दोहरी नागरिकता के विभ्रंश में फँसा गोवा

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सामान्यतौर पर जिस देश में व्यक्ति का जन्म होता है, वह उस देश का नागरिक माना जाता है।भारत में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारतीय नागरिक है।

दोहरी नागरिकता के विभ्रंश में फँसा गोवा

सामान्यतौर पर जिस देश में व्यक्ति का जन्म होता है, वह उस देश का नागरिक माना जाता है। इसके अलावा यदि उसके माता-पिता या फिर दोनों में से कोई एक किसी संबंधित देश में जन्मा है, तब ऐसी स्थिति में भी रक्त संबंध के आधार पर वह व्यक्ति उस देश की नागरिकता का अधिकारी होता है। इसके अतिरिक्त कानूनी प्रक्रिया द्वारा भी किसी देश की नागरिकता प्राप्त की जा सकती है। अतः नागरिकता मनुष्य की वह स्थिति है,
दोहरी नागरिकता
चित्र साभार - goaprism.com
जिसमें उसे अपने देश के नागरिक का स्तर प्राप्त होता है और नागरिक की संज्ञा मात्र ओर मात्र ऐसे ही व्यक्तियों को दी जा सकती है जिन्हें राज्य की ओर से सभी राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्रदान किये गये हों एवम् जिनमें अपने राष्ट्र के प्रति विशेष देशभक्ति का भाव हो। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारतीय नागरिक है। इस दृष्टि से वह भारतीय संविधान के  भाग दो में अनुच्छेद 5 से 11 में उल्लिखित भारतीय नागरिकता के सम्बन्ध में दिए गए समस्त प्रावधानों के प्रति प्रतिबद्ध है।
सामान्यतया संघात्मक शासन व्यवस्था में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था की जाती है, जिसमें पहली संघ की नागरिकता और दूसरी राज्य की नागरिकता होती है। यद्यपि भारतीय संविधान द्वारा भारत में संघात्मक शासन की व्यवस्था की गयी है, तथापि अमरीका आदि अन्य संघ राज्यों की तरह भारत में दोहरी नागरिकता की नहीं वरन् एक ही नागरिकता अर्थात् भारतीय नागरिकता की व्यवस्था है। भारतीय नागरिकता और राष्ट्रीयता कानून के अनुसार, भारत का संविधान भारतीय कानून नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत पूरे देश के लिए एकमात्र नागरिकता उपलब्ध कराता है। इस अधिनियम को समय समय पर नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 1986, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 1992, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2003 और नागरिकता (संशोधन) अध्यादेश 2005 के द्वारा संशोधित किया गया था और पिछले वर्ष  ही  पत्र सूचना कार्यालय भारत सरकार की एक विज्ञप्ति के अनुसार राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने 6 जनवरी, 2015 से नागरिकता (संशोधन) अधिनियम-2015 को तुरंत प्रभाव से लागू कर दिया है। 
पिछले कुछ समय से गोवा में दोहरी नागरिकता का मुद्दा बहुत अधिक गरमाया हुआ है। उल्लेखनीय है कि गोवा 451 वर्षो तक पुर्तगाल का उपनिवेश रहा है और  पुर्तगाल के कानून के अनुसार गोवा में जन्मे पुर्तगाल मूल के व्यक्ति को पुर्तगाल की नागरिकता मिल जाती है। यही कारण है कि सन 1961 से पहले जन्मे गोवावासियों और उनके बच्चों तथा नाती-पोतों को पुर्तगाल तब तक पुर्तगाली नागरिक मानता है जब तक कि उनके जन्म और शादियों का पंजीकरण लिस्बन सेंट्रल रजिस्ट्री में होता है। 