पत्रकारिता और भाषा

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पत्रकारिता समाज का एक ऐसा विभाग है जिसमें दैनंदिन पिछले 24 घंटो के विभिन्न घटनाओं का उल्लेख होता है.

पत्रकारिता और भाषा
पत्रकारिता समाज का एक ऐसा विभाग है जिसमें दैनंदिन पिछले 24 घंटो के विभिन्न घटनाओं का उल्लेख होता है. पत्रकारिता मौखिक लैखिक व द्रैश्यिक तीनों तरह की होती हैं. रेड़ियो पर केवल खबरों की मौखिक जानकारी मिलती है और अखबारों में कुछ चित्रों में और कुछ लिखित जानकारी होती है. टी वी में में चलचित्रों सहित विस्तृत द्रैश्यिक जानकारी होती है. पर सँजोने के लिए अखबार सबसे आसान तरीका है. 
घटनाओं का विवरण देने के लिए भाषा की जरूरत होती है. विवरण देने वाले को भाषा  पर पकड़ होना जरूरी है ताकि वह घटना को आसानी से, कम से कम शब्दों में सँजो सके. भाषा सौम्य और सभ्य होनी चाहिए और समाज के बहुत बड़े तबके को समझ में आनी चाहिए. इसमें शालीनता भी अत्यंत आवश्यक अंग है. पढ़े लिखे लोग तो थोड़ी बहुत इधर उधर भी समझ ही जाते हैं किंतु कम - पढ़ों (अनपढ़ नहीं) को कुछ स्थानीय भाषा का पुट भी चाहिए. कुछ प्रमुख विषयों पर संपादक अपनी राय संपादकीय में देते हैं और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के लेख व आलेख खास विषयों पर दिए जाते हैं ताकि समाज को उस विषय के बारे में विस्तृत जानकारी दी जा सके. 
कुल मिला कर पत्रकारिता के लिए संपादक को घटनाओं के अलावा भाषा पर विशेष ध्यान देना होता है. अलग - अलग घटनाओं को भाषा में पिरोना व उसे संपादित करने के लिए, विषय विशेष से संबंधित पदावली की जानकारी वाले शख्स भी तो चाहिए. इसी खासियत के कारण समाचार पत्रों को भाषा का एक स्तंभ माना जाता था. करीब 50 वर्ष पूर्व जब एक जानकार के घर में जब दो रिशतेदारों के बीच भाषा की पकड़ पर जिरह हुआ कि कौन बेहतर है – बड़ों ने दोनों को पुराने अखबार की प्रतियों से एक ही अंश के हर शब्द के प्रयुक्त अर्थ का समानार्थी लिखने को कहा. साथ में हिदायत दी कि शब्द जितनी बार आएगा, उतनी बार उसका वह अर्थ लिखा जाए, जिसके लिए वह प्रयुक्त हुआ है क्योंकि अनेकार्थी शब्द भी होते हैं. जिसको ज्यादा शब्दों के सही अर्थ पता थे, उसकी पकड़ को ज्यादा आँका गया. कहने का तात्पर्य यह कि उस जमाने में भी भाषा के मानकीकरण के लिए अखबार की तरफ देखा जाता था. आज अखबारों की भाषा का स्तर कम गया है, फिर भी साधारणतया देखा जाए तो अखबार जन साधारण से तो बेहतर भाषा ही देते हैं.  
ऐसे में जब विभिन्न घटनाओं को विस्तृत रूप में वर्णन करते हैं तो ऐसे बहुत से मौके आते होंगे जहां नए हालातों के लिए नए शब्द खोजने पड़ते होंगे. इसी तरह प्रयोग में लाए गए ये शब्द, धीरे धीरे प्रचलन में आते हैं और कुछ समय बाद भाषा में अपना लिए जाते हैं. इससे भाषा भी समृद्ध होती रहती है. इसी लेख के शुरु में प्रयोग किया गया शब्द “द्रैश्यिक” बहुत ही कम उपयोग किया जाता है.
