तुम्हारा इंतजार था

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जब भी शादी का ख्याल आता था ,तुम्हारा चेहरा ही आँखों के आगे आता था ।उठते - बैठते सिर्फ तुम्हारा ही ख्याल रहता था ।

तुम्हारा इंतजार था

इंतजार
गाड़ी में बैठते हुए बाहर का नजारा देखकर अनायास ही चेहरे पर मुस्कराहट आ गई ।आँखों को शुकुन देने वाली हरियाली ,बीच - बीच मे पड़ने वाली छोटी - बड़ी नदियाँ ,नीले आकाश के बीच नई - नई आकृतियाँ बनाते बादल और कानों मे मधुरता घोलती पक्षियों की चहचाहट ।ऐसा लगा बहुत दिनों बाद खुद से मिला हूँ ।जिंदगी मे सफलता और पैसों के पिछे भागते - भागते अपने मन को शुकुन देने वाली सच्ची दौलत से ना जाने कितने सालों बाद आज मिला ।
 लगभग दस साल बाद आज ननिहाल जा रहा था ।वो ननिहाल जहाँ रोबदार मूछों वाले नाना थे लेकिन दिल से उतने ही नर्म , नानी थी जो बहुत लाड़ करती थी और कभी - कभी प्यार से मुझे भोपू भी बुलाती थी , बहुत ही दुलार व परवाह करने वाले मामा - मामी थे ,हमउम्र ममेरे भाई - बहन थे जिनसे दोस्तों जैसा नाता था और थी बिट्टो जो पड़ोस मे रहती थी ।सावली सी बिट्टो मामा के बच्चों के साथ बचपन से ही खेलने आती थी ।हमेशा हँसती - मुस्कराती रहने वाली , स्वच्छंद सी हवा , गमगीनियत से कोसो दूर , जिसकी याद आते ही चेहरे पर मुस्कान तैर जाए , ऐसी ही लड़की थी बिट्टो ।
पिछली बार जब मैं ननिहाल आया था तब सावन का महिना था ।पेड़ों पर झूले पड़े थे जहाँ लड़कियों के झूंड तीज के गीतों को गाते हुए पेंग चढ़ा रहीं थी तो दूसरी तरफ पतंगबाजी करते लड़कों का शोर - शराबा ।यही सब देखने के लिए शहर से गाँव की तरफ दौड़ लगाई थी मैंने ।
मेरे आने की खबर मिलते ही बिट्टो मिलने चली आई ।हरे - लाल सूट पर मोतीयों वाली जूती पहने और लंबे बालों मे परांदा लगाए वह बहुत खुबसूरत लग रही थी ।           
उसने मुस्कराते हुए कहा - कैसे हो चंदन ।
मैंने कहां - एकदम ठीक , तुम सुनाओ कैसी हो ।
उसने उसी मुस्कराहट के साथ कहा - मैं भी ठीक हूँ लेकिन तुम आज तीज के दिन घर मे बैठे क्या कर रहे हो ।चलो तुम्हें खेत घूमाकर लाती हूँ ।
मैंने कहां - चलो ।
खेतों मे जाकर वह गन्ने तोड़ने लगी और एक मुझे भी तोड़ कर दिया ।
गन्ना खा लोगे ना दाँत मजबूत है ना तुम्हारे - कहते हुए वह खिलखिला पड़ी ।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया बस मुस्करा दिया ।
लेकिन वह दूसरे ही पल गंभीर होकर कहने लगी - क्या याद करते हो मुझे ?
