प्रवासी हिन्दी कहानी में वृद्ध

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कभी संयुक्त परिवार होते थे और घर के वरिष्ठ सदस्यों का घर-परिवार-समाज में वरिष्ठ स्थान होता था। समय और स्थान, स्थिति और सोच ने सब उथल-पुथल कर दिया है। आज वृद्ध मुख्यत: एक विसंगति और व्यर्थताबोध में, कटाव और अकेलेपन में, उपेक्षा और अपमान में जी रहे हैं।

प्रवासी हिन्दी कहानी में वृद्ध
(महिला कहानीकारों के विशेष संदर्भ में)

- डॉ. मधु संधु 
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 14 दिसम्बर 1990 को अक्तूबर प्रथम को ‘अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस’ मनाने का निर्णय लिया और 1991 से हर वर्ष 1 अक्तूबर को वृद्ध दिवस या वरिष्ठ नागरिक दिवस मनाया जाने लगा। वृद्ध शब्द का अर्थ है- पका हुआ, परिपक्व। वरिष्ठ नागरिक देश का अमूल्य धन हैं। परिवार, समाज और देश को उनकी देन अभिन्न है।
डॉ० मधु सन्धु
डॉ० मधु सन्धु
उनके पास जीवनानुभवों का खजाना होता है। जीवन मूल्यों और चिरन्तन मूल्यों की थाती होती है। सांस्कृतिक परम्पराएँ होती हैं। भारतीय संस्कृति में पितृऋण की बात की गई है। पश्चिम में ओल्ड इज गोल्ड कहा गया है। वृद्धावस्था पेंशन के कारण वहाँ वृद्ध आर्थिक संकट से मुक्त हैं । लेकिन आज किसी के पास वृद्धों के लिए न लगाव है, न स्नेह और न पैसा। माना गया है कि वे फालतू और निठठले हैं, उनके लिए न घर में जगह है, न परिवार में, न दिल में, न जीवन में। वे बीता हुआ कल हैं, जिसे भुलाना ही उचित है। वे फालतू की रोक-टोक हैं, उनकी उपेक्षा करनी ही चाहिये । वृद्ध बोझ और उलझाव हैं। पीले पत्ते हैं। शिथिल अंग हैं।  पीछे की ओर धकेलने वाले हैं। अनेक रोगों के आगार हैं। कुंठित और रूढिवादी सोच के मालिक हैं। रुका हुआ पानी हैं। उनमें और हममें पीढियों का अंतर है, वक्त के मिजाज में फर्क है, सोच- चिंतन में फर्क है। उन्हें नवीन का स्वागत करना ही नहीं आता।
कभी संयुक्त परिवार होते थे और घर के वरिष्ठ सदस्यों का घर-परिवार-समाज में वरिष्ठ स्थान होता था। समय और स्थान, स्थिति और सोच ने सब उथल-पुथल कर दिया है। आज वृद्ध मुख्यत: एक विसंगति और व्यर्थताबोध में, कटाव और अकेलेपन में, उपेक्षा और अपमान में जी रहे हैं। अर्थ लौलुपता, पूंजीकरण या रिश्तों में बाजारवाद की विषम स्थितियों से वरिष्ठ नागरिकों को हम प्रवासी महिला कहानीकार उषा प्रियम्वदा की ‘वापसी’ में बहुत पहले देख चुके हैं। गजाधर बाबू पैंतीस साल की नौकरी में छोटेबड़े स्टेशनों पर रहे, जबकि पत्नी और बच्चों को सुविधा संपन्न जीवन देते हुये शहर में ही रखा। अब सेवानिवृत होने पर घर लौटे हैं और देखते हैं कि घर में उनकी हैसियत स्टोर के अचार मुरब्बों के बीच पड़ी चारपाई सी ही