प्रमोशन

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अपनी कोख से बच्चे को जन्म देने से बढ़कर पच्चीस लाख कमाना है

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सोमेश की शादी के दो वर्ष पूरे होते तक मिश्र जी के यहाँ सब कुछ सामान्य हो गया। नूपुर और उसके परिवार वालों के स्वभाव ने मिश्र दम्पत्ति की गैर जाति में संबंध की दुविधा को पूरी तरह दूर कर दिया। अब उन्हें बेटे का नूपुर से विवाह का फैसला सही लगने लगा और साथ ही यह भी महसूस होने लगा कि शायद वे स्वयं इतना अच्छा रिश्ता न खोज पाते। नूपुर सुन्दर और योग्य थी। वह सोमेश की ही कम्पनी में लगभग उसी के बराबर वेतन पर कार्य कर रही थी। इस सबसे भी अच्छी बात यह थी कि उसने पूरे परिवार को किसी भी अक्सर पर अपने गैर जाति होने का एहसास नहीं होने दिया था। सोमेश की माँ शारदा तो इसी से बेहद खुश थी कि बहू रीति-रिवाजों में उनके विचारों को ही अधिक महत्त्व देती है मयके को नहीं। 
सोमेश और नूपुर जब भी घर आते घर में उत्सव का सा माहौल हो जाता। नूपुर विविध प्रकार के व्यंजन बनाती और सबको आग्रह कर खिलाती। जेठानी के बच्चों के साथ खेलती, उन्हें पढ़ाती और कभी-कभी खरीदारी कराने ले जाती। जेठानी से घर के रीति-रिवाजों के विषय में जानकारी लेती रहती और उन्हें निभाने का प्रयास करती। बच्चे उससे खूब खुश रहते। परन्तु बड़ों की संतुष्टि के लिए इतना ही काफी नहीं था। उन्हें अब अगली पीढ़ी का इंतजार होने लगा। नूपुर जब भी घर आती तो शारदा उससे बच्चे के विषय में जिक्र करती। वह हँस कर टाल देती। धीरे-धीरे चार साल बीत गए। आखिर एक दिन शारदा ने सोमेश की उपस्थिति में ही नूपुर से स्पष्ट रूप में कह दिया-”बस मौज मस्ती, घूमना-फिरना बहुत हो लिया तुम्हें अब जल्दी ही बच्चे के बारे में सोचना चाहिए। दिन-दिन तुम लोगों की उम्र बढ़ रही है घट नहीं रही है।“
नूपुर चुप रही। इस बार सोमेश ने माँ की बात का जवाब दिया- ”माँ क्या तुम भी नासमझी की बातें करती हो। अभी शादी का समय ही कितना हुआ है? नूपुर का प्रमोशन ड्यू है। वह तो मिल जाय। यह इन सब झंझटों में लग गई तो समझो प्रमोशन गया हाथ से।“
प्रमोशन का कोई उपाय शारदा देवी के पास नहीं था। अतः उन्हें चुप रह जाना पड़ा। नूपुर का प्रमोशन मिलते-मिलते एक साल और बीत गया। इसी बीच सोमेश ने फ्लैट भी बुक करा लिया। अब तक का सब जोड़ा बचाया उसमें लग गया। उस पर पचास लाख का कर्ज और हो गया। अब जब भी शारदा नूपुर से बच्चे का जिक्र करती तो उसका सीधा सा जवाब होता- ”माँ अभी तो आप जानती हैं हमारे पास कुछ नहीं बचता है।“
सोमेश भी अक्सर तंगहाली और लोन का जिक्र करता रहता। पर शारदा हैरान रह जाती कि इतनी तंग हाली में भी वे खुलकर पैसा खर्च करते हैं। फ्लैट में लकड़ी और फर्नीचर का काम बराबर चल रहा है और वह भी ऊँचें दामों का। शारदा सोचती-पैसा फेंकने के लिए इनके पास खूब है बस औलाद को खिलाने का नहीं है। कैसी अजीब बात है? वे इसकी चर्चा घर के अन्य सदस्यों से करती तो सबकी प्रतिक्रिया अलग-अलग होती। सोमेश के पिता शारदा को सोमेश और नूपुर के निजी जीवन में दखल न देने की सलाह देते और उनका बेटे रमेश सोमेश की आर्थिक मदद कर देने की। एक दिन बड़ी बहू ने भी सकुचाते हुए कहा- ”माँ वे लोग यहाँ आते हैं तब भी घर और बच्चों पर काफी खर्च कर देते हैं। मैं उन्हें हर बार मना करती हूँ। आप भी थोड़ा समझाइए। यहाँ इतने महंगे इन सामानों के बगैर भी काम चल सकता है। बच्चों की कपड़ों और खिलौनों की मांग कभी खत्म नहीं होती है। जितना दिलाओं ये और नया-नया मांगते हैं। ये सब पैसे की बर्बादी है।“