1961 से पहले जन्मे अनेक गोवावासी इस समय बड़ी कानूनी कठिनाइयों के दौर से गुजर रहे हैं, क्योंकि उनका जन्म पुर्तगाली शासन में पंजीकृत हुआ जिसके अनुसार वे पुर्तगाली नागरिकता के हुए और सन् 1961 में ही गोवा पुर्तगाल शासन से मुक्त हुआ था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 मार्च, 1962 को जारी अधिसूचना में नागरिकता कानून 1955 के अनुच्छेद 7 के तहत गोवा, दमन और दीव (नागरिकता) आदेश, 1962 में यह व्यवस्था दी थी कि वह हर व्यक्ति या उसके माता-पिता या उसके दादा-दादी में से किसी एक का जन्म 20 दिसंबर 1961 से पहले तत्कालीन गोवा केंद्र शासित प्रदेश, दमन और दीव में हुआ है तो उसे उसी दिन से भारत का नागरिक माना जाएगा बशर्ते इसके एक महीने के भीतर उस व्यक्ति ने लिखित रूप में यह न दे दिया हो कि वह 20 दिसंबर 1961 के पहले की नागरिकता को रखना चाहता है। इस तरह गोवा की मुक्ति से कुछ महीने पहले केंद्र सरकार ने गोवा के हर व्यक्ति को भारतीय नागरिकता दी थी। परिणामस्वरुप ऐसे व्यक्ति पुर्तगाल और भारत दोनों के ही कानूनी रूप से नागरिक हैं। 
गोवा के दीर्घ इतिहास पर यदि संक्षिप्त में दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि यहाँ  तीसरी सदी ईसा पूर्व मौर्य वंश का शासन था। इसके बाद पहली सदी की शुरुआत में कोल्हापुर के सातवाहन वंश और फिर बादामी के चालुक्य वंश ने इसपर 580 ईसवी से 750 ईसवी तक अपना आधिपत्य बनाकर रखा। इसके बाद गोवा कई अलग अलग शासकों के अधिकार में रहा। इतिहास बताता है कि 1312 ईसवी में गोवा पहली बार दिल्ली सल्तनत के अधीन हुआ था, लेकिन शीघ्र ही उसे विजयनगर शासकों ने अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद लगभग सौ वर्षों
तक विजयनगर शासकों ने ही यहाँ शासन किया। हाँलाकि सन्र 1469 में एक बार फिर गोवा गुलबर्ग के बहामी सुल्तान द्वारा दिल्ली सल्तनत के अधिकार में आ गया। बहामी शासकों के बाद बीजापुर के आदिल शाह ने गोवा पर कब्जा किया। सन् 1498 में वास्को डी गामा समुद्री मार्ग से सफलतापूर्वक गोवा पहुँचने से  तत्कालीन यूरोपीय सशक्त देशों को भारत पहुँचने के मार्ग मिल गए। इसी बात का लाभ उठाते हुए सन् 1510 में पुर्तगाली नौसेना ने तत्कालीन स्थानीय मुगल शासक को पराजित कर गोवा के कुछ क्षेत्रों पर पुर्तगाली अधिकार स्थापित किया। धीरे धीरे अपने अधिकार क्षेत्र को विस्तार देते हुए सोलहवीं सदी के मध्य तक पुर्तगालियों ने पूरी तरह से गोवा को अपने अधिकार में ले लिया। 19 दिसंबर, 1961 को भारतीय सेना के सफल अभियान के तहत गोवा को पुर्तगालियों के शासन से मुक्त करवाकर भारत में शामिल किया। पहले तो गोवा को उसके उपक्षेत्र दमन एवं दीव के साथ भारत में संविधान के एक संघीय क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया था, परन्तु बाद में 30 मई 1987 को गोवा को अलग राज्य का दर्जा दिया गया और इस तरह गोवा भारत का 26 वाँ राज्य बना।
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
पुर्तगाल के औपनिवेशिक शासन ने गोवा की स्थानीय संस्कृति का दमनकर परन्तु बड़ी ही चतुराई से स्थानीय लोगों को बतौर पुर्तगाली नागरिक मानकर यहाँ अपनी पुर्तगाली संस्कृति की मानसिकता ऐसी बसा दी कि गोवा के भारत के राज्य बन जाने के बाद भी यहाँ के लोगों को पुर्तगाली नागरिकता के मुद्दे ने मुक्त नहीं किया है। सन 1961 में जब गोवा के लोगों को भारतीय नागरिकता दी गई तो कानूनी तौर पर उनके पुर्तगाल नागरिकता त्यागने की कोई बाध्यता नहीं थी। पुर्तगाल की उनकी राष्‍ट्रीयता खत्म नहीं की जा सकती थी क्योंकि वह एक दूसरे देश का मसला था। यही कारण है कि गोवावासी वे आज भी दोहरी नागरिकता के दंश से घायल हो रहे हैं। गोवा में अनेक ऐसे लोग हैं जो दुविधा में फँस चुके हैं, एक ओर जहाँ वे पुर्तगाल के नागरिक तो बन चुके हैं लेकिन, अभी तक उन्होंने भारतीय पासपोर्ट सरेंडर नहीं किया है।  इस कारण से भी दोहरी नागरिकता का मसले का विवाद समय समय पर उठता रहता है। दोहरी नागरिकता से आशय ही होता है कि व्यक्ति एक ही समय में दो देशों की नागरिकता रखता है। वर्तमान में देखा जाए तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के इस दौर में कुछ सालों से दोहरी नागरिकता जैसे विषय के औचित्य और इससे होने वाली समस्याओं पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं। इसकी पृष्ठभूमि में निःसंदेह आथिर्क चिंताएं अधिक हैं। प्रायः दोहरी नागरिकता अपनाने के लिए प्रमुख कारण रोजगार, मतदान का अथवा व्यापारिक महत्वाकांक्षा होते हैं। 