शब्दों को प्रचलित करने में पत्रकारिता का बडा ही महत्व है. क्रिकेट की शब्दावली के लिए क्रिकेट कामेंट्रेटर को बहुत छूट या कहें मौके होते हैं. नए ए शाट खेले जाते हैं और नई तरह की बौलिंग की जाती है तो उनके लिए नए शब्दों को लाना ही पड़ेगा. पहले पहल तो विस्तृत विवरण दिया जा सकता है किंतु कुछ एक अंतराल के बाद उसके लिए कोई उचित शब्द तो गढ़ना ही होगा. आज से 25-30 बरस पहले दूसरा नामका को कोई भॉल होता ही नहीं था. पहली बाकर यॉर्कर भागवत चंद्रशेखर की बॉल पर सुना था.बाउंसर पहले भी थए किंतु हेजिंग अहभ आई है. इस तरह हर खेल में और जीवन की हर विधा में नए नए परिवर्तनों की वजह से नए शब्दों को लाना ही पड़ता है. इस मकसद से पत्रकारिता में भाषा का विकास बहुत अच्छी तरह संभव है.
यदि पत्रकारिता में भाषा का ध्यान न रखा गया, तो पत्रकारिता ही खराब हो जाती है. इसलिए पत्रकारों को भाषा पर विशेष ध्यान भी देना पड़ता है. मुसीबतें के साथ खुशीबतें और गलतफहमी को साथ सहीफहमी या खुशफहमी, दुखफहमी इत्यादि शब्द तो हो ही सकते हैं उनका प्रयोग में न आना आश्चर्यकारक लगता है. शब्दों के अर्थों में जाएं तो लगता है कि फहमी यानी एक प्रकार का विश्वास हो जाना. गलत फहमी यानी गलत विश्वास हो जाना जैसे “ सॉरी, मुझे गलत फहमी हो गई थी कि वह तुम्हारी बीवी है.”
एक जमाना था जब पत्रकारिता की भाषा को साहित्य का एक स्वरूप माना जाता था. बहुत बार तो पत्रकारिता में प्रयुक्त नए शब्द या शब्द युग्म आधुनिक भाषा की नींव बनते हैं. नई तरह के घटना के रूप में विवरण के लिए नए शब्द बना लिए, तो अगली बार के लिए आसान हो जाता है. यही शब्द जब जन साधारण में चला जाता है तो वहीं भाषा का अंग बन जाता है.
समाचार पत्र हर दिन प्रकाशित होता है और उसमें बिना किसी प्रतिबंध के हर तरह की खबरें छपती हैं इसलिए विषयों की भरमार होती है. आए दिन की घटनाओं को नए तरह से पेश करने के लिए साहित्य में पकड़ तो होनी ही चाहिए ताकि विवरण दिलचस्प और सटीक भी हो. ऐसी हालातों में नए परिस्थितियों में नए शब्दों की आवश्यकता होती है, और तदनुसार शब्द गढ़ लिए जाते हैं. अन्यथा वही भाषा वही विवरण से लोग पक जाते हैं. अखबार की भी साख कमने लगती है. इस तरह पत्रकारिता में भाषा को धनी बनाने के असंख्य अवसर होते हैं. किंतु आज की पत्रकारिता को देखने से पता लगता है कि प्रकाशक या संपादक खर्च कम करने के लिए अनुपयुक्त कामगारों को रखकर निचली श्रेणी की भाषा में खबर परोस देता है. उसे शायद एहसास नहीं होता कि कुछेक दिन के लिए तो ठीक है किंतु लंबे समय में यह घाटे का ही सौदा साबित होता है.
आज की पत्रकारिता में अधिकतर खरोंचने और भड़काने वाली भाषा का प्रयोग होता है. 30-35 साल पहले चंड़ीगढ़ से प्रकाशित (पं जगतनारायण जी का) पंजाब केसरी ही ऐसी खबरों की भाषा का प्रयोग करता था. जैसे -   “बस सड़क से उतरी और घर में घुसी”.  आज कल यह आम बात हो गई है. खबर होगी – “हिंदू ने मारी टक्कर – दो मुसलमान मौके पर ही मारे गए”. सीधी सादी खबर है कि वाहन के टकराव से दो व्यक्ति मारे गए. असमें हिंदू या मुसलमान होने की बात कहकर अखबार वाला क्या कहना चाहता है?  या फिर “पाकिस्तान का विमान गुरुद्वारे पर गिरा”. ऐसी खबरें माहौल को खराब करने के अलावा और कुछ नहीं करती. अखबारों का काम खबर देना है, भड़काना नहीं. लगता है नेताओं का काम अब अखबारों ने ले लिया है.
