डॉ. शंकर शेष

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नाटक, साहित्य की सबसे सामाजिक विधा है| मनुष्य-जीवन और जगत् को उसमें प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता डॉ. शंकर शेष डॉ. शंकर शेष है| इसलिए वह उसकी अनुभूतियाँ का प्रामाणिक, सजीव और रचनात्मक चित्र है| नाटक की संरचना में मनुष्य के जीवन और उसके समस्या को अभारने की विशिष्ट क्षमता है|

डॉ. शंकर शेष के नाटकों में चित्रित नारी जीवन 

नाटक, साहित्य की सबसे सामाजिक विधा है| मनुष्य-जीवन और जगत् को उसमें प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता
डॉ. शंकर शेष
डॉ. शंकर शेष 
है| इसलिए वह उसकी अनुभूतियाँ का प्रामाणिक, सजीव और रचनात्मक चित्र है| नाटक की संरचना में मनुष्य के जीवन और उसके समस्या को अभारने की विशिष्ट क्षमता है| पूर्व और पश्चिम के नाट्य-चिंतक इस तथ्य का समर्थन करते हैं विश्व के कालजयी नाटक इसका पुष्ट प्रमाण है|
समय के साथ भारतीयम समाज और मनुष्य में परिवर्तन आया| जीवन जटिल और चिंतन क्षेत्र व्यापक हुआ| जिससे नाटक में आदर्श और संतुलन की जगह मानव जीवन की समस्या और तनाव केंद्र में आ गया| शंकर शेष के नाटक समकालीन असंगत स्थितियों में जीवित व्यक्ति के जीवन समस्याओं के साक्षी है| उनमें मनुष्य ली पीड़ा यातना और हताशा ही नहीं उसकी अदम्य जिजीविषा और समस्या का समाधान भी प्रस्तावित हुआ है|
भ्रष्टाचार, महंगाई, गरीबी, भुकमारी स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज की कटु सच्चाइयां है| समाज में अपसंस्कृति बढने से सामाजिक समस्याएँ जटिल होती गयी| शंकर शेष ने इन्हें संघर्षशील पत्रों के रूप में ढाला है| जीवन के छल-प्रपंच में घिरे इनके पात्र अपनी लड़ाई में टूटते नहीं है|
"रत्नगर्भा" की इला संबंधों पर हावी होती गई अर्थ संस्कृति से लडती है| "रत्नगर्भा" में नायिका इला को अपने पति के साथ अपने सम्बन्ध बनाकर रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है| शादी के बाद इला का चेहरा एक दुर्घटना से कुरूप होने के कारण उसका पति उससे नफरत करता है| इला का पति सुनील खुद कहता है "मैने सौन्दर्य को अलौकिक शक्ति माना है| पर आज आकाश को मुझ पर ही टूटना था|"1  कुरूपता को सुष्टि की छाती पर लगा दाग समझनेवाला सुनील यह भूल जाता है कि यदि सौन्दर्य तथ्य है तो कुरुपता भी उतना ही बड़ा सत्य है| इओला की कुरुपता को लेकर सुनील इला के विरुध्द अत्याचार करना शुरू करता है| अंत में इला की सम्पत्ति के लिए उसे मर डालने को भी तैयार हो जाता है| यह विषय मालूम होने पर इला कहती है "लाओं मुझे दो जहर.....यदि मेरे मौत से तुम्हें सुख मिलता हो तो घोंट डॉ मेरा गला...बढाओ हाथ|"2 इला इन अंतिम डॉ पंक्तियों में मृत्यु के लिए प्रस्तुत पराजित स्त्री के रूप में सामने आती है| जीवन संघर्ष व परिवार के प्रति असीम प्रेम के बावजूद उसे अविश्वास और नफरत ही मिओलती है ताग्ब यह निराश होकर अपने आप जीवन यात्रा समाप्त करना चाहती है| 
