शिवराम दत्तात्रेय फडणीस

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मुम्बई से पढ़ाई खत्मकर फड़नीस पुणे आए. वहां उनकी मुलाकात ‘हंस प्रकाशनी’ के संपादक अनंत अंतराकर से हुई. दोनों की यह जुगलबंदी फड़नीस के कैरियर के लिए काफी लाभदायक साबित हुआ. 1951 में पत्रिका ‘हंस प्रकाशनी’ के लिए ही उन्हें पहला व्यंग कार्टून बनाने का मौका मिला. फड़नीस पत्रिका, पुस्तक, प्रकाशन की चाहर दीवारी में पांव रख चुके थे और शोहरत ने खुद उनका दरवाजा खटखटाया.


दत्तात्रेय फड़नीस
|| मृणाल चटर्जी ||
Translated from original English by Itishree Singh Rathaur

बहुत ही अनोखे थे उनके कार्टून जिनमें न राजनीतिक छाप थी और न ही कार्टून के नीचे व्यंग के रूप में शब्दों की उपस्थिति. सिर्फ चित्र और चरित्र. इसलिए सभी भाषा की सीमाओं को लांघ कर दत्तात्रेय फड़नीस के कार्टूनों ने हर वर्ग से प्रशंसा ही बटोरी. हर इलाकों में लोगों को बेहद हंसाया उनकी कार्टूनों ने. इन सभी के बीच समाज की अंधेर गलियों में अपनी जिंदगी का गुजारा करने वाले लोगों की मार्मिक चीख को भी भाली  भंती कार्टूनों के माध्यम से घर-घर तक पहुंचाने की कोशिश की फड़नीश ने.
फड़नीस ने कभी भी राजनीति को अपने कार्टूनों में जगह नहीं दी, बल्कि समाज के ऊंचे तबके को लेकर कार्टूनों का अलग संसार बनाया जिनमें जिंदगी से हारे हुए इंसान की तकलीफों को उन्होंने बखूबी दर्शाया. उनके सभी प्रकाशन शब्दविहीन हैं .
फड़नीस का मानना है कि अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं है. यह काम तो रंग-बिरंगे चित्र ही कर सकते हैं. चित्रों को अगर सही तरीके से दर्शाया जाए तो लोग उसमें छुपे संदेश आसानी से समझ सकते हैं. बस यह भावना ही उनकी प्रेरणा है. इसलिए वे शब्दविहीन कार्टून बनाते हैं.
फड़नीस का जन्म महाराष्ट्र के बेलगांव अंतर्गत भोज गांव में 29 जुलाई 1925 को हुआ था. मुम्बई की प्रसिद्ध जेजे स्कूल आफ आर्टस से फड़नीस ने डिप्लोमा की डिग्री हासिल की. इसके बाद कार्टून बनाना उनके लिए जैसे एक नशा ही बन गया.
मुम्बई से पढ़ाई खत्मकर फड़नीस पुणे आए. वहां उनकी मुलाकात ‘हंस प्रकाशनी’ के संपादक अनंत अंतराकर से हुई. दोनों की यह जुगलबंदी फड़नीस के कैरियर के लिए काफी लाभदायक साबित हुआ. 1951 में पत्रिका ‘हंस प्रकाशनी’ के लिए ही उन्हें पहला व्यंग कार्टून बनाने का मौका मिला. फड़नीस पत्रिका, पुस्तक, प्रकाशन की चाहर दीवारी में पांव रख चुके थे और शोहरत ने खुद उनका दरवाजा खटखटाया.
फड़नीस की ‘चित्रहास’ ने दुनिया के हर कोने में लोगों को हंसाया. कार्टून के बारे में लोगों को बताया. कैसे मन के आक्रोश को कागज पर कार्टून के रूप में उतारा जाए. आडियों-विजूवल को लेकर चित्रहास एक कल्पना है जो शब्दों से परे है. भारत के कई शहरों में इसका प्रदर्शन हुआ. यहां तक कि अमेरिका और इंग्लैंड में भी यह काफी प्रसिद्ध हुआ. उनके कार्टून इंटरनेशनल सेलून आफ कार्टून्स में प्रदर्शित हुए. कनाडा व जर्मनी में विश्वविद्यालय अनुदान(यूजीसी) की सहायता से आर्ट आफ कार्टूनिंग पर राष्ट्रीयस्तर पर कुछ धाराओं का भी प्रदर्शन हुआ.
वर्ष 2006 को फ्रांकपर्ट में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में उन्होंने अतिथि के रूप में हिस्सा लिया था. कार्टून्स फ्रॉम इंडिया कार्यक्रम के लिए उनको निमंत्रण मिला था. उनका कार्टून लाफिंग गैलरी का भारत में बहुत बार प्रदर्शन हुआ. इनसे उन्होंने लोगों को खूब हंसाया. केवल चित्र और चरित्र के समाहार से बने कार्टून ने सभी को आत्मविभोर कर दिया. मुम्बई, बेंगलुरू, नई दिल्ली, हैदराबाद, पुणे से लेकर विदेशों में न्यूयॉर्क, लंदन आदि शहरों में उनके कार्टूनों को बेहद सराहा गया.
सफलता
फड़नीस की कार्टूनों पर कई पुस्तकों का प्रकाशन हुआ जैसे मिस्कील गैलरी, लाफिंग गैलरी, लिटिल गैलरी आदि. कार्टून बनाने की कला व कुशलता के विषय में उन्होंने फेटिंग फार चिल्ड्रेन एंड आई-1, फेटिंग फार चिल्ड्रेन एंड आई-2 पुस्तकों में लिखा. इसमें कार्टून बनाने की कला का बखूबी वर्णन किया गया है. आश्चर्य की बात यह है कि व्यंग व हास्यरस के इंसान फड़नीस कठिन गणित, वाणिज्य, औषधी, विधि, दर्शनशास्त्रों की पुस्तकों के लिए भी कार्टून बनाए हैं.

सम्मान
कार्टून जगत ने फड़नीस को बहुत से सम्मानों से नवाजा है. वर्ष 2000 में उन्हें मार्मिक पुरस्कार और रवि परांजपे फाउंडेशन अवार्ड से नवाजा गया. बेंगलुरू में स्थित भारतीय व्यंगचित्र संस्थान ने उन्हें व्यंग जगत में महत्वपूर्ण योगदान के लिए वर्ष 2001 में लाइफ टाइम एचिवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया. पुस्तक रेस्तान के लिए उन्हें वर्ष 2012 में महाराष्ट्र साहित्य परिषद पुरस्कार से नवाजा गया.
व्यक्तिगत जीवन
फड़नीस ने शकुंतला से विवाह किया जिनसे उन्हें दो बेटियां लीना और रूपा हुईं. पुणे में उनका अपना स्टूडियो है. शंकुलता फड़नीस खुद एक लेखिका हैं. वे फड़नीस की लाफिंग गैलरी भी संभालतीं हैं


Translated from original English by Itishree Singh Rathaur.                                                                      
    E-mail: itishree.singhrathaur@gmail.com)
About the Author: A journalist turned media academician Dr. Mrinal Chatterjee presently heads the Eastern India campus of Indian Institute of Mass Communication (IIMC), located at Dhenkanal in Odisha. Besides writing on media and communication, he also writes fiction and column in English and Odia in several publications and websites.   E-mail: mrinalchatterjee@ymail.com                                                                                               


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