मंजुला पद्मनाभन

SHARE:

कार्टून को कला का नतीजा माना जा सकता है. कार्टून चरित्र सुकी को घर-घर पहुंचाने वाली मंजुला पद्मनाभन को देखने के बाद रविशंकर ने यह उल्लेख किया था

मंजुला पद्मनाभन, जिसने वसूलों से नहीं किया कभी समझौता

 मूललेख डाक्टर मृणाल चटर्जी
अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद इतिश्री सिंह राठौर

कार्टून को कला का नतीजा माना जा सकता है. कार्टून चरित्र सुकी को घर-घर पहुंचाने वाली मंजुला पद्मनाभन को देखने के बाद रविशंकर ने यह उल्लेख किया था. भारत कार्टूनिंग की दुनिया में पुरुषों का दबदबा रहा. कुछ महिलाओं ने इस कला में अपने हाथ आजमाने की कोशिश की और कम ने ही उत्कृष्ट प्रदर्शन किया. मंजुला पद्मनाभन ने केवल इस कला में प्रवेश ही नहीं  किया है बल्कि दूसरे के लिए मील का पत्थर खड़ा किया.

 कईं प्रतिभा की धनी मंजुला
मंजुला पद्मनाभन का जन्म 1953 को हुआ. वह एक नाटककार, पत्रकार, कॉमिक स्ट्रिप कलाकार, कथा लेखक औरबाल किताब लेखक है. उन्होंने बच्चों में 21 किताबें में सचित्र बनाए तथा  पायनियर में सुकी की लंबी सिरीज चलाई. इससे पहले 1982 से 1986 तक उन्होंने संडे आॅब्जर्वर में डबल टॉक शीर्षक से एक कार्टून स्ट्रिप चलाया. 76 देशों के 1470 प्रविष्टियों में आनासीस पुरस्कार के लिए उनकी नाटक हार्वेस्ट को चुना गया. हार्वेस्ट शरीर के अंगों की बिक्री व  विकसित तथा विकासशील देशों के बीच की गाथा थी.  यह गोविंद निहलानी द्वारा फिल्माया गया. उन्होंने लाइट्स आउट (1984), हिडन फायर (राशि बन्नी द्वारा प्रदर्शित) आर्टिस्ट मॉडल (1995) और सेक्सटेट (1996) जैसे नाटक लिखे. 

कार्टूनिस्ट के रूप में बनाई पहचान
नाटक में अधिक ध्यान केंद्रीत करने से पहले वह बेहतर कार्टूनिस्ट के रूप में जानी जाने लगी.अग्रेजी दैनिक पायनियर में उनकी कार्टूनों का प्रकाशन होने लगा. कार्टून चरित्र सुकी ने शिष्ट औरत के रूप में एक प्रतिष्ठित दर्जा हासिल किया है.  डबल टॉक के संदर्भ में एक समीक्षक ने कहा कि मंजुला पद्मनाभन के कार्टून चरित्र सुकीमें सबसे अच्छी चीजें यह की कि यह एक बेतुके इंसान को भी बेतुकी बातों पर हंसने को मजबूर करती है. सुकी का चरित्र  पुरषों के सत्ता में संघर्ष कर अपना अस्तित्व कायम रखने वाली  उत्साही शहरी भारतीय महिला है. हमारी और आपकी तरह सुकी सभी मुश्किलों के बीच  दुनिया को समझने की कोशिश करती है. तमाम बदत्तर हालातों के बावजूद वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती है. वह ईश्वर, अपने अस्तित्व, प्रतिकार, दंड और पुरस्कार के संदर्भ में मंथन करती है.

