मुहिम

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सर्दी का मौसम था। ठण्डी हवा की चुभन हड्डियों तक महसूस हो रही थी। सुबह की बारिश ने गलन को और बढ़ा दिया था।

मुहिम

सर्दी का मौसम था। ठण्डी हवा की चुभन हड्डियों तक महसूस हो रही थी। सुबह की बारिश ने गलन को और बढ़ा दिया था। आज की हवा को महसूस करने के बाद यह समझना नितांत मुश्किल था कि यही हवा इस इलाहाबाद शहर में गर्मी में गाल झुलसाने वाली भी हो जाती है। इस शहर की यही खासियत है कि यहाँ हर मौसम अपनी पूर्णता के साथ आता है। बारिश भी बाढ़ से कम पर बात नहीं करती। चंद दिनों में ही आधा शहर गंगा यमुना की लहरों में नहाता है। लोग छतों पर बैठकर या झुंड के झुंड मैदानों गलियों में इकट्ठा होकर डूबते घाटों, घरों और मंदिरों को देखते हैं।
शालिनी चार साल के बाद भाई के घर आई थी। बच्चे बड़े सभी ढलती धूप का आनंद लेते हुए लॉन में बतिया रहे थे। शालिनी की भाभी मीता रसोई में चाय बना रही थी। वरूण ने आवाज लगाई- “मीता चाय जल्दी ले आओ। मुझे जाना है। ठण्ड बढ़ रही है।”
कुछ देर में चाय आ गई। सभी चाय का आनंद लेने लगे। वरूण ने घड़ी पर नजर डालते हुए कहा- “साढ़े चार बज गए। तुम्हारी चाय के चक्कर में मैं आधा घंटा लेट हो गया हूँ। पता नहीं तुम्हारे सब काम इतने सुस्त क्यों रहते हैं ?”
दीपू ने भी पापा का साथ देते हुए कहा- “माँ का तो दिन भर काम खत्म ही नहीं होता है। तब भी कितने काम अगले दिन के लिए टल जाते हैं। आज कोई कपड़ा धुलना हो तो तीन दिन में नम्बर आता है।”
मीता मुस्कुराती रही। परन्तु शालिनी ने हल्का सा प्रतिकार करते हुए कहा- “अकेली पूरा काम जो करती हैं। थक नहीं जाती क्या? तुम लोग मदद क्यों नहीं करते हो?”
शीलू बोल पड़ी- “मैं मम्मी की मदद कर सकती हूँ। मुझे खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना सब आता है। मम्मी मुझे करने ही नहीं देती। खुद ही सारा काम निबटा लेती है।”
दीपू ने शीलू की बात को आगे बढ़ाया- “कोई मदद करे भी तो कैसे? काम को हाथ लगाने से पहले ही कहने लगती हैं- हटो-हटो तुमसे नहीं होगा। मैं कर लूंगी। जब किसी का काम पसंद ही नहीं तो कोई क्या करें।”
शालिनी- “हाँ ये तो है भाभी। आप किसी से काम कराना ही नहीं चाहती हो। सुबह से मुझे भी बैठाकर रखा है। जिस काम को हाथ लगाओ उसे झट आगे बढ़ कर करने लगती हो। तुम्हें भी थोड़े आराम की जरूरत है।”
मीता- “पढ़ने वाले बच्चे हैं। ये घरेलू काम में उलझ जाएगें तो पढ़ाई का समय कैसे मिलेगा? मुझे कहीं जाना नहीं रहता। धीरे-धीरे शाम तक निबटा लेती हूँ और आप यहाँ कितनी आती हो। चार साल में चार दिन को आई हो। उसमें भी दिनभर काम में लगी रही तो आने का क्या सुख?”
वरूण चाय खत्म करते हुए बोले- “यहाँ तो एक ही बंदा फालतू नजर आता है और वह हूँ मैं। मुझसे उम्मीद है कि मैं सब कामों में हाथ बटाऊँ और मैं यह कर नहीं सकता। मैं कितनी बार कह चुका हूँ पूरे काम के लिए काम वाली रख लो। समझ में नहीं आता तो क्या करूँ?”
शालिनी- “समझ में क्यों नहीं आता? मिलती ही नहीं होगी।”
दीपू- “मिलती है। मिलती क्यों नहीं? पर उससे तो ये और परेशान रहती है।”
शालिनी- “क्यों?”