प्रश्न यह उठता है कि आखिर हजारों गोवावासी पुर्तगाल के लिए भारतीय नागरिकता क्यों छोड़ना चाहते हैं? गोवा में दोहरी नागरिकता के शिकार वे ही लोग अधिकतर हैं जो व्यावसायिक उच्च महत्वाकांक्षाएं पाले हुए हैं। देखने में आ रहा है कि हाल के कुछ वर्षों में गोवा के लोग लगातार पुर्तगाली नागरिकता के लिए आवेदन कर रहे हैं, क्योंकि एक बार नागरिकता प्राप्त हो जाने के पश्चात् वे तत्काल यूरोपीय संघ के सदस्य हो जाते हैं। यहाँ के नागरिक बनकर यूरोपीय संघ के किसी भी देश में रोजगार पा सकते हैं। सन् 1986 में पुर्तगाल यूरोपीय संघ का सदस्य बना था। इससे पुर्तगाली नागरिकों को यूरोप में निर्बाध आवागमन, स्वास्थ्य सुविधाओं और बेराजगारी भत्ता या रोजगार जैसी विशिष्ट सुविधाएं स्वतः मिलने लगती हैं। यह भी कहा जाता है कि पुर्तगाली नागरिकता पाने का एक उद्देश्य येनकेन प्रकारेण ब्रिटेन में प्रवेश करना भी होता था, यद्यपि ये अलग बात है कि आज की तारीख में ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग होने की कगार पर खड़ा हुआ है। वैसे देखा जाए तो पुर्तगाल की अर्थव्यवस्था की हालत भी कोई बड़ी अच्छी नहीं है। अतः पुर्तगाल की नागरिकता लेने का एकमात्र उद्देश्य यही सामने आता है कि वे लंदन और उसके आसपास जाकर अपना व्यवसाय बढ़ाना चाहते हैं। वहीं कहीं न कहीं पुर्तगाल भी गोवा के कारण मिली पराजय को भूलता नहीं है, तभी तो गोवावासियों को पुर्तगाल की नागरिकता देकर अस्थिर करने का प्रयास करता रहता है। अतः अब गृह मंत्रालय का यह कहना कि पुर्तगाल में जाकर बस गए गोवावासी भारत या पुर्तगाल में से किसी एक देश की नागरिकता अपना लें, गलत तो नहीं लगता। कुछ दिन पूर्व ही गृह मंत्रालय ने दोहरी नागरिकता के मुद्दे पर गौर करने के लिए एक प्राधिकरण के गठन की योजना की घोषणा की है। वहीं गोवा के मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि अब पुर्तगाली पासपोर्ट धारक गोवा के नागरिक केवल एक ही नागरिकता रख सकेंगे। उनको गोवा या पुर्तगाल दोनों में से किसी एक का चुनाव करना होगा। 
राष्ट्रीयता से सम्बद्ध कोई भी विषय हों फिर चाहे वह गोवा का दोहरी नागरिकता का मुद्दा ही क्यों न हो, शीघ्र समाधान की प्रत्याभूति चाहता है। प्रशासनिक और संवैधानिक स्तर पर मसलों के समाधानों के साथ साथ नागरिकों की भी प्रतिबद्धता बनती है कि इस दोहरी नागरिकता के विभ्रंश से गोवा और भारत को सुरक्षित निकाला जाए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र के हित उसके नागरिक की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से कहीं अधिक उच्च होते हैं। राष्ट्र है, तो नागरिक है, और नागरिक है तो नागरिकता है। पुरानी कहावत है दो नावों पर सवार होकर सुरक्षित और संतोषयुक्त पार नहीं हुआ जा सकता। जीवन और राष्ट्र की सफलता एकता में है, दोहरेपन में नहीं। 

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।
          संपर्क सूत्र -  डॉ. शुभ्रता मिश्रा ,स्वतंत्र लेखिका, वास्को-द-गामा, गोवा, मोबाइलः :08975245042
          ईमेलः shubhrataravi@gmail.com

         

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