यमुना नदी

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मथुरा यमुना के तट पर बड़े सुन्दर घाट बने हुए हैं। यमुना मथुरा-वृन्दावन में एक विशाल नदी के रुप में प्रवाहित होती थी, किन्तु जबसे इससे नहरें निकाली गयी हैं, तब से इसका जलीय आकार छोटा हो गया है।

अमेरिकी वाटरकीपर टीम द्वारा यमुना नदी का निरीक्षण

यमुना नदी का निरीक्षण
आगरा । अमेरिका की पगेट साउन्ड कीपर की स्टाफ एटार्नी कैटेन किन अपने मित्र मैथ्यू गिफेल के साथ 22 फरवरी को आगरा के  विश्व विख्यात एतिहासिक स्मारक ताज महल का अवलोकन किया। किन टोकोमा सिटी में पगेट साउन्ड कीपर नामक संस्था से जुड़ी हुई हैं जो वाटर कीपर नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था से सम्बद्ध है। आगरा भ्रमण के दौरान कैटेन किन यमुना नदी की सारी परिस्थितियों का अवलोकन किया तथा यहां की समस्याओं को समझा और जाना। आगरा के यमुना से सम्बन्धित समस्याओं की जानकारी श्री गुरु वशिष्ठ मानव सर्वांगीण विकास सेवा समिति के संस्थापक अध्यक्ष सत्याग्रही पं. अश्विनी कुमार मिश्र ने इसके लिए पूर्ण तैयारी कर रखी थी। उन्होंने यमुना के तलहटी के विभिन्न भागों से आगरा के स्मारकों तथा शहर के दृश्यों का अवलोकन करवाया। इस अवसर पर यमुना प्रेमी श्री राजीव खण्डेलवाल, डा. राधेश्याम द्विवेदी तथा तनु पचैरी भी साथ साथ आवश्यक व्यवस्था तथा जानकारी देने में लगे रहे।

यमनोत्री में दिव्य अनुभूति :-

सत्याग्रही पं. अश्विनी कुमार मिश्र ने विदेशी अतिथि को बताया कि हमने यमनोत्री से प्रयाग संगम तक यमुना का सम्पूर्ण सर्वे कर रखा है। यमुना नदी की कुल लम्बाई उद्गम से लेकर प्रयाग संगम तक लगभग 860 मील है। यमुना  का उद्गम यमुनोत्रीे है। जो उत्तरकाशी से 30 किमी उत्तर, गढ़वाल में कलिन्द पहाड़ नामक जगह से निकलती है और प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा से मिल जाती है। यमुना के तटवर्ती नगरों में दिल्ली  और आगरा के अतिरिक्त इटावा, काल्पी, हमीरपुर और प्रयाग मुख्य है। प्रयाग में यमुना एक विशाल नदी के रुप में प्रस्तुत होती है और वहाँ के प्रसिद्ध किले के नीचे गंगा में मिल जाती है। वर्तमान समय में अपने उद्गम से आगे कई मील तक विशाल हिमगारों और हिम मंडित कंदराओं में अप्रकट रूप से बहती हुई तथा पहाड़ी ढलानों पर से अत्यन्त तीव्रतापूर्वक उतरती हुई इसकी धारा यमुनोत्तरी पर्वत से प्रकट होती है। वहाँ इसके दर्शनार्थ हजारों श्रद्धालु यात्री प्रतिवर्ष भारत वर्ष के कोने-कोने से पहुँचते हैं। यहां यमुना की छटा निराली रहती है और दिव्यता की अनुभूति होती है।

बाधों से यमुना मृतप्राय :-

 यमुनोत्तरी पर्वत से निकलकर यह नदी अनेक पहाड़ी दर्रों और घाटियों में प्रवाहित होती हुई तथा अनेक  पहाड़ी नदियों को अपने अंचल में समेटती हुई आगे बढ़ती है। उसके बाद यह दून की घाटी में प्रवेश करती है। वहाँ से कई मील तक दक्षिण-पश्चिम की और बहती हुई तथा गिरि, सिरमौर और आशा नामक छोटी नदियों को अपनी गोद में लेती हुई यह अपने उद्गम से लगभग 95 मील दूर वर्तमान सहारनपुर जिला के फैजाबाद ग्राम के समीप मैदान में आती है। इसके आगे यह 65 मील तक बढ़ती हुई हरियाणा के अम्बाला और करनाल जिलों को उत्तर प्रदेशके सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जिलों से अलग करती है। इस भू-भाग में इनका आकार बहुत बढ़ जाता है। अब उनका पूर्व स्वरुप लुप्त हो जाता है। वेग कम हो जाता है। लोग अपने अपने स्वार्थ के लिए मनमाफिक परिवर्तन व बदलाव करते देखे गये हैं। मैदान में आते ही इससे पूर्वी यमुना नहर और पश्चिमी नहर निकाली जाती हैं। यहां हथिनीकुण्ड बांध  सिंचाई का एक साधन बन कुछ लाभ किया वहीं इससे यमुना की आत्मा वहुत दुखी देखी गई और वह पानी के अभाव में मृतप्राय हो गई। इस भू-भाग में यमुना की धारा के दोनों ओर पंजाब और उत्तर प्रदेश के कई छोटे बड़े नगरों की सीमाएँ हैं, किन्तु इसके ठीक तट पर बसा हुआ सबसे प्राचीन और पहला नगर दिल्ली है, जो भारत की राजधानी है। दिल्ली के लाखों नर-नारियों की आवश्यकता की पूर्ति करते हुए और वहाँ की ढेरों गंदगी को बहाती हुई यह ओखला नामक स्थान पर पहुँचती है। यहाँ पर इस पर एक बड़ा बांध बांधा गया है जिससे नदी की धारा पूरी तरह नियंत्रित कर ली गयी है। दिल्ली से आगे यह हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमा बनाती हुई तथा हरियाणा के फरीदाबाद जिले को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले से अलग करती हुई उत्तर प्रदेश में प्रवाहित होने लगती है। 

