गनीमत है

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काव्या की शादी क्या हुई कि अपना घर शहर सब कुछ जैसे पराया हो गया। विगत छः सालों में वह कितना आ पाई है यहाँ।

गनीमत है

काव्या की शादी क्या हुई कि अपना घर शहर सब कुछ जैसे पराया हो गया। विगत छः सालों में वह कितना आ पाई है यहाँ। कभी एक दिन तो कभी दो दिन और कभी-कभी तो मात्र कुछ घंटे ही। यह आना भी कोई आना हुआ। अपने शहर में आकर भी किसी से मिल न पाओ। फोन पर बात करने भर से ही संतोष करना पड़ता है। फोन तो वह ससुराल से भी करती रहती है। फर्क ही क्या हुआ? पर इस बार उसने अपनी सासु माँ और पतिदेव दोनों को साफ समझा दिया है कि वह हफ्ता दस दिन से पहले लौटने वाली नहीं है। इस बार अच्छे से जाकर सबसे मिलेगी। उसे इसकी स्वीकृति भी मिल गई है। मौसम आज ठीक है। धूप की तपन को कम करते बादलों के आसमान में तैरते टुकड़े और कुछ नम हुई हवा निकल पड़ने को काफी है। इरादा पक्का होते ही काव्या ने सुबह छोटी बहन कविता से आज स्कूटी छोड़ जाने को कहा। कविता ने तुरंत प्रतिकार किया- “क्या दीदी आप भी। अभी भी स्कूटी पर चलोगी ?”
चित्र साभार - गूगल इमेज 
“बेशक।”
“नहीं मेरे कहने का मतलब है कि अब आपकी कुछ इज्जत है। फिर स्कूटी पर चलना आपके लिए ठीक भी नहीं है। ट्रैफिक बहुत बढ़ गया है। आपने कब से स्कूटी नहीं चलाई है।”
“नहीं चलाई है तो क्या चलाना भूल गई हूँ ? मैं तुमसे अधिक सालों इन सड़को और इस शहर में घूमी हूँ। मुझे ट्रैफिक से मत डराओ।”
पापा दोनों की नोंक-झोंक सुनकर बाहर आ गए और दोनों का समझौता कराते हुए बोले- “अरे यह तुम्हें डरा नहीं रही है वरन् अपनी स्कूटी बचाना चाह रही है। तुम स्कूटी के ही पीछे क्यों हो? गाड़ी ले जाओ। अभी ड्राइवर आता होगा। तब तक तैयारी करो।”
काव्या ने गर्दन को जोर से ना में हिलाते हुए कहा- “नहीं। गाड़ी आप ही रखिए और कविता को लेते जाइए। मुझे तो आज स्कूटी से ही चलना है।”
मम्मी-पापा दोनों हँस पड़े। पापा बोले- “बेटा कविता आज तुम स्कूटी छोड़ ही दो। मेरे साथ निकल चलो। अब किसी को लाभ की बात समझ में नहीं आती है तो क्या किया जाय।”
कविता के पास पापा की बात मान लेने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। हल्के विरोध के बाद वह तैयार होने चली गई। काव्या भी तैयार होने लगी। माँ ने टोका- “अकेली-अकेली तैयार हो रही हो। बच्चों को तैयार नहीं करोगी?”
