उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और स्वायत्तता

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उच्च शिक्षा किसी भी देश की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण स्तर होता है । उच्चशिक्षा अधिकांशतः विश्वविद्यालयो मे दी जाती है तथा यहीं से देश एवं राष्ट्र निर्माण की नीव पड़ती है ।

               उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और स्वायत्तता

 - सुशील कुमार तिवारी                      
उच्च शिक्षा किसी भी देश की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण स्तर होता है । उच्चशिक्षा अधिकांशतः विश्वविद्यालयो मे दी जाती है तथा यहीं से देश एवं राष्ट्र निर्माण की नीव पड़ती है । "शिक्षा के उद्देश्य" नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक मे प्रोफेसर हवाइडेड  ने विश्वविद्यालयों का राष्ट्र निर्माण मे योगदान के संदर्भ मे लिखा है 'विश्वविद्यालयों ने हमारी सभ्यता के बौद्धिक मार्गदर्शकों को प्रशिक्षित किया है । यहीं से विधिज्ञ , राजनीतिविद , चिकित्सक , वैज्ञानिक , प्राध्यापक एवं साहित्यसेवी निकले हैं।  विश्वविद्यालय ही उन आदर्शो के घर रहे है जिनकी सहायता से लोग अपने वर्तमान युग के संक्षोभ का सामना करते हैं' । विश्वविद्यालयों की इसी भूमिका को ध्यान मे रखते हुए राधाकृष्णन विश्वविद्यालय आयोग ने इन्हे 'किसी राष्ट्र के आंतरिक जीवन के पुण्यस्थान' की संज्ञा दी है । इन दोनों ही कथनो से यह बात स्पष्ट है की उच्च शिक्षा जिसे हम विश्वविद्यालयी शिक्षा भी कहते है , का राष्ट्रीय जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान है । 
उच्च शिक्षा जो राष्ट्र की आधारशिला होती है उसमे गुणवत्ता और स्वायत्तता का सवाल एक महत्वपूर्ण प्रश्न है । गुणवत्ता और स्वायत्ता  उच्च शिक्षा के महत्वपूर्ण पहलू है । गुणवत्ता के बिना शिक्षा अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर पाएगी यह कहना शायद बहुत बड़ी भूल होगी । और शिक्षा में, विशेषकर उच्च शिक्षा में गुणवत्ता स्वायत्ता के अभाव में असंभव भले न हो किन्तु कठिन जरूर है ।उच्च शिक्षा की गुणवत्ता इसलिए जरूरी है कि उच्च शिक्षा
चित्र साभार - द हिन्दू 
के अंतर्गत आने वाले अनुशासन सर्वाधिक कुशलता कि मांग करते हैं । डाक्टर , इंजीनियर , वैज्ञानिक , विधिवेत्ता , अर्थशास्त्री या फिर विभिन्न विषयों के विद्वान , शोधार्थी , इनकी गुणवत्ता ही इन्हे सफल बनाती है और बिना गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के यह संभव नहीं है । क्या कारण है कि यदि आप किसी छात्र से यह पूंछे कि आप अपनी उच्च शिक्षा कहाँ से लेना चाहेंगे तो वह कैम्ब्रिज , ऑक्सफोर्ड या किसी अन्य विदेशी या आईआईटी जैसे उच्च संस्थान कि बात करेगा । इसके पीछे कार्य करने वाला महत्वपूर्ण कारण यहाँ कि गुणवत्ता ही है जो छात्र तो क्या प्रोफेसरो एवं शिक्षाविदों  को भी आकर्षित करती है ।
उच्च शिक्षा कि गुणवत्ता से तात्पर्य उच्च शिक्षा का उन समस्त मानकों पर खरा उतरना है जिनको ध्यान मे रखकर यह प्रदान कि जा रही है । यदि शिक्षा वर्तमान जीवन कि चुनौतियों को कुशलतापूर्वक हल कर देती है , छात्र को अत्यधिक दक्ष बनाती , उसमे आधुनिकतम ज्ञान - विज्ञान के कुशलतम उपयोग को संभव बनाती है तथा उसे इस योग्य बनती है कि वह नवीन ज्ञान का सृजन कर सके तो यह माना जाता है कि शिक्षा गुणवततापूर्ण है ।