मैंने कुछ नहीं कहा ।वह सवालियाँ नजरों से मुझे घूरने लगी ।मुझे हँसी आ गई ।
वह मुँह बनाकर बोली - नहीं याद करते तो कह दो ,हँसने की क्या बात है ।
मैंने हथियार डालते हुए कहा - हाँ बाबा बहुत याद करता हूँ ।
वो फिर कुछ सोचते हुए कहा - अब तो काॅलेज जाने लगे हो , बहुत से दोस्त होंगे और शहर मे तो वक्त का पता भी नहीं चलता होगा , जो मेरी याद आएगी ।
मैंने कहां - याद आती है तो आती है , वो वक्त देखकर थोड़े ही आती है ।
उसने कहा - और यहां यादों के सिवा होता ही क्या है मन बहलाने को , काश मैं भी तुम्हारी तरह बहुत - बहुत पढ़ पाती लेकिन हमारे गाँव मे काॅलेज नहीं और पिता जी शहर भेजते नहीं ।
मैंने कहा - तुम चलो मेरे साथ एक ही काॅलेज मे पढ़ेंगे ।
उसने हैरानी से कहा - पागल हो गए हो क्या , तुम्हारे साथ मुझे कौन भेजेगा ।
मैंने भी मायूसी से कहा - हूँ ठीक कह रही हो ।
तभी शिखा और मोहन वहाँ आ गए ।
शिखा ने कहा - चंदन भैया , तुम यहाँ हो और वहाँ माँ तुम्हें बुला रही है ।
चारों घर की तरफ चल पड़े ।
बिट्टो ने कहा - अभी कितने दिन रूकोगे चंदन ।
चंदन - कितने दिन , अरे कल सुबह ही चला जाऊँगा ।
बिट्टो - क्या कल ही ।
मोहन - चंदन तुम्हें कल तो यहाँ रूकना ही पड़ेगा ।
मैंने अपनी मजबूरी प्रकट करते हुए कहा - परसो मुझे काॅलेज का एक प्रोजेक्ट सब्मिट करना है , इसके लिए मुझे कल ही घर पहुँचना होगा ।
शिखा - तो भैया कल दोपहर बाद चले जाना ।
मोहन - हाँ कल सुबह चलते है नहर पर मछलियाँ पकड़ने ।
बिट्टो जो इतनी देर से ओरो की बातें सुन रही थी अचानक बोल पड़ी - मछलियाँ पकड़ने , छी पागल हो गए हो क्या , हम बिल्कुल भी मछलियाँ नहीं पकड़ेंगे ।मैं किसी को तड़प - तड़प कर मरते नहीं देख सकती ।
मैंने कहा - मछलियाँ पकड़ने ना सही , सैर के लिए तो जा ही सकते है ।
बिट्टो ने चहकते हुए कहा - बिल्कुल , तो कल सुबह की तफरी का कार्यक्रम पक्का ।
अगली सुबह शिखा ने मुझे व मोहन को जगाया ।घर के बाहर निकले तो बिट्टो पहले से ही खड़ी थी ।
उस दिन हमने नदी व तालाब की सैर की , झरने देखने कई कोस दूर निकल गए ।
आते वक्त बिट्टो ने कहा - चंदन , तुम थक तो नहीं गए ।वो क्या है शहरी लोगों को पैदल चलने की आदत नहीं होती ।
मैंने कहा - तुमने कुछ ज्यादा ही गलत धारणाएँ बना रखी है शहरी लोगों के बारे मे ।वैसे भी मुझे पैदल चलना पसंद है ।
शिखा ने कहा - देखते जाओ चंदन भैया एक दिन किसी शहरी लड़के से ही काका इसकी शादी कर देंगे , फिर देखेंगे ये कितनी बुराइयाँ करती है ।
पुष्पा सैनी
पुष्पा सैनी
बिट्टो की शादी सुनते ही मेरा मन रिक्त सा हो गया था , ना जाने क्यों अच्छी लगती थी वह ।क्या यह प्यार था , पता नहीं ।
उस दिन दोपहर को मैं घर के लिए निकल गया ।दोबारा जिंदगी की दौड़ मे शामिल हो गया ।पढ़ाई पूरी की , पापा का बिजनेस संभालने लगा , बीच - बीच मे देश - विदेशों की यात्राएँ भी चलती रही ।मम्मी - पापा जब भी शादी की बात करते मैं टाल देता था ।उन्होंने मुझ पर छोड़ रखा था , मैं अपनी पसंद की किसी भी लड़की से शादी कर सकता हूँ लेकिन मुझे कभी कोई पसंद ही नहीं आई ।
इन्हीं सब यादों के उतरते - चढ़ते पडावों को पार करते हुए मेरी गाड़ी घर पहुँच गई ।ड्राइवर से गाड़ी साइड मे लगाने की कहकर मैं सबसे मिला ।सभी मेरा इंतजार कर रहे थे ।सबसे मिलकर दिल खुश हो गया ।शिखा भी अपने ससुराल से खास मुझसे ही मिलने मायके चली आई थी ।खाना खाते वक्त खूब हँसी - मजाक का दौर चलता रहा ।
बाद में मैं छत पर जाकर टहलने लगा ।तभी शिखा आकर बैठ गई ।
मैंने उसके पास बैठते हुए कहा - शिखा , बिट्टो कैसी है ? 