परन्तु शारदा की समझ से वंशवृद्धि का मामला सोमेश और नूपुर का निजी मामला नहीं था। यह पूरे परिवार के लिए चिंता का विषय था। उनकी ममता जरा भी यह स्वीकारने को तैयार नहीं थी कि किसी भी उम्र में कोई इतना निजी मामला हो सकता है कि जिसमें माँ को सलाहकार न बनाया जा सके। फिर भला वे सोमेश और नूपुर को नसीहत देना क्यों बंद कर दें। सोमेश और नूपुर का वेतन सोमेश के पिता की पेंशन और रमेश के वेतन से तीन गुना था साथ ही खर्च कुछ नहीं। अकारण उन्होंनें चार कमरों का घर बनवाया था जो दो का भी बन सकता था। कुछ काम दो चार वर्ष बाद भी किए जा सकते थे उनके लिए कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं थी। सोमेश को कुछ तो घर से सीखना चाहिए था। यहाँ किस तरह दो-दो कमरे बनाते-बनाते मकान बना है। आगे के दो कमरे, गेट और डिजाइन तो अभी दो साल पहले ही पूरा किया गया है। यदि सोमेश के पिता चाहते तो यह खर्च सोमेश पर डाल सकते थे परन्तु उन्होंने बेटों से कुछ नहीं लिया। सब अपने से पूरा कराया। अब यदि सोमेश ने अकारण अपने शौक से लोन लिया है तब उसकी आर्थिक मदद क्यों की जाय और करें भी तो कौन? यहाँ पहले ही उसकी आय की चौथाई आय है। अब रही बात बच्चों पर खर्च करने की तो यह फिजूल खर्जी नहीं है। आज वे इन बच्चों को प्यार देंगे तो कल ये ही उनके सुख दुःख में खड़े होंगे।  
शारदा की जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही थी वैसे ही सोमेश की संतान के विषय में चिंता भी। अब नूपुर का प्रमोशन हुए भी तीन साल बीत गए थे। उन्हें लगने लगा था कि निश्चित ही बहू में कोई कमी है। सोमेश उनसे छिपा रहा है। अतः कुछ समय से वे नूपुर के इलाज और देवी देवताओं की मनौती पर विशेष बल देने लगी थीं। परन्तु कोई सुखद समाचार नहीं मिल रहा था। इसी सब निराशा के बीच एक दिन सोमेश का फोन आया कि जल्दी ही हम भी आपको दादी बनाने वाले हैं। बताओ पोता-पोती क्या चाहती हो। यह सुनकर शारदा देवी प्रसन्न हो गई उनके सिर से एक बड़ा बोझ उतर गया। उन्होंने घर भर को यह समाचार दिया। वे हँसते हुए कह रही थीं-”पगला है। पूछता है पोता-पोती क्या चाहिए? यह क्या उसके हाथ में हैं। यह तो ईश्वराधीन है। घर में खुशी हो यही बड़ी बात है।“
शारदा ने अगले दिन से ही घर में आने वाले नन्हें मेहमान के स्वागत की तैयारियाँ शुरू कर दीं। वे अपने रिश्तेदारों और जान पहचान वालों से फोन पर जानकारी ले रही थीं कि कौन डॉक्टर और अस्पताल बच्चे की पैदाइश के लिए विश्वसनीय है। कहाँ कितना खर्च लगेगा और आजकल क्या नए रिवाज चल गए हैं। कभी वे सोमेश के पिता से पैसों का हिसाब लगाकर रखने को कहती तो कभी बहू से सलाह मशविरा करती। वे बहू को समझाती कि उसे ही सब सम्भालना होगा। इस उम्र में अब उनसे अधिक काम नहीं हो पायगा। शारदा की परेशानी को देखते हुए बहू एक दिन उन्हें हिम्मत बंधाते हुए बोली- ”माँ आप घबराइए नहीं। मैं सब सम्भाल लूंगी। प्रभु सब ठीक ही करेंगे। आप बस यह पता कर लें कि डिलीवरी कब होनी है।“
”जल्दी ही दादी बनने वाली हो। सोमेश ने इतना ही बताया है।“
”बहुत जल्दी में भी अभी पाँच छः महीने का समय लग जाएगा। चार महीने पहले ही तो नूपुर यहाँ आई थी तब ऐसी कोई बात नहीं थी।“