है। जरा सा कुछ कह देने पर अमर अलग होने का सोचता है। बेटा  नरेंद्र कहता है- बूढ़े आदमी हैं, चुपचाप पड़े रहें, क्यों हर बात में टांग अडाते हैं। बेटी बसंती पडोस में जाने से रोकने पर मुंह फुला लेती हैं और पूरे परिवार के रूखे, अनासक्त व्यवहार और अपनी अवांछित स्थिति से छुटकारा पाने के लिए वे सेठ राम जी मल की चीनी मिल में पुन: नौकरी के लिए चल देते हैं। सीमा खुराना की 'बूढ़ा शेर' मे पापा की स्थिति का प्रतीक है। जिस घर में उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता था। उनकी शेर सी दहाड़ से दूर-दूर तक सब काँप उठते थे, आज हर निर्णय पर अनासक्त भाव से अपनी सहमति दिया करते है। समय के साथ शेर जैसे दहाड़ने वाले पिता अपने साम्राज्य की हार को स्वीकार चुके हैं। 
अनिल प्रभा कुमार की ‘वानप्रस्थ’ में देवकी केनेडा में तलाक़शुदा बड़ी बेटी श्यामा के पास रह रही है। पति की रिटायरमेंट और तीनों बेटियों की शादी के बाद एक रोज देवकी और डॉ साहिब बदहवास से दिल्ली का इतना बड़ा घर, पासबुक, ढेरों एफ और शेयर  वगैरह डी.  स्थानीय बेटी प्रिया के हवाले कर श्यामा के तलाक की खबर सुन कैनेडा पहुंच जाते हैं और फिर कभी अपने देश में रहने नहीं जा पाते और प्रिया सभी एफ डी. शेयरों के कागजात- सब गायब  कर देती है। कैनेडा रूपी वन में प्रस्थान ही पति-पत्नी के लिए वानप्रस्थ बन गया है। 
नीना पॉल की ‘घर- बेघर’ उस पिता की कहानी है जिसकी पत्नी की जब मृत्यु हुई तब बेटा तीन साल का और बेटी सात साल की थी, लेकिन बच्चो की खातिर उसने पुन: विवाह नहीं किया। आज बाई-पास सर्जरी के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी मिली है, उसे घर जाना है- बेटे, बहू, पोती के पास। लेकिन सुबह से शाम हो गई, कोई लेने नहीं आया। वह पीटर के साथ ओल्ड एज होम आ जाते हैं और नाशुक्री संतान को सबक सिखाने के लिए अपने घर को बिकने के लिए लगा देते हैं। तब घर के बाहर ऐसा बोर्ड देख बौखलाए बेटा-बहू भागे आते हैं। पाँव पड़ते हैं। वे मकान के कागज तो लौटा देते हैं, लेकिन अपमान की टीस उन्हें लौटने नहीं देती। 
युवावस्था का गमन और बीमारियों की गलबाहियाँ लिए बुढ़ापे का स्थायी आगमन स्त्री को जीते जी राख़ कर जाता है। जीवन साथी दुश्मनों से भी बदतर हो जाते हैं। यादें धोखा लगती हैं। वर्षों लगाकर जमाई गृहस्थी बीते युग का स्वप्न बन जाती है। दाम्पत्य तहस- नहस हो जाता है। जाकिया जुबेरी की ‘लौट आओ तुम’ की गृह स्वामिनी बुढ़ापे में घर संभालने के लिए एक नौकरानी रखती है और नौकरानी घर ही नहीं साहब जी को भी संभाल बीबी बन जाती है और बीबी को आपा बनाकर रख देती है। पत्नी अब ऊपर की मंजिल में और साहब और नौकरानी नीचे की मंज़िल में रहते हैं। पत्नी का खाना या दूसरी जरूरतें