“ऊँहूँ, बिलकुल नहीं। आज इन्हें आप ही सम्भालिए। ये मुझे कहीं न ठीक से बैठने देंगे ना बातें करने देंगे।”
बच्चों ने भी मम्मी की हाँ में हाँ मिलाई - “हाँ-हाँ आप ही जाओ। हम वैसे भी इतने मजेदार खेल छोड़कर आपके साथ जाने वाले नहीं हैं। बस लौटते में हमारे लिए एक बड़ी आइस्क्रीम लेती आना।” काव्या की बेटी ने उसके थोड़ा करीब आते हुए धीरे से कहा- “और मेरे लिए बड़ी वाली केक लाना।”
काव्या ने सभी की शर्तें मान ली। खाना खाया और निकल पड़ी अपने पुराने रास्तों पर। 
गली पार हुई तो काव्या को ख्याल आया कि उसने वरीयता क्रम तो तय किया ही नहीं। बहुत जनों से मिलना है लेकिन पहले कहाँ जाना है। अभी तक यह निश्चित ही नहीं है। एक पल को उसने सोचा कि रूककर दो चार घर फोन करें। कौन मिल पायगा कौन नहीं। यह निश्चय कर ले। पर तुरंत उसे ख्याल आया कि पास वालों से तो थोड़ा देर से भी मिला जा सकता है पहले दूरी वालों को देखा जाय। इस क्रम में उसकी सहेली शायरा पहले नम्बर पर थी। शहर के एक छोर पर उसकी ससुराल थी और दूसरे पर मयका। शादी से पहले भी जब काव्या को शायरा से मिलना होता था तो करीब उतनी ही दूरी तय करनी पड़ती थी जितनी अब उसकी ससुराल के लिए तय करनी थी। बस दिशा का अंतर आया था। काव्या ने शायरा की ससुराल की ओर स्कूटी मोड़ दी।
काव्या और शायरा की दोस्ती बहुत पुरानी थी। दोनों ने छठी से एम.ए. तक की पढ़ाई साथ-साथ की थी। काव्या का घर कॉलेज के पास था। इसीलिए बहुत बार खाली समय रहने या पढ़ाई सबंधी समस्या सुलझाने के लिए शायरा काव्या के साथ उसके घर आ जाती थी। दोस्ती बढ़ी तो शायरा के घर वालों ने भी काव्या और उसके घर वालों से मिलने की इच्छा जाहिर की। आरंभ में काव्या अपनी मम्मी व भाई के साथ शायरा के यहाँ गई थी। आहिस्ता-आहिस्ता दोनों परिवारों में विश्वास जमा तो कभी-कभी काव्या को अकेले भी शायरा के यहाँ जाने की अनुमति मिल गई थी। उन दोनों की दोस्ती में कभी धर्म या धन आड़े नहीं आया। शायरा के परिवार की हैसियत काव्या के घर से कई गुना अधिक थी। पर काव्या के घर में सभी के पढ़े लिखे और सलीकेदार होने की वजह से शायरा के घर के लोग उनकी इज्जत करते थे। विशेष रूप से काव्या की मम्मी से शायरा के घर की महिलाएँ काफी प्रभावित थी। शायरा भी उनसे कुछ अच्छा सीख लेंगी। इसी उम्मीद में वे शायरा और काव्या की दोस्ती बनी रहे इसके लिए सहयोग बनाए रहती थीं।
शायरा की शादी के बाद भी यह आना जाना बना रहा। शायरा की शादी तो दूसरे शहर में हुई थी पर उसके पति इसी शहर में एक दफ्तर में काम करते थे। उन्होंने काव्या के परिवार से मेल-जोल में कभी ऐतराज नहीं किया। बस काव्या ही दूर थी। कम समय के लिए आती थी। इसीसे विगत चार साल से शायरा से मिल नहीं पाई थी। वैसे इसकी कमी दोनों सहेलियाँ फोन और फेसबुक से पूरी कर लेती थी।
विचारों में खोई काव्या कहीं सपाट तो कहीं उखड़ी सड़क वाले ऊबड़-खाबड़ रास्तों को पार करती हुई तेजी से बढ़ रही थी। शहर में बहुत से नए चौराहे बन गए थे। कहीं सड़कें चौड़ी हो गई थी और कहीं की चौड़ी सड़कें
अपर्णा शर्मा
अपर्णा शर्मा
अतिक्रमण की मार से संकरी हो गई थीं। काव्या देख रही थी विगत वर्षों में बहुत कुछ बदल गया था। लगभग आधा घंटे बाद काव्या शायरा के इलाके में पहुँच गई। यहाँ भी बहुत कुछ बदल गया था। शायरा जिस दुमंजला घर में रहती थी। पहले वह दूर से नजर आता था। काव्या देख रही थी अब यहाँ भी बहुत से दुमंजला तिमंजला घर बन गए हैं। काव्या धीमी गति से सतर्कतापूर्वक शायरा के घर को तलाशती बढ़ने लगी। काव्या की याददाश्त अच्छी थी। इसी से बगैर किसी कठिनाई के शायरा के घर पहुँच गई। शायरा सुबह के भोजन पानी से निबट कर घर समेट रही थी। बेटा स्कूल और पति दफ्तर जा चुके थे। काव्या ने धीरे से दरवाजा खटखटाया। शायरा- “कौन है ?” कहती हुई दरवाजे के करीब पहुँच गई।
काव्या ने धीरे से कहा- “काव्या।” 
शायरा दरवाजा खोलकर विस्मित सी काव्या को देख रही थी- “कब आई मैडम ?” कहते हुए शायरा ने काव्या का हाथ पकड़ लिया। 
“यूँ समझो कि अभी” काव्या ने कहा। दोनो सखियाँ खिलखिलाती हुई कमरे में दाखिल हुई और सोफे पर बैठ गई।
घर, परिवार, रिश्तेदारी और अतीत की ढेरों बातें करते हुए दो घंटे मानो जरा देर में बीत गए। इस बीच उन्होंने एक बार पानी और चाय पी। शायरा ने बेतकुल्फी से बूझा- “तुम दोपहर में क्या खाना पसंद करोगी काव्या। पकवान या सादा खाना?”