”पर सोमेश ने ऐसा क्यों कहा-हम भी जल्दी ही तुम्हें दादी बनाने वाले हैं।“
”आप नूपुर से ही बात कर लिजिए।“
”यही ठीक है।“
उसी दिन शाम को शारदा ने सोमेश को फोन करवाया और उससे नूपुर से बात कराने को कहा। सोमेश ने बताया कि वह अभी दफ्तर से नहीं आई है। शारदा नाराज होते हुए बोली-”तुम्हें अब उसका ख्याल रखना चाहिए। इतनी देर से दफ्तर से क्यों लौटती है। समय से खाना और आराम इस समय उसके लिए बहुत जरूरी है।“
सोमेश हो-हो कर हँसता रहा और शारदा उसे नूपुर के संबंध में हिदायत देती रही। फिर सोमेश ने अचानक फोन रख दिया। डिलीवरी का सही समय शारदा आज भी न जान पाई। सोमेश उनको टाल गया। दो चार दिन बाद शारदा को फिर जचगी की व्यस्था की चिंता सताने लगी। वे परिवार के सदस्यों से सलाह लेने और उन्हें हिदायतें देने लगी। 
एक सप्ताह बाद सोमेश के पिता बैठे चाय पी रहे थे और शारदा उन्हें समझा रही थी- ”नूपुर के यहाँ आने पर आपको अपना ख्याल खुद रखना होगा। मुझे और बहू को तो और ही बहुत काम होंगे।“
सोमेश के पिता ने आश्वासन देते हुए कहा- ”अभी मैं इतना असहाय नहीं हूँ जितना तुम समझती हो। मैं अपना ख्याल रख सकता हूँ।“
तभी फोन की घंटी बजी और सोमेश ने पिता को खबर दी कि उनका पोता आया है। शारदा ने जानना चाहा कि नूपुर और बच्चा ठीक हैं? सोमेश ने बताया-बिल्कुल ठीक हैं। वे कल घर आ जाएंगे। शारदा ने सोमेश से बात करने के लिए फोन की ओर हाथ बढ़ाया परन्तु फोन कट गया। शारदा कुछ रूष्ट सी बोली ”मेरी बात क्यों नहीं कराई?“
”वह शायद जल्दी में था। इस समय उसे अकेले ही घर बाहर सब सम्भालना पड़ रहा होगा। कल सब घर आ जाएंगे तब बात कर लेना।“ सोमेश के पिता ने समझाया। 
शारदा उठकर बहू के पास चली गई।
शारदा ने घर के अन्य लोगों को खुशखबरी सुनाई। फिर बहू से बोली- ”मेरे जाने की तैयारी करो। मुझे आज रात ही गाड़ी में बिठा दो। कल दोपहर तक पहुँच जाऊंगी। सोमेश अकेला परेशान हो रहा होगा।“
शारदा को नूपुर की नादानी और गैर जिम्मेदारी पर क्रोध आ रहा था। वे अपना सामान जुटाती हुई उसको कुछ-कुछ कह रही थी। वे बड़ी बहू की नासमझी पर भी झुझलाती सी बोली- ”बड़ी होकर तुम सही जानकारी भी नहीं रख सकती हो। कल ही हिसाब लगा रही थीं अभी पाँच, छः महीने का समय है।“
”मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है माँजी।“ बहू ने धीरे से कहा।
अपर्णा शर्मा
शारदा देवी के जाने की तैयारी होने लगी। बच्चे घर में छोटे भाई के आने से बेहद उत्साहित थे। वे दादी के साथ चलने की जिद्द कर रहे थे। शारदा उन्हें प्रलोभन देकर घर पर ही रूकने के लिए समझा रहीं थी। आखिर में नन्हें भाई को जल्दी ही उनके पास ले आने की बात पर मामला शांत हो गया। शारदा अपना सामान व जच्चा-बच्चा के लिए आवश्यक चीजें बटोरने लगी। बहू उनकी मदद कर रही थी। सोमेश के पिता पण्डित जी से पत्री बनवाने की फिक्र कर रहे थे। शारदा बोली- ”पहले ठीक से समय तो पता करो पत्री तो तब ही बनेगी। मैं कल पहुँचकर पूरी जानकारी बता दूंगी। आज मेरे जाने की तैयारी करो।“
शाम को रमेश के घर आने पर समाचार मिला वह भी खुश हो गया और माँ के साथ जाने के लिए तैयार भी। माँ की अवस्था के बहाने वह भाई की खुशी में जल्दी से जल्दी शामिल होना चाहता था। अतः रमेश और शारदा रात की गाड़ी से रवाना हो गए। 