 वसूले से समझौता नहीं
 हम कितनी बार अपने फोन को देखते हैं और रिंग करने की इच्छा जाहिर करते हैं? सुकी सिर्फ इसे सम्मोहित करने की कोशिश नहीं करती बल्कि वह फोन की दुनिया से उपर उठना चाहती है.कितनी बार केवल माचिस के डिब्बों को ढूंढने के लिए हम अपने पर्स को खाली कर देते हैं ? कितनी बार हम सभी पर कई कारणों से चीख देते हैं? सुकी अपना कॉन्टैक्ट लेन्स खो चुकी है. इसका गुस्सा अपने बायफ्रेंड पर निकालती है. उसके साथ ही उसके साथ गगनभेदी चुप्पी सारी दास्ता बयां करती है.  उसके जीवन में भी दूसरों की तरह खुशी, निराशा, ऊब है. सुकी को पढ़ते हुए कुछ पाठकों ने सुकी में नाच, गाने, रोमांस तथा गंदे चुटकुलों की मांग की. उन्हें जवाब देते हुए मंजुला ने कहा कि ‘मैं देह व्यापार का हिस्सा नहीं बन सकती. मैं अपने शरीर को नहीं बेच सकती तथा अपने  सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकती’.

 सुकी को मार देना बेहतर
1953 में एक राजनयिक परिवार में दिल्ली में जन्मी मंजुला को किशोरावस्था में ही बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया. वह दिल्ली, स्वीडन, पाकिस्तान और थाईलैंड में पली बढ़ी. सिर्फ 17 में भी उनकी पहली कार्टून का प्रकाशन हुआ. वह जब इतिहास में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही थी तभी से लगातर उनकी कार्टूनों का प्रकाशन होने लगा.  इसके बाद वह  मुख्यधारा में शामिल हुई. अखबारों में स्तंभ लिखने के अलावा उन्होंने क्लेपटोमानीया नामक ँॅेपुस्तक में लघु कथाओं का संग्रह प्रकाशित किया. उनकी कथाओं में हास्यरस की भावन भरी होती. उनकी अन्य सचित्र किताबें हैं आईएम डिफरेंट!  केन यू फाइंड मी? (2011), आनप्राइसलेस! (2005), ए विजीट टु सिटी मार्केट न्यू दिल्ली(1986)समेत कई किताबों के लिए उन्होंने सचित्र बनाए.
2008 में प्रकाशित उनकी कताब एस्केप वास्तविकता और अनुभव को भूगोल से ज्यादा महत्वपूर्ण मानती है. मंजुला ने 90की दशक के अंत में सुकी को साकार रूप देना छोड़ दिया.
इतिश्री सिंह
उन्होंने आउटलुक में प्रकाशित(1नवंबर,2000) निबंध स्ट्रीप स्कीन में लिखा कि लोग हमेशा यह पूछते हैं क मैंने  कॉमिक स्ट्रिप क्यों बंद कर दिया लेकिन बेहतर सवाल यह होता कि वे लोग पूछते कि इनका प्रकाशन कैसे हो रहा था? ऐसी संस्कृति जहां  लड़की के जन्म को आपदा से कम नहीं समझा जाता तथा  नववधूओं की नृसंशता से हत्या कर दी जाती है वहां एक अजीब, फजी बालों वाली लड़की की क्या जगह है जिसका बेस्ट फ्रेंड मेंढक हो और देर से सोना जैसे उसकी पसंद. अगर वह एक मॉडल-अभिनेत्री-एयरहोस्टेस, एक परिश्रमी माँ या हाट पेंट पहनने वाली आइटम जैसी लड़की होती तो शायद आज उसे बाजार में खड़ा कर दिया जाता लेकिन सुकी दबावों में जीने वाली लड़की नहीं थी जो मजबूरन समाज के थोपे गए वसूलों को स्वीकारती इसीलिए उसे मार देना ही बेहतर था.


यह लेख मूल रूप से डॉक्टर मृणाल चटर्जी ने लिखा है . इसका अनुवाद  इतिश्री सिंह राठौर जी द्वारा लिखा गया है . वर्तमान में आप हिंदी दैनिक नवभारत के साथ जुड़ी हुई हैं. दैनिक हिंदी देशबंधु के लिए कईं लेख लिखे , इसके अलावा इतिश्री जी ने 50 भारतीय प्रख्यात व्यंग्य चित्रकर के तहत 50 कार्टूनिस्टों जीवनी पर लिखे लेखों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया. इतिश्री अमीर खुसरों तथा मंटों की रचनाओं के काफी प्रभावित हैं.

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका