प्रगतिशील साहित्य : डा॰ रामविलास शर्मा की स्थापनाएँ (२) / डॉ. महेन्द्रभटनागर

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गतांक से आगे .... रामविलास शर्मा हिंदी-साहित्य  में प्रगतिशील आंदोलन ने अपनी जड़ें मज़बूती से जमा ली हैं। इस आन्दोलन को मज़बूत बनाने में ...

गतांक से आगे ....
रामविलास शर्मा
हिंदी-साहित्य  में प्रगतिशील आंदोलन ने अपनी जड़ें मज़बूती से जमा ली हैं। इस आन्दोलन को मज़बूत बनाने में डा॰ रामविलास शर्मा का नाम प्रमुख है। हिंदी भाषा और साहित्य की विभिन्न समस्याओं पर डाक्टर रामविलास ने समय-समय पर प्रकाश डाला है एवं प्रगतिशील आंदोलन का नेतृत्व भी किया है। उन्होंने अपने विचार बड़ी स्पष्टता के साथ और सरल भाषा में व्यक्त किये हैं। प्रगतिशील हिंदी-साहित्य की सबलताओं और दुर्बलताओं का विस्तृत विवेचन उनकी आलोचनाओं में मिलता है।
प्रगतिशील साहित्य के संबंध  में उनकी मान्यताएँ  निम्नलिखित हैं —
(1) प्रगतिशील साहित्य भरतीय जानता की सांस्कृतिक विरासत का ऐतिहासिक विकास है।
(2) प्रगतिशील साहित्य राष्ट्रीय स्वाधीनता, शांति और जनतंत्र के लिए संघर्ष का साहित्य है।
(3) प्रगतिशील साहित्य देश से साम्राज्यवाद-सामंतवाद की संस्कृति को निकालने के लिए संघर्ष करता है।
(4) प्रगतिशील साहित्य विभिन्न भाषावार इलाकों की जनता में एकता क़ायम करता है और उनकी आपसी मित्रता और भाईचारे को दृढ़ करता है।
(5) प्रगतिशील साहित्य ‘विज्ञान से प्रेम’ और ‘कला जनता के लिए’ इन दो सिद्धन्तों को मिलाकर चलता है।
(6) प्रगतिशील साहित्य जनता की सेवा करने वाले तमाम साम्राज्य-विरोधी और सांमत-विरोधी लेखकों की एकता को दृढ़ करने से विकसित होता है। (‘प्रगतिशील साहित्य किसे कहते है?’ — ‘प्रवाह’, फ़रवरी 1952)
प्रगतिशील साहित्य के संबंध  में डा॰ रामविलास शर्मा की उपर्युक्त मान्यताएँ प्रगतिशील साहित्य को व्यापक क्षेत्र में प्रस्तुत करती हैं; किसी राजनीतिक पार्टी-विशेष की संकीर्ण परिधि में नहीं। इस प्रकार हिंदी-साहित्य में डा॰ रामविलास शर्मा ने सर्वप्रथम इतने स्पष्ट और सुनिश्चित रूप में प्रगतिशील साहित्य के महत्त्वपूर्ण तथ्यों को सामने रखा। उनके इस दृष्टिकोण में उदारता और व्यापकता उचित मात्रा में विद्यमान है। इसी व्यापक दृष्टिकोण के कारण ही; वे आधुनिक-पूर्व के हिंदी-साहित्य के प्रति उचित न्याय कर सके हैं। कहना न होगा कि यह वैज्ञानिक दृष्टि उन्हें मार्क्सवादी दर्शन ने दी है।
प्राचीन हिंदी-साहित्य, कुछ कट्टर सैद्धांतिक प्रगतिवादी आलोचकों द्वारा उपेक्षित ही नहीं रहा, वरन् उसकी अवैज्ञानिक व्याख्या भी हुयी। उसमें पाये जानेवाले प्रगतिशील तत्त्वों को अनदेखा किया गया। यही नहीं, उन प्रगतिशील तत्त्वों के वाहक साहित्यकारों की निरर्थक पर्याप्त निंदा भी की गयी। यह कहना अनुचित न होगा कि उन आलोचकों में उतनी कट्टर सैद्धांन्तिकता नहीं है; जितनी नासमझी। जितना इतिहास को समझने का उनका ग़लत और अवैज्ञानिक दृष्टिकोण है। उदाहरणार्थ तुलसीदास का साहित्य अथवा छायावादी साहित्य। डा॰ रामविलास ने प्राचीन हिंदी-साहित्य को सर्वप्रथम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखा और उसके प्रगतिशील तत्त्वों की छानबीन की। इस परख में जहाँ उनका उदार और व्यापक दृष्टिकोण मिलता है; वहाँ उन्होंने उसमें पाये जाने वाले प्रतिक्रियावादी तत्त्वों को छिपाया भी नहीं है। ऐसी आलोचनाओं में डा॰ रामविलास शर्मा जी का व्यक्तित्व सर्वाधिक प्रखर और प्रभावशाली रूप में प्रकट हुआ है। ‘तुलसी-साहित्य के सामंत-विरोधी मूल्य’ का विश्लेषण करते हुए; उन्होंने कुछ प्रगतिवादी आलोचकों की अवैज्ञानिता पर प्रकाश डाला है। वे लिखते हैं —