अगले रोज रमेश और शारदा चार घंटे देरी से पहुँचे। संध्या का धुधलका घिरने लगा था। हल्की ठण्ड भी हो गई थी। वे टैम्पू से उतरे तो सोमेश सामने क्यारी में पानी लगाता नजर आया। रमेश और शारदा उसकी ओर बढ़े वह अनजान सा उसे रेख रहा था। करीब पहुँचने पर सोमेश उन्हें पहचानकर माँ कहता हुआ उनकी ओर आया। उन्हें अचानक आया हुआ देखकर वह कुछ अचंभित था। बोला- ”भैया आप लोग अचानक! फोन तो कर देते।“
”जब आ ही रहे थे तो फोन की क्या आवश्यकता थी। तुम अचानक काम छोड़कर स्टेशन भागते।“ रमेश ने उसे प्यार भरी झिड़की देते हुए कहा। 
शारदा भी बनावटी गुस्से से बोली- ”घर में इतना काम है और तुझे इस समय भी फूल पत्तियों की चिंता सता रही है।“
सोमेश जोर से हँसा। सब घर में आ गए। 
नूपुर रसोई में शायद चाय बना रही थी। उसने आकर शारदा और रमेश के पैर छुए। वे सोफे पर बैठ गए। शारदा नूपुर को आश्चर्य से देखती हुई बोली- ”तुम रसोई में क्या कर रही हो? बच्चा कहाँ है?“
नूपुर ने हँसकर कमरे की ओर इशारा करते हुए कहा- ”वहाँ मम्मी के पास।“
शारदा ने- ”हूँ।“ कहा और रमेश की ओर थोड़ा रहस्यमयी नजरों से देखा। जिसका अर्थ शायद यही था कि यहाँ सब इंतजाम पहले से ही दुरूस्त है इसीलिए हमारा आना अचानक लग रहा था। वे नूपुर से बोली- ”जाओ तुम आराम करो।“
सोमेश हँसकर बोला- ”हाँ, हाँ जाओ तुम आराम करो।“
नूपुर कमरे में चली गई। सोमेश ने उन्हें पानी दिया। कुछ देर बाद शारदा ने हाथ पैर धोए। वे कमरे में बच्चे के पास जाने के लिए बढ़ी। तभी नूपुर उसे गोद में लेकर उनके पास आ गई और बच्चे को शारदा की गोद में देते हुए बोली-”लिजिए, सम्भालिए इसे।“
शारदा बच्चे को गोद में लेकर गौर से देखने लगी। वे अपनी अनुभवी निगाहों से उसके नाक-नक्स, हाथ-पैर और वर्ण को जाँच रही थीं। नूपुर बाथरूम से कपड़े उठाकर फैलाने लगी। नूपुर की मम्मी भी कमरे से निकल कर शारदा को नमस्कार कर उनके पास आ गई। शारदा का आश्चर्य बढ़ता जा रहा था। रमेश भी असमंजस में था। वहाँ जचगी जैसे कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे थे। नूपुर एकदम सामान्य पहले जैसी चुस्त-दुरूस्त हँसती और काम करती नजर आ रही थी। शारदा ने बच्चे को एक नजर फिर गौर से देखा। उसकी सूरत एक दिन के शिशु जैसी नहीं थी। वह कुछ सप्ताह का लग रहा था। शरदा परेशान सी कभी नूपुर कभी उसकी मम्मी और कभी सोमेश को देख रही थी। सोमेश कुछ रहस्यमयी हँसी बिखेरता हुआ माँ के चेहरे पर आते-जाते भावों को देख रहा था। वह नूपुर की ओर मुस्कुराता हुआ संकेतों से उसे माँ की स्थिति बता रहा था। नूपुर भी मुस्कुरा रही थी। अचानक शारदा के दिमाग में कुछ विचार कौधा। उसने सोमेश की ओर देखा और सबकी चुप्पी तोड़ते हुए शारदा के मुँह से निकल गया- ”क्या यह तुम्हारा बच्चा है?“
सोमेश ठहाका लगाकर हँस पड़ा। उसी के साथ नूपुर और उसकी मम्मी भी। सोमेश ने कहा- ”हाँ माँ यह शतप्रतिशत हमारा ही है। हम आज सुबह ही इसे घर लाए हैं। हमने इसे गोद लिया है।“ 
शारदा के चेहरे पर दुःख और क्रोध के भाव एक साथ उभर आए। उनका संदेह सत्य में बदल गया था। बच्चे को कसकर छाती से चिपकाने वाली बाहों की पकड़ धीमी पड़ गई। उन्होंने एक बार रमेश और नूपुर की ओर देखा फिर निगाहें सोमेश पर जमा दी। सोमेश की हँसी गायब हो गई थी। शारदा देवी का गंभीर स्वर सुनाई दिया- ”तुमने इतना बड़ा फैसला अकेले ही ले लिया?“
सोमेश को कुछ जवाब न सूझा। रमेश ने उसका बचाव किया- ”माँ सोमेश अब अकेला नहीं है। नूपुर की सहमति भी उसके साथ है और दोनों को अपनी गृहस्थ के बारे में फैसला लेने का अधिकार है। आप इतनी परेशान क्यों है?“
