – 74 )
संक्षेप में, यह विचार प्रधान कृति है | कविताओं में विचारत्व की प्रधानता है | लेख इस कृति का अत्यंत महत्त्वपूर्ण भाग हैं | “ दशा और दिशा ” अपने नाम के अनुकूल पाठक को चिन्तन के लिए विवश करती है |

 © दिलबागसिंह विर्क



पुस्तक – दशा और दिशा 
लेखक – माड़भूमि रंगराज अयंगर 
प्रकाशक – ऑनलाइन गाथा 
कीमत – 150 /-
पृष्ठ – 140 

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दशा और दिशा
संस्कृत में गद्य काव्य और पद्य काव्य के अतिरिक्त चंपू काव्य होता है, लेकिन हिंदी में गद्य-पद्य को साथ-साथ लिखने का चलन कम ही है | माड़भूषि रंगराज अयंगर ने इस दिशा में प्रयोग किया है | उनकी प्रथम पुस्तक “ दशा और दिशा ” में 33 रचनाएँ हैं, जिनमें 11 गद्य और 22 पद्य हैं | गद्य रचनाओं में 7 लेख और 4 कथात्मक रचनाएं हैं |
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