वर्तमान समय में भारत में  गुणवत्ता और स्वायत्तता उच्च शिक्षा (higher education) के क्षेत्र की महत्वपूर्ण चुनौतियों के रूप मे उभरे हैं। आए दिन हमारे शिक्षाशास्त्रियों द्वारा इस विषय पर बार - बार चिंता प्रकट की जा रही है जिसे हम सभी विभिन्न समाचार चैनलों , अखबारों , पत्रिकाओं में पढ़ सुन रहे हैं । महामहिम राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री भी देश के नाम सम्बोधन में इस विषय पर अपनी चिंता जाहिर कर चुके है । भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का अनुमान हम विभिन्न संस्थानों द्वारा जारी आंकड़ों एवं रैंकिंग के द्वारा आसानी से समझ सकते है । उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में प्रथम एक सौ विश्वविद्यालयों मे हमारे देश का कोई भी विश्वविद्यालय सम्मिलित नहीं है। क्यूएस वर्ल्ड यूनिवरसिटि रैंकिंग द्वारा जारी 2010 – 2015 तक के आंकड़े इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं ।
1. यदि इनमे से 2015 के आकड़ों को हटा ले तो दुनिया के टॉप 200 विश्वविद्यालयों में भी भारत का कोई संस्थान शामिल नहीं था ।2 2015 में अवश्य भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी , बंगलौर) को 147वां स्थान तथा आईआईटी दिल्ली को 179वां स्थान प्राप्त हुआ है । किन्तु बाकी सभी उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थिति काफी दयनीय बनी हुई है । भारतीय उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के संबंध में होने वाले शोधों एवं सर्वेक्षणो पर यदि ध्यान दिया जाय तो एक तथ्य जो बहुत ही महत्वपूर्ण रूप मे हमारे सामने आता है वह है उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों का एक बड़ी संख्या में बेरोजगार होना है । यह बेरोजगारी अवसरों की कमी की वजह से उतना नहीं है जितना की दक्षता या कहे की शिक्षा में गुणवत्ता की कमी के कारण । विभिन्न सर्वेक्षणों में तमाम नियोक्ता संस्थानों ने यह माना है कि भारत के उच्च तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों में आधे से भी कम विद्यार्थी अपनी शिक्षा के अनुरूप कार्य कर पाने में सक्षम हैं ।
2. यह अकारण नहीं है की आजकल बी.टेक, पीएचडी जैसे उच्च शिक्षा डिग्रीधारी युवा चपरासी या अन्य चतुर्थ श्रेणी की नियुक्तियों मे बड़ी संख्या मे आवेदक के रूप मे देखे गए हैं ।
3. उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के संदर्भ में होने वाले विभिन्न शोधों में भी यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर आई है कि हमारे उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवानों में 70% से भी अधिक अकुशल हैं जो आधुनिक तकनीकी विकास एवं निर्धारित योग्यता के अनुरूप कार्य करने में सक्षम नहीं हैं । 
यह समस्या यहीं पर समाप्त नहीं हो जाती ; शोध कार्य जो उच्च शिक्षा का आधार स्तम्भ माना जाता है उसमें भी गुणवत्ता में ख़ासी कमी आई है । आज भले ही थोक के भाव शोध कार्य हो रहे हों किन्तु उनमें यदि अच्छे गुणवत्तापूर्ण शोधों की गणना की जाय तो वे मात्र गिने – चुने ही प्राप्त होंगे । 