अपर्णा शर्मा
दीपू- “कोई पानी अधिक बहाती है कोई सर्फ ज्यादा खर्च करती है, कोई समय से नहीं आती। कामवाली दो चार महीने से अधिक रुकती ही नहीं। इनकी हिदायतों से घबराकर भाग जाती हैं।”
शालिनी- “ऐसा क्यों है भाभी?”
मीता- “दीदी आपके यहाँ बिजली पानी की कमी नहीं है। इसीलिए आपको खराब न लगता होगा। यहाँ तो एक-एक बाल्टी पानी को लोग लम्बी लाइन लगाते हैं। शहर के किसी न किसी इलाके में हर दिन बिजली पानी गायब रहता है। यह सब सुनकर बहता पानी देखना मुझसे तो बर्दास्त नहीं होता।”
शालिनी ने गहरी सांस लेते हुए कहा- “बिजली पानी की हालत तो अब सब जगह खराब है भाभी। आपने सुना नहीं? नैनी झील का पानी भी दिन-दिन घट रहा है। उस पर उसमें फिंकता कचरे का अम्बार झील को घटाता और किनारों को बढ़ाता जा रहा है। मैं तो कभी-कभी सोचती हूँ वहाँ के लोगों ने उत्तरांचत बनाने को जितने आन्दोलन किए यदि उसके आधे भी झील बचाने को किए होते तो लोगों का और इलाके का अधिक भला हुआ होता। पर ये सब तो परोपकार की बातें हैं। पहले तो अपने उपकार की सोचो। कामवाली रख लो। इन्हें तो निभाना ही पड़ता है। कोई अपने आप किफायत नहीं करती है।”
वरूण ने चाय के बाद सिगरेट सुलगा ली थी। वे जरूरी काम से जाना भूल गए थे। लम्बे समय के बाद मीता को घेरकर कुछ सुनाने का मौका हाथ आया था। इसे छोड़कर जाना उनके लिए मुश्किल था। वार्ता धीरे-धीरे उनके लिए रोचक हो रही थी। तभी शीलू ने याद दिलाया- “पापा आपके जाने को देर हो रही है।”
वरूण ने सामने पड़ी कुर्सी पर पैर लम्बे फैलाते हुए सिगरेट का लम्बा कश खींचा और बोले- “छोड़ो अब जाने का चक्कर। ठण्ड में क्या बीमार होना है और यहाँ बातें भी तो इतनी अच्छी हो रही हैं ।”
दीपू ने बुआ का हाथ हिलाते हुए कहा- “पानी का तो बहाना है बुआ। असली समस्या तो पैसे खर्च करने की है। कामवाली साबुन और सर्फ जो ज्यादा बहाती हैं इसीलिए मम्मी उन्हें भगा देती हैं।”
शालिनी ने असहमती जताई- “नहीं ऐसा नहीं हैं। मैं जानती हूँ। भाभी कामवालियों को खूब खिलाती-पिलाती और कपड़ा, पैसा सब देती हैं। कोई ठीक काम करने वाली मिल ही नहीं रही होगी।”
इतना कहकर उसने मीता की ओर इस उम्मीद से देखा कि उसकी बात का समर्थन होगा। परन्तु इससे पहले कि मीता कुछ बोलती। शीलू बीच में ही बोल पड़ी- “हाँ-हाँ मम्मी पक्की कंजूस हैं। एक दिन बर्तनवाली ने साबुन माँगा तो उसे घंटे भर का भाषण सुना दिया।”
शीलू की बचकानी बात पर सब हंस पड़े। मीता बोली- “क्या बताऊँ। अब उसे रोको समझाओ न तो महीने में चार पाँच साबुन बहा दे। विम रहा सो अलग। मैं इसी चक्कर में खुद बर्तन मांज रही थी। साबुन की एक बट्टी एक सवा महीने चल जाती थी। पता नहीं ये कैसे इस्तेमाल करती हैं इसे रोकते कहते भी तीन बट्टी तो लगा ही देती है।”
शालिनी ने मीता के प्रति हमदर्दी जताते हुए कहा- “किफायत करना अच्छी बात है। पर भाभी इतनी छोटी-छोटी चीजों के लिए खुद को दिनभर मशीन सा दौड़ाना समझदारी नहीं है। हमारी आपकी साबुन सर्फ की बचत से कोई बहुत बड़ी रकम इकट्ठी नहीं हो जाएगी। हाँ समय से पहले बीमार, बूढ़ी जरूर हो जाओगी। तब यह सारी बचत रखी की रखी रह जाएगी। क्यों अपने आपको इतना कष्ट देती हो? अच्छी सी काम वाली क्यों नहीं रख लेती ?”