शारदा देवी ने रमेश को डपटते हुए कहा ”तुम अभी चुप ही रहो।“ वे नूपुर और उसकी माँ की ओर देखकर बोली- ”आपने भी इन बच्चों को यह क्या नादानी भरी सलाह दे दी है। आपकी बेटी में कोई कमी थी तो हम इलाज करा लेते।“ नूपुर की माँ इस अप्रत्याक्षित हमले से थोड़ा सकपका गई। परन्तु शीघ्र ही सम्भलकर बोली- ”यह मेरी सलाह नहीं है। इन लोगों का अपना फैसला है। नूपुर मेरी तो इकलौती सन्तान है। इसके बच्चे का मुझे आपसे अधिक इंतजार था। फिर भी मैं इनके निजी मामलों में इतना हस्तक्षेप नहीं करती हूँ जितना आप कर रही हैं। रही बात नूपुर में कुछ कमी की तो मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि वह पूर्ण स्वस्थ है और वह जो फैसला लेती है उस पर काम करती है। मुझे रात ही इसने फोन पर बताया और मैं इसके फैसले को सहमति देने ही आज सुबह यहाँ पहुँची हूँ।“ इतना कहते-कहते नूपुर की माँ की सांस तेज चलने लगी। 
उधर शारदा देवी भी मुँह दूसरी ओर घुमाए गहरी सांस ले रही थी। नूपुर की माँ की बात खत्म हुई तो शारदा देवी ने सोमेश से नाराजगी और उलाहनें भरे शब्दों में कहा- ”तुमने अपनी माँ को बताने की जरूरत भी महसूस नहीं की। अपना खून अपना होता है सोमेश। तुम्हें एक बार विचार लेना चाहिए था।“
सोमेश अभी तक हतप्रभ सा खड़ा था उसे माँ के यूँ दुःखी हो जाने का तनिक भी अंदाज नहीं था। वह तो आज तक यही मान रहा था कि इस शुभ समाचार से माँ खुश हो जाएगी। पिता उसे आशीर्वाद देंगे। माँ के लिए गोद लिए या अपने जन्में बच्चे में इतना अंतर हो सकता है यह तो उसने सोचा ही नहीं था। माँ को समझाते हुए सोमेश ने नूपुर की ओर इशारा कर कहा- ”माँ यह मेरा और नूपुर का इकट्ठा फैसला है। ऐसा नहीं है कि हमने किसी शारीरिक कमी या मजबूरी में यह फैसला लिया है वरन् सब कुछ सामान्य होते हुए ही हमने ऐसा किया है। जरा सोचो-एक बच्चे की परवरिश में नूपुर के कम से कम दो साल लग जाते। दो साल में जब यह पच्चीस लाख कमा सकती है तो दो लाख में बच्चा ले लेना क्या घाटे का सौदा है? आप अकारण दुःखी हो रही हैं। अपना खून पराया खून ये सब दकियानूसी बातों में उलझने का समय हमारे पास नहीं है।“
शारदा देवी ने सोमेश को अपने सामने इतनी दृढ़ता से बोलते हुए पहली बार देखा था। उनके मुँह से गहरे दुःख के साथ निकला- ”बच्चे की पैदाइश एक सौदा भर है तुम लोगों के लिए। अपनी कोख से बच्चे को जन्म देने से बढ़कर पच्चीस लाख कमाना है...।“

यह कहानी अपर्णा शर्मा जी , द्वारा लिखी गयी है . डॉ0 (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ0 शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह  आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।
संपर्क सूत्र - डॉ0 (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, ”विश्रुत“, 5, एम.आई.जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ0प्र0), पिनः 211004, दूरभाषः 91.0532.2542514,M: +918005313626 ईमेल - draparna85@gmail.com

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  1. आपकी कहानी अत्यंत मार्मिक, हृदय स्पर्शी है एवं आज के समाज का वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करती है, ऐसी उत्कृष्ट रचना हेतु आपको बधाई।

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