उच्च शिक्षा में स्वायत्तता का सवाल भी दिनोदिन एक गंभीर मसला बनता जा रहा है । आए दिन विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों पर बढ़ता राजनीतिक प्रभाव हम सभी से छुपा नहीं है । यह अकारण नहीं है की जैसे ही किसी पार्टी की सत्ता बनती है वैसे ही उसके या उसकी विचारधारा के नुमाइंदे विभिन्न शिक्षण संस्थानों के महत्वपूर्ण पदों पर पहुँच जाते हैं । उच्च शिक्षा की सर्वोच्च संस्था यूजीसी भी इसकी चपेट में आती रही है । समय – समय पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा यूजीसी के कार्यो मे हस्तक्षेप की खबरें अब आमबात हो चुकी है । अभी हाल में हैदराबाद विश्वविद्यालय में घटित हुए पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक दबाव ही सबसे महत्वपूर्ण कारण रहा है । 
शिक्षा संस्थाओं का राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होना तथा स्वायत्त होना अति महत्वपूर्ण है ठीक न्यायपालिका की तरह । यदि न्यायपालिका राजनीतिक प्रभाव से मुक्त न हो तो क्या हम वहाँ न्याय की आशा कर सकते हैं अथवा क्या वह अपना कार्य सही तरीके से कर पाएगी ? ठीक इसी तरह शिक्षा को यदि अपने उद्देश्यों को प्राप्त करना है तो उसे हर हाल मे राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना ही होगा । और यदि शिक्षा प्रणाली ही राजनीतिक
सुशील कुमार तिवारी
उठापटक का माध्यम बन जाएगी तो देश के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाएगा । शिक्षा को स्वायत्त बनाने हेतु विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948-1949) ने यह सुझाव दिया दिया था कि इस हेतु एक स्वायत्त निकाय की स्थापना की जाय । आयोग के इस सुझाव के आधार पर 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन भी किया गया तथा उच्च शिक्षा के सम्पूर्ण प्रशासन का दायित्व इसे सौपा गया । किन्तु महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह संस्था भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में रचनात्मक कार्य तभी कर सकती है जब इसे राजनीतिक दबाबों एवं एजेंडे से मुक्ता रखा जाय ।
आज जरूरत उच्च शिक्षा को और अधिक स्वायत्त बनाने की है किन्तु स्वायत्तता किसी अराजकता का रूप न धारण करे इसका भी ध्यान रखना जरूरी है । आज जरूरत ऐसी नीतियाँ बनाने एवं उन्हें लागू करने की है जिससे हमारी वर्तमान उच्च शिक्षा विश्व स्तर की एवं गुणवततापूर्ण हो सके । इस हेतु हमें अपने पाठ्यक्रम , पठन-पाठन के तरीकों आदि में व्यापक बदलाव करना होगा ।  उन्हें आज की जरूरतों के अनुकूल बनाना होगा । आज जिस प्रकार की नयी – नयी शिक्षण प्रौद्योगिकी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आ रही है उन्हे भी अपनाना होगा  साथ ही इस बात का ध्यान रखना होगा की हमारा ज़ोर शिक्षा को देश की जरूरतों के अनुरूप तथा विश्वस्तर की बनाने पर हो । क्योकि  आज दुनिया मे उच्च शिक्षा जिस तीव्र गति से विकास कर रही है हमे स्वयं  को भी उन मानदंडो पर खरा उतरना होगा । उच्च शिक्षा के क्षेत्र मे हो रहे शोधों को विश्व स्तर का बनाना होगा और इस हेतु हमे उच्च शिक्षा मे योग्य प्रतिभाओं को आने का अवसर सुलभ कराना होगा । आज हमारे देश के तमाम प्रतिभावान छात्र और अध्यापक उच्च शिक्षा के क्षेत्र मे प्रवेश ही नहीं करने पाते । और जो