“कुछ भी नहीं। मैं शाम तक का खा कर निकली हूँ। बस अब चलने की इजाजत दो।” काव्या बोली।
“बेटा स्कूल से आने वाला है। उसके लिए मुझे कुछ तो बनाना ही है। आप भी खा लेना। मैं कुछ अलग नहीं करूंगी।” शायरा ने अपनेपन से कहा। 
“बेटे के स्वाद का पूड़ी-पकवान सब बनाओ। मेरे लिए नहीं।”
“हाँ उसके लिए हर दिन सोचना पड़ता है। खाने में बहुत परेशान करता है।”
“परेशान तो करेगा ही। अकेला जो है। तुमको कितना समझाया है। उसके लिए एक भाई बहन ले आओ। देखना, बगैर कहे खाने लगेगा। हमने तो तीन साल में अपनी गृहस्थ पूरी कर ली थी। दो बच्चों की ही सोच रहे थे। भगवान ने तीन दे दिए। छोटे बेटा-बेटी जुड़वां हैं। अब तीनों लड़ते झगड़ते हैं। उलझन होती है। पर खाना खिलाने की कोई पेरशानी नहीं। छीन झपट कर और डटकर खाते हैं।” काव्या ने शायरा को समझाने के लिहाज से कहा।
शायरा ने पानी का गिलास काव्या के सामने लाकर रख दिया पर उसकी बात का कोई जवाब न दिया। काव्या ने फिर टोका- “अब चुप क्यों हो ? यही ठीक समय है। बच्चा बड़ा हो जाय तो उसे दूसरा बच्चा बर्दाश्त करना बड़ा मुश्किल होता है। अब और देर मत करना।”
शायरा का चेहरा उतर गया। आहिस्ता से बोली- “पर अब संभव नहीं है काव्या। मेरे बेटे को जीवन भर अकेले ही रहना होगा।”
“क्या कह रही हो तुम ?”
“जो हकीकत है वही।”
“क्यों, ऐसी क्या मुश्किल हो गई है ?”
शायरा काव्या के एकदम करीब आकर बैठ गई। उसने दो साल पहले अपने साथ हुई घटना को बहुत धीमी आवाज में काव्या को सुनाया- “सर्दी खत्म होने वाली थी। मेरा तीसरा महीना पूरा हो गया था। अचानक एक दिन पेट में तेज दर्द महसूस हुआ। बच्चा स्कूल और शौहर दफ्तर जा चुके थे। मैं कुछ देर बर्दाश्त करती रही। फिर ख्याल आया कि कोई गड़बड़ न हो जाय। इस ख्याल ने मुझे डरा दिया। पति को फोन किया तो वे बोले- तुम नर्सिंग होम जाकर चैक-अप करा लो। जरूरी लगे तो मुझे फोन कर देना। मैं पहुँच जाऊँगा।” मैने तुरंत घर बंद किया और आटो लेकर नर्सिंग होम पहुँच गई। जगह और लोग परिचित थे। मेरे बेटे का जन्म वहीं हुआ था। एक के बाद एक डॉक्टर ने मेरे कई टेस्ट करा दिए। मेरे बार-बार बूझने पर भी कोई बीमारी या कारण नहीं बता रहा था। मुझे दर्द निवारक इंजैक्शन लगा दिया गया था। जिससे मैं एकदम ठीक महसूस कर रही थी। मैं उठकर चलने ही वाली थी कि नर्स ने मुझे कहा- “मैडम आपको बड़े डॉक्टर बुला रहे हैं।” मैं हैरान थी कि अब क्या समस्या है? मैं डॉक्टर के कमरे में दाखिल हुई। उन्होंने मुझे कुछ इस तरह देखा कि मैं कोई बहुत मुश्किल में हूँ। वे मुझे बैठने का इशारा करते हुए गंभीरता से बोले- “आपके साथ कोई आया है ?”