नाटक "रत्नगर्भा" स्त्री-पुरुष संबंधों को आधार बनाकर लिखा गया है| नेटल के माध्यम से मानुष के सूक्ष्म आत्मिक सौन्दर्य और स्थूल बाह्य शारीरिक सौन्दर्य के समस्या और संघर्ष को चित्रित किया गया है| मन का सौन्दर्य एवं समर्पण श्रेष्ट है अथवा तन का आकर्षण एवं विलास? यही मुख्य प्रश्न नाटककार दर्शाना चाहता है| नारी ह्रदय की कोमल निःस्वार्थ भावनाओं समर्पण एवं त्याग को पुरुष किस प्रकार अपनी वस्नातुप्ति तथा अर्थ- विपासा के अंधेपन में खंडित कर देता है| नारी घर परिवार से संघर्ष करती नजर आती है|
"बिन बाती के दीप" नाटक में भी शंकर शेष ने पति-पत्नी के संबंधों को उद्घाटित किया है|भारतीया समाज में वैवाहिक जीवन के साथ ही सती-पुरुष अर्थार्त पति-पत्नी के माध्यम से पारिवारिक जीवन की शुरुवात होती है| वैवाहिक जीवन के बाद पत्नी-पति को एक दुसरे को समझकर रहना, एक दुसरे के प्रति आत्म विश्वास रखना, मिलते-जुलते कम करना, दोनों के बीच स्नेह और सहानुभूति आदि आवश्यक है| लेकिन इसमें कुछ कमी होने पर पति-पत्नी के बीच कई समस्याएं उत्पन्न हो जाती है|
के.महालक्षमी
के.महालक्षमी 
इस नाटक में शिवराज और विशाखा दोनों प्रेमी-प्रेमिका हैं शिवराज एक औसत श्रेणी का लेखक भी है| वहीँ विशाखा एक प्रतिभावान एवं संवेदनशील लेखिका है| उसका लेखन शिवराज से उच्च श्रेणी का है|  शिवराज अपनी लेखन क्षमताओं को भलीभांति समझाता है| यद्यपि वह राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यकार के रुप में प्रतिषिठत होना चाहता है| दुर्भागयवश शिवराज की प्रेयसी विशाखा एक दुर्घटना में अंधी हो जाती है| परन्तु उसकी संवेदनशील लेखनी समाज के विभिन्न पहलुओं को बड़ी गहराई से उभारती है| महत्वाकांक्षाओं का दास शिवराज विशाखा के विवाह कर लेता है| वह विश्खा के अंधेपन का लाभ उठाकर उसके उपन्यासों को अपने नाम में छपवा लेता है| साहित्य जगत में वह एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रतिषिठत हो जाता है|
प्रसिध्दि की महत्वाकांक्षा में वह इतना गिर जाता है कि विशाखा की आँखों के इलाज के नाम पर उसकी आँखों में ऐसी दवा डालता रहता है, जिससे उसकी आँखों ठीक ही न हो| वह अपनी टाइपिस्ट मंजू से कहता है "विशाखा रखो, मंजू विशाखा अच्छी नहीं होगी तिन साल ताल जो गलत दवा तुमने और मैने डाली है; वह विश्खा की आन्खोहं अच्छी न होने देगी| विशाखा अन्धी रहेगी|"3
अंत में विशाखा सच्चाई जानकर दुखी अवश्य होती है, परन्तु वह स्वयं को अपनी पति से अलग नहीं मानती वह कहती है "तुम मुझ अंधी से प्यार कर सके तो क्या मई तुम्हारा एक अपराध भी क्षमा नहीं कर सकती?"4 परिवार विघटन की समस्या उत्पन्न होने पर भी विशाखा जीवन को सकारात्मक दृश्तिठ्कों में देखती है|