ऊपर ही पूरी कर दी जाती हैं। नौकरानी बीबी साहिब जी के साथ टी॰ वी॰ देखती हुई मटकती, चटखती, झूमती, लहराती, गुनगुनाती रहती है और आपा आँख मूँद कर जीवन की कड़ुवाहटें पीने के लिए अभिशप्त है। घर की, साहिब की- हर चीज उसी की मर्जी से चुनी जाती है। वही सारी खरीददारी करती है। इसी बीच नौकरानी बीबी को अपने देश जाना पड़ता है, पत्नी सोचती है कि पति का हर काम वह संभाल लेगी, पर देखती है कि साहिब जी बीबी को फोन पर अपने मन का हाल बताते कह रहे हैं- लौट आओ तुम।  
दिव्या माथुर की ‘पंगा’ में क़ैसर पीड़ित सेवानिवृत स्कूल अध्यापिका पन्ना तीन कमरों के अपने मकान और गाड़ी के साथ अकेली रहती है। बेटा- बहू अलग रहते हैं। पति युवा पड़ोसिन के साथ खुल्लम-खुल्ला रहने लगा है। मृत्यु भय से संत्रस्त पन्ना विशेषज्ञ के पास जाने के लिए स्वयं ही हाइवे और गलियों में गाड़ी भगाती अफ्रीकन गुंडों, ट्रेफिक जाम जैसी समस्याओं से जूझ रही है, क्योंकि कैंसर मृत्यु का बुलावा है और इंग्लैंड की जर्जर मेडिकल व्यवस्था में डॉक्टर से दोबारा एपाइंटमेंट मिलना कौन सा संभव है ? तिनका-तिनका कर जोडी गृहस्थी का अपनी आँखों के सामने जनाज़ा उठते देखना- बड़ी तकलीफदेह स्थिति है। 
यह बेटों वाली वृद्धाओं की कहानियाँ हैं । ज़किया जुबैरी की ‘मन की सांकल’ में लाड-दुलार में पला सीमा का सैंतीस वर्षीय बेटा समीर माँ द्वारा घर में लाई स्त्री नीरा का विरोध करने पर कैंसर से जूझ चुकी माँ की बाजू दरवाजे में दे अपना पौरुष दिखाता है। रक्षा कवच माने गए बेटे से भयभीत माँ रात हत्या के भय से अंदर से सिटकनी लगा कर रखती है। नीना पॉल की ‘एक के बाद एक‘ की रजनी के पेट में सिस्ट है। उसके दर्दों का अंत नहीं।  साठ साला होने का दर्द, अपने सूरज, दीपक की अनासक्तियों का दर्द, अस्पताली लापरवाहियों का दर्द। किससे शिकायत करें ? सब व्यस्त हैं, अतिव्यस्त- परिवार हो या अस्पताल, बेटे हों या डॉ।    
कल का वानप्रस्थ आज वृद्धाश्रम हो गया है। सारी तकलीफ़ों के बावजूद वृद्धों को निष्कासन की नियति स्वीकारनी ही है। यहीं मृत्यु की प्रतीक्षा की जा सकती है। इला प्रसाद की ‘उस स्त्री का नाम’ कहानी की वृद्धा नायिका अमेरिका में रियल एस्टेट के कारोबार में व्यस्त बेटे के व्यवसाय में सहायता का स्वप्न ले पक्की नौकरी और पक्की उम्र की अनब्याही बेटी छोड उसके पास चली आती है। ट्रेनिग लेती  है। जबकि अपने व्यवसाय और परिवार में रचा बसा बेटा वृद्धा और लाचार माँ को ओल्ड एज होम में छोड़ भूल जाता है। सब चमकने वाली चीजें सोना नहीं होती । वह स्त्री जो कभी बेटी, बहन, पत्नी, माँ थी, यहाँ आकार मात्र वृद्धा बन कर रह जाती है। वह माँ जो बच्चों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए कभी दुर्गा, कभी काली, कभी चंडी का रूप धारण करती थी, वृद्धाश्रम की भेट चढ़ परदेस की धरती पर तिल तिल मरने लगती है। सोशल सेक्योरिटी और आते जाते लोगों की दया ही उसके जीवन का आधार हैं। । 