है भी वो दिन – प्रतिदिन विदेशों को पलायन करते जा रहे है । इस हेतु महत्वपूर्ण कदम यह होगा कि उच्च शिक्षा संस्थानो में पर्याप्त वृद्धि कि जाय । उनमे पर्याप्त मात्र में शिक्षण , पाठन –पाठन हेतु सुविधाओं को उपलब्ध कराया जाय । साथ ही उच्च शिक्षा में आने वाले समस्त छात्रों एवं अध्यापकों कि जवाबदेही सुनिश्चित कि जाय । उच्च शिक्षा में होने वाली नियुक्तियों मे योग्यता को ही एक मात्र मानक बनाया जाय । इन  नियुक्तियों मे उच्च शिक्षा के विश्वस्तरीय मानकों का भी ध्यान रखा जाय और जरूरत पड़ने पर विदेशी विशेषज्ञ  विद्वानों की  भी  सेवा ली जाय । 
आज उच्च शिक्षा की निम्न गुणवत्ता के कारणो मे एक कारण उच्च शिक्षण संस्थानों मे छात्र शिक्षक असंतुलन भी है । विभिन्न शिक्षण संस्थानों के प्राध्यापकों के आधे पद रिक्त पड़े हुए है तथा छात्रों को पढ़ाने के नाम पर मात्र खानापूर्ति हो रही है । अतः इस स्थिति को समाप्त किया जाना भी जरूरी है तथा ऐसे पदों पर रचनात्मक भूमिका वाले शिक्षको की नियुक्ति की जानी चाहिए । पाठ्यक्रम की जड़ता को समाप्त करने की जरूरत है तथा उसमे  आज की जरूरतों के अनुरूप बदलाव किया जाना चाहिए । 
उच्च शिक्षा में नवाचारों (इनोवेशन) को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए तथा नयी चिंतन पदधितियों को बढ़ावा तथा उचित मात्र मे अवसर प्रदान किया जाना चाहिए । उच्च शिक्षा में शोध को बढ़ावा दिया जाना चाहिए साथ ही इसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है । इस हेतु महत्वपूर्ण कदम यह होगा की योग्य विद्यार्थियो को , जो अच्छा शोध कार्य कर सकें उन्हे इस प्रक्रिया मे सम्मिलित किया जाय ।  इस हेतु  विद्यार्थियों को शोध पूर्व लघुशोध कार्य  करने का अवसर दिया जाय तथा इसमे उनकी कुशलता तथा गुणवत्ता को परख कर आगे के लिए अवसर दिया जाय। इसके साथ ही शोध के दायरे में व्यापक बदलाव करना होगा तथा उसे अंतरराष्ट्रीय मानको के अनुकूल करना होगा । 
इस प्रकार शिक्षा सिर्फ सैद्धांतिक न होकर व्यवहरिक जीवन में भी उपयोगी हो ऐसा पाठ्यक्रम एवं शिक्षण अधिगम प्रक्रिया हमे तैयार करनी होगी ।उच्च  शिक्षा को चरित्र निर्माण से लेकर जीवन निर्माण एवं व्यावसायिक कुशलता से लेकर तकनीकी कुशलता तक विस्तृत करना होगा । 
स्वायत्तता हेतु  शिक्षा में  स्वायत्तशासी संस्था की स्थापना की जय तथा इसे राजनीतिक पार्टियों के दबावों से मुक्त रखा जाय  तथा इसके लक्ष्यों के अनुरूप इसे कार्य करने दिया जाय । 

संदर्भ सूची :-
क्यू एस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग २०१५ 
www.topuniversities.com / qs world university rainking-2015 
टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 
www.timeshighereducation.com
         


यह रचना सुशील कुमार तिवारी जी द्वारा लिखी गयी है।  आप महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ,वर्धा ,में  शोध छात्र हैं।

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उच्च शिक्षा किसी भी देश की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण स्तर होता है । उच्चशिक्षा अधिकांशतः विश्वविद्यालयो मे दी जाती है तथा यहीं से देश एवं राष्ट्र निर्माण की नीव पड़ती है ।
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