शिखा ने गलत गंभीर होते हुए कहा - बहुत देर लगा दी भैया पूछने मे ।
मैंने कहा - क्यों क्या हुआ , वो ठीक तो हैं ना ? 
शिखा ने कहा - भैया , तुम कितने सालों बाद आए हो , बिट्टो कितना याद करती थी तुम्हें ।इन दस सालों मे उसकी जिंदगी ही बदल गई ।एक शराबी आदमी के साथ उसकी शादी हुई , जो उसके साथ बहुत ही पाशविक व्यवहार करता था ।मारना - पिटना और रात को किसी भी वक्त उसे घर से निकाल देना ।उसने ना जाने कितनी रातें अपने घर की दहलीज पर बैठे - बैठे गुजारी हैं ।वो जब भी मुझसे मिलती थी ये बातें सिर्फ मुझे बताती थी ।काका - काकी तक को वह कुछ नहीं बताती थी ताकि उन्हें किसी तरह का कष्ट ना हो ।उसने अपनी कसम से मुझे भी बाँध रखा था ताकि मैं ये बातें किसी को नहीं बताऊ ।उसके पति ने शराब व जुए मे सब कुछ तबाह कर दिया और एक दिन उसने खुद को भी खत्म कर लिया ।उसके बाद ससुराल वालों ने बिट्टो को घर से निकाल दिया , तभी से वो यहाँ है ।हँसना - मुस्कराना तो वो पहले ही भूल गई थी , अब तो किसी से बात तक नहीं करती ।
मैंने कहा - उसके साथ इतना सब हो गया और उसने मुझ तक इसकी खबर भी नहीं पहुँचने दी ।
शिखा -  तुमने तो पलट कर देखा भी नहीं भैया , वो किस अधिकार से बताती ।
मैंने अपनी आँखों की कोरो से बहते आंसूओ को पोछते हुए कहा - शिखा अब तुम जाकर सो जाओ ।
मैं सारी रात बिट्टो के बारे मे सोचता रहा और रोता रहा ।
सुबह मैंने सबको बुलाकर कहा कि मैं बिट्टो से शादी करना चाहता हूँ ।
शिखा ने खुशी से कहा - सच भैया ।
मामी ने कहा - क्या बिट्टो इसके लिए तैयार होगी ।
मैंने कहा - उसे तैयार होना ही होगा ।
सभी मेरे फैसले से खुश थे ।मैं बिट्टो के घर गया ।काका - काकी के पैर छूकर मैं वहीं कुर्सी पर बैठ गया ।
काका ने कहा - कैसे हो चंदन , बहुत दिनों बाद आए ।
मैंने कहा - मैं ठीक हैं , आप सब कैसे हैं ।
काकी -  हम सब भी ठीक है बस बिट्टो की चिंता रहती है ।तुम्हें तो पता चला ही होगा उसके बारे मे ।
मैंने कहा -  हाँ काकी मुझे सब पता हैं ।  
इतने मे बिट्टो भी आ गई ।फूल सा चेहरा मुरझा गया था ।वह बिना कुछ बोले ही चाय बनाने चली गई ।
मैंने कहा - काका मैं आपसे कुछ बात करने आया हूँ ।
काका - हाँ , कहो बेटा क्या बात हैं ।
मैंने कहा - काका मैं बिट्टो से शादी करना चाहता हूँ ।
काका - सब जानने के बाद भी ।
मैंने कहा - हाँ ।
काका -  इससे बड़ी खुशी क्या होगी हमारे लिए , मेरी बिट्टो को नई जिंदगी मिल जाएगी ।