‘दो तरह के लेखकों ने तुलसी-साहित्य के मूल्यांकन को बहुत आसान बना दिया है। पहली तरह के लेखक वे हैं जो समझते हैं कि तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ लिखकर इस्लाम के आक्रमण से हिंदू-धर्म की रक्षा कर ली और राम, सीता आदि के चरित्रों द्वारा हिंदू-सामाज और हिंदू-संस्कृति के लिए अमर आदर्शों की प्रतिष्ठा कर दी। दूसरी तरह के आलोचक वे हैं जो समझते हैं कि तुलसीदास ने वर्णाश्रम-धर्म के छिन्न-भिन्न होने के समय फिर ब्राह्मणवाद का समर्थन किया, नारी की पराधीनता को आदर्श के रूप में रखा और जनता को भक्तिरूपी अफ़ीम की घूँटी देकर सुला दिया।
पहली  तरह के आलोचक  तुलसीदास को श्रद्धा की दृष्टि से उन्हें हिंदू-धर्म का उद्धारक मानते हैं। दूसरी तरह के आलोचक उन्हें प्रतिक्रियावादी मानते हैं, उनकी कला का महत्त्व स्वीकार करते हुए भी उनकी विचारधारा को प्रगतिविरोधी मानते हैं। दोनों तरह के आलोचक-श्रद्धा के बावज़ूद-एक ही नतीज़े पर पहुँचते हैं और वह यह कि तुलसीदास जर्जर होती हुई सामंती संस्कृति के पोषक थे, इसलिए आज की जातीय संस्कृति के निर्माण में-ऊँची जाति और ‘नीची’ जाति के हिंदुओं, मुसलमानों आदि की मिली-जुली संस्कृति के निर्माण में — उनकी विचार-धारा कोई मदद नहीं दे सकती। दोनों ही तरह के आलोचक भारतीय जनता को — ख़ासकर कर हिंदी-भाषी जनता को — तुलसीदास की सांस्कृतिक विरासत से वचिंत कर देते हैं। क्या इस तरह की धारणाएँ वैज्ञानिक हैं ? क्या वे जनता के हित में, हमारी जातीय संस्कृति के विकास के हित में हैं ?’
डॉ.महेंद्र भटनागर
इसी लेख के अंत  में वे लिखते हैं — ‘यहाँ मेरा उद्देश्य तुलसी के सभी विचारों का मूल्यांकन करना या उनकी कला का विवेचन करना नहीं है। मेरा उद्देश्य वर्णाश्रम, नारी-समस्या, राजा-प्रजा को लेकर कुछ वामपंथी लेखकों में फैली हुई गुमराहियों का निराकरण करना है।’ इस प्रकार डा॰ रामविलास जी ने प्राचीन हिंदी-साहित्य के प्रगतिशील तत्त्वों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया ; जिसके परिणामस्वरूप  अन्य आलोचक भी इस दिशा में उन्मुख हुये । जो शुभ हुआ।
डा॰ रामविलास शर्मा  जी की यह उदारता युक्तियुक्त  है। लेकिन, उन्होंने कुछ प्रगतिशील आलोचकों की वृथा-भावुकता को सप्रमाण प्रस्तुत किया है। उनकी नासमझी पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। इसी अति उदारता के फलस्वरूप हिंदी-आलोचना-साहित्य में एक अजीब विरोधाभास आया। अनेक ऐसे साहित्यकारों और उनकी कृतियों को इन आलोचकों ने प्रगतिशील घोषित किया; जो सामाजिक उत्तरदायित्त्व से अपने को मुक्त समझते हैं। जिन्होंने  अस्वस्थकर कृतियों का सृजन किया है। डा॰ रामविलास में जहाँ संकीर्णता का अभाव है; वहाँ उनमें अति-उदारता भी नहीं मिलती।  
‘अज्ञेय’ के ‘शेखर : एक जीवनी’ उपन्यास की आलोचना करते हुए डा॰ रामविलास लिखते हैं — ‘आश्चर्य इस बात पर नहीं है कि ‘अज्ञेय’ ने ‘शेखर’ में यह सब लिखा है। आश्चर्य इस बात पर है कि हिंदी के ‘प्रगतिशील’ आलोचक ‘शेखर’ को क्रांतिकारी उपन्यास कहकर उसकी तारीफ़ों के पुल बाँधते नहीं थकते।’ यशपाल के उपन्यासों की आलोचना करते हुए वे आगे कहते हैं — ‘प्रेमचंद को छोड़ दीजिए, वृंदावनलाल वर्मा, अमृतलाल नागर, आदि के कथा-साहित्य के पात्रों से यशपाल के नायकों की तुलना करें तो मालूम हो जाएगा कि जिस राजनीति का अनुसरण करने का वह दम भरते हैं, वह उनके लिए एक नारा भर है। वह राजनीति जनता के जीवन की समझ-बूझ से पैदा नहीं हुई; वह सुनीता की परंपरा पर चिपकायी हुई कागज़ की स्लिप मात्र है; जो हवा में इधर-उधर खड़़खड़ाया करती है।... ‘अपनी कुछ कहानियों में यशपाल ने यह आत्मपीड़ा और राजनीति की स्लिप चिपकाने का नाटक भी नहीं किया। उनमें भोंडा सेक्स-वर्णन हिंदी के अनेक साड़ी-जम्परवादी कलाकारों की परंपरा के अनुकूल हुआ है।... ‘प्रगतिशीलता के नाम पर पूँजीवादी व्यभिचार का चित्रण करके वह ( यशपाल) एक तरफ़ तो प्रगतिशीलता को रोज़गार की एक अच्छी चीज़ बना देते हैं, दूसरी तरफ़ उन ईमानदार पाठकों को प्रगतिशील साहित्य से दूर ठेल देते हैं; जो पुराने साहित्य के अलावा इंसान की ज़िंदगी पर नये दृष्टिकोण से सोचना-विचारना चाहते हैं।’


 शेष अगले अंक में ....

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