इस इक्कीसवीं शती में वृद्धों को अंतत: भारत और विदेश दोनों स्थलों पर ओल्ड-एज-होम ही जाना पड़ रहा है। अर्चना पेन्यूली की ‘हैप्पी बर्थ दे गोल्डेन होम’ में मुम्बई के उपनगर खार में सिस्टर मार्या फर्नाडीस ने दस वर्ष पहले ओल्ड एज होम आरंभ किया था। चालीस के आसपास के वृद्धों की मेजबान, पथप्रदर्शक, हितेशी, संरक्षक मार्या ही है। इस ओल्ड एज होम के कर्नल राघवन गावकर 90 वर्ष के हैं। भारत पाक और भारत चीन की तीन लड़ाइयों में हिस्सा ले चुके हैं। रिटायरमेंट के बाद पाँच महीने के टूयरिस्ट वीज़ा ले पाँच महीने अमेरिका में बेटों के पास रह चुके हैं। लेकिन जब वे अमेरिका में स्थायी रूप से रहने आते हैं, तो अपने को अवांछित ही पाते हैं। बेटे उन्हें ओल्ड एज होम में भेजना चाहते हैं, यह जानकर वे भारत लौट आते हैं। दो बेटों, दो बेटियों, नौ नाती-पोतों वाले कर्नल गावकर को मुम्बई के ओल्ड एज होम में सिर्फ बड़ी बेटी ही मिलने आती है।    
सुषम बेदी की ‘कितने कितने अतीत / कौशल्या शर्मा की शिकायतें’ की  89 साल की कौशल्या वृद्धाश्रम में अतीत की यात्राओं पर है। आठ- दस वर्ष पहले बेटी यहाँ छोड़ गई थी, क्योंकि यहाँ घर से बेहतर देखभाल हो सकती है। उनकी ‘चेरी फूलों वाले दिन’ की 85 वर्षीय सुधा वृद्धाश्रम यानी असिसटिड लिविंग में रह रही है। भारत में सुधा स्कूल की प्रिन्सिपल थी। वृद्धाश्रमों में हो रही वृद्धों की दुर्गति और समझौते अनेक प्रवासी कहानियों में मिल जाते हैं। वृद्धों को स्पष्ट है कि नई पीढ़ी का अवशेषों के प्रति कोई मोह नहीं, चाहे वह व्यक्ति हो या वस्तु। सुषम बेदी की ‘अवशेष’ की कमला 70 आयु से यानि विगत दस वर्ष से नर्सिंग होम में रह रही है। साफ सुथरा सज़ा धजा कमरा है। सामने हरा भरा पार्क है। डॉक्टर हैं, नर्सें हैं, केयर टेकर हैं, बना बनाया गरम खाना है, एड़ना जैसी दोस्त है। बेटा बहू बेटियाँ चक्कर लगा जाते हैं, फोन भी कर लेते हैं। 
बुढ़ापे की असहायावस्था और अकेलापन सुदर्शन प्रियदर्शिनी की सुबह में चित्रित है। उम्र के इस अंतिम पड़ाव में, गहरे नेपथ्य में, मालती के मन, आत्मा और मस्तिष्क में गुजरे जीवन की ढेरों आवाजें गूँजती हैं। मृदंग सी बजती हैं। सुरंग की तरह गूंज-अनुगूँज पैदा करती हैं। पराये देश में न कोई अपनी भाषा समझता है, न भावनाएं।  अब न बच्चे हैं, न पति, न नौकर बंसी। सिर्फ दाना चुगने आई चिड़िया और आँगन के फूल ही बचे हैं। 