“नहीं।”
“कोई बात नहीं। बाद में बुला लीजिएगा। आपको भर्ती होना पड़ेगा।”
“पर क्यों? मैं तो अब ठीक हूँ।”
“यह आप कह रही हैं। आपकी रिपोर्ट नहीं।”
“क्या है रिपोर्ट में ?”
“आपको बताना उचित नहीं होगा। तुरंत इलाज की आवश्यकता है। आप भर्ती हो जाँय।”
“मैं अपने पति को फोन कर सकती हूँ ?”
“हाँ जरूर कर दीजिए। कहिए वे कुछ पैसों का इंतजाम कर चार पाँच बजे तक आ जाय। जरूरत पड़ सकती है।”
“भर्ती के कुछ घंटो बाद ही चैक-अप के नाम पर मुझे आपरेशन थिएटर में ले जाया गया। मैं तुम्हारे जीजा जी को फोन कर चुकी थी। पर मुझे अपनी चिंता से अधिक बच्चे की फिकर थी। अतः मैंने कहा कि वे पहले घर जाय। बच्चे के खाने का इंतजाम कर उसे पड़ौस वाली भाभी जी के पास छोड़कर यहाँ आएं। इस सबके साथ पैसे की भी व्यवस्था करनी थी। इसी में इन्हें नर्सिंग होम पहुँचते पाँच बज गए। तब तक मेरा आपरेशन किया जा चुका था। डॉक्टर ने इन्फैक्शन को कारण बताया और उसके लिए पूरा यूट्रस रिमूव करना जरूरी था। यह भी समझा दिया। मेरे शौहर डॉक्टर से बहस कर रहे थे और डॉक्टर और उसके सहयोगी इन्फैक्शन के फैलने को बचाने के लिए ऐसा किया जाना जायज ठहरा रहे थे।” 
“तुमने अंकल आण्टी को खबर क्यों नहीं की ?” काफी देर से शायरा की बात सुन रही काव्या ने तर्क दिया। 
मुझे इस चीज का तनिक भी एहसास नहीं था कि मेरा आपरेशन होने वाला है। मैं इसे केवल सामान्य चैक-अप समझ रही थी। 
“बाद में सभी लोग आ गए होंगे ? तुम्हारे मयके और ससुराल वाले। फिर उस डॉक्टर और नर्सिंग होम पर केस क्यों नहीं किया ?”
शायरा ने गहरी सांस लेते हुए गर्दन ना में हिलाई - “नहीं कोई नहीं आया काव्या। तुम्हारे जीजा जी ने किसी को खबर ही नहीं लगने दी। बस पूरा चैक-अप एक बार दूसरी जगह कराया। जिसमें कोई समस्या नहीं थी। वह भी मेरे भावी स्वास्थ्य को लेकर। वे इस घटना का प्रचार नहीं करना चाहते थे। बहुत दिनों बाद मैंने केवल अम्मी को बताया। बाकी कोई नहीं जानता। गनीमत है शौहर अच्छे हैं वरना तुम तो जानती हो हमारे यहाँ इतनी बात पर....।”
शायरा कुछ कहते-कहते रूक गई पर काव्या पूरी बात समझ गई। दोनों कुछ देर शांत रही। काव्या ने जग से गिलास में पानी उड़ेलते हुए शायरा को गौर से देखा। वह अतीत के किसी बुरे ख्वाब में खोई थी। पानी पीकर उठते हुए काव्या ने शायरा से कहा- “अपना और बच्चे का ख्याल रखना शायरा। अब मैं चलती हूँ।”



लेखिका
डॉ.  (श्रीमती)  अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।
शिक्षा - एम. ए. (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी. एड., एम. फिल., (इतिहास), पी-एच. डी. (इतिहास)
प्रकाशित रचनाएं –
भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस. एस. पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994, ISBN: 81-85396-10-8.
खो गया गाँव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010, ISBN: 978-81-90911-09-7-8.
पढो-बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012, ISBN: 978-81-8097-167-9.
सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012, ISBN: 978-81-8097-168-6.
जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2014, ISBN: 978-81-8097-190-7.
चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-800-0 (PB).
विरासत में मिली कहानियाँ (कहानी संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-801-7 (PB)
मैं किशोर हूँ  (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-802-4 (PB).
नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-808-6 (PB).
जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014, ISBN: 978-81-7309-803-1 (PB).
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं एवं कहानियाँ प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।
सम्पर्क -
डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई. जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद, (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514, दूरध्वनिः + 91-08005313626, ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

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