मीता ने हाथ उठाया। शायद वह कुछ कहना चाहती थी। परन्तु वरूण ने पहले ही बोलना शुरू कर दिया। जिससे उसके मुँह की बात मुँह में ही रह गई। वरूण ने थोड़ी नाराजगी व थोड़े व्यंग्य भरे शब्दों में कहा- “शालिनी बहन क्या तुम भी। किसे समझाने लगी। यहाँ यह सब समझाते-समझाते सालों बीत गए। तुम जिसे किफायत समझ रही हो यह किफायत नहीं है, दरिद्रता है, दरिद्रता और अधिक स्पष्ट शब्दों में कहा जाय तो निरा लीचड़पन। जो इन्सान सामर्थ होते हुए भी अपने साधनों का इस्तेमाल न करें। उसे दुनियाँ वाले मितव्ययी या समझदार नहीं कहते। बल्कि ऐसे लोग बेवकूफ व घटिया कहे जाते हैं। इसी श्रेणी में आपकी ये भाभीजी हैं। इतनी देर की बहस के बाद भी तुम इनसे हामी नहीं भरवा पाई। इसका मतलब है कि अभी तुम्हें बात समझ में ही नहीं आई है। हिम्मत हो तो कुछ देर और कोशिश कर लो। आज नहीं तो कल, परसों जब तक यहाँ हो रोज समझाओ। अगर तुम जाने से पहले मीता देवी को उसकी दरिद्रता और मितव्ययता में अन्तर समझा सको तो यह मुझपर एक बड़ा एहसान होगा। मैं भी तुम्हें मान जाऊंगा।”
वरूण ने डिब्बी से नई सिगरेट निकाल कर सुलगा ली और लम्बा एक कश खींचकर उसका धुवाँ छोड़ते हुए फिर बोलना शुरू किया- “मुझे अब एक तरह का अपमान और शर्म सी महसूस होने लगी है। जब घर आने वाले प्रश्न करते हैं कि मैं बीवी से इतना काम क्यों करवाता हूँ? तब मैं बात को हँसकर इधर-उधर बदल देता हूँ। अब किस-किस को समझाऊँ कि कसूरवार कौन है। जहाँ अपनी ना चले वहाँ चुप रहना ही ठीक है।”
सूरज अपनी धूप की चादर समेट कर पश्चिम की गोद में सिमट रहा था। हवा का तीखापन बढ़ रहा था। बच्चे बड़ों की लम्बी ऊबाउ बातों से बचकर कमरे में चले गए थे। वरूण ने अन्दर चले जाने के ख्याल से कुर्सी छोड़ दी। परन्तु तभी मीता का गंभीर स्वर सुनकर वे बैठ गए।
“मैं जो भी काम करती हूँ अपनी इच्छा से करती हूँ। इसके लिए मुझपर कोई दबाव नहीं हैं। मैं आपकी हैसियत को आपसे अधिक समझती हूँ। दो हजार की तनख्वाह से गृहस्थ शुरू की थी मैंने। यदि पैसा-पैसा न बचाती तो आज इतनी शान बघारने की हिम्मत न करते। आज भी यदि सबके कहने में आकर सारे काम नौकरों के भरोसे छोड़ दूँ तो यही खर्च बीस से चालिस हजार होते देर नहीं लगेगी। घर में जो सामान साल हर साल बढ़ता दिख रहा है यहीं दिनों दिन गायब होने लगेगा। रही बात कंजूसी की- मैं खाने-पीने में कंजूसी नहीं करती हूँ। कंजूसी करती हूँ तो साबुन, सर्फ और बाथरूमों में बहाये जाने वाले कैमिकल में। जानते हो क्यों?” यह सब बहकर उन्हीं नदियों, झीलों और तालाबों में पहुँचता है जिनको बचाने के लिए कितने आन्दोलन, योजनाएँ और बातें चल रही हैं।”
शालिनी अप्रत्याक्षित रूप से बोल पड़ी- “हाँ गंगा के लिए कितने संत आन्दोलन और अनशन कर रहे हैं। कितनों का प्राणांत भी हो गया है। सरकारें भी करोड़ों का बजट पास कर रही हैं।”
मीता- “अनशन तो घोर हताशा और निराशा की स्थिति है। जो नैतिक को झुका सकती है। परन्तु अनैतिक के लिए उपहास का विषय होती है। आन्दोलन भी अधिकतर नेताओं के ढकोसले हैं और सरकार तो अपनों का पेट भरने के लिए ही योजनाओं के नाम पर पैसे का बंदर बाँट कर रही है। इनमें से यदि एक भी इमानदार होता तो समस्या कब की सुलझ गई होती।”
वरूण ने बहुत दिनों बाद मीता को इतने मन से बोलते सुना था। उसने हल्के मजाक के मूड में कहा- “तो हमारे घर की सरकार उसमें क्या भागीदारी करने वाली है? वह क्यों अपना भट्टा बैठाए ले रही है?”