आगरा में यमुना गन्दा नाला :- 

मथुरा यमुना के तट पर बड़े सुन्दर घाट बने हुए हैं। यमुना मथुरा-वृन्दावन में एक विशाल नदी के रुप में प्रवाहित होती थी, किन्तु जबसे इससे नहरें निकाली गयी हैं, तब से इसका जलीय आकार छोटा हो गया है। केवल वर्षा ऋतु मे यह अपना पूर्ववर्ती रुप धारण कर लेती है। उस समय मीलों तक इसका पानी फैल जाता है। यहाँ तक यमुना के किनारे रेतीले हैं, किन्तु आगे पथरीले और चटटानी हो जाते हैं, जिससे जल धारा बल खाती हुई मनोरम रुप में प्रवाहित होती है। इसमें करबन और गंभीर नामक प्रदूषित नदियां आकर मिलती हैं। आगरा में आते आते यह मात्र गन्दा नाला रह जाती हैं। कुछ दूर चलकर यमुना ने एक बड़ा मोड़ लिया है, जिससे बटेश्वर एक द्वीप के समान बन जाता है। आगरा से 80 किमी. चलने पर बटेश्वर में पानी प्राकृृतिक रुप से स्वच्छ हो जाता है। आगे वह इटावा तक ठीक से चलती हैं। इटावा से आगे मध्य प्रदेश की प्रसिद्ध नदी चम्बल यमुना में आकर मिलती है, जिससे इसका आकार विस्तीर्ण हो जाता है, अपने उद्गम से लेकर चम्बल के संगम तक यमुना नदी, गंगा नदी के समानान्तर बहती है।  इसमें पंचनदा आकर मिलती है। इसके आगे गंगा यमुना के बीच के अन्तर कम होता जाता है और अन्त में प्रयाग में जाकर वे दोनों संगम बनाकर मिश्रित हो जाती हैं। इटावा के पश्चात यमुना के तटवर्ती नगरों में काल्पी, हमीर पुर और प्रयाग मुख्य है। प्रयाग में यमुना एक विशाल नदी के रुप में किले के नीचे गंगा में मिल जाती है। यमुना और गंगा के संगम के कारण ही, प्रयाग को तीर्थराज का महत्व प्राप्त हुआ है।

प्रदूषण का कारण औद्योगिक कचरा :- 

 सत्याग्रही पं. मिश्र ने आगे बताया कि यमुना नदी में जल प्रदूषण का एक बड़ा कारण है औद्योगिक कचरा जैसे पेपर मिल, गन्ना पेरने और चीनी मिल, डिस्टिलरी एवं अन्य विभिन्न प्रकार के कल कारखानों तथा शहरी नालों के गंदे प्रवाह का नदियों में बिना शोधन के डाल दिया जाना। विडंबना है कि देश की जनता विषैला पानी पीने के लिए मजबूर है। यह विष भूमिगत जल में भी लगातार मिश्रित हो रहा है। नेता, अफसर और वी आई पी जन बने बनाए घाटों तक जाकर बयानबाजी कर लेते हैं। नदी जल प्रदूषण का मूल कारण बताते हुए सत्याग्रही पं. मिश्र ने कहा कि कल कारखाने जैसे पेपर मिल, डिस्टिलरी एवं अन्य रासायनिक प्रवाह तथा शहरी नालों का गंदा प्रवाह बिना शोधन के नदियो सीधे उत्सर्जित कर देना। इसे रोकना और शोधित करना बहुत आसान और सहज है। समस्या न ही बहुत वैज्ञानिक है और न ही कठिन है। सामान्य से उपाय से जल स्वच्छ हो सकता है और स्वच्छ जल उपलब्ध कराने से किसी को कोई नुकसान भी नहीं होगा। 

पारम्परिक जल श्रोतों को जीवित करना होगा :-

 कैटेन किन ने पानी के अभाव में नदी में स्वच्छता लाने के बारे में पंडितजी से पूछा तो पंडितजी ने बताया कि हमें अपने पारम्परिक जल श्रोतों को पुनः जीवित करना होगा। बरसात के जलों को ज्यादा से ज्यादा रोककर झील,सरोवर, तालाब, पोखर व कुएं आदि को साफ सुथरा कर पुनः जल संचय के काविल बनाना होगा। जब आधार मजबूत होगा तो नदी में भी पानी नहीं सूखेगा। जब पंडितजी ने कैटेन किन से अमेरिका में बांधों को तोड़े जाने की बात पूछी तो किन ने बताया कि वहां जल की शुद्धता के लिए बने बनाये पुराने बांध तोड़े जा रहे हैं। वहां के लोग जागरुक हो रहे हैं और सरकार भी इसमें मदद कर रही है। आगरा के यमुना प्रदूषण का निरीक्षण के उपरान्त अमेरिका की पगेट साउन्ड कीपर की स्टाफ एटार्नी कैटेन किन एक अन्य कार्यक्रम में समलित होने के लिए जयपुर प्रस्थान का गई। उसका आगरा का भ्रमण बहुत ही सार्थक तथा स्मरणीय रहा।

डा. राधेश्याम द्विवेदी , पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी, 
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा 282001 मो. 9412300183

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यमुना नदी
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