"मूर्तिकार" आधुनिक मध्यवर्गीय परिवारों की अर्थ समस्या को उभारनेवाला नाटक है| शेखर अंत्यत प्रतिभावन किन्तु आदर्शवादी मूर्तिकार है| वह अपने आदर्शवादी सिध्दांतों के कारण गरीब है| शेखर की पत्नी ललिता को अपने घर की गृहस्थी में डॉ वक्त की रोटी की चिंता रही लगी रहती थी| ललिता समाज में अन्य संपन्न कलाकारों को देखती है| वह भी चाहती है कि उसका पति शेकर भी अपने आदर्शवादी सिध्दांतों को छोड़कर व्यवहारिक मार्ग अपनाए|
शेखर अपने आदर्शों से गिरकर, कलाकार से व्यापारी बनना नहीं चाहता| दूसरी ओर ललिता पारिवारिक धारातल से उपजे आर्थिक संकटों का मुकाबला कर रही थी| साथ ही उसे माकन-मालिक सेठ से भी टकराना पड़ता है| ललिता सेठ की मुंशी से कहती है "तू मुझे पैसे से खरीदना चाहता है| टू हमारी गरीबी का फायदा उठाना चाहता है..तो जा अपने मालिक से कह दे...कि दुनिया भर का पूरा सोना इकठ्ठा करके भी ललिता के नख को नहीं छुआ जा सकता"5 वह कहती है ललिता मर जाएगी, पर बिकेगी नहीं| अनेक प्रकार आर्थिक मुसीबत आने पर भी, वह अपने पति के सिध्दांतों के प्रति आदर रखती है| 
समाज में नारी की आर्थिक समस्या के बारे में महादेवी वर्मा के शब्दों में "समाज ने स्त्री के सम्बन्ध में अर्थ का ऐसा विषय विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी वर्ग से लेकर संपन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय ही लगने योग्य है|"6
शंकर शेष के नाटकों में दुर्लभ विविधता देखने को मिलती है| इसका एक कारण तोयह है कि वे अपनी पात्र, घटनाएँ, भाषा और विषय जीवन से उठाते हैं| जीवन विषयों से भरा है और उसमें कभी न ख़त्म होने वाली समस्याएँ और उसके लड़ियाँ है| खास नारियों की जीवन में| इसे शंकर शेष के नाटक बेहतर रूप में प्रस्तावित करते हैं| "रत्नगर्भा" में स्त्री-पुरुष संघर्ष के मूल में आर्थिक स्वार्थ सक्रिय है, लेकिन "मूर्तिकार" में अपेक्षाक्रत अधिक गहरे एवं प्रामाणिक तरीके से शंकर शेष ने इस तथ्य का साक्षात्कार किया है|
  "मूर्तिकार" में स्त्री-पुरुष संगर्ष आर्थिक दबाओं से उपज है तो "बिन बाती के दीप" में समाजार्थिक धारातल पर अभिव्यक्त हुआ है|

संदर्भ
1. शंकर शेष समग्र नाटक (1) "रत्नगर्भा"                 पृ.54                
2. शंकर शेष समग्र नाटक (1) "रत्नगर्भा"                 पृ.91   
3. शंकर शेष समग्र नाटक (1) "बिन बाती के दीप"         पृ.128    
4. शंकर शेष समग्र नाटक (1) "बिन बाती के दीप"         पृ.141 
5. शंकर शेष समग्र नाटक (3) "मूर्तिकार"                 पृ.45
6. आधे भारत का संघर्ष       नलिमणि शर्मा             पृ.175



के.महालक्ष्मी, पीएच.डी छात्र, उच्चा शिक्षा और शौध संसथान, द.भा.हिं.प्र. सभा, मद्रास
नाम   :   के.महालक्षमी
पता    :  १४ मानसरोवर अपार्टमेंट
             बालाजी नगर
             पादिकुप्पम रोड
             चेन्नई - ४०        
व्यवसाय  : अध्यापिका चेन्नई पब्लिक स्कूल
शोथार्ती   : पी.एच.डी, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 

     

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