हाल ही में बंग्लादेश से क्रिकेट में मिली हार के बाद अखबारों में – भारतीय खिलाड़ी आधे मुंडे सर के साथ दिखाए गए और केप्शन लिखा – “स्टेडियम के बाजार में मुर्तिजर ब्लेड भी मिलते हैं”. कितना घिनौना था यह मजाक. लेकिन तकलीफ तभी होती है जब हम पर कोई वार करता है. जब हम वार करते हैं तो मजा ही आता है, उनके तकलीफ की तरफ तो हमारी सोच जा ही नहीं सकती. हमारी मानसिकता ही ऐसी हो गई है.
हममें इंसानियत का नाता भी बचा नहीं रह गया है. इन दिनों बेगलूरू में SHE transport शुरु की गई है. पता नहीं कहाँ दुबक गए वे जो नारी उत्थान की बात करते अनथके कहते हैं कि आज नारी को किसी प्रकार का आरक्षण नहीं चाहिए, किसी प्रकार की विशेष सुविधा नहीं चाहिए. किसी भी विधा में देखिए, वह हर नर के समकक्ष नहीं तो आगे व ऊपर खड़ी है. “चित भी अपना, पट भी अपना और अंटा मेरे बाप का” –  कहावत सोलह आने सच साबित हो रही है. और इसी तरह अखबार वाले भी सरकार व समाज के उन्ही लोगों के साथ हाँ में हाँ मिलाते चापलूसी करते नजर आते हैं. चलो कुछ लोग तो करेंगे ही, लेकिन यहाँ तो ढर्रा ही हो गया है. इन सबके बाद भी, भाषा की शैली पुराने घिसे पिटे शब्दों मे ही हो रही है. नए मौके हैं, नई पीढ़ी है. नए इरादे हैं . उन सबके साथ भाषा का नवीनीकरण भी तो हो सकता है.
अखबारों में लिपि की गलतियाँ तो इतनी होती हैं कि कोई सीखे भी तो इनसे क्या सीखे
एम.आर.अयंगर
यह बात सही है कि समाचारों को सब तक पहुँचाने के लिए साहित्यिक भाषा का प्रयोग नहीं हो सकता. इसके लिए रोजमर्रा की बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग करना पड़ेगा. किंतु उस रोजमर्रा की भाषा का भी तो उत्थान हो सकता है. साहित्यिक न सही , सही भाषा तो लिखी जा सकती है. इसका यह भी तो मतलब नहीं कि बुद्ध जीवी अखबार पढ़ना ही छोड़ दे. उनके लिए भी तो कुछ हो. पहले अखबारों में संपादकीय पृष्ठ बुद्ध जीवियों के लिए होता था. होता तो अब भी है किंतु फर्क इतना जरूर हो गया है कि कुछ विशिष्टों को छोड़कर साधारणतः संपादकीय पृष्ठ की भाषा ही कमजोर हो गई है. विषयों का चयन भी कमजोर हो गया है. और इसीलिए लोगों में भाषा की उन्नति का रास्ता भी बंद हो गया है. स्कूल कालेज की पढ़ाई, वह भी भाषाओं के बारे में – क्या टिप्पणी करें. विषयों में ही बच्चे बिना ट्यूशन के पास नहीं हो पाते.
खैर लगने लगा है कि लेख भी विषय से भटकने लगा है. साराँशतः कहना यही है कि अखबारों की सामर्थ्यता बढ़ाई जाए. उनके अवमूल्यन पर ध्यान दिया जाए. ताकि भाषा के इस स्तंभ को पिनर्जीवन मिल सके और भा, के विद्यार्थी अखबारों के सहारे परानी तरह से खबरों की जानकारी लेते हुए नई भाषा से भी मुखरित हो सके.


यह रचना माड़भूषि रंगराज अयंगर जी द्वारा लिखी गयी है . आप इंडियन ऑइल कार्पोरेशन में कार्यरत है . आप स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत है . आप की विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन पत्र -पत्रिकाओं में होता रहता है . संपर्क सूत्र - एम.आर.अयंगर. , इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड,जमनीपाली, कोरबा. मों. 08462021340

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