“भागीदारी के लिए धन, ज्ञान या ताकत की ही आवश्यकता नहीं है। सही सोच के साथ हम कहीं भी खड़े होकर बहुत कम ताकत और साधन से भी भागीदारी कर सकते हैं। बस मन में इमानदारी और थोड़ी हिम्मत बनी रहे। हिसाब लगाओ यदि हर घर से महीने में आठ की जगह दो साबुन और दो ढाई किलो सर्फ की जगह पाव डेढ़ पाव में काम चला लिया जाय। यानी हम अपने हर दिन के कैमिकल खर्च को एक चौथाई  कर लें। जो कि हम थोड़े से प्रयास से आसानी से कर सकते हैं। तो एक मौहल्ले और बस्ती से कितना कैमिकल जल स्रोतों में जाने से बच जायगा। इसकी मात्रा का अनुमान हर गाँव शहर और फिर पूरे देश में लगाओ। आज जो जल स्रोतों की बर्बादी की स्थिति है वह आप से आप एक चौथाई रह जाएगी। फिर एक चौथाई समस्या को आन्दोलन व जन सहयोग से आसानी से सुलझाया जा सकता है।”
“संध्या का अंधेरा घिरने लगा था। सड़कों पर सन्नाटा पसरने लगा और ठीक वैसा ही सन्नाटा वरूण के लॉन में भी मीता की बात खत्म होते तक छा गया। मीता कुर्सियाँ समेट कर अंदर ले जाने लगी। उसी के पीछे बची कुर्सियाँ वरूण और शालिनी ने भी उठा ली। सब घर में आ गए। मीता रसाई में रात के खाने की तैयारी करने चली गई। वरूण और शालिनी मौन कुछ विचार रहे थे। वे थोड़े आश्चर्य चकित से एक दूसरे को देख रहे थे। शालिनी ने धीरे से कहा-बड़ी गहरी सोंच है। बात एकदम सही है।”
वरूण ने केवल- ‘हूँ’ कहा।
शालिनी बच्चों के पास चली गई। वरूण ने एक नई सिगरेट सुलगा ली। वह विचार रहा था- एक नितांत घरेलू अनपढ़ महिला और सोच का इतना व्यापक दायरा? आज तक वह उसे घर की सोच लायक भी नहीं समझता था। उसे क्या पता था कि उसके अदने से व्यक्तित्व में इतना व्यापक व्यक्तित्व भी छिपा है। आज तक वह इस व्यक्तित्व को क्यों न पहचान पाया? हर दिन साथ रहकर भी आखिर वह मीता से इतना दूर क्यों बना रहा? इतना ही नहीं उसी के कारण बच्चों के दिमाग में भी मीता की अधूरी छवि ही बन पाई...।



डॉ. (श्रीमती)  अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है। सम्पर्क -
डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई .जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514 दूरध्वनिः + 91-08005313626 ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

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सर्दी का मौसम था। ठण्डी हवा की चुभन हड्डियों तक महसूस हो रही थी। सुबह की बारिश ने गलन को और बढ़ा दिया था।
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