वृद्धावस्था में एक ही आकांक्षा होती है कि शेष जीवन ससम्मान बच्चों के संरक्षण में बिताया जाये। सुषम बेदी की गुनाहगार में सांस्कृतिक स्तर पर प्रवासी विधवा रतना का विसंगत क्लोज़ अप मिलता है। साठ वर्षीय रिटायर्ड रतना विदेश मे बच्चों के पास पहुँचने पर माँ न रह कर एक मुसीबत, मसला, समस्या बन जाती है। बेटे, बेटियाँ; बहू, बहन, बहनोई उसे पुनर्विवाह के लिए विवश कर रहे हैं। बहू कहती है,” मेरी माँ ने भी तो दूसरी शादी की है यहाँ जो रहता है, उसे यहाँ के रीति रिवाजों के अनुसार चलना चाहिए।“ बेटी कहती है,” मेरी सहेली की माँ अस्सी की होने वाली है और वह छियासी साल के अपने एक पड़ोसी के साथ जुड़ गई है।” माँ के विवाह के लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन दिया जाता है और रतना इन नई परिस्थितियों से जूझने के लिए अपने को विवश पाती है। 
सुषम बेदी की ‘झाड़’ में सात वर्षीय समीर के पास टी. वी. है, वी. डी. ओ. गेम्स, बेस बॉल, फुट बॉल, बास्केट बॉल है, खाने के लिए फास्ट फूड है, कम्पनी के लिए बेबी सिटर है। उसके लिए नानी दूसरी दुनिया की चीज है। उसे न उसके बनाए खाने में रूचि है, न उसकी ड्रेस सैन्स जँचती है, न रोक-टोक, न स्नेह के आवेग।  सात समुंदर पार से नानी का अमेरिका आना नानी को भावुक कर सकता है। नाती तो मात्र नानी को झेल रहा है। 
सुधा ओम ढींगरा की ‘बिखरते रिश्ते’ वृद्धों के प्रति मानसिकता का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। रिमाझिम के भाई बाबूजी का पैसा और मकान हथिया उन्हें वृद्धाश्रम भेज भूल जाते हैं, जबकि अमेरिका की नैन्सी और डॉ प्रसिल्ला को अपने माता पिता की, उनकी भावनाओं की, उनके सुख-आराम की पूरी चिंता है।   
ऐसा नहीं है कि प्रवासी महिला कहानी लेखन में सिर्फ दुखी, उपेक्षित, बीमार, असहाय वृद्ध ही हैं। यहाँ धमाकेदार मस्त-व्यस्त वृद्ध भी मिलते हैं। दिव्या माथुर की ग्रैंड माँ  की स्त्री पोते के अठारवें जन्मदिन पर उसे दस हजार पाउंड की टयोटा लेकर देती है। मम जानती है कि जरूरत पड़ने पर ओल्ड एज होम छोड़ आएंगे। इसीलिए पैसे बचा कर रखती है कि भारत जाकर नर्स रखकर मुश्किल समय बिता लूँगी। ब्रिटेन के सरकारी अस्पताल में कैटेरेक्ट का ऑपरेशन करवाने की अपेक्षा उसे दिल्ली का प्राइवेट अस्पताल कहीं ठीक लगता है। इस दादी की पोतों-पोतियों से ज्यादा बनती है। कम्प्युटर, सेलफोन ले उनमें व्यस्त- मस्त रहती है। उनकी ‘ठुल्ला किल्ब’  उन प्रौढ़/ वृद्ध भारतियों की कहानी है, जो अपने बच्चों के घर संभालने के लिए इंग्लैंड में रह रहे हैं। उनकी भाषा भले ही देहाती है, पर जीवन शैली, सांस्कृतिक स्तर एकदम भिन्न है। यह वह समाज है, जहां पचास पार के लोगों के क्लब आम होते हैं। प्रौढ़ विधवा प्रेमिकायेँ शादी के लिए तत्पर दिखाई दे रही हैं। जानकी जिया बन गई है । राघव रघु हो गया है। उज्जी की पच्चास वर्षीय महतारी शादी करती है। विधवा जिया और विधुर रघु शादी करना चाहते हैं। कादम्बरी मेहरा की ‘धर्मपरायण’ में उस 72 वर्षीय पुरुष का जिक्र है, जो किसी आत्मीय के शव के अंतिम संस्कार से लौटा है। उसके अटैची में पूजा का सामान भी है, वियाग्रा के पैकेट भी और युवतियों के भड़कीले, अर्धनग्न, उन्मादक चित्र भी। 