काकी - पता नहीं बिट्टो तैयार होगी या नहीं शादी के लिए ।
मैंने संकोच के साथ कहा -  काकी क्या मैं बिट्टो से बात कर सकता हूँ ।
काकी -  हाँ बेटा क्यों नहीं ।
मैं उठकर रसोई मे चला गया ।
बिट्टो ने कहा - आप यहाँ ।
मैंने मुस्कराते हुए कहा - अच्छा तो मैं अब आप हो गया ।
बिट्टो ने कुछ नहीं कहा नजरें झुकाए खड़ी रही ।
उसे चूप देखकर मैंने कहा - बिट्टो मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ ।
उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा ।
मैंने कहा - सबसे बात कर ली है मैंने , सब तैयार है बल्कि खुश हैं ।
बिट्टो ने गंभीरता से कहा - लेकिन ना मैं तैयार हूँ और ना ही खुश ।
मैंने कहा - लेकिन क्यों ?
बिट्टो ने रोते हुए कहा - सबसे मेरे बारे मे सुनकर तरस आ रहा है , तभी ये फैसला लिया है ।मुझे दया की जरूरत नहीं है ।
मैंने कहा - दया की ना सही प्यार की तो जरूरत है ना ।क्या मैं तुम जैसी स्वाभिमानी लड़की पर दया करूँगा ।प्यार करता हूँ तुम से ।
बिट्टो ने कहा - इतने सालों तक कहा छिपा था यह प्यार ।
मैंने कहा - बिट्टो , इंसान ओरो की थाह तो फिर भी पा लेता है लेकिन अपने मन की भावनाओं को समझना कभी - कभी मुश्किल हो जाता है ।जब भी शादी का ख्याल आता था ,तुम्हारा चेहरा ही आँखों के आगे आता था ।उठते - बैठते सिर्फ तुम्हारा ही ख्याल रहता था ।जब तक मैं अपनी भावनाओं को समझता तुम्हारी शादी की खबर मुझ तक पहुँच चूकी थी ।मैं बस तुम्हारे प्यार के साथ ये इंसाफ कर सकता था कि मैं किसी और का नहीं हो सकता था इसलिए मैंने आज तक शादी नहीं की ।तुम्हें क्या मैं एक पल के लिए भी भूल पाया हूँ ।
बिट्टो - लेकिन अब बहुत देर हो गई हैं ।
मैंने कहा - नहीं अब भी देर नहीं हुई है ।मैं तुम्हें तड़प - तड़प कर जीते हुए नहीं देख सकता , इतना प्यार करता हूँ तुम से ।
बिट्टो ने कहा - सच चंदन ।
मैंने कहा - बस तुम्हारी हाँ का इंतजार है तुमने हाँ नहीं कहा तो मैं जिंदगी भर शादी नहीं करूँगा , तुम्हारी ही तरह अकेला रहूँगा ।
अब बिट्टो के सब्र का बाँध टूट गया वह चंदन को गले लगाकर रोने लगी और बोली -  हाँ , तुम्हारा ही इंतजार था ।
मैंने उसके आंसू पोछते हुए कहा - अब ना तुम्हें रोना हैं और न ही मुझे ।हमारा इंतजार खत्म हुआ ।


यह रचना पुष्पा सैनी जी द्वारा लिखी गयी है। आपने बी ए किया है व साहित्य मे विशेष रूची है।आपकी कुछ रचनाएँ साप्ताहिक अखबार मे छप चुकी हैं ।

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