अचला शर्मा की ‘चौथी ऋतु’,  नीना पॉल की ‘प्यासी गर्मी कांपती सर्दी’ , उषा वर्मा की ‘कारावास’ सुधा ओम ढींगरा की ‘कमरा न. 103’ नीलम जैन की ‘अंतिम यात्रा’ वार्धक्य की बहुमुखी त्रासदियाँ लिए हैं। 
अकेलापन और वृद्धावस्था, दोनों ही रोगों को आमंत्रित करने के लिए पर्याप्त हैं। वार्धक्य शारीरिक और मानसिक शिथिलता को लेकर शरीर को धीरे-धीरे अपने चक्रव्यूह में ले लेता है। चुनाव के सारे रास्ते बंद कर एक संकरी-बंद गली मे ला पटकता है।  यह स्वाभाविक और प्राकृतिक घटना है। लेकिन प्रवासी महिला कहानी लेखन के वृद्ध अकेलेपन, विसंगति और व्यर्थताबोध से भी जूझ रहे हैं। अपनों के बिना जीवन की यह चौथी ऋतु बितानी दूभर हो रही है। अभिशाप बन रही है। 

रचनाकार परिचय डॉ० मधु सन्धु
शिक्षा :एम० ए०, पी०एच०, डी०
संप्रति :गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर
प्रकाशित साहित्य : कहानी संग्रहः नियति और अन्य कहानियां, दिल्ली, शब्द संसार,२००१
कहानी संकलनः कहानी श्रृंखला, दिल्ली, निर्मल, २००३.
आलोचनात्मक साहित्यः
1.कहानीकार निर्मल वर्मा, दिल्ली, दिनमान, १९८२.
2.महिला उपन्यासकार, दिल्ली, सन्मार्ग,१९८४.
3.कहानी कोश, दिल्ली, भारतीय ग्रन्थम, १९९२.
4.महिला उपन्यासकार, दिल्ली, निर्मल, २०००.
5.हिन्दी लेखक कोश(सहलेखिका), अमृतसर, गुरु नानक देव,विश्ववद्यालय.
6.कहानी का समाजशास्त्र, दिल्ली,, निर्मल,२००५
समकालीन भारतीय साहित्य, हंस,गगनांचल, परिशोध, प्राधिकृत, संचेतना, हरिगंधा, जागृति, परिषद पत्रिका, हिन्दी अनुशीलन, पंजाब सौरभ, साक्षात्कार, युद्धरत आम आदमी, औरत, पंजाबी संस्कृति, शोध भारती, अनुवाद भारती, वागर्थ, मसि कागद आदि पत्रिकाओं में सैंकड़ों शोध प्रबंध, आलेख, कहानियाँ, लघु कथाएँ, कविताएँ प्रकाशित.
सम्पादनः प्रधिकृत(शोध पत्रिका)- अमृतसर, गुरु नानक देव विश्ववद्यालय(२००१)
विशेषः पच्चास से अधिक शोध प्रबन्धों एवं शोध अणुबन्धों का निर्देशन.
सम्पर्क :madhusandhu@gmail.com

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प्रवासी हिन्दी कहानी में वृद्ध
कभी संयुक्त परिवार होते थे और घर के वरिष्ठ सदस्यों का घर-परिवार-समाज में वरिष्ठ स्थान होता था। समय और स्थान, स्थिति और सोच ने सब उथल-पुथल कर दिया है। आज वृद्ध मुख्यत: एक विसंगति और व्यर्थताबोध में, कटाव और अकेलेपन में, उपेक्षा और अपमान में जी रहे हैं।
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